25.12.19

मोदी नाम केवल्म से नहीं जीते जा सकते हैं राज्य


संजय सक्सेना,लखनऊ


झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली हार को लेकर हर तरफ हाय-तौबा मचा हुआ है। सब अपने-अपने तरीके से बीजेपी की हार की समीक्षा कर रहे हैं, खासकर राष्ट्रीय दल का तमगा हासिल किए हुए कांगे्रस-बीजेपी की जर्बदस्त तुलना की जारी है। कोई 16 सीटें जीतने वाली कांगे्रस को दस में दस नंबर दे रहा है तो 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी का ‘जीरो’ करार दे रहा है। सबका अपना-अपना नजरिया हैं तो इस हकीकत को भी नही झुठलाया जा सकता है कि झारखंड में कांगे्रस इस लिए जीती, क्योंकि उसने झारखंड में अपने कदम मजबूती के साथ जमाने के बजाए दूसरे(जेएमएम) की बैसाखी का सहारा लेना ज्यादा सही समझा, इसीलिए वह आज झारखंड में खड़ी दिखाई दे रही है।

ऐसे तो और भड़केगा सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहा आंदोलन

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब माहौल बिगड़ता है तो उस देश की सरकार का दायित्व बनता है कि वह किसी भी तरह से माहौल को शांत करे। जब बात किसी मांग की होती है और आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो तो सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह उस आवाज को सुने। केंद्र में काबिज मोदी सरकार है कि हर आवाज को डंडे के बल पर दबाने पर आमादा है। यही वजह रही कि देश में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध में हो रहे राष्ट्रव्यापी आंदोलन को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष के उकसावे के बाद मुस्लिमों के उपद्रव के रूप में लिया है।

संसद में हुआ अटल सम्मान समारोह, देश विदेश की 25 विभूतियां सम्मानित

मुख्य आयोजक भुवनेश सिंघल सुनाए अटल जी के अंतिम दिनों के भावुक संस्मरण, सांसद कवियों ने कविताओं के माध्यम से भरी हुंकार

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में पूर्व संध्या पर 24 दिसम्बर 2019 को दोपहर 1 बजे से संसद भवन में ‘अटल सम्मान समारोह’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर एक अनूठी पहल करते हुए सांसद कवियों का राष्ट्रीय अटल कवि सम्मेलन भी किया गया जिसमें विभिन्न सांसद व केन्द्रीय मंत्री ने मंझे हुए कवि की तरह काव्य पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को हतप्रभ कर दिया।

24.12.19

यूपी में हिंसाः पीएफआई लम्बे समय से था सक्रिय मगर सुरक्षा तंत्र आंख मूंदे रहा

                                              अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में प्रतिबंद्धित एवं विवादित संगठन ‘स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया’(सिमी) और उससे जुड़ा संगठन ‘पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) एक बार फिर से राज्य में अपने पैर पसार रहा हैं। सिमी और पीएफआई  दिल्ली में मोदी और यूपी में योगी सरकार बनने के बाद से राज्य के मुसलमानों को कथित भय दिखाकर उकसाने में लगे हैं तो रिहाई मंच, बामसेफ, आईसा, नागरिक एकता पार्टी और शराब मुक्ति मोर्चा जैसे विवादित संगठनों की भी सक्रियता में तेजी देखी गई। चाहें तीन तलाक पर कानून बनाने की बात हो या फिर अयोध्या पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला अथवा गौरक्षा के नाम पर यदाकदा हुईं माॅब लीचिंग की घटनाओं ने इन संगठनों को ‘उर्जा’ प्रदान की तो नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में इन संगठनों ने उत्तर प्रदेश को दंगा-आगजनी की आग में झोंक दिया। प्रतिबंद्धित संगठन को गैर भाजपा दलों के नेताओं के विवादित बयानों ने भी खूब फलने-फूलने का मौका दिया। वैसे,खुफिया सूत्र बताते हैं कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यूपी में बवाल और हिंसा के लिए ‘जमीन’ तैयार की गई थी,लेकिन उस समय खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलांे की अति-सक्रियता के कारण इनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए थे। उस समय तमाम मुस्लिम धर्मगुरू भी परिपक्तता दिखाते हुए लगातार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील  करते दिखाई दिए थे,लेकिन नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के समय करीब-करीब सभी मुस्लिम धर्मगुरूओं और बुद्धिजीवियों ने मुसलमनों को समझाने की बजाए ‘आग में घी डालने’ का काम ज्यादा किया।

नागरिकता कानून तो एक बहाना है असल मुद्दों से ध्यान भटकाना है

देश में इस वक्त हालात बद से बदतर होते नजर आ रहे हैं ऐसा कोई भी फैसला बीजेपी सरकार ने लिया हो और उस पर विरोध प्रदर्शन ना हुआ हो, यह तो कभी हो ही नहीं सकता है. बीजेपी सरकार ने अपने पिछले शासनकाल में नोटबंदी और जीएसटी का ऐतिहासिक फैसला लेकर लोगों को इस तरह उलझाया...पता ही नहीं चला कि बीजेपी के 5 साल कैसे गुजर गए. लोगों को लगा कि सरकार को अभी और वक्त चाहिए  भारत को न्यू इंडिया बनाने के लिए.... अब सरकार ने अपने अगले 5 साल गुजारने के लिए नागरिकता संशोधन कानून के जाल में लोगों को इस कदर उलझा दिया है कि लोग आपस में ही उलझे रह जाएं और देश के जो असली मुद्दे हैं उनसे ध्यान बिल्कुल ही हट जाए. साथ ही देखते ही देखते सरकार के 5 साल फिर से ऐसे ही गुजर जाए.

झारखंड विस चुनाव परिणाम ने मोदी-शाह को दिखाया आईना


सी.एस. राजपूत


नई दिल्ली। झारखंड का विधानसभा चुनाव एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे आंदोलन के बीच हुआ है। आंदोलन सही था या फिर गलत इसका निर्णय बहुत हद तक झारखंड चुनाव के परिणाम से भी होना था। इतना ही नहीं मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल के कारनामे भी इस आंदोलन में समाहित थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी झारखंड चु नाव प्रचार में धारा 370 धारा का हटाना, तीन तलाक पर बिल लाना, राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो जाना, ये सभी अपनी उपलब्धियों का बखान झारखंड चुनाव प्रचार में किया।

23.12.19

आंदोलन और हिंसा एक सिक्के के दो पहलू नहीं

अजय कुमार,लखनऊ

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन बिल पर दो दिनों की हिंसा के बाद जिंदगी फिर से धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगी है,लेकिन अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है,जिसका जवाब कुछ दिनों तक सड़क पर तांडव मचाने वाले लोगों उनके परिवार के सदस्यों को देना होगा तथा उस समाज को भी चिंन्हित करना होगा, जिस समाज के दंगाई सड़क पर सरकारी और निजी सम्पतियों के साथ आगजनी के साथ-साथ हाथ में पत्थर लिए मरने-मारने पर उतारू थे। पुलिस को जिस तरह दंगाइयों ने अपना निशाना बनाया। वह सुनियोजित था। लखनऊ की बात की जाए तो यहां हिंसा का बंगाल और कश्मीरी कनेक्शन भी दिखाई दिया। राज्य के बाहर से आए युवा जिनके शरीर से लेकर पैरों तक में ब्रांडेड कपड़े और जूते नजर आ रहे थे,उनकी भी शिनाख्त शुरू हो गई है। तलाश उन लोगों की भी हो रही है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर दूसरे राज्यों से आए दंगाइयों को ठहराने-खाने की व्यवस्था की। योगी सरकार जिस तरह से दंगाइयों पर शिकंजा कस रही है,उससे तो यही लगता है कि दंगाइयों को गिरफ्तार किया जाएगा कुछ पर रासुका के तहत कार्रवाई भी की जा रही है। इसके अलावा दंगाइयों की सम्पति जब्त करके जानमाल का जो नुकसान हुआ है,उसकी भरपाई की जाएगी। इसको लेकर पुलिस काफी आगे बढ़ भी चुकी है।

यूनिवर्सिटी में कर दी दिल्ली पुलिस ने फर्जीकल स्ट्राइक

पुलिस वालों के हौसले  देश की जनता ने इस कदर बुलंद कर दिए हैं कि अब जनता को ही इसकी भरपाई  खूब बेहतरीन ढंग से करनी पड़ रही है. अभी कुछ समय पहले ही हैदराबाद पुलिस ने रेप के चारों आरोपियों का फर्जी एनकाउंटर किया था. भावनाओं में बहते हुए जनता ने पुलिस का पूरा साथ दिया. इस बात को भी आप अच्छे से जानते हैं कि शेर के मुंह में एक बार खून लग जाए तो उसको खून की आदत पड़ ही जाती है. वही हाल पुलिस वालों का हो चुका है. दिल्ली में पुलिस वालों द्वारा एक नामी यूनिवर्सिटी में घुसकर छात्रों को  इस कदर मारा गया जैसे वह यूनिवर्सिटी नहीं, आतंकवादियों की ट्रेनिंग का अड्डा था.

रिटायर आईपीएस अफसर दारापुरी की रिहाई के लिए चलेगा अभियान

योगी सरकार की आंख की किरकिरी बने आम आदमी की आवाज दारापुरी
मजदूर किसान मंच की बैठक में दारापुरी की रिहाई के लिए लिया प्रस्ताव
दारापुरी की रिहाई के लिए चलेगा हस्ताक्षर अभियान
आरएसएस-भाजपा की विभाजनकारी राजनीति का करेगें पर्दाफाश
आदिवासियों को किसी कीमत पर बेदखल नहीं होने देगें-दिनकर


ओबरा, सोनभद्र :  योगी सरकार की हर जन विरोधी, लोकतंत्र विरोधी कार्यवाहियों के आलोचक रहे और हर वक्त अपनी जनपक्षधरता के प्रति प्रतिबद्ध रहे मजदूर किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व आईपीएस अधिकारी एस0 आर0 दारापुरी सरकार की आंख की किरकिरी बन गए थे।

21.12.19

श्रमिकों को बंधुआ बनाने वाला है इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। हाल ही में केंद्र सरकार ने जो इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल लोकसभा में पेश किया वह श्रमिकों को और मुश्किल में डालने वाला है। मोदी सरकार ने पूंजपीतियों को राहत देते हुए और श्रमिक यूनियनों पर शिकंजा कसते हुए इसके विभिन्न प्रावधानों में औद्योगिक संस्थानों में हड़ताल करने को कठिन बनाया गया है और बर्खास्तगी को आसान कर दिया गया है।

भ्रष्टाचार व मनमानी का अड्डा बना आईजीएनसीए

सिद्धार्थ शंकर गौतम

भारतीय कला और संस्कृति के बिखरे खंडों को एकत्रित करने और उनके संरक्षण की आवश्यकता को पहचानते हुए 1987 में मूर्धन्य कला विद्वान डॉ. कपिला वात्स्यायन ने इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की स्थापना की थी। उन्होंने इस केन्द्र को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई किन्तु वर्तमान में इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र विशुद्ध रूप से राजनीति, भ्रष्टाचार व सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों की शरणस्थली बन गया है। कला-संस्कृति के नाम पर हर माह होने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी धन की जमकर फिजूलखर्ची की जा रही है।

13.12.19

ललित कला अकादमी में हर ओर मनमानी!

ललित कला अकादमी नामक संस्थान भारत सरकार का वह सफ़ेद हाथी है जहाँ करोड़ों रुपये अध्यक्ष के घूमने एवं दान कार्य में लगाए जाते हैं. वर्तमान अध्यक्ष के चयन प्रक्रिया में सभी नियम ताक पर रख दिए गए.

12.12.19

राजनेताओं ने बनाया है हिंदू और मुस्लिम के बीच का चक्रव्यूह....


आखिर कब खत्म होगी हिंदू और मुस्लिम के बीच की नफरत की आग

हम इस धरती में जन्म भी लेते हैं इसी मिट्टी के होकर भी रह जाते हैं. हम सबको इस बात का तो पता है कि  मरना तो हमने एक न एक दिन है ही, मगर फिर भी धर्म जाति  और समुदाय  को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते रहते हैं आखिर मरने के बाद भी क्यों नहीं खत्म होती ये हिंदू और मुस्लिमों के बीच की नफरत  की आग ! हम तो इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं फिर भी बना जाते हैं इस नफरत की दीवार को....मुस्लिमों को लेकर इस समय भारत देश में जो नफरत की आग पैदा हो चुकी है या पहले से ही थी, ऐसा भी कह सकते हैं कि आप हिंदू मुस्लिमों के भेदभाव के जिस चक्रव्यूह में भारत के लोग फंसे हुए हैं. ऐसा लगता है कि कभी समाप्त ही नहीं होगी.

कैब पर तुष्टिकरण की खतरनाक सियासत

अजय कुमार, लखनऊ

केन्द्र की मोदी सरकार ने आखिरकार  भारी विरोध के बीच अपने घोषणा पत्र के एक और चुनावी वायदे ‘नागरिकता संशोधन बिल’ (कैब)को कानूनी जामा पहना ही दिया। अब सिर्फ राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की औपचारिकता बची है। वहीं इस बिल को गैर-संवैधानिक बता कर कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए हैं।

9.12.19

बलात्कार के बढ़ते मामलों में क्या सरकार व सिस्टम पर सवाल नहीं करना चाहिए


बलात्कार की बढ़ रही वारदातों को देख अब सरकार व सिस्टम से सवाल करने की मजबूरी हुई जरूरी

संदीप के. गुप्ता
असि. प्रोफेसर एवं मीडिया रिसर्च स्कॉलर
ईमेल sandyreporter12@gmail.com


बलात्कार के आए दिन हो रहीं नई वारदातें व बढ़ते हुए क्रूर, बर्बर, घ्रणित दुष्कर्मों के मामले को देखकर तो यह निश्चित हो गया है कि लोगों में अब कानूनी सजा का भय नहीं है। कानून अब उनके लिए शायद एक दाँवपेंच का तंत्र बन गया है। न्यायिक-व्यवस्था का ढुलमुल रवैया, सुस्त कार्यवाही, तारीखों पे तारीख को लेकर अपराधी बड़ी निडरता से अपने अपराधों को जन्म दे रहे हैं। अपराधियों की नजर में यह न्याय-व्यवस्था कानून फिल्मी हो गया है। यह महज एक अन्धा कानून ही लगता है। दलीलों सबूतों का खेल लगता है। यह सब ऐसा क्यों है, और क्यों अपराधियों को यह सब सहज व निडर लगता है।

इमरान को भारी ना पड़ जाये बाजवा से टकराहट!

कृष्णमोहन झा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद पर इमरान खान को आसीन हुए अभी मुश्किल से 16 माह का वक्त ही बीता है ,लेकिन इतनी छोटी सी अवधि में ही सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ उनके संबंधों में इतनी खटास आ गई है कि निकट भविष्य में ही प्रधानमंत्री पद से इमरान खान की विदाई के कयास लगाए जाने लगे हैं। दरअसल सेना अध्यक्ष बाजवा से लगभग दो माह के बाद इमरान खान की मुलाकात के तत्काल बाद जब इमरान खान अचानक दो दिन की छुट्टी पर चले गए ,तभी से राजनीतिक दलों एवं मीडिया द्वारा इसे सेना एवं सरकार के बीच बढ़ती दूरियों के रूप में देखा जा रहा है।

7.12.19

‘हैचरी’ यात्रा : इन चूजों के भगवान तो हम मनुष्य ही हैं! (देखें वीडियो)

यशवंत सिंह

करनाल से दिल्ली लौटते वक्त रास्ते में मशहूर ढाबे पर भरपेट मक्खन-पराठे का आनन्द उठाने के बाद फोटो सेशन!

तो फिर राम रहीम, आशाराम, चिमन्यानंद स्वामी और सेंगर जैसे आरोपियों का भी करो एनकाउंटर!

CHARAN SINGH RAJPUT

हैदराबाद में पशु चिकित्सक के साथ गैंगरेप और जलाकर मार डालने घटना को लेकर जिस पुलिस को हम कोसते-कोसते थकते नहीं रहे थे। जिस पुलिस के चलते ही हम अपराध होने की घटना बताते हैं। जिस पुलिस पर हम भ्रष्टतम होने का आरोप लगाते हैं वही पुलिस न्यायिक हिरासत लिये गये हैदराबाद गैंगरेप मामले के आरोपियों का एनकाउंटर करने पर नायक की भूमिका में आ गई है। हैदराबाद के लोग उन पर फूल बरसा रहे हैं। महिलाएं राखी बांध रही हैं। आज पैदा हुए इस अराजक हालात में आम लोगों के साथ ही पीड़िताओं के सगे संबंधियों का इस एनकाउंटर खुश होना बनता भी है।

5.12.19

यदि रोक नहीं सकते रेप, गैंगरेप और पीड़िताओं की जलाने की घटनाएं तो छोड़ दो राजपाट

चरण सिंह राजपूत

जो लोग यह सोच रहे हैं कि देश में कुछ अच्छा होने जा रहा है वह भूल जाएं। रेप, गैंगरेप हत्या और उसके बाद जलाने के मामले में देश में तमाम बवाल मचने के बावजूद, संसद और राज्य सभा में सासंदों के चिल्लाने के बावजूद उन्नाव के बिहार थाना क्षेत्र में गैंगरेप की पीड़िता को पांच लोगों ने जिंदा जलाने की कोशिश की। हालांकि सभी आरोपी गिरफ्तार कर लिये गये हैं पर यह वारदात यह दर्शाती है कि आरोपियों के मन में किसी कानून या फिर समाज का कोई भय रह नहीं गया है। यह भी कहा जा सकता है कि कानून को ताक पर रखकर बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करने वाले लोग हर जिम्मेदार तंत्र को ठेंगा दिखा रहे हैं। कौन हैं इस मानसिकता का जिम्मेदार?

4.12.19

भारतीय सामाजिकता का नया समय

-प्रो. संजय द्विवेदी

हमारे सामाजिक विमर्श में इन दिनों भारतीयता और उसकी पहचान को लेकर बहुत बातचीत हो रही है। वर्तमान समय ‘भारतीय अस्मिता’ के जागरण का समय है। जबकि यह ‘भारतीयता के पुर्नजागरण’ का भी समय है। ‘हिंदु’ कहते ही उसे दूसरे पंथों के समकक्ष रख दिए जाने के खतरे के नाते, मैं ‘हिंदु’ के स्थान पर ‘भारतीय’ शब्दपद का उपयोग कर रहा हूं। इसका सच तब खुलकर सामने आ जाता है, जब हिंदुत्व विरोधी ताकतें ही कई अर्थों में भारतीयता विरोधी एजेंडा भी चलाते हुए दिखती हैं। वे हिंदुत्व अलग-अलग नामों से लांछित करती हैं। कई बार ‘साफ्ट हिंदुत्व’ तो कई बार ‘हार्ड हिंदुत्व’ की बात की जाती है। किंतु डा. राधाकृष्णन की किताब ‘द हिंदु व्यू आफ लाइफ’ कई अंधेरों को चीरकर हमें सच के करीब ले जाती है। इस दिशा में स्वातंत्र्य वीर सावरकर की ‘हिंदुत्व’ भी महत्त्वपूर्ण बातें बताती है।

30.11.19

मृत्युदंड से कम स्वीकार्य नहीं

किसी भी देश के लिए महिलाओं की स्थिति इस बात का सूचकांक होती है कि वह देश और समाज पतन के रास्ते पर चल रहा है या सामाजिक प्रगति के रास्ते पर। इस दृष्टिकोण से देखें तो भारत का भविष्य उज्जवल दिखाई नहीं देता। तेलंगाना राज्य के हैदराबाद में पशु चिकित्सक 26 वर्षीया डॉ. प्रियंका रेड्डी के साथ जो हृदय विदारक घटना हुई उसकी सजा मृत्युदण्ड से तनिक भी कम स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। हैवानियत की सारी हदें पार कर दरिंदों ने जिस तरह पहले सामूहिक बलात्कार और फिर पुलिस से बचने के लिए जिंदा जलाने का घृणित कार्य किया वह इस बात को दर्शाता है कि महिला सुरक्षा कानून का आज भी वहशियों के भीतर कोई खौफ नहीं है, अन्यथा वर्ष 2012 से लेकर अब तक करीब दो लाख बलात्कार के मामले दर्ज नहीं किये जाते।

19.11.19

झूठ की बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

अजय कुमार,लखनऊ

अपने आप को मुसलमानों का रहनुमा समझने का दंभ भरने वाला करीब 50 वर्ष पुराना ‘आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ (एआईएमपीएलबी) अपने आप को हमेशा सुर्खिंयों में बनाए रखने की कला में माहिर है। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल करने की बात कह कर उसने यह बात फिर साबित कर दी है। इससे पहले भी कई मौकों पर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुखालफत कर चुका है। चाहें राजीव सरकार के समय मुस्लिम महिला साहबानों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजारा भता दिए जाने का फैसला रहा हो या फिर इंस्टेंट तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कट्टरपंथी सोच रखने वाले बोर्ड को कुछ भी रास नहीं आता है। वह हर मसले को शरीयत की चादर में छिपा देने को उतावला रहता है। समय के साथ बदल नहीं पाने और कट्टरपंथी सोच के चलते एआईएमपीएलबी से तमाम बुद्धिजीवी मुलसमान दूरी बनाने लगे हैं। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड अपनी संकुचित सोच के चलते विवादों में भी बना रहता है। एक समय बोर्ड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जेबी संगठन समझा जाता था। आज भी बोर्ड इसी लीक पर चलते हुए भाजपा और उसकी सरकारों की मुखालफत में लगा रहता है। बोर्ड का गठन जिन परिस्थितियों में हुआ था,उसे भी समझना जरूरी है। 

11.11.19

फ्लाप मध्यस्थता का ‘हिट फार्मूला’ बना फैसले का आधार!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद अब इतिहास के पन्नों में जरूर सिमट कर रह जाएगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई अहम सवाल भी खड़ा कर गया है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि देश की सियासी और सामाजिक चूले हिला देने वाले इस विवाद को सुलझाने में आजादी के बाद 72 साल क्यों लग गए ? सवाल यह भी है कि मोदी सरकार की तरह केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसी इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई, जिससे अयोध्या विवाद को सुलझाया जा सकता था ? कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि अयोध्या विवाद सुलझाने का कोई प्रयास नहीं किया गया हो,लेकिन हकीकत यही है कि अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो इसके लिए सबसे अधिक कांगे्रस जिम्मेदार है। क्यों कि उसने दशकों तक मजबूती के साथ देश पर राज किया था,जबकि अन्य दलों की जब भी केन्द्र में सरकारें बनी तो उनको वह मजबूती नहीं मिल पाई,जिस मजबूती के साथ कांगे्रस की सरकारें चला करती थीं। जनता पार्टी की सरकार जरूर अपवाद है,लेकिन पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के बाद भी जनता पार्टीे की सरकार अंर्तविरोधाभास के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। यहां तक की मोदी भी अपने पहले कार्यकाल में अयोध्या विवाद सुलझाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे,क्योंकि एक तो संख्याबल के हिसाब से वह आज जितना मजबूत नहीं थे तो दूसरा राज्यसभा में भी उसका(मोदी सरकार) बहुमत नहीं था।

अयोध्या कांड : सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संतुलन साधने का प्रयास किया



सज्जाद हैदर
                   
देश के सबसे बड़े विवाद की जड़ आज उच्चतम न्यायालय ने अपनी ताकत का प्रयोग करते हुए समाप्त कर दी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश की आज की राजनीति ने सत्ता और कुर्सी की लालच में पूरे देश को आग में झोंकने का कार्य किया। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि धार्मिक भावना जिसकी आड़ में उन्माद भी फलता एवं फूलता है। क्योंकि हमारे देश की सबसे बड़ी मुख्य वजह यह है कि देश में बढ़ता हुआ जातिवाद, जिसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो अनपढ़ होते हैं या फिर न्यून्तम स्तर की शिक्षा तक ही सीमित रह जाते हैं। जोकि नेताओं की चाल को नहीं समझ पाते और नेताओं की सियासी साज़िश का आसानी के साथ शिकार हो जाते हैं। और धार्मिक भावनाओं के आधार पर विभाजित हो जाते हैं। जबकि शिक्षित एवं विद्वान व्यक्ति ऐसा कदापि नहीं करते।

श्रीराम मन्दिर आंदोलन के प्रणेता याद आते हैं

विनीत नारायण

आज हम हिन्दुओं के सदियों पुराने ज़ख्मों पर मरहम लगा है । इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हज़ारों सन्तों व  भक्तों को हमारी भावभीनी श्र्द्धांजली जिन्होंने पिछली सदियों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान किया।

10.11.19

और ये सही जवाब...!

#मुझे_फ़क्र_है_कि_मैं_इस_मुल्क़_का_सुन्नी_मुसलमान_हूँ
मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो,
आदमी ही रहने दो ख़ुदा मत समझो!

अज़ीज़ाने गिरामी-ए-मिल्लत और मेरे मुल्क़ के गयूर नौजवानों,
 राम मंदिर और बाबरी मस्जिद हक़-ए-मिल्कियत मुतालबे पर अदालते अज़मीया का आज का फ़ैसला बाइस-ए-मसर्रत तो है ही, हिंदुस्तान की क़ौमी यकजहती के वक़ार को बुलंद-ओ-बाला रखने का पैग़ाम भी आलमी दुनिया को देता है।
 फैसले पर तमाम तरह की राय शुमारी हुई, मुल्क़ के आईन के एतबार से अवाम की अपनी अपनी मुख़्तलिफ़ राय भी थीं मगर मैं जो लिख रहा हूँ वो थोड़ा लीक से हटकर है...
         मुख़्तलिफ़ सियासी जमातों और नामनेहाद क़ौमी रहनुमाओं ने जिस तरह पिछले 75 साला जम्हूरी निज़ाम में मुसलमानों ख़ास कर सुन्नी मुसलमानों का "ब्रेन-ड्रेन" कर मुल्क़ की मुख्य-धारा से काटने का एक घिनोना खेल खेला था।आज अदालत-ए-अज़मीया ने उस मंसूबे को  पामाल कर दिया।
आज ईद मिलादुन्नबी के मुबारक मौक़े पर हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने जिस नज़्मों-ज़ब्त से काम लिया और अदालत के फ़ैसले को सर-माथे लगाकर मुल्क़ के आईन का इक़बाल बुलंद किया उससे ये साबित हो गया कि नानक,कबीर,रहीम,रसखान,
ख़्वाजा,आला हज़रत,अमीर ख़ुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया की इस रूहानी मिट्टी में कोई शरपसंद अब मट्ठा नही डाल सकता।
क्या इत्तेफ़ाक़ है! आज अल्लामा इकबाल की यौमे पैदाइश भी है। इस इंक़लाबी शायर ने श्रीराम को "इमाम-ए-हिंद" की पदवी से नवाज़ा था। आज भी उनकी तहरीर- "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" हमारी रूह की गहराईयों में बसी है। आज हमारा हिन्दुस्तान, हमारा प्यारा मुल्क़ सारे जहां से अच्छा बनने की सिम्त में आगे बढ़ा है और मुझे कहते हुए बड़ा फक़्र है कि इसकी नींव हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने आज अदालत-ए-अज़मीया के फैसले पर अपनी मोहर लगा कर रखी है।और जवाब दिया है उन फ़िरक़ा परस्त ताक़तों को जो अपने सियासी मफाद के लिये इस क़ौम के मुस्तक़बिल से अब तक खेलते आ रहे थे।
बचा के रखियेगा नफ़रत से,
दिल की बसती को,
ये आग ख़ुद नहीं लगती,
लगाई जाती है!

जय-हिंद जय भारत!
डॉ. सयैद एहतेशाम-उल-हुदा
प्रखर वक्ता एवं राष्ट्रवादी चिंतक
माइनॉरिटी सोशल रिफॉर्मिस्ट
9837357723

7.11.19

क्या राम मंदिर मुद्दा खत्म होने देंगे राम को भुनाने वाले लोग?

नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है। मंदिर और मस्जिद दोनों ओर के पैरोकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने की बात कर रहे हैं। देश में कहीं से कोई अनहोनी न होने पाए, इसके लिए पुलिस-प्रशासन को पूरी रह से सक्रिय कर दिया गया है । पर क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानकर दोनों ओर के पैरोकार चुप बैठ जाएंगे ? क्या मंदिर -मस्जिद के नाम पर सियासत करने वाले दल इन धर्म स्थलों की राजनीति करनी छोड़ देंगे ? अब तक के भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों का इतिहास देखा जाए तो लगता नहीं है कि ये लोग सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी मानेंगे। जिस पार्टी कानून हाथ में लेकर सरकारों को चुनौती देते हुए रथयात्रा निकाली है, कानून को ढेंगा दिखाकर अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वस्त की है।

2.11.19

पांच सौ साल पुराना विवाद सुलझने के करीब!

अयोध्या मामला : फैसले से पहले सौहार्द की चिंता,  सरकार और धर्मगुरुओं ने एक सुर में की शांति की अपील

अजय कुमार, लखनऊ

‘लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई।’ अयोध्या के करीब पांच सौ साल पुराने भगवान राम की जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में उक्त पंक्तियों को बार-बार दोहराया जा सकता है, लेकिन देर से ही सही अब यह उम्मीद बंधने लगी है कि मोदी सरकार यानी भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने घोषणा पत्र में किए वायदे को पूरा करने की गंभीर इच्छा शक्ति और सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद अयोध्या विवाद पर फैसले की घड़ी आ गई है। अगर ऐसा हुआ तो सदियों पुराना अयोध्या विवाद हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 12 वर्षो के बाद 16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है। फैसला रिजर्व कर लिया गया है। करीब एक दस दिनों के भीतर अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों वाली बैंच का अंतिम(संभवता) फैसला आ जाएगा। माहौल न बिगड़े, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सभी पक्ष सहज स्वीकार करें इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम धर्मगुरूओं के द्वारा ही नहीं अयोध्या विवाद का मुकदमा लड़ रहे तमाम पक्षकार भी यही चाहते हैं कि कोर्ट के फैसले का सम्मान हो।

परिवार के आत्महत्या करने जैसे मामलों में जिलाधिकारी और संबंधित जनप्रतिनिधियों पर हो दंड का प्रावधान

CHARAN SINGH RAJPUT

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आर्थिक तंगी के चलते दो बच्चों को जहर देकर दंपति ने आत्महत्या की है। मीडिया से लेकर सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठनों ने तो औपचाकिरता निभाकर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। हां सोशल मीडिया पर यह मामला जरूर मजबूती से उठा। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मामला प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का है। प्रधानमंत्री भी ऐसे कि देश के विकास का ढिंढोरा पूरे विश्व में पीटते फिर रहे हैं। दूसरे देशों में जा-जाकर अपनी कीर्तिमान गिना रहे हैं। संपन्न लोगों के बीच में जाकर सेल्फी ले रहे हैं। अमेरिका जैसे देश में जाकर अपनी महिमामंडन में कार्यक्रम करा रहे हैं।

1.11.19

ऑस्ट्रेलिया में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो पुस्तकों का लोकार्पण हुआ





ऑस्ट्रेलिया के खूबसूरत शहर पर्थ की अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संस्कृति’ तथा हिन्दी समाज ऑफ पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (HSWA) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक सुरुचिपूर्ण एवम आत्मीय आयोजन में भारत से आए सुपरिचित लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों ‘समय की पंचायत’ और ‘जो देश हम बना रहे हैं’ का लोकार्पण किया गया. 

31.10.19

क्या प्रशांत किशोर गैर-भाजपा पार्टियों को कमजोर करने के भाजपाई एजेंडे के मोहरे हैं!


प्रशांत किशोर की राजनीतिक ईमानदारी पर शक के बादल... कहीं वे मोदी के पेरोल पर दूसरी पार्टियों को कमजोर करने का  काम तो नहीं कर रहे हैं !

-निरंजन परिहार-

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद चुनावी रणनीतिकार  प्रशांत किशोर की  विश्वसनीयता पर शक के बादल गहराने लगे है।  राजनीतिक हलकों में  महाराष्ट्र के मामले में प्रशांत किशोर की राजनीतिक सूझबूझ, रणनीतिक  तैयारी  और ग्राउंड रियलिटी को समझने की क्षमता पर  प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं। इसके साथ सबसे बड़ा  सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि  क्या वे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कमजोर करने के लिए  बीजेपी और नरेंद्र मोदी के रोल पर तो काम नहीं कर रहे हैं।  प्रशांत किशोर के प्रति प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के रोल पर होने का यह सवाल  इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि बिहार में जेडीयू, उत्तर प्रदेश और  गुजरात में कांग्रेस व अब  महाराष्ट्र में  शिवसेना को प्रशांत किशोर के चुनावी सहयोग ने ताकतवर करने के बजाय कमजोर किया है।

लघुकथा- सब्ज़ी मेकर

इस दीपावली वह पहली बार अकेली खाना बना रही थी। सब्ज़ी बिगड़ जाने के डर से मध्यम आंच पर कड़ाही में रखे तेल की गर्माहट के साथ उसके हृदय की गति भी बढ रही थी। उसी समय मिक्सर-ग्राइंडर जैसी आवाज़ निकालते हुए मिनी स्कूटर पर सवार उसके छोटे भाई ने रसोई में आकर उसकी तंद्रा भंग की। वह उसे देखकर नाक-मुंह सिकोड़कर चिल्लाया, “ममा… दीदी बना रही है… मैं नहीं खाऊंगा आज खाना!”

26.10.19

भगवान चित्रगुप्त जी महाराज परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं, जानिए पूरी कथा....

भैयादूज-चित्रगुप्त जयंती 29 को

संजय सक्सेना,लखनऊ

पांच त्योहारों की श्रृंखला में दीपावली का सबसे अधिक महत्व है तो भैयादूज और इसी दिन पड़ने वाली भगवान चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती  की अपनी अलग महत्ता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। तद्नुसार इस बार 29 अक्टूबर को भैयादूज और चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती मनाई जाएगी। इस दिन कायस्थ समाज कलम-दवाज की पूजा करके अपने अराध्य चित्रगुप्त जी महाराज की पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

19.10.19

यूपी में आइजीआरएस की सभी सेवाएं ठप, सीएम हेल्पलाइन नंबर ने भी काम करना बंद कर दिया!

तो क्या यूपी के सीएम से भी जनता को नहीं मिलेगा न्याय? जाने-माने तेजतर्रार समाजसेवी तनवीर अहमद सिद्दीकी ने  बताया यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हमेशा ही गरीबों के मसीहा रहे हैं। आम जनता की फरियाद को सुनने के लिए आए दिन अधिकारियों को फटकार ही नहीं लगाते लापरवाही बरतने पर सख्त से सख्त कार्यवाही कर चेताते भी रहते हैं। इसके बाद भी सीएम योगी की हर कोशिशें बेकार हो रही हैं। आम जनता को न्याय नहीं मिल पा रहा है। अंतिम रूप में प्रदेश की जनता सीएम योगी के दरबाद में पहुंचकर ही न्याय की गुहार लगाती है। लेकिन सितंबर 2019 से न्याय का अंतिम दरबार भी बंद हो गया है।

14.10.19

रेल यात्रा या जेल यात्रा ...!!

रेल यात्रा या जेल यात्रा ...!!
तारकेश कुमार ओझा
ट्वीटर से समस्या समाधान के शुरूआती दौर में मुझे यह जानकार अचंभा होता
था कि महज किसी यात्री के ट्वीट कर देने भर से रेल मंत्री ने किसी के लिए
दवा तो किसी के लिए दूध का प्रबंध कर दिया। किसी दुल्हे के लिए ट्रेन की
गति बढ़ा दी ताकि बारात समय से कन्यापक्ष के दरवाजे  पहुंच सके। क्योंकि
रेलवे से जुड़ी शिकायतों के मामले में मेरा अनुभव कुछ अलग ही रहा। छात्र
जीवन में रेल यात्रा से जुड़ी  कई लिखित शिकायत मैने केंद्रीय रेल मंत्री
समेत विभिन्न अधिकारियों से की। लेकिन महीनों बाद जब जवाब आया तब तक मैं
घटना को लगभग भूल ही चुका था। कई बार तो  मुझे दिमाग पर जोर देकर याद
करना पड़ा कि मैने क्या शिकायत की थी। जवाबी पत्र में लिखा होता था कि
आपकी शिकायत मिली.... कृपया पूरा विवरण बताएं जिससे कार्रवाई की जा सके।
जाहिर है किसी आम इंसान के लिए इतना कुछ याद रखना संभव नहीं हो सकता था।
रोज तरह - तरह की हैरतअंगेज सूचनाओं से मुझे लगा कि शायद प्रौद्योगिकी के
करिश्मे से यह संभव हो पाया हो। बहरहाल हाल में  नवरात्र के दौरान  की गई
रेल यात्रा ने मेरी सारी धारणाओं को धूल में मिला दिया। सहसा उत्तर
प्रदेश स्थित अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ यात्रा का कार्यक्रम बना। 12815
पुरी - आनंदविहार नंदन कानन एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में बड़ी मुश्किल से
हमारा बर्थ कन्फर्म हो पाया। खड़गपुर के हिजली से ट्रेन के आगे बढ़ने के
कुछ देर बाद मुझे टॉयलट जाने की जरूरत महसूस हुई। भीतर जाने पर मैं हैरान
था , क्योंकि ज्यादातर टॉयलट में पानी नहीं था। मैने तत्काल ट्वीटर से
रेलवे के विभिन्न विभागों में शिकायत की। मुझे उम्मीद थी कि ट्रेन के
किसी बड़े स्टेशन पहुंचते ही डिब्बों में पानी भर दिया जाएगा। शिकायत पर
कार्रवाई की उम्मीद भी थी। लेकिन आद्रा, गया, गोमो और मुगलसराय जैसे बड़े
जंक्शनों से ट्रेन के गुजरने के बावजूद हालत सुधरने के बजाय बद से बदतर
होती गई। पानी न होने से तमाम यात्री एक के बाद एक टॉयलटों के दरवाजे खोल
रहे थे। लेकिन  तुरंत मुंह बिचकाते हुए नाक बंद कर फौरन बाहर निकल रहे
थे। क्योंकि सारे बॉयो टॉयलट गंदगी से बजबजा रहे थे। वॉश  बेसिनों में भी
पानी नहीं था। इस हालत में मैं इलाहाबाद में ट्रेन से उतर गया। हमारी
वापसी यात्रा आनंद विहार - पुरी नीलांचल एक्सप्रेस में थी। भारी भीड़ के
बावजूद सीट कंफर्म होने से हम राहत महसूस कर रहे थे। लेकिन पहली यात्रा
के बुरे अनुभव मन में खौफ पैदा कर रहे थे। सफर वाले दिन करीब तीन घंटे तक
पहेली बुझाने के बाद ट्रेन आई। हम निर्धारित डिब्बे में सवार हुए। लेकिन
फिर वही हाल। इधर - उधर भटकते वेटिंग लिस्ट और आरएसी वाले यात्रियों की
भीड़ के बीच टॉयलट की फिर वही हालत नजर आई। किसी में पानी रिसता नजर आया तो किसी में बिल्कुल नहीं। कई वॉश बेसिन  में प्लास्टिक की बोतलें और
कनस्तर भरे पड़े थे। प्रतापगढ़ से ट्रेन के रवाना होने पर मुझे लगा कि
वाराणसी या मुगलसराय में जरूर पानी भरा जाएगा। लेकिन जितनी बार टॉयलट गया
हालत बद से बदतर होती गई। सुबह होते - होते  शौचालयों में गंदगी इस कदर
बजबजा रही थी कि सिर चकरा जाए। ऐसा मैने कुछ फिल्मों में जेल के दृश्य
में देखा था। लोग मुंह में ब्रश दबाए इस डिब्बे से उस डिब्बे भटक  रहे थे
ताकि किसी तरह मुंह धोया जा सके। बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चों की हालत
खराब थी। फिर शिकायत का ख्याल आया... लेकिन पुराने अनुभव के मद्देनजर ऐसा
करना मुझे बेकार की कवायद लगा। इसी हालत में ट्रेन हिजली पहुंच गई। हिजली
के प्लेटफार्म पर भारी मात्रा में पानी बहता देख मैं समझ गया कि अब साफ -
सफाई हो रही है... लेकिन क्या फायदा ... का बरसा जब कृषि सुखानी...।
ट्रेन से उतरे तमाम यात्री अपना बुरा अनुभव सुनाते महकमे कोस रहे थे। मैं
ट्वीटर से समस्या समाधान को याद करते हुए घर की ओर चल पड़ा।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

13.10.19

गृह मंत्री संविधान और अपनी शपथ का ध्यान रखें, एक वर्ग को भय-अनिश्चितता में रखना उचित नहीं

उबैद उल्लाह नासिर

गृह मंत्री अमित शाह यह भूल जाते हैं कि  अब वह केवल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष नहीं बल्कि देश के गृह मंत्री भी हैं, यही नहीं वह शायद यह भी भूल जाते हैं कि सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री के तौर पर उन्होंने क्या शपथ लिया था अन्यथा नागरिकता और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के सिलसले में वह ऐसे बयान न देते जो हमारे संविधान के शब्दों और उसकी आत्मा के खिलाफ है। गृह मंत्री जानते हैं की संविधान की धारा 14  और 15  के तहत इस देश में सभी नागरिकों को सामान अधिकार प्राप्त हैं और सरकार धर्म जाति  क्षेत्र और लिंग के आधार पर किसी से किसी प्रकार का भेद भाव नहीं कर सकती उन्होंने सांसद और मंत्री के तौर पर जो शपथ ली है उस में भी यही कहा गया है कि वह  उक्त आधारों पर देश के किसी नागरिक से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे फिर वह ऐसे बयान कैसे दे सकते हैं की सरकार नागरिकता का जो क़ानून बनाने जा रही है उस से हिन्दुओं सिखों जैनियों बौद्धों ईसाईयों आदि को डरने की ज़रूरत नहीं क्योंकि सरकार उन सबको भारत की नागरिकता दे देगी उनके इस बयान से स्पष्ट है कि केवल मुसलमानों को घुसपैठिया बता कर उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। यह तो सम्भव है की सरकार लोक सभा में अपने बहुमत और राज्य सभा में अपने मैनेजमेंट से उक्त क़ानून पास करा ले और राष्ट्रपति जिस प्रकार आँख बंद कर के सरकार के हर क़ानून को मंज़ूरी दे रहे हैं उसी प्रकार इस क़ानून को भी मंज़ूरी दे दें लेकिन गृह मंत्री को जान्ना चाहिए की उक्त क़ानून को ठीक उसी तरह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जायेगी जैसे धारा ३७० को समाप्त करने के लिए दी गयी है और संविधान की उक्त धाराओं के चलते सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून को निष्क्रय कर देगा क्योंकि संविधान इस सिलसले में बिलकुल स्पष्ट है।

3.10.19

हे राम! कैसा हो गया गांधी का देश

जहां एक तरफ़ अखण्ड भारत मोहनदास करमचंद गांधी को बापू और महात्मा कहता औऱ पूजता है वहीं समाज का एक तबका ऐसा भी है जो उन्हें देशद्रोही बताता है. सवाल तो यह है कि दुनियाभर को लोहा मनवाने वाले इस महात्मा के ऊपर अचानक इतनी टिप्पणी कैसे होने लगी. आख़िरकार यह वही व्यक्ति है जिन्होंने अफ्रीका आन्दोलन, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो, नमक आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन आदि कई बड़े आंदोलन किए. साथ ही वैश्विक स्तर पर ओबामा से लेकर नेल्सन मंडेला जैसे दुनियाभर में गांधीवादी और गाँधी जी के भक्त भरे पड़े हैं.

यह शहर हर साल डूबता है पर यहाँ के नेताओं और अफसरों का शर्म नहीं डूबता

Madhup Mani "Pikku"
दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर जहाँ बाढ़ नदी से नहीं, नाले के पानी से आता है... 30 वर्षों से इस शहर पर एक ही दल का राज है. कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह शहर प्रत्येक वर्ष बाढ़ से नहीं नाले के पानी से हीं डूब जाता है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिहार के ऐतिहासिक राजधानी पटना की. निम्न और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार जिन्हें सरकार की ओर से न कोई सब्सिडी मिलती है और न हीं इन तक कोई बाढ़ राहत पहुँच पाती है, वो हर साल अपने घर के बहुत मेहनत से ख़रीदे लाखों के सामान को अपनी आँखों के सामने डूबते और बर्बाद होते देखते हैं.

इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा : चमनलाल


नागपुर. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर चमनलाल ने वर्तमान परिस्थितियों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश की जा रही है. जो असल देशभक्त हैं उन्हें दरकिनार कर उन लोगों को आजादी के आंदोलन का नायक बनाने की कोशिश की जा रही है जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। इसलिए नागरिकों को बेहद सजग रहते हुए तर्कों और तथ्यों के आधार पर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश करना चाहिए.

क्या भारतीय राजनीति ने गांधी का रास्ता खारिज कर दिया?

प्रो. संजय द्विवेदी

‘हिंद स्वराज’ के बहाने गांधी की याद... महात्मा गांधी की मूलतः गुजराती में लिखी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज्य’  हमारे समय के तमाम सवालों से जूझती है। महात्मा गांधी की यह बहुत छोटी सी पुस्तिका कई सवाल उठाती है और अपने समय के सवालों के वाजिब उत्तरों की तलाश भी करती है। सबसे महत्व की बात है कि पुस्तक की शैली। यह किताब प्रश्नोत्तर की शैली में लिखी गयी है। पाठक और संपादक के सवाल-जवाब के माध्यम से पूरी पुस्तक एक ऐसी लेखन शैली का प्रमाण जिसे कोई भी पाठक बेहद रूचि से पढ़ना चाहेगा। यह पूरा संवाद महात्मा गांधी ने लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए लिखा था। 1909 में लिखी गयी यह किताब मूलतः यांत्रिक प्रगति और सभ्यता के पश्चिमी पैमानों पर एक तरह हल्लाबोल है। गांधी इस कल्पित संवाद के माध्यम से एक ऐसी सभ्यता और विकास के ऐसे प्रतीकों की तलाश करते हैं जिनसे आज की विकास की कल्पनाएं बेमानी साबित हो जाती हैं।

गाँधी एक व्यक्ति नही विचार हैं

Shivam Dwivedi
पूर्व में गाँधी जयंती थी। जाहिर है खूब विचार विमर्श चला। गाँधी प्रासंगिक है या अप्रसांगिक। गाँधी किसका है और किसका नहीं है। गांधी बीजेपी का है या कांग्रेस का। एक दूसरे कि विचारधारा को गलत सावित करने के लिए और अपनी विचारधारा को सही बताने के लिए इतिहास , राजनीति, की बड़ी - बड़ी बातें की तथा अंत में एक दूसरे को या गांधी को कोसने के सिवा और कुछ नहीं शेष मिला । पर आखिर में गांधी है किसका ? तेरा या मेरा ।

2.10.19

कौन माई का लाल है जो भागलपुर के हिंदुस्तान और भास्कर में डिप्टी मेयर को छपने से रोक सके!

''कौन माई का लाल है जो भागलपुर के हिंदुस्तान और भास्कर में डिप्टी मेयर को छपने से रोक सके''! जी हां, ये दावा है भागलपुर में अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहे डिप्टी मेयर राजेश वर्मा का। साथ ही वो इन दोनों संस्थानों के संपादकों के अपनी जेब में होने का दावा भी करते हैं।

हनी ट्रैप : गिरते मूल्य, उलझता चरित्र

डा. शशि तिवारी
भौतिकवाद की आपाधापी एवं पश्चिम सभ्यता के अनुसरण ने न केवल भारतीय संस्कृति को तहस-नहस किया है बल्कि सामाजिक मूल्यों का भी हृास किया हम सिर्फ गंदगी के दलदल में धसने की अंधी दौड़ में सिर्फ दौड़े ही जा रहे है। समय का चक्र तेजी से घूम रहा है। पश्चिम के लोग भारतीय मूल्यों एवं सस्कृति को तेजी से अपना रहे है क्यांेकि, उसके न केवल अपने फायदे है बल्कि शांति प्राप्ति का भी मार्ग है । भारतीय मूल्यों में नैतिकता को सर्वोच्च माना गया है तभी तो कहा भी जाता है ''पैसा गया तो कुछ नहीं, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया लेकिन इज्जत गई तो सब कुछ गया'' यह बात बड़े दीर्घ अनुभवों के बाद बात कही गई।

तीन साल से जेल में बंद 954 करोड़ के घोटाले के आरोपी यादव सिंह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत

जेपी सिंह
नोएडा अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह को उच्चतम न्यायालय से जमानत मिल गई है। मंगलवार को तीन सदस्यीय पीठ ने यादव सिंह की जमानत याचिका मंजूर कर ली। करोड़ों के घोटाले का आरोपी यादव सिंह पिछले तीन साल से जेल में बंद थे।उनपर 954.38 करोड़ रुपए के एग्रीमेंट बांड को गलत तरीके से जारी करने का आरोप है। पीठ ने यादव सिंह को जमानत देते हुए ट्रायल कोर्ट को जमानत की शर्त निर्धारित करने के लिए कहा। हालांकि, सीबीआई ने यादव सिंह की जमानत याचिका का विरोध किया।

छिंदवाड़ा में हुआ था असहयोग आंदोलन का शंखनाद

मनोज कुमार
महात्मा, बापू राष्ट्रपिता, किसी भी संबोधन से आप स्मरण करेंगे तो आपके जेहन में उस व्यक्ति की छवि उभर कर आएगी जिसे हम गांधीजी कहते हैं. ये वो व्यक्तित्व हैं जिनके बिना भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव के लिए सम्पूर्ण जीवन जीने वाले इस महान संत के चरणकमल से मध्यप्रदेश एक बार नहीं, कई कई बार स्वयं को गौरवांवित किया है. अविभाजित मध्यप्रदेश में गांधीजी की दस अविस्मरणीय यात्राएं हुई थी. सबसे पहली बार वे 1918 में इंदौर आए थे. मार्च महीने में गांधीजी की यात्रा चार दिनों की थी. तब उन्होंने भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 8वें अधिवेशन का उद्घाटन किया था और यहीं से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की मांग उठी थी. बाद में उन्होंने एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था. गांधी की दूसरी यात्रा वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य में कंडेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में हुई थी. कंडेल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित सुंदरलाल शर्मा के कार्यों से गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पंडित शर्मा को अपना गुरु बना लिया. 

25.9.19

नोटबंदी से भी ख़राब हालात हैं महाराष्ट्र में!

भारतीय रिजर्व बैंक ने मंगलवार को यहां मुंबई स्थित पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर किसी भी प्रकार के व्यापारिक लेन-देन पर रोक लगा दी है, आरबीआई ने वित्तीय अनिमितताओं को लेकर पंजाब और महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक के कामकाज में प्रतिबंध लगाया है|

आयुष्मान भारत योजना की गड़बड़ियों पर पहरा

ललित गर्ग

देश में आज सरकारी अस्पतालों में जहां चिकित्सा सुविधाओं एवं दक्ष डाॅक्टरों का अभाव होता है, वहीं निजी अस्पतालों में आज के भगवान रूपी डॉक्टर एवं अस्पताल मालिक मात्र अपने पेशा के दौरान वसूली व लूटपाट ही जानते हैं। उनके लिये मरीजों की ठीक तरीके से देखभाल कर इलाज करना प्राथमिकता नहीं होती, उन पर धन वसूलने का नशा इस कदर हावी होती है कि वह उन्हें सच्चा सेवक के स्थान पर शैतान बना देता है। केन्द्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना आम व्यक्ति को बेहतर तरीके से असाध्य बीमारियों की चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिये प्रारंभ की गयी थी, लेकिन इस बहुउद्देश्यीय योजना को भी पलीता लगाने में कोई असर नहीं छोड़ी गयी है। लेकिन इस योजना में गडबड़ी एवं धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ जिस सख्ती से कार्रवाई की जा रही है, वह अनूठी एवं कारगर है, सरकार की सक्रियता एवं जागरूकता की परिचायक है।

18.9.19

यूपी में पहचान छिपाकर रह रहे हैं दस लाख घुसपैठिए!

यूपी में पैठ जमाए बैठे हैं बंग्लादेशियों के 'पालनहार'
अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना वजह नहीं कहा है कि असम की तरह ही यूपी में भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार किया जाना चाहिएं। दरअसल,वोट बैंक की सियासत के चलते बंग्लादेशियों के लिए यूपी हमेशा सुऱिक्षत ठिकाना रहा। यह बंग्लादेशी अपने को असमिया बताकर अपनी नागरिकता छिपाते रहे तो वोट के सौदागरों ने इन्हें न केवल पाला-पोसा बल्कि इनको यहां की नागरिकता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाजवादी सरकार के समय बड़ी संख्या में बंग्लादेशियों ने यहां घुसपैठ की तो कुछ नेताओं/पार्षदों ने अपने पैड पर लिखकर देना शुरू दिया कि वह इन्हें(बंग्लादेशियों को) लम्बे समय से पहचानते हैं।

12.9.19

'वन मैन आर्मी' जैसी योगी सरकार के ढाई साल

अजय कुमार, लखनऊ                                                 
भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने एक नये कल्चर को जन्म दिया है। अब केन्द्र की मोदी सरकार हो या फिर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें सब की सब जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड करने को लेकर काफी उतावली रहती हैं। पूर्व में जो चलन देखने को मिलता था उसमें केन्द्र और राज्य की सरकारें साल-दर-साल अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखती थी, लेकिन जब से मोदी युग शुरू हुआ है तब से 100 दिन, छहः-छहः महीने के काम का हिसाब जनता को दिया जाने लगा है। इसी क्रम में आजकल मोदी सरकार अपने सौ दिन पूरे होने का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने पेश कर रही हैं तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 19 सितंबर से अपनी सरकार के ढाई साल के कामों का लेखा-जोखा जनता के सामने रखेगी। यह नई परम्परा है तो इसके फायदे भी अनेक हैं। इस परम्परा को सरकार की मार्केेटिंग का फंडा भी कहा जा सकता है। एक तरफ सरकार को रिपोर्ट कार्ड के बहाने अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिल जाता है दूसरे सरकार के कामकाज में पारदर्शिता भी बनी रहती है। इसका प्रभाव यह होता है कि पांच साल बाद जब चुनाव होते हैं तब  जनता के सामने अपनी सरकार के कामकाम का ढिंढोरा पीटने में ज्यादा मेहनत नहीं पड़ती है। 19 सितंबर 2019 को योगी सरकार के ढाई  साल पूरे हो जाएंगे।

बेसिक शिक्षा विभाग अलीगढ़ ने किया सूचना अधिकार का उल्लंघन, आयोग में तलब

अलीगढ़ । जनपद के बेसिक शिक्षा अधिकारी और उनके मातहत या तो सूचना अधिकार कानून जानते नही हैं या फिर जानबूझ कर सूचना नहीं देना चाहते हैं। सूचना अधिकार अधिनियम के प्रति बेसिक शिक्षा विभाग अलीगढ़ की उदासीनता  तो यही कह रही है कि उनके यहां कानून का नही उनका ही राज़ चलता है।

‘जय श्री राम’ को ‘जेएसआर’ बनाने वाली मानसिकता

संजय सक्सेना, लखनऊ
हिन्दुस्तान में ऐसे लोगों की लम्बी-चैड़ी फौज है जिनका समाज और देशहित से कोई लेना-देना नहीं है।इसमें कुछ कद्दावर नेताओं,टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों से लेकर कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग  भी शामिल है जो हर समय, हर मसले पर मौके-बेमौके अपनी राजनीति चमकाने के लिए निकल पड़ता है। चाहें कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाने की बात हो या फिर पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की, इनको सबूत चाहिए होता है। देश में या  सीमा पर किसी आतंकवादी को मारा जाता है तो इन्हें मानवाधिकारों की रक्षा की चिंता होने लगती है। परंतु देश पर कोई संकट या प्राकृतिक आपदा आती है तो यह लोग  देश का साथ देने की बजाए अपने एसी कमरों में कैद हो जाते हैं।

11.9.19

इस साल संयुक्‍त राष्‍ट्र के अति महत्‍वपूर्ण सम्‍मेलन का हिस्‍सा बनेंगी एक्ट्रेस दीया मिर्जा


संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव और 196 मंत्रियों की उपस्थिति में करेंगी स्वागत समारोह को होस्‍ट

UNCCD के चौदहवें COP के लिए रिसेप्‍शन होस्‍ट करेंगी दीया मिर्जा

पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन पर लोगों के लिए एक निरंतर आवाज़ रही दीया मिर्ज़ा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता फैलाने के लिए अथक प्रयास किया है। इस वर्ष भी जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण के सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलनों में से एक का आयोजन सोमवार को राजधानी दिल्‍ली में होगा।

सरदार सरोवर में जल स्तर 138.68 मीटर तक बढ़ाने का विरोध जारी रखे मप्र शासन


नर्मदा बचाओ आंदोलन और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई 8 घंचे तक घमासान चर्चा

बड़वानी| नर्मदा चुनौती सत्याीग्रह में चले मेधा पाटकर और नर्मदा घाटी के विस्थापित प्रतिनिधियों के उपवास की समाप्ति के वक्त जैसा कि तय हुआ था, आंदोलन द्वारा उठाए सभी सवालों और मुद्दों पर नर्मदा घाटी विकास विभाग से विस्तृत चर्चा 9 सितंबर 2019, सोमवार को हुई। भोपाल में तेज बारिश के कारण निर्णय लिया गया कि आंदोलनका‍री नर्मदा नघाविप्रा, इंदौर पर ही पहुँचेंगें जहां भोपाल से आए मंत्री, श्री सुरेन्द्रसिंह बघेलजी, अधिकारियों एवं आंदोलन के 35 साथी – देवराम कनेरा, रणवीर तोमर, गोखरु सोलंकी, सुरभान भीलाला, सुरेश प्रधान, राहुल यादव, वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र व अन्य – मेधा पाटकरजी के साथ पूरे 8 घण्टे  चर्चा निर्णय में भिड़े रहे। इस बैठक में मध्‍यस्थ के रुप में भूतपूर्व मुख्य सविच श्री शरदचंद्र बेहार जी के अलावा वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान शामिल थे।

Prime Minister ensure addressal of Social-Environmental Concerns before Inauguration

Ranchi, September 11 : We have learnt that the Prime Minister is going to  dedicate tomorrow to the nation the second riverine Multi Modal terminal at Sahibganj in Jharkhand, even when many of the concerns regarding the social and environmental impact remain to be addressed. It is claimed that the terminal has been built in record time, and certainly one of the reason is the brushing aside or neglect of these serious issue. We are deeply concerned by the neglect of these concerns by the authorities.

10.9.19

जैकलीन आई एम कमिंग : पीटर मेंडलिस बनकर 'मुगेऱीलाल' के साथ साकार हुए 'हसीन सपने'

अमर आनंदरघुवीरलाल को छोटे पर्दे पर देखकर हमेशा उस नायक की छवि मन में रही जो निम्न मध्यम वर्ग की दबी-कुचली ख्वाहिशों का प्रतिनिधित्व करता है और जिंदगी में तमाम अवरोधों के बावजूद सपने देखने और उसे पूरा करन की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है। मुंगेरीलाल के हसीन सपने के अलावा अगर फिल्मों की बात करें तो , मैसे साहब, पीपली लाइव न्यूटन से लेकर सुई धागा तक अनेक ऐसी फिल्में रही हैं जिसमें रघुवीर यादव को जीवन संघर्ष के नायक के तौर पर स्थापित करने में कोई कमी नहीं रखी।  अपनी 6 फिल्मों को अपने अभिनय के दम पर ऑस्कर तक पहुंचाने वाले रघुवीर यादव की नई फिल्म जैकलीन आई एम कमिंग भी उनके इसी अंदाज का हिस्सा है और मेरा सौभाग्य है कि मैं उनकी इस फिल्म का हिस्सा हूं। रखुवीर यादव यानी फिल्म में होसंगाबाद किनारे के काशीनाथ तिवारी की भूमिका कर कर रहे रखुवीर के साथ मेरा किरदार पीटर मेंडलिस का है, जो एक सरकारी विभाग में उनका सीनियर है और परेशानी के दौरान उनका हौसला बढ़ाता है और उन्हें प्रसन्न रखने की कोशिश करता है।

9.9.19

यूपी में बूढ़ी कांग्रेस को मिले युवा नेतृत्व तो बने बात

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में कांगे्रस के हौसलों को उड़ान नहीं मिल पा रही है। प्रियंका वाड्रा गांधी की तमाम कोशिशों के बाद भी कांगे्रसी लगातार मिलती हार से उबर नहीं पा रहे हैं। कांगे्रस के छोटे-बड़े नेताओं ने मायूसी की चादर ओड़ रखी है तो कार्यकर्ताओं ने भी हवा का रूख भांप कर अपने आप को ‘समेट’ लिया है। कांगे्रस के सामने समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश कांगे्रस में जान फूंकने वाले उसके तमाम दिग्गज नेता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां से वह कांगे्रस के पक्ष में बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं कर सकते हैं। इन बुर्जुग नेताओं के पास न तो अब इतनी इच्छाशक्ति बची है कि वह जनता के बीच जाकर कांगे्रस विचारधारा  को प्रचार-प्रसार कर सकें, न ही इन नेताओं के पास किसी बड़े आंदोलन को लम्बे समय तक चलाने की शारीरिक ताकत है। रही सही कसर राहुल गांधी के अमेठी से वानयाड पालयन ने पूरी कर दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की रायबरेली संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव जीतने सोनिया गांधी भी राज्य में कभी नहीं दिखाई देती हैं।

भारत में सबसे अधिक महिलाएं करती हैं आत्महत्या

विश्व आत्महत्या निवारण दिवस 10 सितम्बर पर विशेष

प्रभुनाथ शुक्ल

आत्महत्या जिंदगी का सबसे प्राणघातक फैसला है। जीवन में कई स्थितियां ऐसी बनती हैं जब इंसान उससे लड़ नहीं पाता। जब उसे समस्या का निदान नहीं दिखता तो उसके पास एक मात्र विकल्प आत्महत्या होती है। आत्महत्या कोई भी आदमी कर सकता है। वह उच्च शिक्षाविंद्, वैज्ञानिक, अभिनेता, राजनेता, महिलाएं, युवा या फिर आम आदमी। आत्महत्या के संबंध में यह तर्क मनगढ़ंत हैं कि पढ़े-लिखे लोग आत्महत्या कम करते हैं या नहीं करते। भारत में कई उदाहारण हैं जहां सफल व्यक्ति अपनी जिंदगी से पस्त होकर ऐसा कदम उठाता है। जिसके बारे में आम आदमी यह सोच भी नहीं सकता है कि संबंधित व्यक्ति इस तरह का भी फैसला ले सकता है। देश में कई आईएएस, आईपीएस, राजनेता, फिल्मी हस्तियां आत्महत्या कर चुके हैं। दक्षिण भारत में काफी किंग के नाम से मशहूर हस्ती इसका ताजा उदाहरण हैं। जिन्होंने भारी आर्थिक नुकसान की वजह से ऐसा कदम उठाया। आत्महत्याओं को हम समय रहते रोक सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर ऐसी सोच पैदा नहीं होती है। आधुनिक जीवन शैली बेहद प्रतिस्पर्धात्मक हो चली है। व्यक्ति हर बात को अपनी सफलताओं और असफलताओं से जोड़ देता जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं होती हैं। पूरी दुनिया में हर साल 10 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। विश्व में होने वाली कुल आत्महत्याआंे का 21 फीसदी भारत में होता है। लोगों को आत्महत्या से बचाने के लिए 2003 से पूरी दुनिया में 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या निवारण दिवस मनाया जाता है। मानोचिकित्सक मानते हैं कि सामाजिक जागरुकता की वजह से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है।

2020 का विधान सभा चुनाव पार्टियों की आईटी टीम लड़ेगी


वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव के साथ अमरेंद्र पटेल की बातचीत

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव कहते हैं कि मीडिया संस्थागत बदलाव का ही नहीं, बल्कि व्यवस्थागत बदलाव का भी केंद्र रहा है। सामाजिक बदलाव का भी कारक रहा है। मीडिया की तकनीकी बदल रही है और इसका कार्य क्षेत्र और स्वरूप भी बदल गया है। पत्रकार अमरेंद्र पटेल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि 2020 का विधान सभा चुनाव पार्टियों की आइटी टीम लड़ेगी और इसकी कवायद भी शुरू हो गयी है। वीरेंद्र यादव से अमरेंद्र पटेल की हुई बातचीत प्रस्तुत है:

7.9.19

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को फ्री मेट्रो राइड पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार

जे.पी.सिंह
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को उच्चतम न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाई है।उच्चतम न्यायालय  ने महिलाओं को दिल्ली मेट्रो में फ्री सवारी के प्रस्ताव पर कहा है  कि एक तरफ लुभावने वादे और दूसरी तरफ नुकसान के दावे यह साथ-साथ नहीं चल सकते हैं।एक तरफ दिल्ली सरकार  मुफ्त सवारियां कराने जा रही है और दूसरी तरफ वह उच्चतम न्यायालय से चाहती है कि केन्द्र सरकार को निर्देश दे कि 50 फीसदी ऑपरेशनल नुकसान की वे भी भरपाई करे।

6.9.19

होइहि सोइ जो कमलनाथ रचि राखा!



डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'

सियासत की करवट, उधेड़बुन में उलझी मध्यप्रदेश कांग्रेस, बारिश के मौसम में भी भोपाल का बढ़ता तापमान, अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ के खिलाफ मंत्री के ऊँचें स्वर, आबकारी अधिकारी की सौदेबाजी, विधायकों को हिस्सा दिलवाना, अपनी ही सरकार के मंत्री का पुतला जलना, राजा-महाराजा का बगावत पर उतर आना, प्रदेश कांग्रेस की कमान के लिए छटपटाना, पूर्व अध्यक्ष का दुःख जाहिर करना, बंटाधार का चिट्ठी-पत्री का खेल खेलना आदि बहुत सी घटनाएँ बीते हफ्ते मध्यप्रदेश कांग्रेस के भाग्य में जुड़ तो गई किन्तु इसके पीछे मुख्यमंत्री कमलनाथ की चुप्पी भी विचारणीय और निर्णायक बनी हुई है।

5.9.19

निलंबित TFI के भ्रष्ट तानाशाहों, व्यभिचारियों को खुला पत्र.....

भारत में इस समय बदलाव की बयार चल रही है। नई दिल्ली से शुरू हुई यह कहानी पूरे देश में देखी जा सकती है। जो कभी CBI और RBI को अपनी कठपुतली समझते थे,आज वह रहम की भीख मांग रहे हैं। जहां पूरी दुनियां पीएम मोदी की कूटनीति की कायल है, वही दुश्मन देश के राष्ट्राध्यक्षों को नींद भी नसीब नहीं हो रही...!

यूपी कांग्रेस : गिरता जनाधार, प्रियंका पर ऐतबार

अजय कुमार, लखनऊ

कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा सियासत की पुरानी खिलाड़ी हैं। कभी वह अपनी माॅ सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी तक सिमटी थीं। आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश (जिसे मोदी-योगी का गढ़ माना जाता है) में कागे्रस को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी प्रियंका पर डाली गई तो मानों कांगे्रसियों को हौसले की उड़ान मिल गई। होता भी क्यों नहीं, प्रियंका को वर्षाे से कांगे्रस का छिपा हुआ ट्रम्प कार्ड माना जा रहा था। पूर्वी यूपी की प्रभारी बनते ही प्रियंका ने पूर्वांचल से भाजपा और मोदी की जड़े खोदने के लिए खूब हाथ-पैर मारे। मोदी एंड टीम को लगातार कोसा। पूर्वी उत्तर प्रदेश की करीब 50 सीटों के प्रत्याशी उनके ही द्वारा तय किए गए,लेकिन नतीजा शून्य रहा। प्रियंका का न तो जादू चला, न कोई चमत्कार हुआ। कांगे्रस का वोट प्रतिशत और सीटें जीतने दोनों के मामले में पिछड़ गई। अर्थात कांगे्रस को सबसे बुरा वक्त प्रियंका ने दिखा दिया था।

बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी पर हमला

सुनवाई आगे बढ़ने के साथ मंदिर समर्थकों में बढ़ रही बेचैनी
जे.पी.सिंह

अयोध्या मामले में जैसे जैसे उच्चतम न्यायालय में सुनवाई आगे बढ़ रही है और हिन्दू पक्ष विवादित स्थल के मालिकाने का अबतक कोई ठोस सबूत पांच सदस्यीय संविधान पीठ को नहीं दिखा सका है वैसे वैसे मंदिर समर्थकों में बेचैनी बढ़ती जा रही है। नतीजतन अब अदालत के बाहर मुस्लिम पक्षकारों के वकील को धमकी देने के साथ-साथ वादी पर भी हमला शुरू हो गया है।बाबरी मस्जिद मामले के वादी  इकबाल अंसारी पर हमला करने और मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी देने का आरोप लगा है। साथ ही जान से मारने की धमकी दी गई है। इकबाल अंसारी ने यह हमले का आरोप अंतरराष्ट्रीय शूटर वर्तिका सिंह पर लगाया है।बाबरी मस्जिद के पक्षकार मोहम्मद इकबाल और अंतरराष्ट्रीय शूटर कहने वाली वर्तिका सिंह के बीच झड़प ने सुरक्षा में चूक उजागर कर दी।

3.9.19

लखनऊ में पूर्व पीएम अटल जी के नाम पर बनेगा मेडिकल विश्वविद्यालय

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कैबिनेट की बैठक में छह महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी मिली है। इसमें प्रमुख रूप से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय के लिए राज्य सरकार द्वारा लखनऊ में 50 एकड़ जमीन को मंजूरी देना शामिल है। योगी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर सरकार चिकित्सा विश्वविद्यालय स्थापित करने जा रही है। इसके लिए लखनऊ के मॉल क्षेत्र में जमीन चिह्नित की गई है।

31.8.19

चमत्कार है तो नमस्कार है ....!!

चमत्कार है तो  नमस्कार है    ....!!
तारकेश कुमार ओझा
डयूटी के दौरान लोगों के प्रिय - अप्रिय सवालों से सामना तो अमूमन रोज ही होता है। लेकिन उस रोज आंदोलन पर बैठे हताश - निराश लोगों ने कुछ ऐसे अप्रिय सवाल उठाए , जिसे सुन कर मैं बिल्कुल निरूत्तर सा हो  गया। जबकि आंदोलन व सवाल करने वाले न तो पेशेवर राजनेता थे और ​न उनका इस क्षेत्र का कोई अनुभव था। तकरीबन दो सौ की संख्या वाले वे बेचारे तो खुद वक्त के मारे थे। एक सरकारी संस्थान में वे प्राइवेट कर्मचारी के तौर पर कार्य करते हैं जिसे सरकारी भाषा में संविदा , कैजुयल या कांट्रैक्चुयल कर्मचारी भी कहा जाता है।   आंदोलन उनका शौक नहीं बल्कि ऐसा वे  इसलिए कर रहे थे, क्योंकि उन्हें पिछले  नौ महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी। मेरे धरनास्थल पर पहुंचते ही उन्होंने जानना चाहा कि मैं किस चैनल से हूं। मेरे यह बताने पर कि मैं किसी चैनल से नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया से हूं। उनके मन का गुबार फूट पड़ा। नाराजगी जाहिर करते हुए वे कहने लगे कि चैनलों पर हम रोज देखते हैं कि पड़ोसी मुल्क अपने मुलाजिमों को तनख्वाह नहीं दे पा रहा। हम इसी देश के वासी हैं और हमें भी पिछले नौ महीने से वेतन नहीं मिला है... लेकिन हमारा दुख -दर्द कोई चैनल क्यों नहीं दिखाता। उनके सवालों से मैं निरुत्तर था। वाकई देश में किसी बात की जरूरत से ज्यादा चर्चा होती है तो कुछ बातों को महत्वपूर्ण होते हुए भी नजर अंदाज कर दिया जाता है। पता नहीं आखिर यह कौन तय कर रहा है कि किसे सुर्खियों में लाना है और किसे हाशिये पर रखना है। सोचने - समझने की शक्ति कुंद की जा रही है और चमत्कार को नमस्कार करने की मानवीय कमजोरी को असाध्य रोग में तब्दील किया जा रहा है। यही बीमारी जेएनयू में विवादित नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार को राष्ट्रनायक की तरह पेश करने पर मजबूर करती है। 2011 में अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन सफल रहने पर हम उन्हें गांधी से बड़ा नेता साबित करने लगते हैं। लेकिन कालांतर में यह सोचने की जहमत भी नहीं उठाते कि वही अन्ना आज कहां और किस हाल में हैं और उनके बाद के आंदोलन विफल क्यों हुए। नामी अभिनेता या अभिनेत्री का एक देशभक्तिपूर्ण ट्वीट  उसे महान बना सकता है, लेकिन अपने दायरे में ही पूरी ईमानदारी से कर्तव्यों का पालन करते हुए जान की बाजी लगाने वालों के बलिदान कहां चर्चा में आ पाते है। अक्सर सुनते हैं मेहनतकश मजदूर , रेलवे ट्रैक की निगरानी करने  वाले गैंगमैन या प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड डयूटी के दौरान जान गंवा बैठते हैं। वे भी देश का ही कार्य करते हुए ही मौत के मुंह में चले जाते हैं, लेकिन उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता या ध्यान देने की जरूरत भी नहीं समझी जाती।   लोकल ट्रेनों से निकल कर मायानगरी मुंबई के शानदार स्टूडियो में गाने वाली रानू मंडल के जीवन में आए आश्चर्यजनक बदलाव से हमारी आंखें चौंधिया जाती है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि 90 के दशक के सवार्धिक सफल पाश्र्व गायक मोहम्मद अजीज करीब दो दशकों तक गुमनामी के अंधेरे में खोए रहे। उनकी चर्चा तभी हुई जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। किसी कथित टैलेंट शो में गाकर प्रसिद्ध हुए गायक हमें अपनी और आकर्षित करते हैं लेकिन उन गुमनाम गायकों की कभी भूल से भी चर्चा नहीं होती जो अपने जमाने के नामी गायकों की संताने हैं । पिता की तरह उन्होंने भी गायन के क्षेत्र में करियर बनाना चाहा, लेकिन सफल नहीं हो सके। हमें कौन बनेगा करोड़पति में चंद सवालों के जवाब देकर करोड़पति बनने वालों पर रीझना सिखाया जा रहा है , लेकिन  लाखों लगा कर डिग्रियां हासिल करने के बावजूद चंद हजार की नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसने वाले देश के लाखों नौजवानों की चिंता हमारे चिंतन के केंद्र में नहीं है। क्योंकि इससे बाजार को भला क्या हासिल हो जाएगा। बल्कि ऐसी भयानक सच्चाईयां हताशा और अवसाद को जन्म देती है। लेकिन चमत्कार को नमस्कार करने की यह प्रवृति एक दिन कहां जाकर रुकेगी , सोच कर भी डर लगता है।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
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चिन्मयानंद मामला : सुप्रीम कोर्ट में पेश छात्रा नहीं लौटना चाहती यूपी, 4 दिन दिल्ली में रहेगी

जेपी सिंह
उच्चतम न्यायालय ने स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ अपने यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद लापता हुई एलएलएम की छात्रा को 4 दिनों के लिए अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में रहने की व्यवस्था करने का निर्देश रजिस्ट्री को दिया है। भाजपा के पूर्व सांसद एवं पूर्व गृहमंत्री  स्वामी चिन्मयानंद पर शोषण के आरोप लगाने वाली पीड़ित लड़की को यूपी पुलिस उच्चतम न्यायालय लेकर पहुंची जहां जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस ए.एस.बोपन्ना ने उससे बात की।

बैंकों का विलय कर अर्थव्यवस्था को फिर अस्थिर कर रही है मोदी सरकार!

जेपी सिंह
आने वाले 5 साल में देश को पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए नेक्स्ट जेनरेशन बैंकों का होना जरूरी है। ऐसा दावा करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को सरकारी बैंकों के मेगा कंसॉलिडेशन प्लान की घोषणा की। अब देश में सरकारी बैंकों की संख्या मौजूदा 27 से घटकर 12 रह जाएगी। 6 छोटे सरकारी बैंकों का भारतीय स्टेट बैंक में तथा विजया बैंक, देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में पहले ही विलय हो चुका है। इस तरह, एसबीआई तथा बैंक ऑफ बड़ौदा विलय के बाद 10 सरकारी बैंकों में पहले ही शीर्ष दो बड़े बैंकों में तब्दील हो चुके हैं।

मोदी राज में भारत से सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिना

जेपी सिंह

आर्थिक विकास दर में गिरावट के बाद भारत से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिन गया है। अर्थव्यवस्था की हालत और बदतर हुई, जून तिमाही में जीडीपी विकास दर घटकर 5 फीसद रह गयी है। यह साढ़े छह वर्षों का निचला स्तर है। साल 2013 के बाद जीडीपी ग्रोथ का यह सबसे बुरा दौर है।यह तब है जब जीडीपी की गणना 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद बदली प्रणाली से की गयी है जबकि यूपीए सरकार के मानदंडों से यदि गणना की जयकछुआ चाल से इसका समाधान सम्भव नहीं है बल्कि इसके लिए तीव्र गति से प्रयास करना पड़ेगा। तो यह मात्र 2 से 2. 5 फीसद के बीच ही बैठेगी।जीडीपी के  वर्तमान हालात आर्थिक आपातकाल सरीखे हो गए है।  कछुआ चाल से इसका समाधान सम्भव नहीं है बल्कि इसके लिए तीव्र गति से प्रयास करना पड़ेगा। सरकार को समझना होगा कि अब शेखी बघारने से काम नहीं चलेगा क्योंकि जीडीपी का गिरकर 5 फीसदी पर पहुंचना, उसके अब तक के दावों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।

अडानी का नाम आते ही कहां चला जाता है मोदी का राष्ट्रवाद?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में ऐसा मायाजाल फैला रखा है कि लोग सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने घूम रहे हैं। देश में रोजी-रोटी का बड़ा संकट पैदा हो गया है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से गड़बड़ा गई है। बेरोजगारी के मामले में मोदी सरकार ने पिछली सभी सरकारों को पीछे छोड़ दिया है। नौबत यहां तक आ गई है कि सरकार ने रिजर्व बैंक का रिजर्व पैसा 1.76 हजार करोड़ रुपये भी निकाल लिया है। निजीकरण के नाम पर देश के संसाधनों को लूटवाने की तैयारी सरकार ने पूरी कर ली है। रेलवे यहां तक रक्षा विभाग भी संकट में है। आर्डिनेस फैक्टरी में 45 हजार कर्मचारियों ने आंदोलन छेड़ रखा है। निजी कंपनियों में बड़े स्तर पर छंटनी का दौर चल रहा है। प्रधानमंत्री ने लोगों को भावनात्मक मुद्दों में उलझा रखा है। गिने-चुने विरोधियों पर शिकंजा कसकर भ्रष्टाचार को मिटाने की बात की जा रही है। जबकि न केवल सरकार में शामिल बल्कि दूसरी पार्टियों से आकर मोदी और शाह के सामने आत्मसमर्पण करने वाले नेताओं को संरक्षण दे दिया जा रहा है। जनता को देशभक्ति का उपदेश दिया जा रहा है और अपने करीबियों को सरकारी संसाधनों को दोनों हाथों से लूटवाया जा रहा है। वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी अपने हर करीबी को संरक्षण दे रहे पर अडानी ग्रुप पर तो जैसे सब कुछ लुटाने को तैयार हैं।

25.8.19

कृष्ण के दृष्टिकोण आज के सामाजिक सन्दर्भ में

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
हिन्दू धर्म में हम कृष्ण को गुरु मानते हैं। मेरे अनुसार कृष्ण केवल गुरु ही नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो अन्धकार से प्रकाश में ले जाते हैं। कृष्ण ने तो अन्धकार को नजरअंदाज करते हुए भूत-वर्तमान और भविष्य के प्रकाश को स्थापित करने का कार्य किया है। कृष्ण ने इंद्र को छोड़कर प्रकृति पूजन को बताया। यह भी किसी सूर्य के प्रकाश से कहाँ कम है? लेकिन आज के समय के अनुसार गोवर्धन तक ही पूजन समाप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि अंधाधुंध प्रकृति दोहन के कल्चर में जब हम कॉलोनी के बागों की स्थापना कर उनका पोषण करते हैं तो भी कृष्ण की याद आती है, जब हम हमारे मोबाइल पर स्क्रीन गार्ड्स और कवर लगाते हैं तब भी वही याद आते हैं कि, "जो चीज़ तुम्हारे लिए फायदेमंद है उसकी सुरक्षा करो उस पर पूरी श्रद्धा रखो। अपनी पॉजिटिव एनर्जी उसे दो।"

22.8.19

चार मंत्रियों को बाहर करने के बाद योगी ने बाकी नए-पुराने मंत्रियों को पढ़ाया नैतिकता का पाठ

अजय कुमार, लखनऊलखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार की इमेज को लेकर काफी सचेत हैं। वह नहीं चाहते हैं कि उनके मंत्री प्रदेश सेवा की बजाए जनता के बीच अपना रूतबा दिखाए। योगी यह भी नहीं चाहते हैं कि किसी मंत्री के परिवार का कोई सदस्य या करीबी मंत्री के काम में हस्तक्षेप करे। मंत्रियों को साफ हिदायत दी गई है कि वह सरकार की छवि के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करें। तात्पर्य यह है कि योगी संकेतों में अपने मंत्रियों को समझा रहे थे कि अगर उन्होंने मंत्री के तौर पर अपने कार्य के प्रति लापरवाही या नीति विरूद्ध कोई काम किया तो उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।

21.8.19

योगी सरकार की यदुवंशियों को लुभाने की तैयारी, धूमधाम से मनाई जा रही है श्री कृष्ण जन्माष्टमी

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। धर्म और राजनीति दो अलग-अगल विषय हैं। संविधान निर्माताओं ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था ताकि किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हो। सब जानते हैं कि भारत विभिन्न धर्मो, भाषाओं-जातियों वाला देश है। अनेकता में एकता भारत की शक्ति है। ऐसे में किसी एक या सभी धर्मो को साथ लेकर राजनीति करना मुश्किल ही नहीं असंभव थी। मगर कड़वी सच्चाई यह भी है कि भले ही हमारे संविधान निर्माताओं ने दूर की सोच रखते हुए देश का तानाबान धर्मरिनपेक्ष के रूप में तैयार किया था,लेकिन सियासतदारों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए समय-समय पर धर्म और राजनीति में घालमेल करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा।

पीलीभीत में पत्रकार सुधीर पर जानलेवा हमले से पत्रकार यूनियन नाराज

पत्रकारों की हत्या और जानलेवा हमले बर्दाश्त नहीं, पत्रकार ही अगर असुरक्षित हो गए तो लोकतंत्र का क्या होगा, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने प्रान्तीय बैठक में पत्रकार उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई
लखनऊ। उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बैठक सोमवार को गोमतीनगर स्थित प्रांतीय कार्यालय में संपन्न हुई, जिसमें पत्रकार उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई और सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई।

बेपटरी होती यूपी की कानून व्यवस्था

अपराध मुक्त प्रदेश के नारे के साथ सत्ता में आई बीजेपी की योगी सरकार ने अपने कार्यकाल का आधा समय पूरा कर लिया है। इस दौरान योगी सरकार अपराधियों पर नकेल कसने की पूरी कोशिश की है। मगर समय-समय पर अपराधी कानून व्यवस्था को बेपटरी करते रहे हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट यूपी की तर्ज पर कड़ा कानून बनाकर अपराधियों को उखाड़ फेकने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि छह महीने के भीतर दोनों राज्यों से गैंगेस्टर की सफाई शुरू हो जानी चाहिए। गैंगेस्टर के बीच एरिया में दबदबा बनाने के लिए होने वाला संघर्ष समाज व कानून व्यवस्था दोनों के लिए घातक है। यह सच है कि योगी सरकार अपराधियों पर कहर बन कर टूटी है। ढाई साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में पुलिस ने 3599 एनकाउन्टर किये है। जिसमें 73 अपराधी ढेर हुए है जबकि चार पुलिसकर्मी शहीद भी हुए है। इस दौरान पुलिस ने 8251अपराधी गिरफ्तार किये है, इसके अलावा मुठभेड़ में 1059 अपराधी घायल हुये है। आंकड़ों के मुताबिक मुठभेड़ में 1 लाख के तीन और 50 हजार के 28 ईनामी मारे गये है। ऑपरेशन क्लीन के खौफ से कुल 13866 अपराधी अपनी जमानत निरस्त कराकर जेल चले गये। 13602 आरोपियों के खिलाफ गैंगेस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हुई। गैंगेस्टर आरोपियों की 67 करोड़ की सम्पत्ति जब्त की गयी बावजूद इसके पुलिस अभी भी अपराध और अपराधियों की कमर नहीं तोड़ पायी है।

19.8.19

जब जज बनकर फैसले करने लगे कलम के जिगोलो



अमितेश अग्निहोत्री
दैनिक जागरण ने पहलू खान की मॉब लिंचिंग में गिरफ्तार सभी अभियुक्तों के बरी होने की खबर तस्कर पहलू खान हत्याकांड के सभी आरोपित बरी शीर्षक के साथ लगाई है।अगर आप के अंदर संविधान,कानून और पत्रकारिता के मूल्यों की रत्ती भर समझ है तो अपना सर पीट लीजिये। दैनिक जागरण कथित रूप से हिंदी पट्टी का नम्बर 1 अखबार है। यह स्थान इन्हें ऐसे ही नही मिला है। पत्रकारिता को ताक पर रखकर पत्तेचाटी करने के लम्बे और सतत कालखण्ड के बाद आज यह शीर्ष पर पहुचे है।

वीआईपी कल्चर पर बार-बार मोदी-योगी का ‘हथौड़ा’

अजय कुमार, लखनऊ
नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान वीआईपी कल्चर पर ‘हथौड़ा’ चलाते हुए वर्ष 2017 में मंत्रियों और अफसरों की गाड़ी पर लाल-नीली बत्ती(जो स्टे्टस सिम्बल हुआ करता था) लगाए जाने पर रोक लगाई थी तो इसकी चैतरफा प्रशंसा के साथ-साथ इस पर खूब सियासत भी हुई थी। गैर भाजपाई राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के फैसले को अपने राज्यों में लागू करने से मना कर दिया था। उस समय उत्तर प्रदेश में नई-नई योगी सरकार बनी थी। अन्य राज्यों से इत्तर योगी सरकार ने सबसे पहले लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म करने के लिए इसे प्रदेश में लागू कर दिया। गौरतलब हो, मोदी सरकार ने पहली मई 2017 से लाल बत्ती हटाने के लिए मोटर व्हीकल एक्ट से वो नियम ही हटा दिया था, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें वीआईपी लोगों को लाल बत्ती लगाने की इजाजत देती थीं। लाल बत्ती हटाने के आदेश के साथ ही 28 साल पुरानी परंपरा खत्म हो गई थी। वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सख्त फैसले लेने के लिए जाने जाती है। पहले उसने मोदी सरकार की पहल पर मंत्रियों और अधिकारियों की गाड़ी पर लगने वाली लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म किया तो उसके बाद मंत्रियों और नेताओं से सम्पति का ब्योरा मांग लिया। इसी प्रकार प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए बदमाशों के एनकांउटर का रास्ता भी चुना।

आखिर आजादी के सही मायने क्या हैं.....

वर्तमान में आजादी के मायने बदल गए हैं. अब कोई भी हमारी राजनैतिक शक्तियां जल, अनाज, आवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों पर बात नहीं करती हैं. यह बड़ी विडम्बना है कि आजादी के मायने को बदल कर राजनैतिक पार्टियां खुद देश की जनता को बहका रही हैं और राष्ट्र, धर्म, संप्रदाय, मंदिर- मस्जिद, जात- पात के नाम पर आपस में लड़ा कर स्वयं राजनीतिक रोटियां सेक रही हैं.  वास्तव में क्या यही आजादी के मायने है कि स्वातंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर झण्डा लहराना, परेड देखना, लाउडस्पीकर लगाकर देशभक्ति गानों पर थिरकना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होना और देश के जयकारे लगाना ही महज आजादी है.

370 व 35 ए हटाना कितना सही, कितना गलत और कितना सफल

पिछले कई दिनों से जम्मू- कश्मीर राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है. बना भी क्यों न रहे, जो जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए हटा दिया गया. हालाकि भारत की शान व अभिन्न हिस्सा कहा जाने वाला कश्मीर आजादी के बाद से ही विवादित रहा और चर्चा का विषय बना रहा.

15.8.19

करणी दान सिंह राजपूत बीकानेर संभााग के 'राजस्थान सेवा गौरव पत्रकारिता' पुरस्कार से सम्मानित




बीकानेर के रवीन्द्र मंच पर आयोजित समारोह में यह सम्मान करणीदानसिंह राजपूत की माता हीरा और पिता रतनसिंह की सीख एवं पत्रकारिता के इतिहास का वर्णन करने के बाद प्रोफेसर चतुर्वेदी स्मृति संस्थान जयपुर की ओर से रविवार 4 अगस्त 2019 को प्रदान किया गया।  समारोह में स्वामी श्री समवित सोम गिरी जी महाराज (महंत श्री लालेश्वर महादेव मंदिर बीकानेर) श्री गुलाबचंद कटारिया (नेता प्रतिपक्ष राजस्थान विधानसभा व पूर्व गृह मंत्री राजस्थान सरकार) श्री अरुण चतुर्वेदी (पूर्व कैबिनेट मंत्री राजस्थान सरकार) के द्वारा प्रदान किया गया। श्री राजपूत को शाल और पीताम्बर व साफा ओढा कर मढे हुए सुनहरे सम्मान प्रशस्ति पत्र को प्रदान कर सम्मानित किया गया।

हिंदुओं के साथ ही आजादी के बाद मुसलमानों ने भी गांधी को नहीं समझा : प्रियंदव




बनारस : बीएचयू में एनी बेसेंट हाल में कला संकाय एवं प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद की याद में हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार एवं इतिहासविद प्रियंवद का एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। अपने व्याख्यान में इतिहास और दर्शन के सम्बंधों पर चर्चा करते हुए प्रियंवद ने कहा कि यह इतिहास पर निर्भर करता है कि वह किसे कितना स्थान देता है. उन्होंने इतिहास पर अपनी बात रखते हुए कि वह बौद्धिकता के रसायन से बना हुआ सबसे खतरनाक उत्पाद है जो राष्ट्रों को अहंकारी और निरर्थक बनाता है। इसके उदाहरण भारत विभाजन की घटना में देखे जा सकते हैं।

आजादी के विरोधी और अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार देशभक्त नहीं गद्दार हैं

नई दिल्ली। आज की तारीख में उन क्रांतकारियों की आत्मा रो रही होगी, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले उन समाजवादियों की आत्मा भी आहत होगी, जिन्होंने देश में स्वराज का सपना देखा था। आज की तारीख में जब खुशहाली के रास्ते जाना चाहिए था ऐसे में भावनात्मक मुद्दे समाज पर हावी हैं। जो लोग आजादी की लड़ाई और आजादी के विरोधी, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत भाती थी वे आज न केवल आजाद भारत की सत्ता पर काबिज हैं बल्कि देश के संसाधनों के मजे भी लूट रहे हैं। आजादी के लिए सब कुछ लुटा दिये क्रांतिकारियों कर परिजन फतेहाल में गुरबत की जिंदगी काट रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर इन दिखावे के राष्ट्रवादियों का ढकोसला देखने को मिलेगा। देखना कैसे देश के सबसे बड़े देशभक्त होने का दावा किया जाएगा। 370 धारा खत्म करने के बाद इस स्वतंत्रता दिवस पर कैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को देश के सबसे बड़े नायक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

चौपाल के मोहनकृष्ण बोहरा पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण


जोधपुर।  पढ़ो तो पूरा पढ़ो, तल तक जाओ। आगे बढ़ो तो उत्स तक जाओ।' हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक  प्रो. मोहनकृष्ण बोहरा ने उकत विचार अपने अस्सीवें जन्मदिन पर चौपाल द्वारा आयोजित समारोह में व्यक्त किये। जोधपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के सभागार में आत्मीय जन को सम्बोधित करते हुए प्रो बोहरा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत एक पंजाबी कथन से की: तुस्सी साड्डा जुलूस करना चांदे हो, यानि आप लोग मेरा जुलूस निकालना चाहते हो।

अब कैसे कृष्ण, कैसे राम निकलेगा (ग़ज़ल)

तेरा न बोलना बहुत देर तक खलेगा
एक न एक दिन तेरा घर भी जलेगा

नज़र बंद हो अपनी बोई नफरतों में
फिर रहीम और कबीर कहाँ मिलेगा

चाँद को चुराके रात को दोष देते हो
इंतज़ार करो , आसमाँ भी पिघलेगा

जाति,धरम,नाम सबसे तो खेल लिया
अब कैसे कृष्ण , कैसे राम निकलेगा

पानी,हवा,मिटटी सब तो बँट गए हैं
किस आँगन में अब गुलाब खिलेगा

सब को बदल दिया खुद को छोड़के
सच को झूठ से और कितना बदलोगे

सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन, नई दिल्ली


14.8.19

जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं ....!!

जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं    ....!!
तारकेश कुमार ओझा
जीवन के खेल वाकई निराले होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि ना - ना करते आप वहां पहुंच जाते हैं जहां जाने को आपका जी नहीं चाहता जबकि अनायास की गई ऐसी यात्राएं न सिर्फ सार्थक सिद्ध होती हैं बल्कि यादगार भी। जीवन की अनगिनत घटनाओं में ऐसी दो यात्राएं अक्सर मेरे जेहन में उमड़ती - घुमड़ती रहती है। पहली घटना मेरे किशोरावस्था की है। पत्रकारिता का ककहरा सीखते हुए उस दौर में रविवार, धर्मयुग , दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी तमाम लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बंद हो चुकी थी। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के इस काल - खंड में साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर कुछ नए अखबारों का प्रकाशन शुरू हुआ। कम कीमत वाले इन पत्रों के साथ चार रंगीन पृष्ठों का सप्लीमेंट और एक छोटी सी पत्रिका भी रहती थी। लिहाजा देखते ही देखते ऐसे साप्ताहिक पत्रों ने अच्छा - खासा पाठक वर्ग तैयार कर लिया। देश के चार महानगरों से हिंदी व अंग्रेजी में निकलने वाले एक साप्ताहिक पत्र का एक पन्ना आंचलिक खबरों के लिए था। शुरूआती दौर में मुझे ऐसे किसी मंच की बेताबी से जरूरत थी, लिहाजा बगैर किसी औपचारिक बातचीत के मैने उस समाचार पत्र के क्षेत्रीय कार्यालय को डाक से खबरें भेजना शुरू कर दिया।  अमूमन हर हफ्ते प्रकाशित होने वाली  बाइ लाइन खबरों  ने मुझे क्षेत्र का चर्चित पत्रकार बना दिया था। हालांकि मेरी प्राथमिकता पहचान के साथ पारिश्रमिक भी थी। क्योंकि यह मेरे करियर के शुरूआती दौर के लिए प्राण वायु साबित हो सकती थी। बेरोजगारी का कलंक मेरे सिर से मिट सकता था। लेकिन उस दौर के दो ऐसे समाचार पत्रों ने लिखित घोषणा के बावजूद एक चवन्नी भी कभी पारिश्रमिक के तौर पर नहीं दी तो मैं निराशा के गर्त में डूबने लगा।  क्योंकि अंतहीन प्रतीक्षा के बाद भी कभी कोई मनीआर्डर तो आया नहीं, उलटे ज्यादा तगादा करने पर खबरें छपना भी बंद हो जाती थी। इस बीच शहर में एक वित्तीय कंपनी का कार्यालय खुला। इसके कई कर्मचारी मेरे परिचित थे। तब फोन आदि नहीं बल्कि सीधे घर पहुंचने का जमाना था। लिहाजा इसके कुछ कर्मचारी कई बार मेरे घर यह कहते हुए आ पहुंचे कि आपको महाप्रबंधक बुला रहे हैं। मैं असहज हो गया। क्योंकि मैं जानता था कि अखबारों में समाचार छपवाने  के लिए मुझे बुलाया जा रहा है, जबकि तात्कालीन परिस्थितियों में यह मुश्किल था। लिहाजा मैने कन्नी काटने की भरसक कोशिश की। लेकिन काफी अनुनय - विनय के बाद मुझे उनके दफ्तर जाना ही पड़ा। महाप्रबंधक काफी भद्र आदमी था। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि उनकी कंपनी का विज्ञापन किसी समाचार पत्र में छपवा दूं। इसके लिए कोलकाता जाना पड़े तो चले जाएं, कंपनी के आदमी साथ होंगे। आपको केवल साथ जाना पड़ेगा। मन से राजी न होते हुए भी आखिरकार मुझे कोलकाता निकलना पड़ा। कंपनी के दो मुलाजिम मेरे साथ थे, जिनमें से एक मेरा सहपाठी रह चुका था। ट्रेन से कोलकाता का रुख करते हुए भी कई बार लगा कि ऐसा कुछ हो जाए, जिससे मैं इस अनचाही यात्रा से बच सकूं। रेल अवरोध या तकनीकी समस्या। लेकिन मेरी एक न चली। उधेड़बुन के बीच हम हावड़ा स्टेशन पर थे। पूछते - पाछते बस से उसी साप्ताहिक समाचार पत्र के दफ्तर जा पहुंचे। जहां भविष्य की तलाश में पहले भी दो - एक बार जाना हुआ था। मुझे याद है कोलकाता के एजेसी बोस रोड पर उस अखबार का दफ्तर था।  आफिस के कर्मचारी अचानक मुझे अपने बीच पाकर हैरान थे। मैने अनमने भाव से मकसद बताया। कुछ देर में ही 3450 रुपये का विज्ञापन फाइनल हो गया। रसीद बनाते समय कुछ कर्मचारियों ने जब मुझसे कमीशन लेने को कहा तो मैं पशोपोश में पड़ गया। क्योंकि साथ गए लोगों के सामने मेरी इमेज खराब हो सकती थी। दूसरी तरफ दफ्तर के लोगों का कहना था कि एजेंसियों को हम 15 फीसद देते हैं। आप हमारे सहयोगी हैं। इसलिए हम आपको केवल 10 फीसद कमीशन दे सकते हैं। इस लिहाज से यह 345 रुपये बन रहा था। लड़कपन के उस दौर में यह मेरे लिए 3 लाख  से कम न था। , या कहें इससे भी ज्यादा । ये रुपये मुझे बगैर मांगे या उम्मीद के मिल रहे थे। मैं जिस  क्षेत ्र में  हाथ पांव मार रहा था, उसमें कमाई भी हो सकती है यह तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।  उधेड़बुन के बीच साथ गए लोगों ने यह कहते हुए मुझे धर्मसंकट से उबारा कि अखबार से अगर आपको कुछ मिल रहा है तो इसमें भला हमें क्या ऐतराज हो सकता है। कमीशन के पैसे बैग में रख कर दफ्तर से बाहर निकला तो मैं जिंदगी की पहेली पर हैरान था। क्योंकि लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जहां से मुझे कभी अठन्नी भी नहीं मिली, वहीं से बगैर मांगे इतने पैसे मिल गए कि दशहरा - दिवाली मन जाए।
अनचाही और आकस्मिक यात्रा की एक और मजेदार घटना युवावस्था में हुई। जब मैं अप्रत्याशित रूप से पत्रकारिता से रोजी - रोटी कमाने में सक्षम हो चुका था। तब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बिल्कुल नई बनी थी। इसकी नेत्री ममता बनर्जी  राजनैतिक तनातनी के लिए तब खासे चर्चित चमकाईतला आने वाली थी। जो मेरे ही जिले की सीमा क्षेत्र में है। एक रोज सुबह अखबार का काम निपटाने के बाद स्टेशन से बाहर निकला तो चमचमाती टाटा सुमो खड़ी नजर आई। तब इस गाड़ी में चढ़ना बड़े फक्र की बात मानी जाती थी।  पता लगा  कुछ परिचित  नेता वहां जा रहे हैं। कुछ देर बाद सभी सुमो के नजदीक खड़े मिले । मुझे देखते ही बोल पड़े, आपको लिए बगैर नहीं जाएंगे। मेरे लिए यह काफी आकर्षक प्रस्ताव था, क्योंकि चमकाईतला जाने के लिए हमें केशपुर होकर जाना था, जो उन दिनों राजनैतिक हिंसा के लिए अंतर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। लेकिन दुविधा यह कि मेरी प्राथमिकता शहर की खबरें होती थी। मुझे लगा कि मैं बाहर रहा और शहर में कोई बड़ी घटना हो गई तो... इसके साथ तब दोपहर के भोजन के बाद मुझे हल्की झपकी लेने की भी बुरी आदत थी। लिहाजा मैं वहां जाने से आना - कानी करने लगा। लेकिन नेताओं ने एक झटके से सुमो की अगली सीट का दरवाजा खोला और आग्रहपूर्वक मुझे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठा दिया। इस तरह जीवन की एक और आकस्मिक यात्रा यादगार बन गई। हम हंस पड़े जब सुमो का चालक लगभग रूआंसा हो गया जब उसे पता चला कि गाड़ी केशपुर होकर गुजरेगी। लगभग रोते हुए ड्राइवर बोल पड़ा... बाल - बच्चेदार हूं सर... और वाहन में बैठे सब लोग हंसने लगे।

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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
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13.8.19

हमे ऐसा हिंदुस्तान बनाना है...ईद-उल-अज़हा की मुबारकबाद

इस वीडियो की मार्फत ईद-उल-अज़हा की एहले हिंदुस्तान को दिली मुबारक पेश करता हूँ।वज़ीर-ए-आज़म आली जनाब नरेंद्र मोदी जी,वज़ीर-ए-दाखला आली जनाब अमित शाह जी की सरपरस्ती में हमें किस तरह के हिंदुस्तान की तशकील करनी है...इस वीडियो के मार्फत गौर फरमाएं...
जय-हिंद
लिंक---
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10.8.19

संगठन पर्व सदस्यता अभियान-2019

उत्तर प्रदेश के ज़िला बदायूं में आयोजित सदस्यता अभियान कार्यक्रम मे सैकड़ो की तादात में मुस्लिम मोअशरे के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कराई! इस अवसर पर मुझे प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक एवं मुख्य वक्ता के तौर पर रहने का सौभाग्य प्राप्त हुया,विधायक बदायूं सदर जनाब महेश चंद्र गुप्ता जी गरिमामई उपस्थित, प्रदेश मंत्री भारतीय जनता पार्टी(अल्पसंख्यक मोर्चा) DrNazia Alam जी की क़यादत और अल्पसंख्यक मोर्चा(BJP) जनाब Atif Nizami जी की निज़ामत ने इस इजलास को ज़ीनत अफ़रोज़ कर दिया...मुख्य वक्ता के तौर पर इजलास में मदु करने के लिये ज़िला बदायूं की अवाम,विधायक जी और आतिफ़ निज़ामी जी का दिल की गहराईयों से शुक्रिया...
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जय हिंद-जय भारत
जय राष्ट्रवाद
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