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30.4.11

हे ईश्वर,दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान नहीं करना-ब्रज की दुनिया

sai baba
मित्रों,गोस्वामी तुलसीदास ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ रामचरितमानस में वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है कि जहँ-तहँ जामि तृण भूमि समुझि पड़हिं नहिं पंथ;जिमि पाखंडवाद ते लुप्त होहिं सद्पंथ.यानि वर्षा ऋतु में पगडंडियों पर इतनी घनी घास उग आती है कि राही को पता ही नहीं चलता कि वास्तव में रास्ता है किधर से.कुछ इसी तरह जब राष्ट्र और समाज में पाखंडवाद का बोलबाला हो जाता है तब लोग सन्मार्ग को भूलने लगते हैं.दुर्भाग्यवश वर्तमान भारत के राजनैतिक,सामाजिक और धार्मिक जीवन में भी बहुत-कुछ ऐसा ही हो रहा है.

              मित्रों,आध्यात्मिक दृष्टि से दुनिया में हमेशा से तीन तरह के लोग रहे हैं.एक वे जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं,दूसरे वे जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखते और तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो अन्धविश्वासी हैं.इसी तीसरी श्रेणी की मौजूदगी का लाभ उठाते हैं बगुला भगत की तरह पाखंडपूर्ण जीवन जीनेवाले लोग.भारतीय इतिहास के पन्नों को अगर हम पलटें तो पहली बार अथर्ववेद में मंत्र-तंत्र,जादू-टोने और चमत्कार का जिक्र आता है.हालाँकि सिन्धु-घाटी सभ्यता के शहर मोहनजोदड़ो से एक पुजारीनुमा व्यक्ति की मूर्ति प्राप्त हुई है लेकिन वह जनसमुदाय को प्रभावित करने के लिए जादू-टोने और चमत्कार का प्रयोग करता था या नहीं;का कोई साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और जब तक सिन्धु-घाटी सभ्यता की लिपि पढ़ नहीं ली जाती तब तक ऐसा हो पाने की कोई सम्भावना भी नहीं है.उत्तरवैदिक काल में चार पुरुषार्थों का सिद्धांत आया.अर्थ,काम,धर्म और मोक्ष में मोक्ष की महत्ता सबसे ज्यादा मानी गयी.इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता था.लेकिन बाद में जब बौद्ध धर्मं में पाखंड का प्रभुत्व बढ़ा और तंत्रयान और वज्रयान का प्रभाव बढ़ा तब बोधिसत्व (बौद्ध मुनि) धन लेकर दूसरे लोगों के दुखों-पापों को अपने ऊपर लेने और अपने तपोबल से मोक्ष दिलवाने का दावा करने लगे.बुद्ध की जातक कथा से प्रेरित होकर ब्राह्मणों ने विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं का अवतार करवाना शुरू कर दिया.पहले राम,फिर कृष्ण जैसे महामानवों को विष्णु का अवतार बना दिया गया.ऐसा भारत में हमेशा से होता आया है कि किसी असाधारण मनुष्य के मरने के बाद लोग उसे अवतार मानकर उसकी पूजा करने लगते हैं.बुद्ध और कबीर जैसे अनीश्वरवादी और निर्गुण भी कुछ चतुर लोगों के इस प्रकार के षड्यंत्रों के शिकार हो चुके हैं.कुछ ऐसे भी लोग हुए जो अपने जीवनकाल में ही खुद के अवतारी होने का दावा करने लगे.श्रीमदभागवतपुराण जो कथित रूप से विष्णु के कृष्णावतार की कथा है;में भी एक ऐसे हीमिथ्याचारी राजा का उल्लेख है जिसने काठ की दो अतिरिक्त भुजाएँ लगवा ली थीं और खुद के विष्णु का वास्तविक अवतार होने का दावा करता था.

          मित्रों,१९वीं-२०वीं सदी में महाराष्ट्र में एक महान संत ने जन्म लिया जिसका नाम लोगों ने रखा साईं बाबा.साईं ने कभी यह नहीं कहा कि वे अवतारी हैं,बल्कि उनका चित्त,स्वभाव और जीवन-शैली तो एक छोटे-से बच्चे की तरह सरल थे.अब किसने उनमें शिव को देखा और किसने राम को;यह देखनेवाला जाने.वे तो खुद को सिर्फ एक भक्त मानते थे.हालांकि उन्होंने कुछ चमत्कार भी दिखाए जो किसी त्यागी-तपोनिष्ठ संत के लिए किसी भी तरह से असंभव नहीं है.साईं ने कोई संपत्ति भी जमा नहीं की.मरे तब पांव में जूता-चप्पल तक नहीं था.मेरे एक मामा जिन पर किसी आत्मा-वात्मा का साया था;किसी भी चीज की बरसात करा देने में सक्षम थे.तो क्या वे शिर्डी के साई बाबा के अवतार हो गए.शिर्डी के साई के देहत्याग के कुछ ही साल बाद २३ नवम्बर,१९२६ को आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी गाँव में एक बच्चे ने जन्म लिया.माता-पिता ने नाम रखा सत्यनारायण राजू.चौदह साल की उम्र में अति उर्वर मस्तिष्क के स्वामी सत्यनारायण ने स्वयं को शिर्डी के साई बाबा का अवतार घोषित कर दिया.उनकी जीवन शैली भव्य थी और जीवन यौन-स्वच्छंदता के आरोपों के कारण विवादस्पद.वह जनसामान्य को प्रभावित करने के लिए कभी भभूत को मिठाई बना देता तो कभी मिश्री.वह ऐसे चमत्कार थोक में दिखाता जो कोई भी साधारण-सा जादूगर भी दिखा सकता था.मानों उसके रूप में साई ने सिर्फ इसी मकसद से अवतार लिया था.इस बात की पुष्टि के लिए स्वयं इंटरनेट पर उसकी हाथ की सफाई की पोल खोलनेवाले कई वीडियो मौजूद हैं.हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या!
          मित्रों,त्यागमूर्ति शिर्डी के साई बाबा का यह कथित अवतारी अपने पीछे १.५ लाख करोड़ रूपये की अकूत संपत्ति छोड़ गया है.क्या ऐसा व्यक्ति शिर्डी के साई बाबा का अवतार हो सकता है?आप यह भी सोंच सकते हैं कि अगर वह संन्यासी था भी तो किस तरह का संन्यासी था?संन्यास का तात्पर्य ही पूर्ण विरक्ति होता है लेकिन यह व्यक्ति तो माया के प्रति एक सामान्य गृहस्थ से भी ज्यादा अनुरक्त था.लोगों पर अपना विश्वास ज़माने के लिए इसने अपनी मृत्यु के वर्ष की भविष्यवाणी कर रखी थी;20२२ ईस्वी.साथ ही उसने यह भी घोषणा कर रखी थी कि उसकी मृत्यु के ८ साल बाद यानि २०३० ईस्वी में वह फिर से धरती पर आएगा;प्रेम साई के रूप में.लेकिन उसकी ये दोनों भविष्यवाणियाँ उसकी मौत के साथ ही झूठी साबित हो चुकी हैं.
     मित्रों,हालाँकि उसने गरीबों की भलाई के लिए अस्पताल और स्कूल भी खोले और इन कार्यों के लिए उसकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए.लेकिन भारत में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है और उनमें से किसी ने आज तक स्वयं के अवतार होने का दावा भी नहीं किया है.कुछ लोग भारतीय परंपरा का हवाला देकर कह सकते हैं कि हमारे यहाँ मरे हुए व्यक्तियों की निंदा करना उचित नहीं माना जाता.अगर ऐसा मानना सही है तो फिर रावण और कंस जैसे पापियों के प्रसंगों को शास्त्रों से पूरी तरह हटा क्यों नहीं दिया जाता?किसी पापी का जो कर्म उसके जीवित रहते निंदनीय रहता है वह उसकी मृत्यु होते ही स्तुत्य कैसे हो जा सकता है?तो आईये मित्रों हम सब मिलकर ईश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह सत्य साई और उसके जैसे सभी पाखंडियों की आत्माओं को शांति प्रदान नहीं करे और रौरव नरक में अनंत काल तक निवास दे.