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26.8.13

अजेय नहीं है चीन-ब्रज की दुनिया

मित्रों,पिछले कुछ महीनों से हमारी मीडिया और हमारी केंद्र सरकार भारत-चीन सीमा पर चीन की आक्रामक गतिविधियों से इस कदर भयभीत हैं जैसे चीन कोई अजगर (ड्रैगन) हो और भारत कोई मेमना। जबकि असलियत तो यह है कि न तो चीन अजगर है और न ही भारत मेमना। भले ही चीन सैन्य तैयारियों के मामले में हमसे दो दशक आगे है,भले ही उसका सालाना रक्षा बजट हमसे 15 गुना ज्यादा है,भले ही उसकी जीडीपी हमसे 5 गुना अधिक है लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम युद्ध से पहले ही मनोवैज्ञानिक तौर पर पराजित हो जाएँ। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1979 ई.  के चीन-वियतनाम युद्ध में एक छोटे-से देश जिसका क्षेत्रफल मात्र सवा तीन लाख वर्ग किलोमीटर है और जिसकी वर्तमान समय में आबादी मात्र 9 करोड़ है के सामने विशालकाय चीन को मुँह की खानी पड़ी थी। हम चाहे सैन्य-संसाधन में कितने भी कमजोर क्यों न हों तो भी हरेक दृष्टिकोण से हम वियतनाम से तो कई गुना ज्यादा मजबूत हैं। फिर चीन से भय कैसा? चीन का सामना करने में घबराहट क्यों और कैसी? संस्कृत में एक कहावत है कि जब तक आपदा सामने न जाए तब तक हमें उससे नहीं डरना चाहिए और जब सामने आ जाए तो डरने से कुछ लाभ नहीं होनेवाला इसलिए बुद्धिमत्ता से उसका सामना करना चाहिए।
                            मित्रों,जब शत्रु अत्यंत क्रूर और निर्दय हो और इस कदर नास्तिक हो कि बंदूक को ही अपना भगवान मानता हो तो उसके सामने गिड़गिड़ाने और दंडवत होने से तो और भी कुछ हासिल नहीं होनेवाला है सिवाय जलालत के। इतिहास गवाह है कि लड़ाइयाँ साजो-सामान से नहीं जीती जातीं जज्बे से जीती जाती हैं। 1965 की लड़ाई में निश्चित रूप से पाकिस्तान के पास हमसे अच्छे अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन लाल बहादुर शास्त्री के तेजस्वी नेतृत्व ने दोनों सेनाओं के बीच बहुत बड़ा फर्क पैदा कर दिया। 1962 में हम चीन को कड़ी टक्कर दे सकते थे लेकिन तब नेहरू इस कदर भयग्रस्त थे कि बिना लड़े ही उन्होंने गौहाटी तक से सेना वापस बुला ली थी। दुर्भाग्यवश हमारा वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व भी उसी नेहरूवादी,पलायनवादी मानसिकता का शिकार है जिसके चलते हमें 1962 में अकारण मुँह की खानी पड़ी थी। कभी-कभी जोरदार टक्कर मारने के लिए पीछे भी हटना पड़ता है लेकिन हमारी वर्तमान सरकार तो ऐसा करती हुई भी नहीं दिखती बल्कि वो बेवजह पीछे हटती जा रही है और चीन के हाथों अपमान-पर-अपमान बर्दाश्त करती जा रही है।
                                                          मित्रों,नेपोलियन बोनापार्ट के पास कोई दुनिया या यूरोप की सबसे बड़ी सेना नहीं थी लेकिन उसने अपनी यूरोपजयी सेना को मानसिक तौर पर काफी सख्त बना दिया था। उसके जोशीले भाषण सेना पर जादू कर जाते थे और तब वे तब तक अलंघ्य समझे जानेवाले आल्प्स पर्वत को भी छोटा-सा टीला समझकर आसानी से पार कर जाते थे। बाबरनामा बताता है कि 17 मार्च,1527 के खानवा के युद्ध में एक समय बाबर की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली थी लेकिन बाबर का मनोबल तब भी ऊँचा था। बाबर ने अपनी हताश सेना के सामने ही अपने शराब के प्यालों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और फिर कभी शराब नहीं पीने की प्रतिज्ञा की। इस छोटी-सी घटना का उसकी सेना पर जादुई असर हुआ और एक छोटी-सी सेना ने सही व्यूह-रचना का उपयोग कर अपने से कई गुना बड़ी सेना हरा दिया। छत्रपति शिवाजी को ही लीजिए जिन्होंने सह्याद्रि में महान मुगलों को लोहे के चने चबवा दिए थे। शिवा ने अपनी सूक्ष्म बुद्धि और छापेमार रणनीति से मुगल सेना की विशालता को ही उसकी कमजोरी बना दिया था।
                                 मित्रों,इसलिए मैं कहता हूँ कि विश्वास रखिए अभी भी देर नहीं हुई है। बस हमें अपने प्रतिरक्षा सेक्टर की ओवरहॉलिंग करनी होगी। हमें अल्पकालीन के साथ-साथ दीर्घकालीन रणनीतियाँ भी बनानी होंगी। 1990 के दशक में कलाम साहब के नेतृत्व में बनी एक कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार हमें जहाँ वर्ष 2005 तक 70% रक्षा निर्माण खुद करना था और 30% ही आयात करना था आज हम अपनी जरुरतों का 70% आयात करते हैं। पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम हमें नेता,अफसर और सैन्य-संस्थानों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना होगा। फिर हमें निजी क्षेत्र के लिए प्रतिरक्षा क्षेत्र को भी खोलना होगा। विदेशों से साजो-सामान मंगाने पर हमें दोगुना खर्च करना पड़ता है। वर्ष 2006 में पूरे विश्व के हथियार आयात में हमारी हिस्सेदारी 9% थी जिसको हम बदल सकते हैं। इसके लिए हमें प्रतिरक्षा क्षेत्र को भी यथासंभव विदेशी निवेशकों के लिए खोलना होगा। हमें बेहतरीन तकनीकी से लैस हथियारों के आयात को जारी रखते हुए आत्मनिर्भरता की ओर तेज गति से कदम बढ़ाना होगा और आलतू-फालतू सामानों के आयात और निर्माण पर व्यय करने से बचना होगा। सिर्फ मिसाइलें दागने और परमाणु हथियार इकट्ठा कर लेने से हमें कुछ भी हासिल नहीं हो्गा। हमें परंपरागत हथियारों और तरीकों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सिर्फ सही जगह पर,सही साजो-सामान पर पैसा खर्च करना होगा। हमें रणनीतिक मामलों में योजना बनाते समय वियतनाम,ईजराइल और जापान जैसे उन देशों की मदद भी लेनी होगी जो रणनीतियाँ बनाने के फन में माहिर हैं और जिन्होंने कभी-न-कभी भूतकाल में मदांध चीन को पराजित किया है। इसके साथ ही हमें अपने उन तजुर्बेकार जनरलों और सेनानायकों की सलाहों पर भी काफी संजीदगी से अमल करना होगा जिन्होंने 1962,65,71 और 99 की लड़ाइयों में सक्रिय भागीदारी की है।
                          मित्रों,चीन की बात करते समय हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि अगर वियनामियों की तरह जीवट और समुचित व सामयिक रणनीति बनाकर उस पर पूरी गंभीरता से अमल किया जाए तो सीमित साधनों के बूते भी चीन ही नहीं महाशक्ति अमेरिका को भी युद्ध के मैदान में हराया जा सकता है। हमें चीन की बात करते समय यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व भले ही चीन के भय से काँप रहा हो हमारे तीनों सेनाओं के जवानों का मनोबल हमेशा की तरह आठवें आसमान पर है। हम दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र हैं और हमारा एक-एक युवा मर-मिटेगा मगर देश को अपमान का मुँह कभी देखने नहीं देगा। हमें आज भी यह बात याद है कि कभी हमारे जवानों की हिम्मत और बहादुरी की प्रशंसा करते हुए इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कहा था अगर उन्हें आधी भारतीय सेना दे दी जाए तो वे इसके बूते पूरी दुनिया को जीतकर दिखा सकते हैं।
                          मित्रों,मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भयभीत होने या घबराने से हमारे राजनैतिक नेतृत्व को कोई लाभ नहीं होगा। हमें होश को बनाकर और बचाकर रखना होगा और जोश को भी। फिर अकेले चीन तो क्या हम एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों को ही पराजित कर सकते हैं। परन्तु हमारे गले में विजयश्री तभी वरमाला डालेगी जब हमारा नेतृत्व लाल बहादुर शास्त्री की तरह वास्तव में नेशन फर्स्ट एंड लास्ट की नीति पर चले जो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री और यूपीए के सत्ता में रहते संभव ही नहीं है। मनमोहन सिंह और इन दिनों की कांग्रेस पार्टी के लिए तो सत्ता और सत्ता से उपजनेवाला कालाधन ही अथ भी है और इति भी। उनकी प्राथमिकता सूची में देश और देशहित कहीं है ही नहीं। 

25.8.13

पगथिया: छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

पगथिया: छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?:
"मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है अपने हिन्दू धर्म पर गर्व है अपनी हिन्दू संस्कृति पर ...

24.8.13

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं  

1. पेट्रोल ,डीजल का उपयोग सोच समझ कर करे क्योंकि इसका अनावश्यक खर्च
   हमें कंगाल बना रहा है।
2. भ्रष्ट नेताओं को हार का जबर्दस्त मजा चखाएं।चोर नेता जो जनता के कर के पैसे
   की लूट चलाते हैं ,उनके खिलाफ कठोर कानून लाओ।
3 . विदेशो में पड़ा काला धन वापिस लाने का जो दल लिखित में वादा करता है
     उसकी सरकार बनवाओ।
4 . विदेशी चीजों की खरीदी बंद करो स्वदेशी का सम्मान व उपयोग करो।
5. सरकार द्वारा बड़े उद्योगपतियों को दी जा रही सब्सिडी और अन्य रियायते
    बंद हो।
6. सरकार द्वारा समाज कल्याण या रोजगार के नाम पर चल रही अनुत्पादक
    लोक लुभावन योजनायें तत्काल बंद हो।
7. काम के घंटों में बढ़ोतरी हो और सरकारी छुट्टियों में कमी हो।
8. रक्षा उपकरणों में स्वदेशी उत्पाद को तीव्र गति से बढ़ाया जाए।
9.  उधार लेकर घी पीने की संस्कृति बंद करो और बचत करो।
10. लघु उद्योगों का संरक्षण हो और ग्रामीण क्षेत्रों में लघु इकाइयों को प्रोत्साहन
      दो।
11. उत्पाद की मजबूत गुणवत्ता हो।
12. परिश्रमी और पुरुषार्थी बनो ,शारीरिक मेहनत को हेय मत समझो।
13.हर प्रकार का सट्टा,जुआ बंद हो।
14. सरकारी खर्चो,भत्तों में भारी कमी हो। सरकारों द्वारा अपने काम के बखान
    के लिए किया जाना वाला खर्च और विज्ञापन बंद हो।
15. खेती को उद्योग का दर्जा दो।        

23.8.13

आसाराम बापू जी विश्वास को खंडित न करें!

ऐसा लगता है जैसे सारे विवादों का ठेका लेने के बाजीगर आजकल बाबा ही हो रहे हैं। फिर चाहे वह बाबा रामदेव हों या संत आसाराम बापू। दोनों ही अपनी विवादित शैली के लिये जाने जाते हैं। आसाराम नए विवाद में घिरे हैं। कभी जमीनों पर कब्जे, कभी यौन शोषण के आरोप, कभी पत्रकार के साथ मारपीट, कभी किसी का मजाक उड़ाने जैसे आरोप ऐसे व्यक्ति को कहां शोभा देते हैं। ऐसा भी नहीं होता सब झूठ की गठरी ओर अकेले बाबा ही सत्य का
झंडा लेकर लहरा रहे हैं। बलात्कार का आरोप लगना साजिश है या हकीकत यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन एक सं
त सत्य के साथ होता है। जब कुछ गलत किया ही नहीं तो क्यों सामने आकर गिरफ्तारी नहीं दे दी? यदि झूठ होगा तो सामने आ जायेगा। सत्य को सामने लाने से किसी भी जांच से परहेज भी नहीं करना चाहिए। हकीकत यह है कि जिसका जो काम है वह कर ही नहीं रहा बाकी में टांग उड़ाकर खुद को महान बना रहा है। बाबा खुद को भगवान समझते हैं उनके भक्त भी यही मानते हैं। सत्य जानिए ऐसे लोग असाधारण तो हो सकते हैं परन्तु भगवान नहीं। हमारी तरह हाड़-मांस के पुतले हैं एक दिन पंचतत्व में विलीन भी हो जायेंगे। लोगों के दिलों में आदर के साथ बसने वाले बाबाओं द्वारा जनता की भावनाओं को छलने का सिलसिला पुराना है। कलयुग की आश्चर्यजनक हकीकत यह है कि जिनके ऊपर सभ्यता, संस्कृति की जिम्मेदार है वही उसे खंडित भी कर रहे हैं। लोगों को भोग-विलास से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देने वाले क्या स्वयं वास्तव में ऐसे हैं? एक साधारण व्यक्ति भी इसका जवाब ना में ही देगा। ऐसा क्यों? आश्रम सिर्फ नाम के होते हैं सुविधाए फाइव स्टार होटल से कहीं ज्यादा होती हैं। धरती की जन्नत आश्रमों में ही बसती है। देश के बाबा धर्म के नाम पर धंधा करने से संभल जाये तो ही अच्छा है वरना वह दिन भी दूर नहीं होता जब जनता उन्हें ढूंढकर इलाज करेगी। यह भी सच है कि अतिमहत्वाकांक्षा ओर बड़बोलेपन के घोड़े पर सवार होने वाले एक दिन गिरते जरूर हैं।

22.8.13

reenakari: धार्मिक भावना वो थी जो सिता ने दी

reenakari: धार्मिक भावना वो थी जो सिता ने दी:   धार्मिक भावना वो थी जो सिता ने दी आसाराम संत पर एक नाबालिग के यौन शोषण का आरोप लगा है , जिसकी आई.एफ.आर भी र्दज हो गयी और वह पीड़...



धार्मिक भावना वो थी जो सिता
ने दी





आसाराम संत पर एक नाबालिग के यौन शोषण का आरोप लगा है , जिसकी आई.एफ.आर भी
र्दज हो गयी और वह पीड़ित बच्ची भी उपस्थित है , धारा – ३७६,३४२,५०६ लगाई गयी फिर
भी अभी तक आसाराम को गिरफ्तार नहीं किया गया ...आखिर क्यों..? यदि कोई ड्राक्ट्रर
, पुलिस , राजनेता , अध्यापक , अफ्सर आदि पर ये आरोप लगे होते तो वे कब के
गिरफ्तार किए जा चुके होते ...किन्तु क्योंकि आसाराम एक संत है , तो उनका मामला
धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ है ...पुलिस को भय है उनके उन तमाम अनुयायियों का जो
बवाल कर सकतें है ... वाह
!
क्या खूब है बल्कि वे सच्चे अनुयायी है तो अपने आप से सहयोग करना चाहिए, आसाराम को आगे आकर उनसे
बवाल ना करने को कहना चाहिए , उन पर लगा आरोप सच हैं या झूठ इसका फैसला कानून कर
लेगा ...किन्तु एक संत को अपने संत होने का प्रमाण देने की अवश्कता ना हो किन्तु
कथनी और करनी में फर्क नहीं होना चाहिए... वे ये जानते होंगें कि सच की हमेशा जीत
होती हैं..,फिर यदि उन पर आरोप है तो पूर्ण जाँच कराना उनका धर्म है ...जैसे सिता
मईयां ने अपने उपर लगें आरोपों को दूर करने के लिए अग्नि परिक्षा दी और राम जी ने
भी ये विश्वास करतें हुए कि सिता सत्य है फिर भी केवल समाज के लिए समाज कि नजरों
के सामनें उनको अग्नि परिक्षा देने से नहीं रोका ...कुछ ऐसा ही उदहारण आज आसाराम
को गिरफ्तार होकर शान्तिपूर्ण ढ़गं से देना चाहिए ...धार्मिक भावना वो थी जो सिता
ने दी ...ये नहीं जो आज धार्मिक भावना के भय से कोई अग्नि परिक्षा ना दें ...

अंधश्रद्धा की आड़ में आसाराम बापू

संत (या यूं कहें तथाकथित!) आसाराम बापू पर लगे रेप के आरोप सभ्य समाज को असभ्यता का आइना दिखा रहे हैं। हो सकता है कि उन पर लगे बेबुनियाद हों, फिर भी कभी संस्कारी रहे भारत में आज असंस्कार इस कदर हावी हो गया है कि सदाचारी और बलात्कारी में ज्यादा फर्क नजर नहीं आता है। पुलिस इस मामले में आसाराम बापू से पूछताछ करने का मन बना रही है। उनके खिलाफ रेप का मामला दर्ज हो गया है। केस दर्ज होने के बाद आसाराम बापू की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मामला दर्ज होने के बाद उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। पूरा माहौल उनके विरोध में है।
इस प्रकरण के बहाने अगर हम बदलते सामाजिक ढांचे पर गौर करें, तो हमारा नैतिक पतन बड़ी तेजी के साथ हो रहा है। ये तो आसाराम बापू का मामला है, लेकिन इससे पहले भी हमारे समाज का कुत्सित चरित्र दर्शाती कई घटनाएं लोगों का जेहन ताजा करती रही हैं। अक्सर सुनने में आता है कि फलां जगह पर ढोंगी बाबा के कहने पर पिता ने बेटी से रेप कर दिया, या फलां जगह पर बेटा पैदा होने की आस में महिला की आबरू ढोंगी बाबा ने लूटी। शायद आसाराम बापू की जगह कोई ढोंगी बाबा होता, तो किसी क्षेत्रीय अखबार के भीतर के पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर लग गई होती, या शायद वह भी जगह नहीं मिलती और हमारा समाज अपने क्षीण होते चरित्र को प्रोत्साहित कर रहा होता। 
इतना ही नहीं, ढोंगी बाबाओं के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सरेआम गोलियों से भूना जाता है, जैसा कि पुणे में अंधश्रद्धा निर्मूलन से जुड़े डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के साथ हुआ। डॉ. दाभोलकर का मर्डर होने के बाद कुछ नेताओं ने सीधे हिंदू संगठनों पर उंगली उठा दी, जबकि उनके सहयोगियों ने दो बड़े बाबाओं का हाथ होने का संकेत दिया। बताया गया कि डॉ. दाभोलकर इन बाबाओं की काली करतूतों का पर्दाफाश कर उनका असली चेहरा लोगों के सामने उजागर करने वाले थे। इससे स्पष्ट है कि ढोंगी बाबाओं का जाल किस कदर हमारे समाज में विष बनकर फैला है और ये अपनी कुत्सित क्षुधा पूर्ति के लिए किस हद तक जा सकते हैं।
यहां बात सिर्फ डॉ. दाभोलकर के मर्डर की नहीं, या आसाराम बापू के रेप केस में फंसने या न फंसने की नहीं है। क्योंकि, ये तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पाश्चात्य सभ्यता में लिपटता, चिपटता जा रहा हमारा समाज स्वतंत्रता, स्वच्छंदता की आड़ में जिस उच्छृंखलता की ओर बढ़ रहा है, वह आजकल हर जगह किसी न किसी रूप में रेप कर रहा है। कॉर्पोरेट कल्चर में तो तमाम जगहों पर ऐसे नरपिशाच घूम रहे हैं, जो अपने तईं जमकर महिलाओं, लड़कियों को भोग्या बना रहे हैं। इनमें मीडिया हाउसेज भी शामिल हैं, हालांकि बस इनके तरीके अलग-अलग हैं। इन जगहों पर न केस दर्ज हो रहे हैं, न ही कोई आवाज उठा रहा है, बस अंदर ही अंदर चीजें सुलग रही हैं। इनमें बदलाव तभी संभव है, जब एक सामाजिक क्रांति आए और लोग खुद ब खुद अपनी कुत्सित मानसिकता पर काबू कर उसे निर्मलता में बदलें।
सर्वेश पाठक

आई सैल्यूट संदीप शेखर प्रियदर्शी-ब्रज की दुनिया

मित्रों,मई महीने का पहला सप्ताह था। एक महीना होने को था व्यवहार न्यायालय,हाजीपुर से हमारी जमीन की दखलदहानी का पत्र एसडीएम,महनार को गए। हमने इस बीच पत्रोत्तर के लिए महनार,अंचलाधिकारी के दफ्तर में क्लर्क श्री देवानंद सिंह से संपर्क भी किया। फोन करने पर वे रोज कहते कि आज मैं एसडीएम के नाजिर से जरूर बात करूंगा। पिताजी तो काम के लिए कुछ लेने-देने को भी तैयार थे। इसी बीच हमारा एक पूर्वपरिचित फेंकू मुकेश प्रभाकर हमारे डेरे पर आया और झूठ-मूठ के ईधर-उधर फोन घुमाने लगा। हालाँकि उस समय मैं यूजीसी नेट की तैयारी में पूरी गंभीरता से लगा हुआ था लेकिन अब मामला मेरे लिए भी असह्य होने लगा था।
             मित्रों,मैंने टेलीफोन डायरेक्टरी से महनार के एसडीएम का लैंडलाईन का नंबर निकाला और डायल कर दिया। उधर से सुझाव आया कि आप अगर पत्रकार हैं तो सीधे उनके मोबाईल पर बात क्यों नहीं करते? मैंने उन्हीं महाशय से नंबर लेकर फिर से डायल किया। फोन उठानेवाले स्वयं एसडीएम साहब थे। मैंने उनसे विनम्र शब्दों में कहा कि पिछले एक महीने से हमारा एक पत्र पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में आपके कार्यालय में पड़ा हुआ है। पत्र-संख्या भी बताई। कुछ देर बाद एसडीएम साहब ने उधर से ही फोन कर मुझे बताया कि पत्र को उन्होंने बहुत ढुंढवाया लेकिन मिला नहीं सो मैं खुद ही पत्र की कॉपी लेकर आ जाऊँ।
               मित्रों,सच कहूँ तो तब तक अफसरों को लेकर मेरी अवधारणा अच्छी नहीं थी सो मैं उनसे मिलने-जुलने से यथासंभव बचता ही था। उसी दिन 4 मई को मैंने न्यायालय से पत्र की कॉपी प्राप्त की और परसों होकर 6 मई,2013 को फर्स्ट ऑवर में ही मैं एसडीएम साहब के कार्यालय पर जा धमका। तब तक वे कार्यालय में आए नहीं थे और मैंने तब तक नाश्ता भी नहीं किया था। सो परिसर के बाहर सड़क पर जाकर नाश्ता-पानी करने लगा। लौटा तो वे अपने कार्यालय में विराजमान हो चुके थे। मैंने एक चिट पर अपना नाम लिखकर दरबान को दिया। तुरंत बुलावा आया। तब महनार नगर पंचायत के कुछ मोटी चमड़ीवाले नेता उनसे पिछले कई महीने से जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी नहीं होने और इस प्रकार 10000 प्रमाण-पत्रों के लंबित होने की शिकायत कर रहे थे। उनको विदा करने के बाद उन्होंने मुझसे पत्र की कॉपी मांगी और नाजिर कैलाश बाबू को तत्काल सीओ,महनार अनिल कुमार सिंह को पत्र लिखकर उनसे उनका एक दिन का वेतन पत्र द्वारा बताने का आदेश देने को कहा। इस बीच मैं उनके पास ही बैठा रहा। तब उन्होंने चपरासी को भेजकर बीडीओ,महनार प्रवीण कुमार सिन्हा को बुला लाने को कहा। यहाँ मैं आपको बता दूँ कि महनार में अनुमंडल,प्रखंड और अंचल कार्यालय एक ही परिसर में है। बातचीत के दौरान एसडीएम संदीप शेखर प्रियदर्शी ने मुझे बताया कि डीएम जितेन्द्र प्रसाद जी ने उनको महनार में ही रहने को कहा है। उनसे पहले कोई एसडीएम महनार में रहा नहीं। पटना या हाजीपुर से आता-जाता रहा। अभी परिसर में ही स्थित कृषि भवन में उन्होंने अपना आवास बनाया है। एक अकेले के लिए कितनी जगह चाहिए ही? पहली रात को अंधेरे में जब वे अकेले सोये हुए थे तो बर्रे ने उनको डंक मार दिया। पहले तो वे डर गए कि कहीं साँप ने तो नहीं काट लिया लेकिन बाद में खयाल आया कि वे तो प्रथम तल पर हैं सो यहाँ तो साँप आएगा नहीं।
                    मित्रों,इसी बीच बीडीओ,महनार प्रवीण कुमार सिन्हा पसीना पोंछते हुए हाजिर हुए। फिर शुरू हुआ डाँट-फटकार का लंबा दौर। उनसे प्रियदर्शी जी ने मेरे सामने ही पूछा कि क्या वे खुद को जनता का मालिक समझते हैं? क्या बीडीओ ऑफिस उनके बाबूजी का दालान है? उनको बड़े ही कठोर शब्दों में उन्होंने समझाया कि वे जनता के नौकर हैं मालिक नहीं और आदेश दिया कि दो दिनों में सारे पेंडिंग प्रमाण-पत्रों को निर्गत करें।
                    मित्रों,इसी बीच नाजिर कैलाश बाबू उपस्थित हुए और प्रियदर्शी जी से पहले के एसडीएम की बड़ाई करने लगे। प्रियदर्शी जी ने उनको भी जमकर लताड़ लगाई और कहा कि उनको अच्छी तरह से पता है कि पिछले एसडीएम किस तरह से काम करते थे। उस समय तो कार्यालय में आनेवाली चिट्ठियाँ एसडीएम की गाड़ी में ही उनके साथ ही घूमती रह जाती थीं और बाद में फेंक दी जाती थीं। उन्होंने नाजिर बाबू से मेरे काम के बारे में पूछा तो बताया गया कि पत्र अभी टाईप हो रहा है। थोड़ी देर में पत्र आ गया और तत्क्षण प्रियदर्शी जी ने उस पर हस्ताक्षर करके मुझे थमा दिया और कहा कि मैं खुद ही जाकर सीओ,महनार अनिल कुमार सिंह से पत्र का जवाब ले आऊँ। मैं जब सीओ कार्यालय पहुँचा तो सीओ अपनी कुर्सी से गायब मिले। वे तब अपने बड़ा बाबू के कक्ष में उनके सामने की कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैंने जब उनको पत्र देकर उसका तुरंत जवाब देने को कहा तो उन्होंने टालू अंदाज में कहा कि मैं एक सप्ताह बाद आऊँ क्योंकि आज काम का हो पाना संभव ही नहीं है। फिर मैंने प्रियदर्शी जी को फोन लगाया और सीओ की उनसे बात कराई। डाँट-फटकार का तेज असर हुआ और 5 मिनट में ही पत्र का जवाब मेरे हाथों में था। फिर मैंने रसीद कटवाया और घर लौट आया। कल होकर न्यायालय से पता चला कि सिर्फ रसीद से काम नहीं चलेगा एसडीएम के यहाँ से एक पत्र भी चाहिए कोर्ट के नाम से।
                          मित्रों, मैंने फिर से एसडीएम साहब से बात की और 9 मई को मिलने पहुँचा। इस बार भी लगभग पूरे दिन उनके सानिध्य में ही रहा। तब उनके साथ बीडीओ और सीओ,महनार भी मौजूद थे और निर्देश प्राप्त कर रहे थे। मेरा काम हो जाने पर उन्होंने मुझसे पूछा कि आपका जो काम बमुश्किल दस मिनट का था,को होने में पूरे दो दिन लग गए। आप ही बताईए कि इस सुस्त और महाभ्रष्ट तंत्र में मैं कैसे सुधार लाऊँ? उन्होंने यह भी बताया कि वे हाई डाईबिटिज के मरीज हैं और यह बीमारी नौकरी के दौरान पैदा होनेवाले तनाव की ही देन है। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि उन पर अभी करीब पौने दो सौ मुकदमे चल रहे हैं। किसी कर्मी को डाँट लगा दी तो हो गया एक मुकदमा दर्ज। उन्होंने मुझसे इस बात की शिकायत भी की कि मीडिया किसी अधिकारी की बुराइयों को तो खूब उछालती है लेकिन उनके अच्छे कामों पर चुप्पी लगा जाती है। इसी बीच कोई जिला परिषद् सदस्य उनसे मिलने आया मगर उन्होंने मिलने का समय समाप्त हो जाने का हवाला देते हुए मिलने से मना कर दिया। थोड़ी देर बाद कोई गरीब फरियादी आया जो हसनपुर,महनार का था और जिसके घर पर उसकी अनुपस्थिति में उसके किसी दबंग रिस्तेदार ने कब्जा कर लिया था। प्रियदर्शी जी न केवल उससे गर्मजोशी से मिले बल्कि तुरंत समुचित कार्रवाई का निर्देश भी दिया। मैं अभिभूत और हतप्रभ था कि क्या कोई अफसर ऐसा भी हो सकता है? मैंने जब उनको बताया कि मैंने भी यूपीएससी और बीपीएससी की मुख्य परीक्षा कई-कई बार दी थी तो उन्होंने मुझे कहा कि अच्छा हुआ कि आप पास नहीं हुए। ईधर हम जैसे लोगों के लिए सिर्फ परेशानी-ही-परेशानी है। अब मैं उनको क्या बताता कि वर्तमान काल में पत्रकार तो और भी बँधुआ मजदूर बनकर रह गए हैं सो मुस्कुरा कर रह गया।
                                             मित्रों,यही मेरी प्रियदर्शी जी से दूसरी और अंतिम मुलाकात थी लेकिन बाद में मैं अखबारों में उनके कारनामे लगातार पढ़ता रहा। उन्होंने कैसे बीडीओ,महनार के 12 बजे ही ऑफिस से भाग जाने पर उनकी गाड़ी की चाबी ही जब्त कर ली,कैसे सीओ ऑफिस के किसी भ्रष्ट कर्मी पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की या कैसे किसी पियक्कड़ मुखिया को परिसर से बाहर निकलवाया या कैसे मुरौवतपुर के घूसखोर विद्युतीकरण ठेकेदार को गिरफ्तार करवाया। इस बीच मैं भिखनपुरा,बिलट चौक अपनी ससुराल गया तो पता चला कि कोई रंजन सिंह नाम का विद्युतीकरण ठेकेदार उनलोगों से विद्युतीकरण के लिए प्रति परिवार 300-300 रुपए की रिश्वत मांग रहा है। मैंने अपने साले को ग्रामीणों के साथ प्रियदर्शी जी से मिलने की सलाह दी और आश्वस्त किया कि मिलने के बाद यह समस्या निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी।
                        मित्रों,लेकिन ऐसा हो पाता कि इससे पहले ही कल 21 अगस्त के समाचार-पत्र में पढ़ने को मिला कि एसडीएम,महनार संदीप शेखर प्रियदर्शी का तबादला बेगूसराय कर दिया गया है। पढ़ते ही झटका लगा। मैं तो अभी तक खुश हो रहा था कि महनार अनुमंडल में पहली बार एक ईमानदार,कर्त्तव्यनिष्ठ और ओजस्वी अफसर आया है जो पूरी तस्वीर को एकबारगी ही बदल देने की क्षमता रखता है। अभी-अभी तो वे आए थे,अभी तो ठीक से सेटल भी नहीं हुए थे कि तबादला हो गया। जाने अब अगला एसडीएम कैसा हो? क्या इस तरह बार-बार जल्दी-जल्दी के तबादलों पर रोक नहीं लगनी चाहिए? जब किसी अधिकारी को काम करने और स्थिति को सुधारने के लिए समय ही नहीं दिया जाएगा तो सुधार होगा कैसे? प्रियदर्शी जी को दो-तीन सालों तक महनार का एसडीएम बने रहने देना था। खैर संदीप शेखर प्रियदर्शी जी जहाँ भी रहें खुश रहें,स्वस्थ रहें यही हमारी कामना है। आई सैल्यूट यू,संदीप शेखर प्रियदर्शी।  

reenakari: आबरू

reenakari: आबरू: आबरू एक के साथ एक मुफ्त है, स्त्री का जन्म सुस्त है , नारी की गाथा गाता , नारी के सम्मान में , ये शब्द मुछों का ...

आबरू
एक के साथ एक मुफ्त है,
स्त्री का जन्म सुस्त है ,
नारी की गाथा गाता ,
नारी के सम्मान में , ये शब्द
मुछों का सवाल ,ये शब्द
जात – पात की मशॅाल , ये शब्द
नारी का साथ  है , ये शब्द
उसका हाल है , ये शब्द
नारी को सम्मान से ,
सामान करता , ये शब्द
ना सात फेरे अग्नि के , ना डौली कि स्वारी ,
फिर भी उसका जीवनसाथी , ये शब्द ,
समाज ने ये खेल खेला
इस शब्द का जाल फेंका ,
आबरू शब्द ये मिला ,
आबरू आबरू का गान
स्त्री का जन्म सुस्त है ,
एक के साथ एक मुफ्त है
स्त्री का जन्म सुस्त है ,

आबरू


आबरू



एक के साथ एक मुफ्त है,
स्त्री का जन्म सुस्त है ,

नारी की गाथा गाता ,
नारी के सम्मान में , ये शब्द

मुछों का सवाल ,ये शब्द
जात – पात की मशॅाल , ये शब्द
नारी का साथ  है , ये शब्द
उसका हाल है , ये शब्द


नारी को सम्मान से ,
सामान करता , ये शब्द
ना सात फेरे अग्नि के , ना डौली कि स्वारी ,
फिर भी उसका जीवनसाथी , ये शब्द ,


समाज ने ये खेल खेला
इस शब्द का जाल फेंका ,
आबरू शब्द ये मिला ,
आबरू आबरू का गान

स्त्री का जन्म सुस्त है ,

एक के साथ एक मुफ्त है

स्त्री का जन्म सुस्त है ,

21.8.13

सेहत का बिग ब्रदर - अनन्नास



बहनों, 
आज रक्षा-बंधन है, आपकी रक्षा करने और आपसे राखी बंधवाने आपका बिग ब्रदर आ गया है। आज का पावन दिन इसके साथ प्यार से बिताइये और स्वस्थ हो जाइये ..... 


सेहत का बिग ब्रदर - अनन्नास

अनन्नास एक उष्णकटिबन्धीय पौधे एवं उसके फल का सामान्य नाम है। ब्रोमेलियासीइ परिवार का यह फल आज
सर्वव्याप्त, रसीला, जोशीला और स्वादिष्ट फल है। इस फल का वानस्पतिक नाम अनानास कोमोसस है। इसका अनोखा मीठा और खट्टा स्वाद सबको अच्छा लगता है। वैसे तो इसका मौसम मार्च से जून तक रहता है, लेकिन बाजारों में यह पूरे साल उपलब्ध हो जाता है। । अनन्नास का ज्यूस शौक से पीया जाता है। साथ ही इसको ताजा काट कर खाया जाता है और खाने के बाद सलाद के रूप में या फ्रूट-कॉकटेल के रूप में प्रयोग भी किया जाता है। 
अनन्नास पाचक तत्वों से भरपूर, शरीर को ताजगी देने वाला, हृदय व मस्तिष्क को शक्ति देने वाला, कृमि नाशक और स्फूर्तिदायक फल है| ये त्वचा में निखार लाता है| गर्मी में यह ताजगी व ठंडक देता है| अनन्नास के रस में प्रोटीन को पचाने की अपार क्षमता है| यह आँतों को सशक्त बनाता है|
हालांकि तकनीकी दृष्टि से यह अनेक छोटे-छोटे फलों से मिल अपना आकार प्राप्त करता है। इसकी सतह पर ये छोटे फल आँख की तरह दिखाई देते हैं। यह एक बड़ा और बेलनाकार फल है, जिसकी बाहरी खुरदरी और छिलकेदार सतह हरे, भूरे या पीले रंग की होती है। सिर पर नीली हरी मांसल पत्तियों का ताज पहने सबको आकर्षित करता है। इसका नीचे का आधार अपेक्षाकृत अधिक मीठा और कोमल होता है। 
इतिहास 
दोस्तो, नाम पर मत जाइये, सच्चाई यही है कि न ये पाइन है, न ये एप्पल है और न ही इसकी उत्पत्ति हवाई द्वीप से हुई है। यह अलग बात है कि अनन्नास का व्यवसायिक उत्पादन हवाई द्वीप में ही शुरू हुआ, और आज इसे हम हवाई द्वीप के विषेश फल के रूप में जानते हैं। लेकिन इसकी उत्पत्ति दक्षिणी अमेरिका में हुई है। पाइन कोन जैसा दिखने के कारण इसका नाम पाइनएप्पल रखा गया। पाइनएप्पल शब्द अंग्रेजी में 1664 से पहले कभी प्रयोग नहीं लिया गया। 
इसकी खोज का श्रेय क्रिस्टोफर कोलम्बस को दिया जाता है, जिन्होंने 1493 में इसे गॉडेलूप द्वीप में खोजा, हालाँकि दक्षिणी अमेरिका में लम्बे समय से इसकी खेती की जा रही थी। कोलम्बस ने इसको “piña de Indes” अर्थात “इंडियन्स का पाइन” नाम से पुकारा। दक्षिणी अमेरिका के गॉरानी इंडियन्स ने इसे खाने के लिए पैदा करते थे। वे इसे nanã अर्थात उत्कृष्ट फल कहते थे। 
1519 में एक अन्य खोजकर्ता मेगेलान ने ब्राजील में पाइनएप्पल का की खोज की थी और 1555 से इस रसीले फल को
बड़े चाव से निर्यात करके इंगलैंड भेजा जाने लगा। और जल्दी ही यह फल हिन्दुस्तान, एशिया और वेस्ट इंडीज में भी प्रचलित हो गया। सन् 1751 में जब जॉर्ज वाशिंगटन ने बरबाडोस में पहली बार पाइनएप्पल खाया तो उन्हें यह इतना पसन्द आया कि इसे पसन्दीदा उष्णकटिबन्धीय फल घोषित कर दिया। 
सन् 1770 में केप्टन जेम्स कुक ने हवाई द्वीप में अनानास की खेती शुरू की, लेकिन इसका व्यवसायिक उत्पादन 1880 से शुरू हुआ, जब समुद्री जहाज के आने से इसका निर्यात आसानी से होने लगा था। सन् 1903 में जेम्स ड्रमॉन्ड डोले ने अनानास का डिब्बों में बंद करके पूरे विश्व में इसको भेजना शुरू किया था। इसका छिलका निकालने और काटने की नई स्वचालित मशीनें आने के बाद इसका निर्यात दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा। इस तरह देखते देखते डोल हवाईयन पाइनएप्पल कंपनी हवाई की सबसे बड़ी खाद्य उद्योग बन गई। आज भी विश्व का 10 प्रतिशत अनानास हवाई में ही पैदा होता है। मेक्सिको, होन्ड्युरस, थाईलेंड, चीन, डोमिनियन रिपब्लिक, फिलिपीन्स, कोस्टा रिका और एशिया अनानास के बड़े उत्पादक देश हैं। 

अनन्नास – पोषक तत्वों का उपवन 
अनन्नास में पोषक तत्वों और एंजाइम्स का एक जटिल मिश्रण होता है जिसे ब्रोमीलेन कहते हैं। यह इसके फल और तने में व्याप्त रहता है। इसमें प्रमुख तत्व प्रोटीन को पचाने वाले कई शक्तिशाली एंजाइम्स (जैसे सिस्टीन प्रोटीनेजेज इत्यादि) होते हैं। साथ ही ब्रोमीलेन में कई प्रदाहरोधी, कैंसररोधी और रक्त को पतला रखने वाले प्रभावशाली तत्व होते हैं।
इसमें भरपूर विटामिन सी होता है, जो एक घुलनशील एंटीऑक्सीडेंट है और मुक्त-मूलकों के आतंक से हमारी रक्षा करता है। और रक्षातंत्र को मजबूत बनाता है। इस तरह अनन्नास डायबिटीज, अस्थमा, हृदयरोग और कैंसर में बहुत हितकारी माना गया है। 
मात्र एक कप अनन्नास से हमें ढेर सारा मेंगनीज ( 125% DV) मिल जाता है, जो कोशिका में ऊर्जा-उत्पादन और रक्षातंत्र के कई एंजाइम्स के सहायक की तरह कार्य करता है। उदाहरण के लिए सुपर ऑक्साइड डिसम्युटेज माइटोकोंड्रिया (कोशिका की ऊर्जा-उत्पादक इकाइयां) में मुक्त-मूलकों का सफाया करता है। इसमें पर्याप्त थायमीन (विटामिन बी-1) भी होता है जो ऊर्जा उत्पादन में कई तरह से मदद करता है। इसे मीट को मेरीनेड करने के काम में भी लिया जाता है। कैंसर के विख्यात वैकल्पिक बुडविग उपचार में अनन्नास का भरपूर उपयोग किया गया है। 

पगथिया: ये कैसा भारत निर्माण …?

पगथिया: ये कैसा भारत निर्माण …?
 देव भी पुरुषार्थ के पीछे चलता है ,ऐसा हिन्दू दर्शन और विद्धवानों का मानना है,मगर वर्तमान

20.8.13

क्या नीतीश पीएम मैटेरियल हैं?-ब्रज की दुनिया

मित्रों,काफी समय पहले मैंने उपनिषदों से ली गई एक कथा पढ़ी थी। एक ब्राह्मण था जो जब भी कुछ अच्छा करता तो उसका भरपुर श्रेय खुद लेता और जब भी कुछ बुरा करता तो उसके लिए देवराज इन्द्र को दोषी ठहरा देता क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य की भुजाओं में इन्द्र का निवास होता है। एक दिन खेत से हाँकते वक्त कोई गाय उसकी पिटाई से मर जाती है। तभी इन्द्र वेष बदलकर आते हैं और उससे पूछते हैं कि यह गोहत्या किसने की। ब्राह्मण आदतन जैसे ही इन्द्र का नाम लेता है वैसे ही इन्द्र प्रकट हो जाते हैं। ब्राह्मण की बोलती बंद हो जाती है और तब इन्द्र उसे कड़ी फटकार लगाते हैं कि अगर अच्छे कार्यों का श्रेय तुम लेते हो तो बुरे कर्मों की जिम्मेदारी भी तुम्हें ही लेना पड़ेगी।
                       मित्रों,हमारे प्रदेश बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का व्यवहार भी इन दिनों उपरोक्त ब्राह्मण जैसा हो गया है। राज्य में जब भी कुछ अच्छा होता है तो वे उसका श्रेय लेने में क्षणभर की भी देरी नहीं करते लेकिन जब कोई बुरी या शर्मनाक घटना घट जाए तो जनाब कभी उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते। अभी कल की ही बात है कि खगड़िया के धमारा घाट स्टेशन पर ट्रेन से कटने से माता कात्यायनी के दर्शन के लिए जा रहे तीन दर्जन हिन्दू श्रद्धालु मारे गए लेकिन उन्होंने घटना की सारी जिम्मेदारी रेलवे और केंद्र सरकार पर डाल दी। मानो स्थानीय मेले का सुचारू प्रबंधन करना और छोटे-छोटे स्टेशनों पर लोगों को पटरी से हटाने सहित कानून-व्यवस्था संभालना और घायलों को अविलंब अस्पताल पहुँचाना भी सिर्फ केंद्र सरकार का ही काम हो। इससे पहले भी जब छपरा में मिड डे मिल खान से 23 बच्चे मारे गए थे तब भी उन्होंने इसके लिए विपक्षी दल राजद को जिम्मेदार ठहरा दिया था। इसी तरह उनकी पार्टी कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस के सुर-में-सुर मिलाती हुई नवादा में हुए सांप्रदायिक दंगों के लिए मुख्य विपक्षी दल भाजपा को दोषी ठहरा चुकी है। मानो मिड डे मिल का सुचारू प्रबंधन और कानून-व्यवस्था संभालना भी सिर्फ-और-सिर्फ विपक्ष की जिम्मेदारी है। फिर नीतीश जी के जिम्मे क्या है? खाली चपर-चपर करते रहना कि गठबंधन तोड़ने का उनका निर्णय सही था और आतंकियों को अपना बेटा-बेटी बताते रहना? अभी चार दिन पहले जब वैशाली जिले में जहरीला मिड डे मिल खाने से कई दर्जन बच्चे बीमार हो गए तो नीतीश जी ने फरमाया कि ऐसा तो होता ही रहता है,कोई मरा तो नहीं न। मैं मानता हूँ कि कोई मरता तो वे जरूर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराते। दुर्भाग्यवश कोई नहीं मरा इसलिए उनको ऐसा करने का सुअवसर भी नहीं मिल सका।
                              मित्रों,अभी कुछ सप्ताह पहले ही नीतीश जी ने प्रदेश के विधायकों को यह प्रावधान करके खुश कर दिया है कि विधायक-कोष से होनेवाले साढ़े सात लाख रुपए तक के काम के लिए अब निविदा आमंत्रित नहीं करनी होगी। यानि विधायक जी जिस चेले को चाहें ठेका दे सकेंगे। अब साढ़े 7 लाख के टुकड़े में माननीय जी पूरा काम करवाएंगे और घुमा-फिराकर विधायक-कोष की दो करोड़ रुपए वार्षिक की राशि में से कम-से-कम आधी तो उनकी जेबों वापस आ ही जाएगी। अब अगर विधायक-कोष से बनी सड़कें या पुल उद्घाटन से पहले ही टूट या धँस जाए तो दोषी कौन होगा? तब नीतीश जी तो यकीनन अपनी आदत के अनुसार अपना पल्ला झाड़ लेंगे और कहेंगे कि इसके लिए वे नहीं बल्कि विधायक जी जिम्मेदार हैं लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि मौजूदा कानून को बदला किसने? किसने माननीयों को लूट की छूट दी?
                                         मित्रों,कुल मिलाकर पीएम बनने से पहले ही पीएम पद के लिए हॉट मैटेरियल बन चुके नीतीश कुमार जी में हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के सारे गुण एकबारगी पधार चुके हैं। जिस तरह आर्थिक दुरावस्था,रुपए के अवमूल्यन और महँगाई के लिए मनमोहन सिंह कभी अपनी ऐतिहासिक सरकार को जिम्मेदार नहीं मानते उसी प्रकार से हमारे राज्य के मुख्यमंत्री जी भी किसी भी ऊँच-नीच के लिए अपने को और अपनी सरकार को बिल्कुल भी दोषी नहीं मानते हैं। जाँच आयोग बनाने में भी वे मनमोहन से पीछे नहीं आगे हैं। प्रदेश में फारबिसगंज न्यायिक जाँच आयोग और कोसी जाँच आयोग समेत कई जाँच आयोग इस समय अस्तित्व में हैं और इन्होंने कदाचित् अगले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी रिपोर्ट नहीं देने की कसम उठा रखी है। अब इनके मंत्रीमंडल को ही लें तो उसमें आपको कई ऐसे नायाब मंत्री मिल जाएंगे जो कभी लालू-राबड़ी मंत्रीमंडल के नवरत्नों में शुमार थे और तब राज्य में जंगलराज कायम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। इनमें से रमई बाबू तो लगभग अनपढ़ हैं और अपने पद के लिए पूरी तरह से अयोग्य तो वे हैं ही। अब आप ही बताईए कि इन जंगलराज विशेषज्ञों की बदौलत कोई कैसे राज्य में सुशासन स्थापित कर सकता है? वेसे नीतीश जी का एक और कारनामा अद्वितीय की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस समय वे अकेले 18 विभागों के मंत्री हैं जबकि किसी के लिए सुचारू तरीके से एक अकेले विभाग को संभालना ही कठिन होता है। अच्छा तो यह होता कि नीतीश जी सारे मंत्रियों की छुट्टी कर देते और राष्ट्रपति शासन की तरह अकेले ही पूरी सरकार चलाते वो भी बिना किसी जिम्मेदारी के।
               मित्रों,अब तो एक ही बात नीतीश कुमार जी के मुखारविंद से सुननी बाँकी रह गई है। मैं उम्मीद ही नहीं करता हूँ बल्कि मेरा पूरा विश्वास है कि भविष्य में जब भी कोई बड़ी और बुरी घटना प्रदेश में घटती है तो श्रीमान् यही कहेंगे कि इसके लिए और कोई नहीं सीधे तौर पर राज्य की जनता ही जिम्मेदार है। केवल राज्य की जनता की लापरवाही से ही (वैसे हम कुछ लापरवाह तो हैं भी) यह दुःखद घटना घटी है। आखिर किसी भी दुःखद घटना की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन उठाए ही क्यों? वैसे वे जब ऐसा कहेंगे तब कहेंगे हम तो जनता की तरफ से अपनी गलती एडवांस में ही मान लेते हैं क्योंकि यह हमारी ही गलती थी जो हम 2010 में दोबारा नीतीश जी की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गए और उनको दोबारा के लिए सीएम मैटेरियल समझ लिया। 

धड़ाम से ………

धड़ाम से  ……… 

बात मौन के महत्व की है ,बड़ी ताकत है मौन में। जो काम चिल्लाने से पूरा नहीं होता
वह मौन से हो जाता है। सब कुछ इस तरह करो कि किसी के कानो कान खबर भी ना
हो ,कुछ सालों से मौन अपनी पराकाष्ठा पर है ,बिना कुछ चूं चपाटा किये रुपया धडाम
हो गया ,बस सब देखते रह गए मोहनी अदा से  …।

           कुछ सालों से अभी तक बेचारी ईमानदारी का जनाजा निकाला जा रहा है,किसी
ने यह पूछने की हिम्मत नहीं करी कि ये मरी कैसे ?ईमानदारी शिखर पर खड़ी थी और
मौन ने बड़ी मासूमियत से खाई की तरफ धकेल दिया ,ईमानदारी कुछ समझे उसके
पहले धड़ाम से खाई में जा गिरी  ……………. धड़ाम

         अर्थ का पहिया बड़े जोर से चक्कर खा रहा था ,यह चक्कर घूमता हुआ ऊपर जा
रहा था ,सब खुश थे कि ये चक्कर बड़ी तेजी से घूम रहा है लेकिन बड़ी शिफ्त से कब
रिवर्स लगा कि भागा धड़ाम से निचे की तरफ …….कोई रूकावट नहीं लगता है खाई
में जाकर विश्राम लेगा  …धड़ाम हो खुद ही ठहर जाएगा 

     पहली पार से उथल पुथल हुयी ,हमने उस ओर इशारा किया मगर वो बोले -बेटे ,
मौन  … थोड़े समय बाद एक आवाज आई - धड़ाम -धड़ाम  … और कुछ रण बाँकुरे
को सदा के लिए मौन कर गयी  …!!

    दामाद जी अपना कारोबार भी मौन हो चला रहे थे ,बड़ी अच्छी कट रही थी। रुपया
खुद ब खुद बढ़ रहा था ,सिलसिला आगे बढ़ रहा था क्योंकि कुछ चला था और मीलों
चलना था पर वाह रे किस्मत !ना जाने कैसे खे -खे करता मका आया और धड़ाम से
धक्का दिया ,इससे कुछ उल्टी बाहर आई मगर मौन हो कर वापिस निगल ली  …।

    वो बेतहाशा भागे जा रहे थे ,जब भी पीछे मुड़ कर देखते तो गरीबी पीछा करती
दिखती ,उनकी साँसे फुल रही थी मगर दौड़े जा रहे थे ,हमने उनको रोक कर पूछा -
यूँ भागने से क्या होगा ,इससे मुकाबला करो. वो बोले - रुकते ही यह पकड कर मुझे
धड़ाम से गिरा देगी इसलिए रुकना उपाय नहीं है मुझे किधर भी भागना है ,दोड़ना
है ताकि मेरा धड़ाम होना टल जाये !

       हम घर पर बैठे थे ,सोचा कुछ समाचार जान लूँ। टी वी ऑन किया कि समाचार
वाचक अजीब हरकतें करता हुआ बोला - हाय राम ,जोरदार मंदी की आंधी से पूरा
शेयर मार्केट धड़ाम से ओंधे मुंह गिर पड़ा। …….

        टी वी पर धड़ाम सुन हम घर के बाहर निकले शायद इस धड़ाम से पीछा छूटे
घर से कुछ दुरी पर एक अँधा माथे पर भारी बोझ रखे पृथ्वी की तरह गोल घेरे में
घूम रहा था। मेने उसके सर के बोझ को हटाना चाहा तो वो बोला -ये क्या कर रहा
है छोरा ,दीखता नहीं मैं निर्माण कर रहा हूँ ,सालो से दौड़ रहा हूँ और सालो तक
दौड़ने की अदम्य इच्छा रखता हूँ  … और तू इस बोझ को धड़ाम से मुझसे अलग
करना चाहता है ?

  मेने कहा -बूढ़े बाबा ,समय को पहचान ,अब तेरा सूरज अस्त हो रहा है क्योंकि
अब क्षितिज से शेर दहाड़ रहा है ,कट ले बाबा वरना शेर तेरा धडाम कर ही देगा !!    

17.8.13

खूंखार आतंकी टूंडा आ ही गया गिरफ्त में

मोस्ट वांटेड खूंखार आतंकवादी बम बनाने का एक्सपर्ट अब्दुल करीम उर्फ टूंटा आखिर पकड़ा गया। यह वह शख्स है जिसने पश्चिमी यूपी समेत देश के कई हिस्सों में आतंकवाद के बीज रोपे। देश में आतंक की पैदाईस करने में इसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। हैरत यह कि निशाने पर होने के बावजूद यह पहली बार ही पकड़ में आया। पत्रकारिता के सफर में अब्दुल करीम उर्फ टूंडा पर कई बार लिखने का मौका मिला।  हिन्दुस्तान में ही जन्मे गाजियाबाद के पिलखुआ कस्बे के रहने वाले इस नापाक गद्दार हैवान के इरादे शुरू से ही खतरनाक रहे थे। खून-खराबा, हिंसा उसे पसंद थी। बम बनाते वक्त हुए एक विस्फोट में इसका हाथ उड़ गया तभी नाम टूंडा पड़ा। कोई दोराय नहीं कि यदि हिन्दुस्तान में ऐसे हैवान न हो तो पाकिस्तान की औकात इतनी नहीं कि वह हम पर चोट कर सके। पत्रकारिता के सफर में अब्दुल करीम उर्फ टूंडा पर कई बार लिखने का मौका मिला। कभी चिकित्सक रहे टूंटा का शुरू से ही देश को आतंकवाद की आग में झोंकने का मकसद रहा। उसका बीस साल पुराना आपराधिक इतिहास है। जिसमें सीरियल बम धमाके सबसे ज्यादा शामिल रहे हैं। चार भाषाओं पर उसकी पकड़ है। गिरफ्तारी के वक्त भी इस आतंकी की नजरों का अंदाज शातिराना था। दिल्ली पुलिस के सीपी एस0एन0 श्रीवास्तव ने उसकी गिरफ्तारी का खुलासा किया। कोई दोराय नहीं कि यह पुलिस के साथ हर हिन्दुस्तानी के लिये बड़ी सफलता है। कानूनी मजबूरियां न होती, तो शायद इस आतंकी को सजा बिना इंतजार के लिये गई होती। चार भाषाएं बोलने वाला यह बम एक्सपर्ट देखिए क्या राज उगलता है। ऐसे गद्दारों ने जो जख्म लोगों को दिये हैं शायद ही वह कभी भर सकें। 

16.8.13

मोदी राजा भोज मनमोहन गंगू तेली-ब्रज की दुनिया



मित्रों,कल लगातार दसवीं बार मुझे लाल किले से अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुनने का अवसर मिला। इसे मैं सुअवसर कहूँ या कुअवसर समझ में नहीं आता। कितनी बड़ी विडंबना है कि आज आजादी के 67 साल बाद भी प्रधानमंत्री ने देश के समक्ष कमोबेश वही चुनौतियाँ गिनाईं जिनको 15 अगस्त,1952 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने गिनाई थी। इसका सीधा मतलब यह है कि कैलेंडरों में भले ही 60 साल गुजर गए मगर हमारा देश आज भी वहीं-का-वहीं खड़ा है। वही गरीबी,वही भुखमरी,वही बेरोजगारी,वही सीमा विवाद,वही जनसंख्या-विस्फोट और वही सांप्रदायिक दंगे।
              मित्रों,फिर हमने गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत के कथित भावी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी सुना जो लालन कॉलेज,भुज से जनता को संबोधित कर रहे थे। उनमें जोश था,ओज था,देश के बेहतर भविष्य के लिए योजनाएँ थीं। उन्होंने भ्रष्टाचार पर खूब बातें कीं,जमकर हल्ला बोला। पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया लेकिन यह नहीं बताया कि राजनैतिक दलों को सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर कर देने से कैसे तंत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि गुजरात में लोकायुक्त नहीं होने से भ्रष्टाचार को कम करने में कैसे सहायता मिल रही है। वैसे मैं आपको यह भी बता दूँ कि अधिकतर राज्यों में लोकायुक्त महोदय भ्रष्टाचार का कुछ खास नहीं उखाड़ पाए हैं और यह पद अभी भी महज सांकेतिक ही बना हुआ है। इतना ही नहीं आज भी जबकि मोदीजी की पार्टी में दागियों की बड़ी फौज मौजूद है तो फिर उनकी पार्टी कैसे पार्टी विथ डिफरेंस हुई?
                                   मित्रों,2014 के चुनावों में किस पार्टी को बहुमत मिलेगा या फिर किसी भी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलेगा अभी से कहा नहीं जा सकता। ऐसे में अगर भाजपा और एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है तो पता नहीं कि भाजपा और नरेंद्र मोदी को किन-किन मुद्दों पर कौन-कौन से समझौते करने पड़ेंगे? फिर क्या पता कि आज से दस साल बाद नरेंद्र मोदी की भी वही स्थिति हो जाए,उनका स्वर भी उसी तरह निराशाजनक हो जाए जिस तरह कि आज 15 अगस्त,2004 को उम्मीदों से लबरेज रहे मनमोहन सिंह का है।
                    मित्रों, यह सच है कि वर्तमान दशक में हमारे राजनेताओं का काफी तेजी से नैतिक स्खलन हुआ है जिससे जनता का उनमें विश्वास लगातार बहुत तेजी से कम हुआ है लेकिन यह हमारे लोकतंत्र की मूलभूत कमजोरी नहीं है। हमारे लोकतंत्र की मूलभूत समस्या नेता नहीं हैं बल्कि मौलिक समस्या है हमारी गलत और खर्चीली चुनाव प्रणाली। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य हो सकता है कि कई बार चुनावों में कुल जमा ज्यादा मत पानेवाला दल हार जाता है और कुल जमा कम मत पानेवाले दल की जीत हो जाती है। कोई भी दल मात्र 20-30% मतदाताओं का समर्थन पाकर ही प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ जाता है जबकि असलियत तो यही होती है कि वह सरकार कुल प्राप्त मतों के आधार पर अल्पमत की सरकार होती है।
                          मित्रों,यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ सालों में गाँव से लेकर संसद तक के लिए होनेवाले चुनावों में पैसों का जोर बढ़ा है। आज किसी भी विधानसभा चुनाव में प्रति उम्मीदवार कम-से-कम 1 करोड़ और लोकसभा चुनाव में प्रति उम्मीदवार कम-से-कम 10 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। हमारे राजनेताओं ने चुनाव-दर-चुनाव जनता के साथ इतनी वादाखिलाफी की है कि अब जनता यह मानकर चलने लगी है कि हमारा नेता वादों को पूरा करनेवाला है नहीं इसलिए जनता चुनावों के समय ही उम्मीदवारों से पैसे मांगने लगी है और अब वह मत का दान नहीं करती बल्कि अपनी मत बेचती है। जनप्रतिनिधियों और जनता के इस द्विपक्षीय नैतिक स्खलन का परिणाम यह हुआ है कि अब ईमानदार और गरीब व्यक्तियों के लिए चुनाव लड़ना और लड़कर जीतना संभव ही नहीं रह गया है। जनबल पर धनबल के हावी होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो बीते वर्षों में सामने आया है वह यह है कि राज्यसभा और विधान परिषद् जो कभी गैर राजनैतिक गणमान्य लोगों की सभा मानी जाती थी आज पूंजीपतियों का आरामगाह बन गई है। आज सरकारों के गठन में जमकर सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त की जाती है। राजनीति ने व्यवसाय का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। पहले चुनाव में पूंजी लगाओ और फिर जीत के बाद वैध-अवैध तरीके से जमकर पैसे बनाओ और बनाने दो। लूटो और लूटने दो। कभी तो नेताओं के खराब होने से तंत्र खराब होता है तो कभी तंत्र के भ्रष्ट होने से नेता भ्रष्ट हो जा रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस बिगड़ैल तंत्र को सुधारने का मंत्र क्या है?
                                                          मित्रों,मैं आपसे बार-बार निवेदन कर चुका हूँ कि जब तक भारत में संसदीय शासन-प्रणाली है हम भय,भूख और भ्रष्टाचार का कुछ नहीं उखाड़ सकते। देश में जनप्रतिनिधियों द्वारा सत्ता के प्रधान के चुनाव की परंपरा तुरंत बंद होनी चाहिए क्योंकि हमारे वार्ड सदस्य,पंचायत-समिति सदस्य,जिला-परिषद् सदस्य,विधायक और सांसद चोर और लालची हो गए हैं,उनके मन में अब रंचमात्र भी जनकल्याण की भावना शेष नहीं बची है। कुछेक को छोड़कर सबके सब सिर्फ आत्मकल्याण में लगे हुए हैं इसलिए अब जनता को सीधे-सीधे अपना शासक चुनने का अधिकार मिलना चाहिए कुछ-कुछ उसी तरह जैसे ग्राम-पंचायतों में ग्रामीणों को मुखिया को चुनने का मिला हुआ है। चुनावों के समय जनता दोहरा मतदान करे। मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री के लिए अलग और विधायक-सांसद के लिए अलग ठीक पंचायत चुनावों की तरह।
                         मित्रों,ऐसा जब होगा तब होगा आज की कड़वी सच्चाई तो यही है कि हमें संसदीय शासन-प्रणाली के माध्यम ही अगले साल मोदी और मनमोहन में से एक को चुनना होगा। यदि हम दोनों के कल के भाषण की तुलना और देश की विस्फोटक स्थिति पर दृष्टिपात करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि हमारे सामने मोदी को चुनने के अलावा कोई विकल्प है ही नहीं। दरअसल मनमोहन चुके हुए तीर हैं,गीले हो चुके बारूद हैं,बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं,घोटालों के घंटाघर और नाकामियों का नगाड़ा हैं,मात खा चुके राजा हैं इसके विपरीत मोदी में अपार संभावनाएँ हैं,उम्मीदें हैं,जोश है,जुनून है और सिर्फ देश के लिए जीने-मरने का जज्बा है। एक डूबता हुआ सूरज है दूसरा ऊपर चढ़ता पूर्णमासी का चंद्रमा। एक ने विषम परिस्थितियों से पूरी तरह से हार मान ली है तो दूसरे ने कभी हार मानना सीखा ही नहीं है। एक बीमार है तो दूसरा बलवान तन से भी और मन से भी। मोदी कुछ भाइयों के लिए कड़वे कुनैन भी हो सकते हैं लेकिन सच्चाई तो यही है कि देश को चढ़ रहे मलेरिया बुखार से निजात पाने के लिए हमें देर-सबेर उनको स्वीकार करना ही पड़ेगा।
                     मित्रों,आईए हम डूबते हुए सूरज को अलविदा कहें और क्षितिज पर निविड़ अंधकार को अपने तेज से चीर कर उभरते हुए मृगांक का स्वागत करें। यही वर्तमान समय की जरुरत है और हमारी खतरे में पड़ती दिख रही आजादी की रक्षा के लिए अपरिहार्य भी। अगर हम आजाद रहे फिर कभी संविधान और शासन-प्रणाली को भी बदल लेंगे। देखिए नजर उठाकर उत्तर की ओर कि किस प्रकार से शंकरपुरी में चीन की सेना आक्रामक हो रही है और किस तरह कश्मीर में पाकिस्तान पागल हुआ जा रहा है। मनमोहन की अब तक की सबसे मजबूर,कमजोर और सत्तालोलुप सरकार ने अपनी नाकामियों से इनके मन में एक बार फिर भारत-विजय की आस जगा दी है। अब हमें कदापि केंद्र में मजबूर नेता या सरकार नहीं चाहिए बल्कि बेहद मजबूत मनस्वी प्रधानमंत्री और सिंह-गर्जना करनेवाली सरकार चाहिए (हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी यही चाहते हैं) और वैसी सरकार खुद को देंगे,खुद के लिए चुनेंगे हम। क्योंकि हमीं इस मुल्क के असली मालिक हैं,कोई संसद या सांसद नहीं।

राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म , जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 66 वीं वर्षगांठ मना रहा हैं। आजादी के बाद देश ने प्रजातंत्र के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त को भी अंगीकार किया है। इसके तहत सर्व धर्म समभाव की नीति का पालन किया गया। हर धर्म के मानने वाले नागरिकों को अपने अपने  धर्मानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता तो दी गयी है लेकिन किसी दूसरे के धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं दिया गया हैं। लेकिन धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचने की ललक ने देश के राजनीतिज्ञों को धर्म की आड में राजनीति करने का रास्ता खोल दिया। धर्म,जाति और क्षेत्रीयता के शार्ट कट से सत्ता पाने का लालच राजनीतिज्ञ छोड़ नहीं पाये और इसी कारण वासुदैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को मानने वाले देश में तरह तरह के विभाजन दिखायी देने लगे हैं। अब धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता के शब्द राजनैतिक गलियारों में आरोप प्रत्यारोप लगाने में उपयोग होते दिखायी दे रहें हैं। कोई राजनैतिक दल अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहता है तो दूसरा उसे मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगाता हैं। वहीं दूसरी ओर आरोप लगाने वाले खुद ही सत्ता में आने के बाद वही कुछ करते नजर आते हैं जिनके आधार पर वे दूसरे दल पर छद्म धर्मनिरपेक्षता का आरोप लगाते हैं। एक ही राजनैतिक दल के दो मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से अलग अलग आचरण करते दिखायी दे रहें है। एक मुख्यमंत्री सदभावना मंच पर एक मौलवी द्वारा पहनायी जा रही टोपी पहनने से इंकार कर कट्टर हिन्दू होने का संकेत देता है तो दूसरा मुख्यमंत्री ईद मिलन समारोह में इस्लामी टोपी पहनकर खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने का प्रयास करता है। लेकिन मंशा दोनों की ही एक है कि वे अपनी पार्टी को मजबूत करना चाहते है। क्या राजनेताओं का यह आचरण उचित है? लेकिन यह शाश्वत सत्य है कि विभिन्नता में एकता ही भारत की विशेषता है। हमारे देश में अलग अलग धर्म और जाति के लोग आपस में भाई चारे के साथ रहते है। इसीलिये धर्म और जाति को आधार मानकर राजनैतिक बिसात बिछाना देश के लिये हितकारी नहीं हैं। भारत एक विकासशील देश है। विकास की प्रक्रिया सतत जारी रखने के लिये यह आवश्यक है कि देश में अमन चैन कायम रहे। आज यह समय की मांग है कि देश में राजनैतिक नेतृत्व करने वाले राजनेता अपने राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म और जाति के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें और देश के नौनिहालों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा और आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।़ इसलिये आइये आज के दिन हम यह संकल्प लें कि हम अपने राजनैतिक हितों के लिये हम धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर समाज को बंटने नहीं देंगें और देश के समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगें।