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7.4.11

आधुनिक बोधकथाएँ-२ । (नयी बहु)

आधुनिक बोधकथाएँ - २ (नयी बहु)
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_07.html


(सौजन्य-गुगल इमेज) 
नयी बहु ।

विपरीत समय और अपने ख़्बाब की  सुंदर कन्या को पसंद करने के चक्कर में, एक  महानुभव, करीब-४० साल की उम्र  तक कुँवारे रह गए । चलो, इन को हम,` पवन` के नाम से पहचानें । ऐसे इन्सान ज्यादातर स्वभाव से सरल और भोले होते हैं, अतः `पवन` भी अपनी सपनों की दुनिया में जीने वाला भोला-भाला सा इन्सान था ।

मगर, जैसा सभी लोग कहते हैं की, विवाह बंधन का संयोग, हमेशा भगवान तय करते हैं, अपने भोले पवन को भी संयोग से, करीब ३८ साल की एक अनुभवी कन्या (?) नाम-`चेतना` अंत में मिल ही गई ।  वर-वधु में से, किसी एक पार्टी का भी इरादा कहीं बदल न जाए, इसी आशंका को लेकर, बहुत ही जल्दबाजी में, दोनों के विवाह संपन्न कराये गए ।

इतनी बड़ी उम्र में, साल बीस-चौबीसवाला मुग्धावस्था का मामला तो होता नहीं है..!! इसीलिए नयी बहु चेतना ने आते ही अपनी ससुराल में, अपनी माँ (पवन की सास) के सिखाए हुए तमाम आँटसाँट आज़माकर, अपने भोलेभाले पति पवन को वश में करके, घर के सारे व्यवहार और पवन के कारोबार पर अपना अधिपत्य जमाना शुरु कर दिया ।

पवन भले ही भोलाभाला था, पर  बाकी घरवाले मूर्ख न थे । थोड़े ही दिनो में चेतना के सारे अवगुण,पवन की माँ -पिता, छोटे भाई ,छोटी बहन,सब के समझ में आ गये..!! सब को पता चल गया की, चेतना, पवन को बहलाफुसला कर, घर का सारा व्यवहार,कारोबार और रुपया-तिजौरी,सब पर अपना स्वामित्व जताना चाहती है..!!

अतः चेतना की सारी साज़िश को, पवन के अलावा घर के और सारे सदस्य एकजूट होकर नाकाम करने की कोशिश में लग गए । अपनी साज़िश को नाकाम होते देख, चेतना के मन में,  घर के बाकी सारे सदस्यों के प्रति धृणा एवं अभाव पैदा होने लगा ।

थोडे ही दिनों में, चेतना को अपनी औक़ात दिखाते हुए, सारे घरवालों ने मिलकर, बहु को एक नौकरानी जैसा बनाकर रख दिया । सुबहमें जल्दी उठकर, सब के लिए चाय-नास्ता, दोपहर का भोजन, दोपरह की चाय, शाम का भोजन, और घर के अन्य सारे छोटे-मोटे काम, उ..फ..फ..फ..!!

एक-दो महीना होते होते, चेतना काम के भारी बोज से थक गई, उसे इतना सारा काम रहता था की, वह अपने पति पवन के साथ पांच मिनट का समय भी बिता न पाती थी । रात को भी चेतना इतनी थककर चूर हो जाती थी की, अपने बिस्तर पर लेटते ही उसे गहरी नींद  आ जाती थीं..!!

ऐसे में एक दिन चेतना की माँ (पवन की सास),अपनी बेटी चेतना का हालचाल पूछने के लिए आ पहुंची । चेतना तुरंत अपनी माँ को, अपने कमरे में ले गई और सासरीवालों की चौकसी की वजह से उसकी सारी साज़िश नाकाम हो रही थी, ये सारी बाते माँ को बता दीं । यह सब सुनकर,चेतना की माँ को, सब पर बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी बेटी चेतना के कान में, कुछ अकसीर नुस्खें बताकर `विजयी भवः` का आशीर्वाद देकर रवाना हो गई ।

उसी दिन, शाम होने को आई, सायं भोजन तैयार करने का वक़्त हो चला था,फिर भी रसोई घर में बहु दिखाई न देने की वजह से, सास ने बहु को ज़ोर से आवाज़ दी । चेतना बहु अपने कमरे से, आराम से आकर सास के सामने बेपरवाह सी खड़ी हो गई । पवन की माँ को, बहु के तेवर कुछ बदले बदले से दिखाई दिए,उसके बावजूद सास ने चेतना को शाम का भोजन तैयार करने के लिए कहा ।

बस, सास का इतना कहना था की, चेतना वहीं ध..डा..म से ज़मीन पर गिर गई और  दायें-बायें लोट लगाते (Roll) लेटने लगीं । बहु को ज़मीन पर इधर उधर लेटते देख, मारे घबराहट के सास की चीख निकल पड़ी और पवन और घर के बाकी सदस्य को आवाज़ देकर उसने सब को  इकट्ठा कर लिया । बहु को शायद हिस्टीरिया का दौरा (मिर्गी का दौरा) पड़ गया होगा समझकर, कोई चेतना  को जूता, कोई उसे प्याज़ सुंघाने लगा । इतने में चेतना जोरों से दहाड़ मार कर उठ बैठी और अपने सारे बाल खुला छोड़कर,आंखे फाड फाड कर, चीखते-चिल्लाते हुए, अपना सर चारों दिशा में हिलाकर, सारा तन थरथराने लगीं ।

पवन के घरमें, ढेर सारा हंगामा और चिल्लाहट सुनकर सारे पड़ोसी भागे भागे दौड़ आए । किसी श्रद्धालु बुढ़ियाने चेतना से,`आप कौन है?` सवाल किया । जिसके जवाब में चेतना ने बताया, वह एक देवी शक्ति है और सत्यवती चेतना बहु की पवित्र भक्ति से प्रसन्न होकर,सारे दुःख दर्द दूर करने के लिए, उसके तन में प्रवेश किया है।

फिर तो होना ही क्या था..!! 

चेतना बहु के तन में प्रवेश कर, कोई देवी शक्ति सब को सुखी होने का आशीर्वाद दे रही है, ऐसे समाचार आग की तरह सारे गाँव में फैल गए । देवी शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, कई लोगों ने, अपने हाथों में दीपक,अगरबत्ती,नारियल और फुलफल के साथ, पवन के घर के बाहर क़तार लगा दी..!!

चेतना की माँ की बताई हुई अकसीर तरकीब बढ़िया काम कर रहीं है, यह देखकर चेतना मन ही मन, ये सभी बेवकूफ़ श्रद्धालु लोग पर मुस्काती रही । चेतना का आनंद तब दोगुना हो गया जब, उसके सास=ससुर और बाकी घरवालों के साथ, उसके पति पवन ने भी, चेतना के साथ किए गए बुरे बर्ताव के बदले, देवी शक्ति उर्फ़ चेतना के चरणस्पर्श कर, हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी..!!

बस फिर तो जैसे चेतना को नौकरानी की बजाय मानो घर में राजरानी का ओहदा प्राप्त हो गया । किसी को शक होने की बात तो दूर, अब तो चेतना को घर में पानी की इच्छा करने पर बैठे बिठाए दूध मिलने लगा ।

पर कहते हैं ना की, ज्यादा चतुर लोग कभी ना कभी बड़ी बेवकूफी कर जाते हैं? एक हफ्ते के बाद, चेतना ने भी ऐसी ही एक ग़लती कर दी..!! अपनी साज़िश में खुद कैसे कामयाब हो गई, और उसने कैसा ला जवाब अभिनय किया इस बात का वृत्तांत जब, चेतना फोन पर उसकी माँ को सुना रही थी, उसी वक़्त, ये सारी बातें, बगल के कमरे में उपस्थित चेतना के पति और सास ने सुन ली । थोड़ी ही देर में सभी घरवालों को पता चल गया की चेतना, देवी शक्ति का प्रवेश होने का ढोंग रचा कर, घर में अपना सिक्का जमाना चाहती थी ।

उसी दिन शाम होते ही, रसोई में काम कर रही सास ने, चेतना बहु को आवाज़ देकर भोजन में थोड़ा हाथ बटाने के लिए कहा । यह सुनते ही रोज़ की तरह, चेतना  अपने सारे बाल खुला छोड़कर,आंखे फाड़ फाड़ कर, चीखते-चिल्लाते हुए, अपना सिर चारों दिशा में हिलाकर, सारा तन थरथराने लगीं । थोड़ी ही देर में सारे पडोसी देवीमाँ के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, फिर से एकत्रित हो गए..!!

पर अब की वार ये क्या हुआ..!!

यहाँ जैसे ही चेतना में देवी शक्ति का आविर्भाव हुआ उसी समय, अचानक उसका पति पवन भी उपर उछल- उछलकर, जोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा..!!

हमेशा शांत स्वभाव के पवन का ऐसा ख़ौफ़नाक स्वरूप देखकर, नौटंकी कर रही चेतना, शांत होकर, आश्चर्य और डर के मारे, अपने पति पवन की ओर टकटकी लगाकर देखने लगीं । चेतना के आसपास खड़े सारे लोग भी,चेतना को वहीं पर छोड़कर, अब पवन की ओर मुड़ गए ।

बड़े ही भक्ति भाव के साथ, पवन के माता-पिता ने, पवन से प्रश्न किया," आप कौन से  देव  हैं और हमारे बेटे पवन के शरीर में प्रवेश करने के पीछे आप का क्या प्रयोजन है?"

पवन ने आंखे फाड फाड कर, चीखते-चिल्लाते हुए, अपना सिर चारों दिशा में हिलाकर, सारा तन थरथराते हुए, जवाब दिया," मैं  पवन पुत्र हनुमंत हूँ, सामने बैठी पवित्र नारी के शरीर में जो देवी शक्ति विद्यमान है, उसे मैंने अपनी भारी भरकम गदा सँभालने को दी थीं, जो उसने कहीं खो दी है । अब मुझ से ये अपना मुँह छिपाती फिर रही है? आज तो उससे, मैं अपनी गदा  वापस लेकर ही दम लूंगा ।"

बस पवन का इतना कहना था की, पवन की छोटी बहन (चेतना की ननन्द) भागकर भीतर से एक लंबा सा लट्ठ ले आई और बोली," हे पवन पुत्र बजरंगबलीजी, आप ऐसा ग़जब मत करना । गदा की जगह, थोड़े दिन तक, इस लट्ठ से काम चला लीजिए ना प्ली..झ..!! चेतना मेरी प्यारी भाभी है, उसे आप कुछ मत करना..!!"

मगर, पवन (पुत्र हनुमानजी) ने किसी की एक न मानी और अपनी बहन के हाथ  से वह भारी लट्ठ छीन कर, चेतना की ओर दौड़े..!!

इससे पहले की चेतना  कुछ समझ पाती, पवन (पुत्र?) ने उस देवी शक्ति से  अपनी खोइ हुई गदा तुरंत वापस माँगते हुए, चेतना की पीठ पर, वही लट्ठ से उसकी भारी धुलाई करना शुरु कर दिया। अभी तक देवी शक्ति के आविर्भाव के कारण चिल्लाते हुए, थरथरा रही चेतना, अब मारे दर्द से चिल्लाते, भय से थरथराने लगी ।

पवन के हाथों मार सहन ना होने के कारण, चेतना अपना देवी शक्ति वाला ढोंग छोड़कर पवन के चरण में अपना माथा टेक कर, उससे दया की भीख माँगने लगीं । अपनी माँ के इशारे पर पवन ने ये कहकर देवी शक्ति को माफ़ किया की," आज के बाद, तुम जितनी बार मेरी प्यारी पत्नी चेतना के तन में प्रवेश करेगी, उतनी बार मैं पवन के शरीर में प्रवेश करके, तेरी लट्ठ-पूजा करके, तुमसे  मेरी गदा वापस लेकर ही तेरा पीछा छोड़ूँगा..!!"

दोस्तों, हमें लगता है..!! कपटी चेतना की नकली देवी शक्ति शायद आजतक, पवन पुत्र बजरंगबलीजी की गदा, ढूंढ न पायी है..!! इसीलिए, उस दिन के बाद, चेतना बहु  के तन में, देवी शक्ति ने ना कभी प्रवेश किया है, न तो पवन पुत्र अपनी गदा ढूंढने उस घर में वापस आयें हैं..!!

हाँ, ये बात तो है की, इस घटना के, कुछ घंटे पश्चात, घर के सभी सदस्य ने, चेतना को फोन पर, अपनी माँ को यह कहते हुए सुना था की,

" आज के बाद तेरी एक भी सलाह, मैं  माननेवाली नहीं हूँ, यहाँ बजरंगबली के हाथों की मार, तुम्हें थोडे ही खानी पड रही है? उ..ई..माँ..!!"

आधुनिक बोध - समय आने पर जो इन्सान, जैसी भाषा समझता हो, वैसी ही भाषा में उसके साथ बात करनी चाहिए ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०७ -०४ -२०११.

15.10.08

जीवनसाथी चाहिये



नाम : मनीषा नारायण
उम्र : ३० वर्ष
शिक्षा : स्नातक( तमिल,तेलुगु,कन्नड़,मलयालम,तुलु,मराठी,गुजराती,हिंदी भाषाएं लिख-पढ़ सकती हैं; अंग्रेजी से मोहभंग)
रंग : साफ़ गेंहुआ
कद : ५’५"
व्यवसाय : भिक्षा एवं कमर्शियल सेक्स वर्कर
मासिक आय : १५०००-२०००० रु.(अनुमानित)
अतिरिक्त गतिविधियां : भड़ास(दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लाग की सलाहकार), अर्धसत्य(लैंगिक विकलांग यानि हिजड़ों के दुनिया के एकमात्र हिंदी ब्लाग की माडरेटर)
विशेष : मेडिकल जांच से पता चला है कि अंदरूनी अंग स्त्रैण किंतु अल्प विकसित हैं बाह्य जननांग अनुपस्थित है जिस कारण लैंगिक विकलांगता है।
चूंकि अब हमारे देश में विवाह के अतिरिक्त "लिव इन रिलेशनशिप" को भी कानूनी मान्यता मिल चुकी है अतः जो भी उदार मना इस संबंध में इच्छुक हों मेहरबानी करके भड़ास के माध्यम से अपने बारे में जानकारी देते हुए सूचित करें । जाति ,धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग आदि आदि इत्यादि जैसा कोई बंधन नही है।

8.3.08

भाषा में गंदगी देखने वाले परम (चूतिया) लोगों के लिए पेश है... काशी का अस्सी

((होली आते देख भड़ास पर साथियों ने होलियाना माहौल बनाया तो मेरा भी मन अइंठ रहा है, मुझे लखेद रहा है, बोल रहा है....अबे, तू भी कुछ लिक्ख, साला केवल पढ़ पढ़ कर मने मन मुनक्का, मने मन छुहारा होता रहेगा। सो, मन की पेलाई के बाद मेरी आत्मा जगी तो खुद लिखने के बजाय टीपने की सोचना लगा। यही तो दिक्कत है हम जैसों में। भोषणी के, जब हमारे टाइप लोग लेखक-कथाकार-कवि-साहित्यकार टाइप बन नहीं पाए, तो टिपियाने में क्या जाता है, तुम लोग लिखो, मैं उसे उठाकर चेप दूंगा अपने यहां। मेरे जैसा आदमी इसी तरह सोचते हुए होली पर कुछ टिपियाने के अभियान में गूगल बाबा के सहयोग से खोजते-खाजते पहुंच गया एक साइट पर जिसमें काशी के अस्सी के कुछ अंश दिए हुए थे। सो, मैंने बिना देर किए, उस साइट को दिल ही दिल थैंक्यू थैंक्यू बोलते, लप्प से वो मैटर टीप लिया और अपन भड़ास पर चेंप दिया, इस उम्मीद में कि जो मजा पढ़ के हम लोग लिये थे, वो इस झलकी को पढ़कर आप भी ले सकेंगे और अगर मन न भरे तो एगो काशी का अस्सी खरीद लीजिएगा। तो भई, उस साइट का नाम लेकर आभार प्रकट कर देते हैं। साइट का नाम है, भारतीय साहित्य संग्रह,....मुझे उम्मीद है कि इससे प्रेरणा लेकर वो साथी जो इस वक्त कनाट प्लेस के आसपास की किसी खूबसूरत बिल्डिंग में मौज कूट रहे हैं, वो जरूर अपनी गालियों, कविताओं और मुक्तक के प्रयोग को और आगे बढ़ाएंगे। मेरे खयाल से समझदारों के लिए इशारा काफी होता है, क्यों हरे भाई, पंकज भाई, नीरव जी....:)जय भड़ास, यशवंत)


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देख तमाशा लकड़ी का
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मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है ! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् ‘परम’ (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ-

तो सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर-सा बायोडॉटा—कमर में गमछा, कन्धे पर लँगोट और बदन पर जनेऊ—यह ‘यूनिफॉर्म’ है अस्सी का !

हालाँकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है। पैंट-शर्ट, जीन्स, सफारी और भी जाने कैसी-कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग ! लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो ! वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लँगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो, गमछा अपनी जगह अडिग है !
‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है ! चाहे होली का कवि-सम्मेलन हो, चाहे कर्फ्यू खुलने के बाद पी.ए.सी और एस.एस.पी. की गाड़ी, चाहे कोई मन्त्री हो, चाहे गधे को दौड़ाता नंग-धड़ंग बच्चा—यहाँ तक कि जार्ज बुश या मार्गरेट थैचर या गोर्बाचोव चाहे जो आ जाए (काशी नरेश को छोड़कर)—सबके लिए ‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ का जय-जयकार !
फर्क इतना ही है कि पहला बन्द बोलना पड़ता है—जरा जोर लगाकर; और दूसरा बिना बोले अपने आप कंठ से फूट पड़ता है।
जमाने के लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा ‘आइडेंटिटी कार्ड’ है इसका !
नमूना पेश है—

खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला—‘किस दुनिया में हो गुरू ! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घण्टे-भर से पान घुला रहे हो ?’’
मोरी में ‘पंचू’ से पान की पीक थूककर बोले—‘देखौ ! एक बात नोट कर लो ! चन्द्रमा हो या सूरज—भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से ! समझे कुछ ?’
‘जो मजा बनारस में; न पेरिस में, न फारस में’—इश्तहार है इसका।
यह इश्तहार दीवारों पर नहीं, लोगों की आँखों में और ललाटों पर लिखा रहता है !
‘गुरू’ यहाँ की नागरिकता का ‘सरनेम’ है।
न कोई सिंह, न पांड़े, न जादो, न राम ! सब गुरू ! जो पैदा भया, वह भी गुरू, जो मरा, वह भी गुरू !
वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है यह :

गिरिजेश राय (भाकपा), नारायण मिश्र (भाजपा), अम्बिका सिंह (कभी कांग्रेस, अभी जद) तीनों की दोस्ती पिछले तीस सालों से कायम है और न आने वाली कई पीढ़ियों तक इसके बने रहने के आसार हैं ! किसी मकान पर कब्जा दिलाना हो, कब्जा छुड़ाना हो, किसी को फँसाना हो या जमानत करानी हो—तीनों में कभी मतभेद नहीं होता ! वे उसे मंच के लिए छोड़ रखते हैं...अस्सी के मुहावरे में अगर तीनों नहीं, तो कम-से-कम दो—एक ही गाँड़ हगते हैं।
अन्त में, एक बात और। भारतीय भूगोल की एक भयानक भूल ठीक कर लें। अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं। अस्सी ‘अष्टाध्यायी’ है और बनारस उसका ‘भाष्य’ ! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से ‘पूँजीवाद’ के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी ‘टीका’ हो जाए...मगर चाहने से क्या होता है ?
अगर चाहने से होता तो पिछले खाड़ी युद्ध के दिनों में अस्सी चाहता था कि अमरीका का ‘व्हाइट हाउस’ इस मुहल्ले का ‘शुलभ शौचालय’ हो जाए ताकि उसे ‘दिव्य निपटान’ के लिए ‘बहरी अलंग’ अर्थात् गंगा पार न जाना पड़े...मगर चाहने से क्या होता है ?


इति प्रस्तावना।
तो मित्रो, यही अस्सी मेरा बोधगया है और अस्सीघाट पर गंगा के किनारे खड़ा वह पीपल का दरख्त बोधिवृक्ष, जिसके नीचे मुझे निर्वाण प्राप्त हुआ था !
अन्तर्कथा यह है कि सन् ’53 में मैं गाँव से बनारस आया था। मँझले भैया रामजी सिंह के साथ। आगे की पढ़ाई के लिए। उन्हें बी.ए. प्राइवेट पढ़ना था घर की खेती-बारी सँभालते हुए। और मुझे इंटर में। वे बेहद सख्त गार्जियन थे—कुछ-कुछ प्रेमचन्द के ‘बड़े भाई साहब’ की तरह ! इस बात का भी मुझे आश्चर्य होता था और उन्हें भी कि अपने अध्यापकों से अधिक ज्ञान के बावजूद, अपने ही मित्रों को पढ़ा-पढ़ाकर पास कराने के बावजूद वे खुद फेल कैसे हो जाते हैं ?
उन्होंने एक बार अपने पास चेले को पकड़ा। रिजल्ट आया ही आया था। उन्होंने पूछा, ‘‘बे लालजी ! हम तुझे पढ़ाए, जो-जो नहीं आता था तुझे सब बताए, लिखाए, रटाए; तू पास हो गया, हम कइसे फैल हो गए ?’ लालजी बोले—‘गुरू, ऐसा है कि आप जो पढ़ाए, वह तो हम पढ़े ही। बाकी आपकी चोरी-चोरी भी कुछ पढ़े थे।’

उन्हें उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ। मुझसे पूछा—‘अन्दाजा लगाओ तो जरा ! क्या बात हो सकती है ? इसमें अन्दाजा लगाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन मैं अन्दाजा लगाने लगा और नहीं लगा पाया। कारण, कि भैया के शब्दकोश में व्याकरण के लिए कोई जगह नहीं थी ! ‘ने’, ‘में’, ‘का’, ‘पर’, ‘से’ आदि को वे फालतू और बेमतलब समझते थे ! सीधे-सादे वाक्य में अड़ंगेबाजी के सिवा और कोई काम नहीं नजर आता था इनको ।...लेकिन यह बताता तो लात खाता !
बहरहाल, बात ‘निर्वाण’ की।
एक दिन भैया ने कहा—‘तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है। वह बातचीत होने लायक होनी चाहिए। कोई तुमसे अंग्रेजी में कुछ पूछे और तुम उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने लगो, यह अच्छा नहीं। तुम अस्सी के चुडुक्कों के साथ खेलना छोड़ो और चलो, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करो।’

भैया मुझे इसी पीपल के पास ले आए। शाम के समय। घाट पर भीड़-भाड़ कम थी। उन्होंने मुझे एक सीढ़ी के पास बिठा दिया और कहा—‘डेली शाम को यहाँ आकर अभ्यास करो !—ऐसे !’
वे पन्द्रह गज दूर खड़े हो गए—अटेंशन की मुद्रा में और पेड़ से बोले—‘व्हाट इज योर नेम ?’ फिर पेड़ के पास ले गए और सामने देखते हुए उसी मुद्रा में बोले, ‘सर, माई नेम इज रामजी सिंह !’ फिर वहाँ से पन्द्रह गज दूर—व्हाट इज योर फादर्स नेम ?’ फिर पेड़ के पास से—‘सर, माई फादर्स नेम इज श्री नागर सिंह !’ इस तरह वे तब तक पीपल के पास आते-जाते रहे, जब तक पसीने-पसीने नहीं हो गए !
‘हाँ, चलो अब तुम ?’ वे सीढ़ी पर मेरी जगह बैठकर सुस्ताने लगे।
मित्रो ! भगवान झूठ न बुलवाएँ तो कहूँ कि अंग्रेजी बोलना तो मुझे नहीं आया, हाँ, इतना जरूर समझा कि पसीने से ज्ञान का बड़ा गहरा सम्बन्ध है !

इसीलिए जब लोग पूछते हैं कि तुम्हें इतना अधिक पसीना क्यों होता है या बूढ़े बकरे की तरह गन्धाते हो तो मैं उनकी मूर्खता पर हँसकर रह जाता हूँ। अरे भले आदमी, ज्ञानी को ज्ञानोद्रेक से पसीना नहीं आएगा तो क्या कँपकँपी छूटेगी ?
लेकिन साहब, मेरे ज्ञान की बधिया बैठा दी मुहल्ले के ‘आदिवासियों’ ने।
इधर ‘प्रामाणिक अनुभूती’ और उधर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ और यथार्थ को पसीने से परहेज !
एक थे हमारे बापजान जो पैना उठाए हमें किताबें-कापियों में जोते रखते थे—‘सालो, खेती तो गई सरकार के ‘उसमें’। अगर यह भी नहीं करोगे तो भीख माँगोगे !’ दूसरी ओर मुहल्ले के बाप थे जो अपने बच्चों का स्कूल में नाम लिखाते थे—पढ़ने के लिए नहीं, सरकार की ओर से मुफ्त बँटने वाली ‘दलिया’ के लिए ! वे केवल ‘रेसस पीरियड’ में ही स्कूल में नजर आते।
उनका एक जीवन-दर्शन था—‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?’

पूरा मुहल्ला पीढ़ियों से उसी शैली से जीता चला आ रहा था—गाता-बजाता, झूमता, मदमाता ! किसी के पास कोई डिग्री नहीं, रोजगार नहीं, व्यवसाय नहीं, काम नहीं; परलोक सिधारते समय पंडित महाराज ने पत्रा-पोथी लपेटे हुए एक लाल बेठन खोंस दिया बेटे की काँख में—बस ! वे तख्त पर बेठन रखे हुए जनेऊ से पीठ खुजा रहे हैं और जजमान का इन्तजार कर रहे हैं !
जजमान रोज-रोज नहीं आते, ग्रह-नक्षत्र भी रोज-रोज खराब नहीं होते, मुंडन, शादी-ब्याह, जनेऊ जैसे संस्कार भी रोज-रोज नहीं होते और न रोज-रोज फत्ते गुरु की कन्धे पर कुम्हड़ा होता है। फत्ते गुरू कुम्हड़े का पूरा वजन उठाए हुए मुहल्ले-भर को सुनानेवाली आवाज में आत्मलाप करते आ रहे हैं—‘पालागी फत्ते गुरू !’ जय हो जजमान !’’ सट्टी गए थे का गुरू ?’ कवन भँड़ुआ सट्टी जाता है जजमान ?’ अरे तो इतना बड़ा कोंहड़ा ? हफ्ते-भर तो चलेगा ही गुरू !’ हफ्ते-भर तुम्हारे यहाँ चलता होगा। यहाँ तो दो जून के लिए भी कम है !’

मुहल्ला अपने दरवाजों, खिड़कियों, छतों से आँखें फाड़ फत्ते गुरू का कोंहड़ा देख रहा और उनके भाग्य से जल-भुन रहा है। सन्तोष है तो यह कि आज का दिन फत्ते गुरू का, कल का दिन किसी और गुरू का ! कौन जाने हमारा ही हो ?
कहते हैं, बुढ़ापे में तुलसी बाबा कुछ-कुछ ‘पिड़काह’ और चिड़-चिड़े हो चले थे। मुहल्ले वालों ने उनसे जरा भी छेड़छाड़ की, पिनक गए और शाप दे डाला—‘जाओ, तुम लोग मूर्ख दरिद्र रह जाओगे !’
मित्रो, मेरा मतभेद है इससे। शान्तिप्रिय द्वेवेदी को जितना तंग किया मुहल्ले ने, उससे अधिक तंग तो नहीं ही किया होगा बाबा को और अगर उन्हें शाप ही देना था तो जाते-जवाते इनके हाथ ‘मानस’ पोथी क्यों पकड़ा जाते ? फिर भी ये कहते हैं, तो हम मान लेते हैं; लेकिन सरापकर भी क्या कर लिया बाबा ने ? माथे पर चंदन की बेंदी, मुँह में पान और तोंद सहलाता हाथ ! न किसी के आगे गिड़गिड़ाना, न हाथ फैलाना। दे तो भला, न दे तो भला ! उधर मंदिर, इधर गंगा; और घर में सिलबट्टा ! देनेवाला ‘वह’; जजमान भोंसड़ी के क्या देगा ? भाँग छानी, निपटे और देवी के दर्शन के लिए चल पड़े।
चौके में कुछ नहीं, मगर जिए जा रहे हैं—ताव के साथ ! चेहरे पर कोई तनाव नहीं, कहीं कोई फिक्र नहीं और उधर से लौटे तो साथ में कभी-काल, एक जजमान—‘सुन बे रजुआ, खोल केवाड़ी, आयल हौ जजमान चकाचक !’’
तो साहब ! कच्ची उमर और बाला जोबन ! अपन को भा गया यह दर्शन !

काहे की है-है और काहे की खट्-खट् ! साथ तो जाना नहीं कुछ ! फिर क्यों मरे जा रहे हो चौबीसों घंटे ? सारा कुछ जुटाए जा रहे हो, फिर भी किसी के चेहरे पर खुशी नहीं ! यह नहीं है, तो वह नहीं है ! इसे साड़ी, तो उसे फ्रॉक, तो इसे फीस, तो उसे टिफिन, तो इसे दवा, तो उसे टॉनिक, तो इसे...कुछ करो तब भी और न करो तब भी यह दुनिया चल रही है और चलती रहेगी...
प्यारेलाल ! अपनी भी जिन्दगी जियो, दूसरों की ही नहीं !
ऐसे में ही गया था सब्जी लेने अस्सी पर ! लुंगी और जाकिट पहने हुए !
लगभग दो बजे दोपहर।
सन् ’70 के जाड़ों के दिन।
सलीम की दुकान पर खड़ा हुआ ही था कि सड़क से आवाज आई—डॉक्टर !
मैंने मुड़कर देखा तो एक परिचित मित्र ! रिक्शे पर ! इससे पहले एक-दो बार की ही भेंट थी उससे।
मैं पास पहुँचा तो उसने पूछा, ‘आवारगी करने का मन है डॉक्टर ?’
‘क्या मतलब ?’

‘कहीं चलना चाहते हो ? कलकत्ता, बम्बई, दार्जलिंग, कालिंगपाँग, नेपाल कहीं भी !’
मैं चकित ! बोला—‘रुको ! सब्जी देकर आते हैं तो बात करते हैं।’
उसने रिक्शे पर बैठे-बैठे मेरा हाथ पकड़ा—‘एक बात का उत्तर दो। महीने में कितने दिन होते हैं ? तीस दिन। इनमें से कितने दिन तुम्हारे अपने दिन हैं ? ‘अपने’ का मतलब जिसमें माँ-बाप, भाई-बहन, बीवी, बेटा-बेटी किसी का दखल न हो। जैसे चाहो, वैसे रहो, जैसा चाहो, वैसा जियो।’
मैं सोच में पड़ गया।
‘एक दिन, दो दिन, तीन दिन ?’ वह उसी गम्भीरता से बोलता रहा।
मैं चुप।

‘सुनो ! महीने के सत्ताइस दिन दे दो बीवी को बाल-बच्चों को, पूरे खानदान को ! उनसे कहो कि भैया, ये रहे तुम्हारे दिन ! लेकिन ये तीन दिन मुझे दे दो। मेरी भी अपनी जिन्दगी है, उसके साथ जुल्म न करो, समझा ?’
‘और सुनो ! कार्यक्रम बनाकर जीने में तो सारी जिन्दगी गँवा रहे हैं हम ! हम घर से निकलते ही कहते हैं कि सुनो, अमुक जगह जा रहे हैं और इतने बजे आएँगे। और कहीं बाहर जाना हुआ तो हफ्ते-भर के राशन-पानी, साग-सब्जी का बन्दोबस्त करके जाते हैं !...इन सबका कोई मतलब है क्या ? आवारगी करने का भी कार्यक्रम बनाया जाता है क्या ?’
‘ठीक है यार ! मैं सलीम को बता तो दूँ कि सब्जी पहुँचा के घर पर बोल देगा !’
‘लो, फिर वही बात ! अरे, जिन्हें खाना है, वे ले जाएँगे; चलो तुम !’
‘अच्छा चलो !’ मैं भी बगल के रिक्शे पर बैठ गया—‘तुम भी क्या कहोगे ?’

और साहब ! मैंने सोचा था कि शहर से ही कहीं सिनेमा वगैरह देख-दाखकर शाम नहीं तो रात तक लौट आएँगे, लेकिन पहुँच गए पंजाब मेल से सचमुच कलकत्ता, वहाँ के डायमंड हार्बर, फिर वहाँ से काकद्वीप। छककर रास्ते-भर खाया-पिया—मौज मनाई ! पसीने के बगैर जिन्दगी का मजा लिया।...वही लुंगी और जाकिट, हवाई चप्पल, जेब में दस नए पैसे। आन का आँटा, आन का घी। भोग लगावैं बाबाजी !
पाँच दिन बाद लौटे थे घर !
मौज तो बहुत आई, लेकिन लौटानी ट्रेन में ही एक दूसरा ज्ञानोदय हुआ।
जो भी तुम पर पैसा खर्च करता है, वह तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। प्यारेलाला ! ट्रेन छूटनेवाली है, लपक के जरा दो टिकट तो ले आओ !...जरा उस तरफ बैठ जाओ तो थोड़ा बदन सीधा कर लें...यार, कैसे दोस्त हो, कहीं से एक गिलास पानी नहीं पिला सकते ?...जरा वो तौलिया तो पकड़ाना, ‘फ्रेश’ हो लिया जाए ?...गुरू, सिगरेट तो है मगर माचिस छूट गई, डिब्बे में नजर दौड़ाओ ! कोई-न-कोई जरूर बीड़ी सिगरेट पी रहा होगा !...अगर आप दोस्त के लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ?

घर में ऐसा कुहराम मचा था कि न पूछिए ! कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और बीवी ने बेवा होने की पूरी तैयारी कर ली थी !
मुझे जल्दी ही अहसास हो गया कि माया-मोह के जंजाल में फँसा मैं—अस्सी का प्रवासी—इस दर्शन के काबिल नहीं !
अस्सी पर प्रवासियों की एक ही नस्ल थी शुरू में—लेखकों-कवियों की !
आजादी के बाद देश में जगह-जगह ‘केन्द्र’ खुलने शुरू हो गए थे—‘मुर्गी-पालन केन्द्र’, ‘मत्स्य पालन केन्द्र’, ‘सुअर-पालन केन्द्र’, ‘मगर-घड़ियाल-पालन केन्द्र’। इन कवियों-लेखकों ने भी अपना एक केन्द्र खोल लिया—केदार चायवाले की दुकान में। ‘कवि-पालन केन्द्र’। कोई साइनबोर्ड नहीं था, लेकिन जनता इसे इसी रूप में जानती थी। सुबह हो या दोपहर या शाम—केदार, विजयमोहन, अक्ष्योभ्येश्वरी प्रताप, शालिग्राम, अधीर, आनन्द भैरवशाही, विद्यासागर नौटियाल, विश्वनाथ त्रिपाठी (देहलवी), श्याम तिवारी, विष्णुचन्द्र शर्मा, बाबा कारन्त—इनमें से किसी को भी समूह में या अलग-अलग यहीं पाया जाता था !

इसके मानद इंचार्ज थे समीक्षक नामवार सिंह और पर्यवेक्षक थे त्रिलोचन। ये कवि प्रायः यहीं से ‘काव्य-भोज’ के लिए ‘तुलसी पुस्तकालय’ या ‘साधु वेला आश्रम’ की ओर रवाना होते।
मगर हास्य ! ’60 के शुरू होते-होते भी ‘फुर्र’ हो गए और केन्द्र भी टूट गया !
सन् ’65 के आस-पास जब धूमिल का आविर्भाव हुआ तो उसने गुरु के चरण-चिह्नों पर चलते हुए केदार चायवाले के सामने हजारी की दुकान को ‘केन्द्र’ बनाने की कोशिश की। हजारी के बगल में कन्हैया हलवाई की दुकान। वह कन्हैया के यहाँ से चार आने की जलेबी लेता और चार आने का सेव-दालमोठ और हजारी की दुकान में आ बैठता। इधर-उधर से कवियाये दूसरे लोग भी आते और नागानन्द भी। कवियों की नज़र अखबार या बहस पर होती, नागानन्द की जलेबी-नमकीन के दोनों पर !
ऐसे में केन्द्र क्या चलता !

मगर बाद के कई वर्षों तक—जिस प्रकार गोला दीनानाथ के इलाके में घुसते ही मसालों की गन्ध से नाक परपराने लगती है, उसी प्रकार अस्सी पर खड़े होने वाले किसी भी आदमी के कान के पर्दे काव्य-चर्चा से फटने लगते थे। धूमिल काव्य द्रोहियों के लिए परशुराम था और उसकी जीभ फरसा !
अस्सी से धूमिल क्या गया, जैसे आँगन से बेटी विदा हो गई। घर सूना और उदास।
इधर सुनते हैं कि कोई बुढ़ऊ-बुढ़ऊ से हैं कासीनाथ-इनभर्सीटी के मास्टर जो कहानियाँ-फहानियाँ लिखते हैं और अपने दो-चार बकलोल दोस्तों के साथ ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर ‘राजेश ब्रदर्स’ में बैठे रहते हैं ! अकसर शाम को ! ‘ए भाई ! ऊ तुमको किधर से लेखक-कवि बुझाता है जी ? बकरा जइसा दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाने से कोई लेखक कवि न थोड़े नु बनता है ? देखा नहीं था दिनकरवा को ? अरे, उहै रामधारी सिंघवा ? जब चदरा-ओदरा कन्हियाँ पर तान के खड़ा हो जाता था—छह फुट ज्वान; तब भह्-भह् बरता रहता था। आउर ई भोंसड़ी के अखबार पर लाई-दाना फइलाय के, एक पुड़िया नून और एक पाव मिरचा बटोर के भकोसता रहता है ! कवि-लेखक अइसै होता है का ?
सच्चा कहें तो नमवर-धूमिल के बाद अस्सी का साहित्य-फाहित्य गया एल.के.डी. (लौंडा के दक्खिन) !’’
मित्रो, इमर्जेंसी के बाद और ’80 के आस-पास से गजब हो गया !

भारत पर तो बेशक हमले हुए—यवनों के, हूणों के, कुषाणों के, लेकिन अलग-अलग और बारी-बारी, मगर अस्सी पर एक ही साथ कई राज्यों और जिलों से हमले हुए—आरा, सासाराम, भोजपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया जाने कहाँ-कहाँ से ‘जुवा’ लड़के युनिवर्सिटी में पढ़ने आए और चौराहे पर डेरा-डंडा गाड़ चले !
इनमें नई नस्लें थीं !
एक नस्ल पैदा हुई ‘फाइन आर्ट्स’ के शौक से ! ये लड़के ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर पेंसिल और स्केचबुक लिये बैठे रहते हैं और ‘संघ की ओर से बँटनेवाली खिचड़ी या रोटियों के इन्तजार में बैठी या लेटी गायों, कुत्तों और भिखमंगों कि चित्र बनाया करते हैं !
दूसरी नस्ल ‘तुलसीघाट’ पर आयोजित होने वाले ‘ध्रुपद मेला’ से निकली ! यह गायकों-वादकों और उनकी कला पर फिदा होकर सिर हिलानेवालों की नस्ले हैं ! ये कढ़ाई किए हुए रंग-बिरंगे कुर्ते और चूड़ीदार पाजामा पहने, कन्धे पर झूलते लम्बे बाल बढ़ाए किसी गुरू या चेली के साथ बगल में तानपूरा दबाए इधर-उधर आते-जाते नजर आते हैं।
तीसरी नस्ल और भी जालिम है—पत्रकारों की ! तलवार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ वालो की। ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है ! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं ! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है !
एक चौथी नस्ल भी है गोवर्धनधारियों की जो कानी उँगली पर ‘राष्ट्र’ उठाए किसी चेले के ‘हीरो-हाण्डा’ पर दस बारह साल से मुस्की मार रहे हैं। लेकिन इनके बारे में बाद में !
(भारतीय साहित्य संग्रह से साभार)