Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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16.6.08

"भारतीय" सुधर गए या गूगल ?


विनीत खरे

मेरी एक पोस्ट "गुगल करें तो टेक्नोलॉजी और करें अश्लीलता" पर ब्लॉगर मित्रों की अलग-अलग राय थी.
ritu said... सिर्फ s ही नहीं और अक्षर भी टाइप करके देखिए...
June 9, 2008 1:06 PM

ab inconvenienti said... वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को! आप गूगल के बारे में इतना सब जानते हैं तोफ़िर यह भी मालूम ही होगा की ऑटोसजेस्ट एक स्वचालित प्रक्रिया है, इसमें प्रदर्शित शब्द हिन्दी में अब तक के सबसे अधिक खोजे गए शब्द हैं........... अब अगर ठरकी हिन्दी वाले यही सब सर्च करते हैं तो बेचारा गूगल क्या करे? गूगल 43 भाषाओं में सर्च की सुविधा देता है, पर वह चूँकि हिंदुस्तान की अति पावन संस्कृति षडयंत्र के तहत विनष्ट करना चाहता है, इसीलिए हिन्दी ऑटो सजेस्ट में ऐ से जेड तक हर अक्षर में अश्लील शब्द जानबूझकर घुसा दिए गए , हम उसका मरते दम तक विरोध करेंगे! (और 'एस' क्या सभी अक्षरों में ऐसे ही शब्द ऑटो सजेस्ट हो रहे हैं, ज़रा ये भी पता लगा लें की हिन्दी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग (और शायद सबसे लोकप्रिय साईट भी) मस्तराम मुसाफिर ब्लॉग पर रोज़ कितने हिट्स/कमेंट्स आते हैं)
June 9, 2008 2:28 PM

संजय बेंगाणी said... इस महान संस्कृति की पैदाइश, हम भारतीय अगर सेक्स को खोजते रहेंगे तो यही दिखेगा न... गूगल इसमें क्या करे? और हम भारतीयों की संस्कृति सेक्स शब्द से ही खत्म हो जाती है, पता नहीं तीस से एक सौ बीस करोड़ कैसे हो गए?
June 9, 2008 6:34 PM

चौराहा said... विनीत बाबू दरअसल इसमें गूगल की कोई ग़लती नहीं है। लोग पहले जिन शब्दों से सर्च करते हैं वो उन सबको स्टोर कर लेता है बाद में नए सर्फर को ऑटो सजेस्ट में वो उन्हीं शब्दों को मुहैया करवाता है। ये दो तरफा मामला है। जैसा इनपुट होगा वैसा ही आउटपुट भी मिलेगा। और हां एक काम कीजिएगा निवेदन है कि अपनी टिप्पणियों से मेरे ब्लॉग चौराहा का जो लिंक इनकन्वीनिएंट महोदय ने आपको दिया है उसे हटाने की कृपा करिएगा। ये कोई अश्लील ब्लॉग नही है। वो मेरा एक लेख है जो हिंदी में अश्लील ब्लॉग्स के ऊपर लिखा गया था। उन्होंने उसे कुछ ग़लत संदर्भ में ही पेश कर दिया है।
June 9, 2008 8:12 PM

akumarjain said... विनीत भाई,अपना भारत तो कृष्ण जी की रासलीला और खजुराहो की शिल्पकला और वात्सायन बाबा की चौसठ कलाओं का देश है, फिर गुगल दादा से क्या होना जाना है??भाई, जब स्कूलों मे यौन शिक्षा की बात हो रही हो तो मेरे ख्याल से आपको भी बिना देर किये अपने पट इन बातों के लिये खोल देने चाहियें।
June 9, 2008 11:02 PM
विनीत खरे said... मित्रो गूगल भारत इतना समझदार है कि "S" लिखते ही वह समझ गया कि user "सेक्स" समबन्धित शब्द ही ढूंढ़ रहा है ....वाह
June 9, 2008 11:44 PM

विनीत खरे said... अगर हम हिन्दी भाषी यही तलाशते है तो google.co.in के इग्लिश वर्ज़न में ऑटो सजेस्ट मैं "S" लिखने पर ऑटो सजेस्ट क्यों नहीं आता है? क्या यह हिन्दी भाषियों को बदनाम करने की शजिश तो नहीं ?
June 10, 2008 5:57 PM

आलोक said... विनीत जी, आपका लेख और उस पर की टिप्पणियाँ पढ़ीं। लंबा जवाब था इसलिए अपने चिट्ठे पर लिखा है। अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा।
June 10, 2008 11:55 PM

akumarjain said... आलोक जी,आपका चिट्ठा छान मारा लेकिन गूगल वाली पोस्ट नही दिखाई दी। अगर आप अपने चिट्ठे के बदले पोस्ट का लिंक दे देते तो जरा सुविधा होती।
June 11, 2008 12:06 AM
आलोक said... आपको हुई असुविधा के लिए क्षमा, यह है लेख की कड़ी - गूगल सुझाव, टेक्नोलॉजी, अश्लीलता, और प्रयोक्ता का अनुभव - सुधारना आपके हाथ में है
June 12, 2008 6:24 PM

akumarjain said... आलोक जी, कडी के लिये धन्यवाद। आपके आलेख पर मैने एक छोटी सी छीटाकशी की है, उसका अवलोकन जरूर करें। मुझे लगता है कि हिंदी ब्लागिंग तथा मीडिया से जुडे बंधुओ को इसके लिये गुगल से विरोध जताना चाहिये। विरोध सामुहिक भी हो सकता है और व्यक्तिगत भी।
June 13, 2008 9:54 AM

9.6.08

गुगल करे तो टेक्नोलॉजी, कोई और करे तो अश्लीलता !!

http://paankidukaan.blogspot.com
विनीत खरे
गुगल (http://www.google.co.in/ ) पर जा कर पेज को भाषा को हिन्दी में बदलें, आपका पूरा पेज हिन्दी में हो जाएगा लेकिन सर्च बार में "s" लिखते ही आप चौक जायेंगे। उस में सिर्फ "सेक्स" संबंधित शब्द ही आते है।


गुगल ने एक टेक्नोलॉजी प्रयोग करके user के लिए ऑटो सजेस्ट की टेक्नोलॉजी तैयार की है जिससे user एक वर्ड को लिखते ही आपको उस वर्ड से संबंधित शब्द आ जायगे।


मित्रों, गूगल के लोगो (Google's Logo) के नीचे भारत लिखा है, भारत की संस्कृति पर हमला नहीं है ये? क्या भारत में इतना खुलापन है की "s" लिखते ही सेक्स के शब्द ऑटो सजेस्ट हों?

1.4.08

... तब कहाँ छुपे थे भाई !!!

मेरे एक ब्लॉग पोस्ट "थोड़ा हिन्दी जान लो भाई !!!" को हिन्दी ब्लॉगर ने "इतनी गंभीरता" से लिया इसके लिए धन्यवाद! उनके नाम न लिखते हुए कमेंट यह है।


Comment One...
अब ऐसे मजाक घटिया लगते हैं। जाने-अनजाने आप हिन्दी के विरुद्ध किये जा रहे इस तरह के षडयन्त्रों में सहभागी हो रहे हैं। यदि दम हो तो कभी अंग्रेजी की पारिभाषिक शब्दावली का विश्लेषण कीजिये और समझने की कोशिश कीजिये कि वे कितने सार्थक हैं।
March 31, 2008 11:32 AM


Comment Two...
हास्य अच्छा है, पर आप अपनी हिन्दी थोडी सुधर लीजिये, ,, "थोड़ा हिन्दी जान लो भाई !!!" .. को अगर "थोड़ी हिन्दी जान लो भाई !!!" लिखते तो बेहतर होता..
March 31, 2008 12:56 PM


Comment Three...
एक बेहुदा मजाक, ऐसा शाहरूख व साजिद जैसे लोग करते है.
March 31, 2008 1:40 PM


Comment Four...
कितनी हीन भावना धंसी है आपमें जो अपनी मातृभाषा के साथ ये बेहूदगी आपको हास्य लगती है।
March 31, 2008 3:06 PM


Comment Five ...
Behoodi harkat hai yeh.
April 1, 2008 8:18 AM


लेकिन मुझे यह जानना है कि हिन्दी की यह दुर्दशा हो रही थी तो यह मठाधीश कहा थे। मुझे यह भी जानना है कि उसमें लिखे अग्रेजी के शब्दों का अर्थ अगर उन लोगो को पता है तो मुझे भी बता दे ताकि मैं भी उसको सुधर लू।

22.3.08

जिधर देखू तेरी तस्वीर नजर आती है !

विनीत खरे
http://paankidukaan.blogspot.com


यह बात तब की है जब मैंने अपना कदम जवानी देहलीज पर रखा ही था। उस समय मैं १२वी में पढता था, कुछ भी नहीं पता था कि क्या सही है, क्या ग़लत है, क्या करना है, बस एक सूत्री काम दोस्तो के साथ "मौजा ही मौजा"।

वैसे तो होली मेरे लिए हमेशा ही खास होती है लेकिन उस साल की होली तो मुझे आज तक याद है, हम पांच दोस्त होली की मस्ती मे थे एक दुसरे की टांग खीचते हुए सिविल लाइन्स से चौक की तरफ़ बढे चले। करीब आधे घंटे में चौक पहुचे। वहाँ चौराहे पे करीब २०० से ३०० लड़के अपनी मस्ती नाच गा रहे थे। हम भी उन्ही में शामिल हो गए।

तभी मेरी नजर एक मकान की खिड़की पर पड़ी, उस पर एक लड़की खड़ी थी, मैंने पहले तो टालने की कोशिश की लेकिन नजर थी की कुछ समय बाद वही चली ही जाती। उसकी आखों में अजीब से कशिश थी। मैंने अपने दोस्तो को भी दिखाया लेकिन वह तो होली की मस्ती में चूर थे। लेकिन मैं तो उसे देखता ही रहा। थोडी देर में हम लोग भी अपने अपने घरो के लिए चल दिए। लेकिन मैं घर कब, कैसे और कितनी देर में पंहुचा पता ही नहीं चला।

घर पहुँच के मैं नहा के सो गया लेकिन वह मेरे आखों के सामने घूम रही थी। मैंने सोचा एक दो दिन में यह खुमारी चली जायगी लेकिन मैं जिधर जाता सिर्फ़ वह ही वह नजर आती थी। न ही खेलने में मन लगता न ही किसी और काम में। इस बात को करीब 15 साल हो गए है। सिलसिला आज शायद कम हो गया है लेकिन आज भी वह मुझे नहीं भूलती।

16.3.08

कुछ तो बात है अपने पुराने शहरो में ...

विनीत खरे
(http://paankidukaan.blogspot.com/)
इस महानगर की भागदौड़ में मैं शायद खो गया हूँ। मैंने अपने को खोजने नाकाम कोशिश की कुछ याद आया लेकिन धुंधला सा।


मैं इलाहाबाद में रहता था , वहाँ के रास्ते गलियां सब अपने थे, जब भी मैं अपनी साईकिल से वहाँ से निकलता था, कोई न कोई चाचा ताऊ मिली ही जाता था। मैं भी उन लोगो को बहुत अदब से नमस्कार करता था। फिर वह अपने घर ले जाते, चाची प्यार से अपने हाथो से बने लड्डू खिलाती फिर हालचाल पूछती थी। ..... लेकिन महानगर में तो कोई एक दूसरे को पहचानते ही नही। लड्डू क्या वह तो नमस्ते तक नहीं करते।


कुछ तो बात है अपने पुराने शहरो में ...


वहाँ के तयौहारों में तो पता चलता त्यौहार है। हफ्तो पहले से ही माँ तैयारी शुरू कर देती थी। वहाँ की होली की बात ही कुछ और। वह् माँ के साथ आलू के पापड़ बनवाते बनवाते चुपके से खाना, गुझिया के बनते समय गरम-गरम चखना, शाम को हास्य कवि सम्मेलन में वह हास्य की फुहार, होली जलने की रात दोस्तो के साथ शहर में घूमना, वह होली के दिन रंगो की बाल्टी, हर तरफ़ अबीर गुलाल .... लेकिन यहाँ तो भाई एक दूसरे को रंग क्या पानी की बूंद नहीं डालता।

यहाँ मरने पर चार कंधे नहीं नसीब होते है. यहाँ रहने वाले एक अजीब सी जी रहे है। जिसमे न प्यार, न रिश्ते , न जज्बात, बस जी रहे है। मेरा मानना है कि ९०% लोगो वही के है लेकिन वहाँ के लोग महानगर में आ के महानरकीय जिन्दगी जी रहे है। पता नहीं क्यों जी रहे है।