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7.10.08

सद्विचारों के लिए यंहा आयें!

तलवार ही सब कुछ है, उसके बिना न मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है और न निर्बल की।
गुरु गोविंद सिंह


इसी प्रकार के विचारों के लिए इस चिट्ठे पर पधारें
सद-विचार

6.9.08

ऐ ! टीचर तुझे सलाम

चाहे जितना हम अपनी शैक्षिक प्रणाली को कोस् ले उसके बावजूद हर क्षेत्र में सफल व्यक्ति के पीछे एक शिक्षक की भूमिका देखी जा सकती है । एक स्कूल में तमाम तरह के संसाधनों के बावजूद एक शिक्षक के न होने पर वह स्कूल नहीं चल सकता है । दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण हैं, और रोज ऐसे हजारों उदाहरण गढे जा रहे हैं ,जंहा बिना संसाधनों के शिक्षक आज भी अपने बच्चों को गढ़ने में लगे हैं । वास्तव में आज के प्रदूषित परिवेश में यह कार्य समाज में आई गिरावट के बावजूद हो रहा है ,इसे तो दुनिया का हर निराशावादी व्यक्ति को भी मानना पड़ेगा ।
आज शिक्षक दिवस को 5 सितम्बर के दिन हम सबको यह बातें ध्यान में रखनी चाहिए , इसके साथ हमारे मस्तिष्क में यह प्रश्न भी उठना ही चाहिए कि आख़िर अपने पुरातन संस्कृति में महत्व के बावजूद आज समाज में एक शिक्षक इतनी अवहेलना का निरीह पात्र क्यों बन जाता है? स्कूली शिक्षा का यह स्तम्भ जब तक मजबूत नहीं होगा ,तब तक अपनी शैक्षिक प्रणाली में कोई आमूल - चूल परिवर्तन फलदायी नहीं हो सकता है । हाँ सब को यह समझना होगा कि संस्कृति से अधूरे बच्चे केवल साक्षरों की संख्या ही बढ़ा सकते हैं, पर कोई मौलिक परिवर्तन उनके बूते कि बात नहीं?
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिन आज हम शिक्षक दिवस पर मना रहे हैं । एकलव्य जैसे शिष्य देने वाली गुरुकुल शिक्षा कि संस्कृति वाले इस देश की शिक्षा के बदले मुखौटे में शिक्षक ,शिक्षार्थी व शिक्षा के मायने ही बदल दिए गए हैं। मार्गदर्शक कहे जाने वाले गुरु और शिष्य के मध्य नैतिक मर्यादाओं में तेजी से हो रही गिरावट पूरे समाज के लिए चिंतनीय है। समाज की गिरावट से होड़ लेते हुए शिक्षा से जुड़े हुए उच्च-आदर्श व मूल्य जिस तरह से खोये जा रहे हैं, उससे शिक्षक भी पूर्णतयः विचलित होते दिख रहे हैं। व्यावहारिक खामियों के चलते सर्व शिक्षा का प्रयोग सफल नहीं हो पा रहा है । नैतिक शिक्षा पढ़ाई जाने के बावजूद नैतिकता कितनी कायम है , यह समाज के आईने में दिख रहा है। इस शैक्षिक व्यवस्था में अधिकारीयों की छाया शिक्षकों पर, शिक्षकों की छाया छात्रों पर पड़ती है । राजनीती और अफसरशाही में खोट से ही अव्यवस्थाओं का आगमन हुआ है । जाहिर है इस बात पर सिर्फ़ क्षोभ ही जाहिर किया जा सकता है कि आज हमारा शैक्षिक जगत अमीरी व गरीबी कि दो वर्गीय व्यवस्था में साफ बटा हुआ दिख रहा है। आज ज्ञान के भंडार को खरीदा जा रहा है, और ज्ञान पाने के लिए अकूत धन खर्च करना पड़ रहा है।शैक्षिक हिस्से में पारदर्शिता समाप्तप्राय है ,और इस पवित्र पेशे में माफिया कब्जा जमा चुके हैं । यह कहा जाए कि शिक्षा अब धन व बाहुबलियों कि मुट्ठी में है ,तो ग़लत न होगा । व्यवसायीकरण के इस दौर में शिक्षा को शिक्षा को कुछ लोगों के हाथ कि कठपुतली बना दिया गया है । आख़िर शिक्षक भी इनकी चपेट कंहीं न कंहीं से आ ही जाते है । जाहिर है कि जब पूरे समाज का जो भटकाव हो रहा है , तो शिक्षक भी तो इसी का एक अंग ही तो है ।
शिक्षक संगठन भी अपने ही फायदों कि आड़ में लेकर आन्दोलन करते है , कभी शैक्षिक गुणवत्ता और उसका उन्नयन उनके आन्दोलन का हिस्सा या मुद्दा नहीं बना है । स्कूलों में बच्चों का कितना बहुआयामी और तथा समग्र विकास हो सकता है ,यह उन्हें पढ़ने वाले शिक्षकों कि लगन, क्षमता व उनकी कार्यकुसलता पर ही निर्भर होता है । सरकार को भी इस तथ्य को मानना ही चाहिए कि अच्छी गुणवत्ता और कौशलों से पूर्ण पठन - पाठन तभी सम्भव है जब हर अध्यापक यह मानकर कार्य करे कि वह नए भारत के भावी कर्णधारों को तैयार कर रहा है । आज शिक्षक दिवस के दिन सभी नीति निर्धारकों को भी चिंतन करना चाहिए कि क्या अपेक्षित बदलाव हो पा रहा है । समाज के सामने यह स्पष्ट किया जन चाहिए कि सारी समस्यायों कि जड़ केवल शिक्षा नीतियां और अध्यापक ही नहीं है । विश्लेषण का विषय यह होना चाहिए कि जिनके कारण शैक्षिक नीतियां अपना समय के अनुरूप कलेवर और चोला नहीं बदल पाती है । इस परिवेश में जंहा हर उस व्यक्ति कि तैयारी व शिक्षा को अधूरा मना जाता है , जिसने लगातार सीखते रहने का कौशल न प्राप्त किया हो और उसका उपयोग न कर रहा हो । जो अध्यापक नई तकनीकों से परिचित नहीं हो पा रहे हों , उनका योगदान शैक्षिक आचरण में लगातार कम होता जाता है । आज के परिवेश में वही अध्यापक अपना सच्चा उत्तर-दायित्व निभा सकेगा जो स्वयं अपनी रचनात्मकता व सृजन शीलता के प्रति आश्वस्त हो और अध्ययन शील हो । ऐसी स्थितियां उत्पन्न किए जाने पर उसका स्वागत किया जाना चाहिए जंहा शिक्षक और छात्र साथ-साथ सीखें , चिंतन और निष्कर्ष पर मेहनत करें ।
शिक्षा कि हर गंभीर या अगंभीर चर्चा में अक्सर अध्यापक की कमियां निकलने वाले अक्सर मिल ही जाते हैं । पर यह उसी सच्चाई के कारणवश ही होता कि समाज अध्यापकों से आज भी अन्य लोगों कि तुलना में कंहीं अधिक ऊँचे मापदंडों पर खरे उतरने कि कोशिश लगातार करता रहा है । मेरा मानना रहा है कि भारत के अधिकांशतः अध्यापक अनेक कठिनाइयों व समस्यायों के क्षेत्र में जूझते हुए कार्य करते रहते हैं । अध्यापकों की कमी , अन्य कार्यों में उनकी उर्जा खपाना , अध्यापक प्रशिक्षण संस्थानों कि आई बाढ़ के बावजूद अध्यापक प्रशिक्षण का स्तर लगातार गिर रहा है , जाहिर है इस तरह कि कमियों से उत्पन्न समस्यायों कि जिम्मेदारी शिक्षकों के बजाय शैक्षिक नीति निर्धारकों कि के ऊपर ही आनी चाहिए ।
एक प्राइमरी का मास्टर होने के नाते आज शिक्षक दिवस के दिन मैं यह शपथ लेता हूँ कि अपने कर्तव्य पथ से कभी भी नहीं टलूंगा । साथ ही अपने उन सभी गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ , जिनके कारण मैं आज अपने सोच व विचार की ताकत को पा सका हूँ ।

10.8.08

IBN7 से पूंछता हूँ की ख़बर किस कीमत पर ?


हे निजी चैनल IBN7 ! ख़बर की दुनिया में ख़बर को हर कीमत में लाने का दावा करने वाले चैनल...... तुझसे तो केवल एक ही प्रश्न है मेरा ..........की बता
ख़बर किस कीमत पर ?
किस कीमत पर तू ख़बर चलाता है ,अपने चैनल में ।
बड़े बड़े दावे करने वाले ,हिंदुस्तान की कसम , मुद्दा में घंटो बहस करने वाले चैनल के कर्ता-धर्ताओं को इसका जवाब देना ही चाहिए की आख़िर क्या मजबूरी थी की संसद नोट कांड की रिकॉर्डिंग नहीं चलायी गई ,
वैसे तोIBN7 का नारा है ख़बर हर कीमत पर !
कभी चैनल को देखिये , तो मन में प्रश्न उठता है की हजारों बार इन्टरनेट के videos दिखाकर जनता को डरानेवाले , और चलते -चलते जनता पर ही ख़बर की पुष्टि की जिम्मेदारी छोड़ कर अगली ख़बर चलाने वाले इस बार खबर के लिए मानक की बात करने लगे ।
यही बात आम जन मानस को खटक रही है ।
क्या इससे चैनल की साख को धक्का नहीं लगा है ? मीडिया कई बार कठघरे में खड़ा होता रहा है । यह उसी कीअगली कड़ी ही समझ में आती है । चैनल को चाहिए था की उसे recordings का प्रसारण करके उसके बारे मेंजनता को स्वयं निष्कर्ष निकलने का मौका देना चाहिए था । आख़िर वह अब तक तो उसी जनता के प्रति ही तो प्रतिबधता की बात करता रहा है।

22.6.08

प्राइमरी का मास्टर

प्राइमरी के अध्यापकों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है. इस मंच पर आप अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं. एक प्राइमरी के मास्टर के रूप मे यदि आप समझते हैं की कुछ समस्याएँ हैं, तो हम भी मानते है की समस्याएँ हैं. क्यों नहीं इस मंच का प्रयोग इन समस्यायों के समाधान मे किया जाए. अगर बच्चे उस तरह नहीं सीख पाते है, जैसे उन्हे सिखाया गया है, तो क्यों नहीं उन्हें उस तरह से सिखाया जाए जैसे वो सीख सकें.

ये प्रस्तावना/भूमिका है एक ब्लाग का जिसका नाम है प्राइमरी का मास्टर http://primarykamaster.blogspot.com/। इस ब्लाग को चलाते हैं प्रवीण त्रिवेदी जो फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) जिले के रहने वाले हैं। उनके ब्लाग पर काफी अच्छी पोस्टें और अलग टेस्ट की पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी। भाई प्रवीण जी ने भड़ासी बनने के लिए और अपने ब्लाग को भड़ास से जोड़ने का अनुरोध पत्र भेजा था तो मैं उनके ब्लाग को देखने पहुंच गया। काफी जोरदार और पठनीय ब्लाग है।

रवीश कुमार ने दैनिक हिंदुस्तान के कालम में प्रवीण के इस ब्लाग की तारीफ भी की है। रवीश ने लिखा है- फतेहपुर जनपद के प्राइमरी के एक मास्टर का अनुभव दिल्ली में होने वाली बहसों से हटकर ताजगी भरा लगता है।

आप भी प्रवीण के ब्लाग पर जाकर उनका उत्साहवर्धन कर सकते हैं। प्रवीण जी, आपके ब्लाग को मैंने भड़ास के भाई भड़ासियों के कोने में जोड़ लिया है।

जय भड़ास

यशवंत