Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label poem. Show all posts
Showing posts with label poem. Show all posts

24.10.12

जिंदगी की कहानी

जिंदगी की कहानी
आसमान में उड़ते
पक्षी की तरह है!
पक्षी का पीछा करें,
तब भी आसमान में
पैरों के निशां नहीं मिलते,
पक्षी उड़ जाता है,
पीछे आकाश खाली रह जाता है,
जिंदगी में भी कहीं
कोई चिन्ह नहीं छुड़ते,
सब कुछ विस्मृत हो जाता है,
रह जाती हैं तो केवल यादें
जिंदगी तो
प्रमाण मांगती है
आज का!
आशीष कुमार 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग 
देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार  
09411400108

15.1.12

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.


भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.

एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.

भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
"भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं."----रविन्द्र

12.10.11

क्यों ?

प्यार किया तो प्यार किया, बना दिया अफसाना क्यों
तुम बदले या हम बदले अब ये सब गिनवाना क्यों ?

दोनों का ये साझा है ,बस अपना इसे बताना क्यों
तुम पहले या हम पहले इन बातों पर अड़ जाना क्यों ?

कनुप्रिया 

7.6.11

WOMAN-POEM


google se sabhar 



I want to live proudly 

I love to do everything fearlessly

I wish to make my dreams true

I like to gain veneration

I prefer revolt than compromise 

I am a ''WOMAN '' Who Opposes

Man's Autocratic Nature .
                                                shikha kaushik
                       http://gulkakaushik.blogspot.com

2.1.11

कविता: प्रतिकार

राजा सशंकित, प्रजा सशंकित और यह ध्वजा सशंकित,
सोंचता हूँ देश की धरती, तुझे त्याग ही दूँ ।
पर, ... ... ...
(भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह के प्रतिकार में यह पूरी कविता जरूर पढ़े)
http://pankaj-patra.blogspot.com/2010/11/pratikar-poem-by-prakash-pankaj.html


पिछले  कुछ दिनों से मेरे मन की स्थिति दयनीय थी। चाह रहा था कुछ लिखना पर लिख नहीं पा रहा था। अचानक उस रात फूट परे ये शब्द। करुण स्थिति में लिखी गई यह कविता समाज के कुछ ऐसे (कु)ख्यात प्रकार के लोगों को समर्पित है जो की "निम्न" हैं :

अनुच्छेद।।१।।  कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, ए. राजा और उन जैसे भ्रष्ट लोगों के लिए।
अनुच्छेद।।२।। आई.आई.पी.एम  के चोटी वाले उन जैसे अन्य शिक्षा के व्यापारियों के लिए।
अनुच्छेद।।३।। गिलानी, अरुंधती और उन जैसे अन्य देशद्रोहियों राष्ट्र-विरोधियों के लिए।

20.2.10

समय

चटखी कली पर
गून्ज उपवन में
अटकी रही,
क्षण की एक बून्द भर
समय के मेघ पर
लटकी रही ।
घडी की सुइयाँ
इस बीच भी मगर
भागती रहीं,
सूरज की किरणें
धरती के दरवाजे
जागतीं रहीं ।

कविता का भ्रूण
गर्भ में ही पडा
बस टीसता रहा,
ह्र्दय का पत्थर
पिघला तो नहीं
पसीजता रहा ।
सपनों की ओस
यादों के पत्तॉं पर
पडती रही,
आशा की बदली
निर्जन आकाश में
उमडती रही ।

समय निठुर निश्चल सा
अपनी अकड में
हिला तक नहीं,
वर्तमान भूत से,
या फिर भविष्य से
मिला तक नहीं।

22.1.09

खो देना चहती हूँ तुम्हें.. Feel the words (Poem by Chhiyaishi )

सही है कि तुम चले गये, दूर अब मुझसे हो गये
इतने वक़्त से भी कहाँ करीब थे, पर अब फाँसले सदा के लिए हो गये
बात करने का तुमसे मन नहीं, कोई जवाब तुम्हारे खयाल का देना नहीं
ना तुमसे कोई रिश्ता, ना अब कोई और चाह रही
काश की तुम बीते दिनों से भी मिट जाओ, तुम्हारी यादें इस कोहरे में कहीं गुम जायें
काश कि तुम्हारा नाम मुझे फिर याद न आये, ये याद रहे कि तुम मेरे कोई नहीं
जो हो तुम मेरे कोई नहीं तो फिर भी क्यूं याद करती हूँ ये कह कर कि तुम मेरे 'कोई नही'
चले जाओ तुम मेरे शब्दों से, ख्यालों से, इस वक्ये के बाद तो तुम जा चुके हो मेरे सपनों से भी
नाम लेते ही साँसों में अब भी हलचल सी क्यूँ होती है
क्यूँ किसी बात की आशा अब भी रहती है
हाथों से तुम्हें छिटकना चाहती हूँ फिर भी एहसास छूटता क्यूँ नहीं
चलते हुये गिरती हूँ तो आज भी क्यूँ तुम्हारा हाथ बढा देना याद आता है
ये दिन - यह वाक्या बीता है तो फिर इसी तरह ज़िन्दगी आगे भी बढ जायेगी
तुम्हारा तो पता नहीं, मुझे 'बूढे हो जाने पर ये-वो होगा' - वाली बातें याद आयेगीं
चाहती हूँ इस सबके बाद भी तुमसे कभी मुलाकात ना हो
सामना करने की हिम्मत जो खो बैठी हूँ
सूरत-सीरत, अन्दाज़ और तलफ्फुज़् सब बदल गये हैं
बहुत डर लगता है अपने इस बद्ले हुए रूप से
काफी चीज़े छोड आयीं हूँ पीछे
वो तभी के लिये सही थी
अब तो उन्हें साथ लिये ज़िन्दगी जीना भी कठिन है
खुश रहो तुम सदा, बहुत बडे बनो
ज़िन्दगी का हर मकाम तुम्हें हासिल हो, ये तमन्ना है मेरी
बस तुमसे सामना ना हो फिर कभी, ये ख्वाहिश बाकी रहेगी

http://rohittripathi.blogspot.com
http://chhiyaishi.blogspot.com