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17.8.10

हम सत्ता के सत्ता हमारी-ब्रज की दुनिया


भारतीय लोकतंत्र में समस्त राजनीतिक क्रियाकलापों के केंद्र में क्या है?जनता तो बिलकुल भी नहीं.वास्तव में सत्ता ही वह धुरी है जिसके चारों ओर हमारी राजनीति घूमती है और घूमते हैं हमारे राजनीतिज्ञ.लेकिन सत्ता सुंदरी को साध पाना हमेशा से बड़े-बड़े साधकों के लिए भी आसान नहीं रहा है.बहुत-से राजनेता तो आजीवन विपक्ष की राजनीति ही करते रह जाते हैं.लेकिन हमारे लिए यह गौरव की बात है कि हमने यानी हाजीपुर की जनता ने एक ऐसे व्यक्ति को राजनीतिक जीवन दिया है जिनके लिए सत्ता को साधना बाएँ हाथ का खेल रहा है.पहले श्रीमान भी हमेशा विपक्ष में नजर आते थे.१९८९ में उनकी समझ में आया कि असली मजा तो सत्ता के साथ रहकर मलाई चाभने में है.इसलिए चार दिन की अँधेरी रात में जिसे जी भरकर गालियाँ देते थे चांदनी रात वाले दिन के उजाले में उसी से गले मिलते देखे गए.जब तक साथ में सत्ता सुख भोगते रहे वही दल उनके लिए राष्ट्रवादी बन गया जिसे वे दिन-रात बोतलबंद पानी पी-पी कर सांप्रदायिक करार देते थे.सत्ता सबको शुद्ध बना देती है एकदम गंगाजल के माफिक.वे केंद्र में जिस विभाग के भी मंत्री रहे खूब बहाली की लेकिन सशुल्क.वर्ष १९९८ में सी.बी.आई. ने अजमेर रेलवे भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष कैलाश प्रसाद को उम्मीदवार से पैसे लेते रंगे हाथों गिरफ्तार भी किया.लेकिन नेताजी ने अपने रसूख के बल पर न सिर्फ मामले को रफा-दफा करवा लिया बल्कि अटल सरकार की दूसरी पारी में संचार मंत्री भी न गए.राजग भी दलित चेहरे को पाकर धन्य हुई जा रही थी.लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें भाजपा फ़िर से सांप्रदायिक नज़र आने लगी.वर्ष २००४ का लोकसभा चुनाव उन्होंने उस लालू प्रसाद के साथ मिलकर लड़ा जिनको सत्ता से हटाने के लिए लाभी वे शैतान से हाथ मिलाने को भी तैयार थे.लेकिन लालू जी ने उन्हें धोखा दे दिया.वादा करके भी रेलमंत्री का पद खुद ले लिया.बेचारे के हाथ आया इस्पात एवं रसायन मंत्रालय.लेकिन नेताजी ठहरे उर्वर मस्तिष्क के स्वामी.इस्पात मंत्रालय में भी बहाली की गई.प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.महनार में कहीं स्टील फक्ट्री का अता-पता नहीं लेकिन बहाली कर ली गई.बहाल हुए लोग क्या परती खेत में काम करेंगे?.वर्ष २००५ में उनके हाथों में सत्ता की चाबी भी आ गई जबकि उन्होंने अकेले चुनाव लड़ा था.कोई भी गठबंधन बिना उनकी सहायता के सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था.दोनों पक्षों लालू और नीतीश उनके पास चाबी मांगने गए लेकिन वे टस-से-मस नहीं हुए.हाँ यह जरूर कहते रहे कि राजद को सत्ता से हटाने के लिए वे शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं.यह उनकी जिद का ही परिणाम था कि मात्र ८ महीने बाद ही बिहार को फ़िर से विधानसभा चुनाव में जाना पड़ा.इस बार उनके हाथ से सत्ता की चाबी निकल गई.बिहार में राजग की सरकार बनते ही उन्हें फ़िर से लालू अच्छे लगने लगे.उन्होंने २००९ का लोकसभा का चुनाव लालू के साथ मिलकर लड़ा लेकिन बिहार की जनता उनके बार-बार पाला बदलने से परेशान हो गई थी.परिणाम यह हुआ कि उनकी पार्टी का सूपड़ा ही साफ हो गया और वे खुद भी हाजीपुर से हार गए.चुनाव हारने के बाद हाजीपुर के दौरे पर आए और जनता से पूछा कि उनसे कहाँ गलती हुई?श्रीमान जनता के फोन करने पर फोन पर आने की जहमत तक नहीं उठाते और अपनी गलती पूछ रहे हैं.मैंने कहा न कि नेताजी सत्ता के लिए ही बने हैं सो लालू जी के सौजन्य से राज्यसभा में पहुँच गए हैं.देखना है कि कब तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का जुगाड़ होता है.फ़िर से बिहार विधानसभा के लिए रणभेरी बज चुकी है और नेताजी एक बार फ़िर लालू जी के साथ खड़े हैं.नेताजी की पार्टी भी अलबेली है.सारे महत्वपूर्ण पदों पर नेताजी और इनके भाई जमे हुए हैं.जो निर्णय नेताजी ने ले लिया सबके लिए वही आदेश है.विरोध का स्वर सुनाई देते ही विरोधी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.यानी नेताजी की पार्टी तो भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन उनकी पार्टी में लोकतंत्र नहीं है.नेताजी खुद को अब भी दलित मानते हैं लेकिन उनके पास अकूत संपत्ति है.पहले फकीर जरूर थे अब राजाओं के लिए भी दुर्लभ ज़िन्दगी जीते हैं.फ़िर से सत्ता के लिए दांव लगा दिया है.बिहार में सत्ता हाथ लगी तो सबसे अच्छा वरना सोनिया जी का कृपापात्र होने का फायदा उठाते हुए केंद्र में शामिल हो लेंगे.सत्ता और उनमें अन्योनाश्रय सम्बन्ध जो ठहरा.वे सत्ता के लिए और सत्ता उनके लिए बने हैं और सत्ता दुनिया का सबसे बड़ा सत्य तो है ही.