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10.8.08

डाक्टर रूपेश ! शेम-शेम... चुप्पी क्यों साध रखी है????


डाक्टर रूपेश ! शेम-शेम... शर्म की बात है आपके लिये ........ हर पोस्ट पर टिप्पणी लिखने वाले करुणाकर की मौत की बात पर चुप्पी क्यों साधे हो????? आज मुझे ये सुनने को मिल रहा है तो इसमें क्या ऐसा है जो मुझे दुःख होना चाहिये क्योंकि मैं तो जादूगर हूं साथ ही धरती का भगवान कहलाता हूं यानि कि चिकित्सक....... मैं क्यों असाध्य कहकर मौत का तिल-तिल इंतजार करते लोगों का उपचार अपने जिम्मे पर ले लेता हूं ???? मैंने अपने अध्ययनकाल में न जाने कितनी बार देखा कि पच्चीसों डाक्टरों की टीम मरीज को एण्टी-स्पाज़्मोडिक दवाएं दे रही ऐ फिर भी पेट दर्द है कि रुक नहीं रहा या संसार का सबसे अच्छा हार्ट-स्टिम्युलेंट देने के बावजूद पूरी टीम के सामने कार्डियोग्राम फ़्लैट होता जा रहा है और बस अगले पल एक सीधी लकीर..... खत्म ... जीवन समाप्त.... क्यों..क्यों...?????? बस इसलिये कि सुनिश्चित हार की घोषणा के बाद भी मैं लड़ना छोड़ कर हथियार डाल कर बैठ नहीं जाता.......। मैंने करुणाकर के परिवार के लिये सांत्वना के दो शब्द तक नहीं बोले या लिखे जबकि इस मुद्दे (मुद्दा इसलिये कह रहा हूं क्योंकि इस विषय के चलते मुझे ख्याति मिलने वाली थी जिसे कि मैं भविष्य में शायद कैश कराता ऐसा लोगों का विचार है ) पर मुझे सबसे ज्यादा चिल्ल-पौं करना चाहिये था आखिर हार मेरी हुई... चिकित्सा शास्त्र की हुई... आयुर्वेद की हुई....। कोई प्रलाप न करूंगा और न ही इस बात का अफसोस करूंगा कि मैं इस मिशन में नाकामयाब हुआ.......। मैं हर बार जीतता हूं जीवन की जंग क्योंकि डूबते जहाज की कप्तानी स्वीकारने का साहस है ... भय नहीं है इस बात का कि लोग निंदा करेंगे .... इस भय से मरणासन्न रोगी को भगा नहीं देता और अंतिम सांस तक लड़ता हूं। चिकित्सा करने पर अगर चमत्कार नहीं होता तो मैं निस्संदेह अपराधी ही तो हूं मुझे मार डालना ही सही न होगा क्या???? एक दिन मैं भी मरूंगा और किसी चिकित्सक को मेरे परिवार के लोग कोसते हुए आगे बढ़ जाएंगे जीवन पथ पर .....।
बस इतना ही..............