होना
उसका चेहरा वीभत्स है
लिखावट बडी भद्दी है
उसकी सोच बेढंगी है
और उदगार असभ्य
वह वर्षों से किनारे खड़ा है
जहाँ-जहाँ उसका अक्स झिलमिलाता है
वह जगह पानी पानी हो जाती है
इसमे कुछ बेमुरव्वत भी नही
जहाँ जमीन को ठौर न मिले ,
वहाँ पानी ही पानी सही
अब जो-जो होना है , हो जाने दो .......
पंकज राग चर्चित युवा कवि हैं .अभी पुणे फ़िल्म एंड टेलीविजन संस्थान के निदेशक है . फिल्मी गीतों पर इनकी किताब, धुनों की यात्रा , राजकमल से छपकर चर्चित हो चुकी है . आप पसंद करेंगे तो इनकी कुछ और कविताएँ दी जाएंगी
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7.3.08
पंकज राग की कविता , खास भड़ास के लिए
Posted by
हरे प्रकाश उपाध्याय
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