Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label हड़ताल. Show all posts
Showing posts with label हड़ताल. Show all posts

8.9.10

फेसबुक पर 7 सितम्बर की हड़ताल

          आज मजदूरों के विभिन्न संगठनों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मंहगाई और दूसरी समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय हड़ताल की। विभिन्न कल-कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों में यह हड़ताल बेहद सफल रही है। मैंने फेसबुक के जरिए जानने कोशिश की थी कि विभिन्न इलाकों में हड़ताल कैसी रही और इस कुछ दोस्तों ने जो प्रतिक्रिया भेजी है वह देखने लायक है इससे हड़ताल का अंदाजा लगेगा साथ ही दोस्त कैसे देख रहे हैं इसका भी अंदाजा लगेगा।             

मैंने लिखा था - भारत में आज केन्द्रीय मजदूर संगठनों के आह्वान पर राष्ट्रीय हड़ताल चल रही है। मेरे शहर कोलकाता और समूचे प्रांत में इस हड़ताल ने आम हड़ताल की शक्ल ले ली है। यह मजदूर संगठनों की मंहगाई के विरोध की गई जायज हड़ताल है। आपके शहर और प्रांत में यह हड़ताल कैसी रही कृपया बताएं ?

Subhash Rai-  08 सितंबर 2010 को 04:32 बजे
Jagdishwar jee, Agra mandal men bhee hadtal ka vyaapak asar raha. sadakon par aavajaahee kam rahee, sarkaree daftar soone rahe.

.
           
Niranjan ShrotriyaSeptember 8, 2010 at 6:41am
जगदीश्वर भाई! दुखद है की मध्य प्रदेश में अब ट्रेड यूनियन्स का वह प्रभाव अब नहीं रहा! केवल बॅंक्स में छुटपुट असर दिखा! कुल मिलाकर हड़ताल निष्प्रभावी ही रही
Kishan Kaljayee - wrote:
"Delhi me bhi mujhe band ka koee khas asar nahi dikha.Lekin yah hadtal jaruri mudde par thi."

Divik Ramesh commented -
"दिल्ली महानगर ही नहीं देश की राजधानी हॆ । फिर भी काफ़ी अचर रहा हॆ । मुझे १९७३-७४ के दिन याद आ गये । महगाई के विरोध में ही मॆने भी धारा १४४ तोड़ी थी ऒर भूपेश गुप्त जॆसे बड़े नेताओं के साथ जेल (तिहाड़ जेल) में भी रहा था । शायद अध्यापक होने के नाते नॊकरी नहीं गई ।"
Ashish Tripathi - yahan banaras men to kuch ka pata hi nahin chal raha hai...

Asrar Khan -
"Delhi samet NCR mein hadtal kafee had tak kamyaab rahi ..Trade unions ne jamkar akta dikhai  jise dekhkar aissa laga ki vartmaan sarkar se log keval asantust hi nahin  valki sarkar se logon ka vishvaas uth gaya hai... mujhe lagta hai ki hamara desh bahut bade asantosh ki taraf badh raha hai."
ent you a message.
           
Jitendra Srivastava-  08 सितंबर 2010 को 08:52 बजे
dilli men vasa hee hai jaisa aksar hota hai.
Abdul wrote:
"yes com this is Indian Historic movment, long live All india UTUC ..........."
and Ajay Kamath like this.
Tapan Dasgupta -All Central Trade Union called an all India industrial stike agaist price rise, contract system, rights of the unorganised workers, privatisation etc., which got tremendous support and has been a great sucess. In Vadodara thousands of workers took out a rally from Mandvi - a historic central place of Vadodara to Collector Office and submitted a memorundum to him.
message.
           
Shri Krishna Sharma- 07 September 2010 at 17:34
दिल्ली के मजदूरों की स्थिति दूसरे राज्यों के मजदूरों से ज्यादा खराब है। कभी किसी बहाने तो कभी किसी वजह से , उन्हें एक जगह पर रहने तक
नहीं दिया जाता है इसलिए वे हक की लडाई तक में पीछे रह जाते हैं। एक तो कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी, ऊपर से घनी बरसात ने मजदूरों को बिखेर कर रखा है। इस वजह से यहाँ उतना प्रभाव दिखाई नहीं दिया जितना आप वहाँ बता रहे हैं।
     
Pankaj Chaturvedi- 08 September 2010 at 09:42
delhi is the capital and i saw little bit effect on auto rickshaw, except life was normal
Anupam Ojha - "Mumbai me atyant safal rahi ye hadataal !"

you a message.
     
Vineet KumarSeptember 8, 2010 at 10:51am
सॉरी सर,अभी आपका मैसेज देख पाया। दिन में फर्स्ट हाफ में थोड़ा असर दिखा लेकिन शाम के वक्त सीपी में तो सारी दूकानें खुली दिखी। काफी-चहल पहल भी। मयूर विहार में रहता हूं,वहां कोई असर नहीं दिखा।
ent you a message.
     
Meethesh Nirmohi08 सितंबर 2010 को 10:38 बजे
samanya rukh hee raha.

Sudha Tiwari - "चंडीगढ़ में बंद का असर मिला- जुला रहा.बैंक वगैरह बंद थे,स्कूल सारे खुले रहे और सड़क पर निजी वाहन ही चल रहे थे,बस- ऑटो वालो ने बंद का साथ  पूरी तरह से दिया जबकि   टैक्सी वालों ने आंशिक रूप से ."

Satyanand Nirupam -
dilli mein kuchh pata nahin chal paya, jahan tak main dekh paya...

Ajay Saklani - जगदीश्वर जी, मैं दिल्ली में रहता हूँ और यहाँ हड़ताल के लिए कोई जगह नहीं है| जंतर मंतर में जो लोग आन्दोलन करते हैं वो वहां आन्दोलनकारियों की भीड़ में खो जाते हैं| रोजाना वहां जा पाना नहीं हो पता है और समाचार वाले तो सर्कार और पूंजीपतियों के गुलाम हैं| तो असर कैसा है उसे जान पाना थोड़ा मुश्किल है| गरीबों को इस आन्दोलन के बारे में या तो पता नहीं है क्योंकि वो अपने जीने के लिए दो पैसे कमाने में व्यस्त हैं और अमीर इसे तमाशा समझते हैं| कौन जी रहा है और कौन मर रहा है इस से अमीरों को कुछ लेना देना नहीं है| उन्हें तो बस हराम की कमाई पसंद है| 
कुछ आन्दोलन ऐसे भी अहिं जिन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल है| उन आंदोलनों में बैठे ज़्यादातर लोग यह भी नहीं जानते की वो यहाँ क्यों बैठे हैं क्योंकि उन्हें राजनीती के तहत किसी राजनितिक दल के स्वार्थ के लिए उपयोग किया जा रहा है| 

24.7.09

पानी की बूँद में हड़ताल की फुहार

मुंबई में इन दिनों इन्द्र देवता मेहरबान हैं। सागर उफान मार रहा है। साथ में हड़ताल राज्य सरकार के ऊपर ज्वार भाटा की तरह आ रही है। पहले तो मानसून ने महाराष्ट्र में बहुत देर से दस्तक दी। इसके बाद दस्तक का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अभी तक राज्य सरकार के ऊपर मुसीबत बनाकर आता जा रहा है। पहले रेसिडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल की। अपनी मांगों पर अड़ गए। और न राज्य सरकार झुकी, न ही डॉक्टर । अंततः सरकार को झुकाना पड़ा और फ़िर तो इसके बाद महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों का मिजाज़ ही बदल गया। और अब डाक्टर , शिक्षक हड़ताल पर चले गए है। वैसे अगर देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय ने बंद और हड़ताल पर पाबंदी लगा रखा है। बावजूद इसके अपनी मांगों को लेकर विभिन्न संगठन गाहे- बगाहे हड़ताल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे मानकर चलते हैं किअपनी मांगें मनवाने का यही एक रास्ता है। घी कभी सीधी उंगली से नहीं निकलता है। कई श्रम संगठन आज भी हड़ताल को अपना अधिकार मानते हैं। हड़ताल करने वाले कभी ये नहीं सोचते कि हड़ताल करने से आम जनता में क्या असर पड़ेगा। और जनजीवन कितना प्रभावित होगा। जब समझौता और समाधान के सभी रस्ते बंद हो जाए तो हड़ताल करना उनका अन्तिम अस्त्र बनता है। अगर अतीत में जाएँ तो मुंबई में दत्ता सावंत हड़ताल कराने में अग्रणी थे। उन्होंने कपडा मिल मालिकों की लम्बी हड़ताल कराई थी। इससे फायदा नहीं बल्कि बहुत बड़ा नुकसान हुआ था। मिल मालिक झुके नहीं और मजदूरों पर भुखमरी और बेकारी की नौबत आ गयी। मिल मालिकों ने मिलों की जमीन को बेंचकर अपनी रकम खड़ी कर ली। और मजदूरों के परिवारों पर तबाही टूट पड़ी। हड़ताल जब लम्बी खिचती है तो मालिक या नियोक्ता नहीं बल्कि सीमित साधनों वाला श्रम जीवी वर्ग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यानी कि चाकू खरबूजे पर गिरे या फ़िर खरबूजा चाकू पर गिरे। नुकसान खरबूजे का ही होना है। अभी रेसिडेंट डॉक्टरों का इलाज हुआ ही था कि वैद्यकीय अधिकारी और प्राध्यापक बीमार हो गए हैं। वो भी इन दिनों सरकार से मांगे मनवाने में अडे हुए हैं। ज़ाहिर है इस हड़ताल से मरीजों का इलाज और छात्रों की शिक्षा पर विपरीत असर पडेगा।लेकिन जब सरकार की नीतियां ही ग़लत हो तो असंतोष के बादल फटना लाज़मी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि जब सरकार हड़तालियों की मांगें मान लेती है तो फ़िर आखिरकार सरकार इतना देर क्यों लगाती है। जिससे अव्यवस्था फैलती है। देश का विकास रुक जाता है। और देश आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर जाता है। अब क्या ये माना जाए कि आज नेताओं में वो क्षमता नहीं है जो विवेक का इस्तेमाल करके किसी समस्या के उत्पन्न होने से पहले उसका समाधान ढूंढ सकें। जब सब कुछ नुकसान हो जाता है तब सरकार के दिमाग की नसें काम करना शुरू करती है। साल भर का लेखा - जोखा लिया जाए तो डॉक्टरों, शिक्षकों,बैंक कर्मियों, एयर लाइंस कर्मचारियों , उद्योग में कार्यरत श्रमिकों की हड़ताल होती ही रहती है। हड़ताल तो विदेशों में भी होती रहती है। लेकिन वहाँ का तरीका अलग है। जापान में एक जूता फैक्ट्री में हड़ताल हुयी तो कर्मचारियों ने अपना विरोध प्रकट कराने के लिए इस दौरान एक ही पैर का जूता बनाया। उन्होंने काम करते हुए अपना विरोध जारी रखा। अंततः प्रबन्धन झुका और मांगें पूरी हो गयी। अब तो मुंबई में बारिश के मौसम में जहाँ हाई टाइड की धमकी मिलती है तो वही सरकारी कर्मचारी भी पानी की बूँद में हड़ताल की फुहार मार रहे हैं।