30.11.19
मृत्युदंड से कम स्वीकार्य नहीं
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19.11.19
झूठ की बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
अपने आप को मुसलमानों का रहनुमा समझने का दंभ भरने वाला करीब 50 वर्ष पुराना ‘आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ (एआईएमपीएलबी) अपने आप को हमेशा सुर्खिंयों में बनाए रखने की कला में माहिर है। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल करने की बात कह कर उसने यह बात फिर साबित कर दी है। इससे पहले भी कई मौकों पर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुखालफत कर चुका है। चाहें राजीव सरकार के समय मुस्लिम महिला साहबानों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजारा भता दिए जाने का फैसला रहा हो या फिर इंस्टेंट तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कट्टरपंथी सोच रखने वाले बोर्ड को कुछ भी रास नहीं आता है। वह हर मसले को शरीयत की चादर में छिपा देने को उतावला रहता है। समय के साथ बदल नहीं पाने और कट्टरपंथी सोच के चलते एआईएमपीएलबी से तमाम बुद्धिजीवी मुलसमान दूरी बनाने लगे हैं। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड अपनी संकुचित सोच के चलते विवादों में भी बना रहता है। एक समय बोर्ड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जेबी संगठन समझा जाता था। आज भी बोर्ड इसी लीक पर चलते हुए भाजपा और उसकी सरकारों की मुखालफत में लगा रहता है। बोर्ड का गठन जिन परिस्थितियों में हुआ था,उसे भी समझना जरूरी है।
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11.11.19
फ्लाप मध्यस्थता का ‘हिट फार्मूला’ बना फैसले का आधार!
अयोध्या विवाद अब इतिहास के पन्नों में जरूर सिमट कर रह जाएगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई अहम सवाल भी खड़ा कर गया है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि देश की सियासी और सामाजिक चूले हिला देने वाले इस विवाद को सुलझाने में आजादी के बाद 72 साल क्यों लग गए ? सवाल यह भी है कि मोदी सरकार की तरह केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसी इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई, जिससे अयोध्या विवाद को सुलझाया जा सकता था ? कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि अयोध्या विवाद सुलझाने का कोई प्रयास नहीं किया गया हो,लेकिन हकीकत यही है कि अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो इसके लिए सबसे अधिक कांगे्रस जिम्मेदार है। क्यों कि उसने दशकों तक मजबूती के साथ देश पर राज किया था,जबकि अन्य दलों की जब भी केन्द्र में सरकारें बनी तो उनको वह मजबूती नहीं मिल पाई,जिस मजबूती के साथ कांगे्रस की सरकारें चला करती थीं। जनता पार्टी की सरकार जरूर अपवाद है,लेकिन पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के बाद भी जनता पार्टीे की सरकार अंर्तविरोधाभास के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। यहां तक की मोदी भी अपने पहले कार्यकाल में अयोध्या विवाद सुलझाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे,क्योंकि एक तो संख्याबल के हिसाब से वह आज जितना मजबूत नहीं थे तो दूसरा राज्यसभा में भी उसका(मोदी सरकार) बहुमत नहीं था।
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अयोध्या कांड : सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संतुलन साधने का प्रयास किया
सज्जाद हैदर
देश के सबसे बड़े विवाद की जड़ आज उच्चतम न्यायालय ने अपनी ताकत का प्रयोग करते हुए समाप्त कर दी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश की आज की राजनीति ने सत्ता और कुर्सी की लालच में पूरे देश को आग में झोंकने का कार्य किया। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि धार्मिक भावना जिसकी आड़ में उन्माद भी फलता एवं फूलता है। क्योंकि हमारे देश की सबसे बड़ी मुख्य वजह यह है कि देश में बढ़ता हुआ जातिवाद, जिसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो अनपढ़ होते हैं या फिर न्यून्तम स्तर की शिक्षा तक ही सीमित रह जाते हैं। जोकि नेताओं की चाल को नहीं समझ पाते और नेताओं की सियासी साज़िश का आसानी के साथ शिकार हो जाते हैं। और धार्मिक भावनाओं के आधार पर विभाजित हो जाते हैं। जबकि शिक्षित एवं विद्वान व्यक्ति ऐसा कदापि नहीं करते।
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श्रीराम मन्दिर आंदोलन के प्रणेता याद आते हैं
आज हम हिन्दुओं के सदियों पुराने ज़ख्मों पर मरहम लगा है । इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हज़ारों सन्तों व भक्तों को हमारी भावभीनी श्र्द्धांजली जिन्होंने पिछली सदियों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान किया।
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10.11.19
और ये सही जवाब...!
मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो,
आदमी ही रहने दो ख़ुदा मत समझो!
अज़ीज़ाने गिरामी-ए-मिल्लत और मेरे मुल्क़ के गयूर नौजवानों,
राम मंदिर और बाबरी मस्जिद हक़-ए-मिल्कियत मुतालबे पर अदालते अज़मीया का आज का फ़ैसला बाइस-ए-मसर्रत तो है ही, हिंदुस्तान की क़ौमी यकजहती के वक़ार को बुलंद-ओ-बाला रखने का पैग़ाम भी आलमी दुनिया को देता है।
फैसले पर तमाम तरह की राय शुमारी हुई, मुल्क़ के आईन के एतबार से अवाम की अपनी अपनी मुख़्तलिफ़ राय भी थीं मगर मैं जो लिख रहा हूँ वो थोड़ा लीक से हटकर है...
मुख़्तलिफ़ सियासी जमातों और नामनेहाद क़ौमी रहनुमाओं ने जिस तरह पिछले 75 साला जम्हूरी निज़ाम में मुसलमानों ख़ास कर सुन्नी मुसलमानों का "ब्रेन-ड्रेन" कर मुल्क़ की मुख्य-धारा से काटने का एक घिनोना खेल खेला था।आज अदालत-ए-अज़मीया ने उस मंसूबे को पामाल कर दिया।
आज ईद मिलादुन्नबी के मुबारक मौक़े पर हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने जिस नज़्मों-ज़ब्त से काम लिया और अदालत के फ़ैसले को सर-माथे लगाकर मुल्क़ के आईन का इक़बाल बुलंद किया उससे ये साबित हो गया कि नानक,कबीर,रहीम,रसखान,
ख़्वाजा,आला हज़रत,अमीर ख़ुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया की इस रूहानी मिट्टी में कोई शरपसंद अब मट्ठा नही डाल सकता।
क्या इत्तेफ़ाक़ है! आज अल्लामा इकबाल की यौमे पैदाइश भी है। इस इंक़लाबी शायर ने श्रीराम को "इमाम-ए-हिंद" की पदवी से नवाज़ा था। आज भी उनकी तहरीर- "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" हमारी रूह की गहराईयों में बसी है। आज हमारा हिन्दुस्तान, हमारा प्यारा मुल्क़ सारे जहां से अच्छा बनने की सिम्त में आगे बढ़ा है और मुझे कहते हुए बड़ा फक़्र है कि इसकी नींव हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने आज अदालत-ए-अज़मीया के फैसले पर अपनी मोहर लगा कर रखी है।और जवाब दिया है उन फ़िरक़ा परस्त ताक़तों को जो अपने सियासी मफाद के लिये इस क़ौम के मुस्तक़बिल से अब तक खेलते आ रहे थे।
बचा के रखियेगा नफ़रत से,
दिल की बसती को,
ये आग ख़ुद नहीं लगती,
लगाई जाती है!
जय-हिंद जय भारत!
डॉ. सयैद एहतेशाम-उल-हुदा
प्रखर वक्ता एवं राष्ट्रवादी चिंतक
माइनॉरिटी सोशल रिफॉर्मिस्ट
9837357723
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drhuda
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7.11.19
क्या राम मंदिर मुद्दा खत्म होने देंगे राम को भुनाने वाले लोग?
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2.11.19
पांच सौ साल पुराना विवाद सुलझने के करीब!
अजय कुमार, लखनऊ
‘लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई।’ अयोध्या के करीब पांच सौ साल पुराने भगवान राम की जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में उक्त पंक्तियों को बार-बार दोहराया जा सकता है, लेकिन देर से ही सही अब यह उम्मीद बंधने लगी है कि मोदी सरकार यानी भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने घोषणा पत्र में किए वायदे को पूरा करने की गंभीर इच्छा शक्ति और सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद अयोध्या विवाद पर फैसले की घड़ी आ गई है। अगर ऐसा हुआ तो सदियों पुराना अयोध्या विवाद हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 12 वर्षो के बाद 16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है। फैसला रिजर्व कर लिया गया है। करीब एक दस दिनों के भीतर अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों वाली बैंच का अंतिम(संभवता) फैसला आ जाएगा। माहौल न बिगड़े, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सभी पक्ष सहज स्वीकार करें इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम धर्मगुरूओं के द्वारा ही नहीं अयोध्या विवाद का मुकदमा लड़ रहे तमाम पक्षकार भी यही चाहते हैं कि कोर्ट के फैसले का सम्मान हो।
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परिवार के आत्महत्या करने जैसे मामलों में जिलाधिकारी और संबंधित जनप्रतिनिधियों पर हो दंड का प्रावधान
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आर्थिक तंगी के चलते दो बच्चों को जहर देकर दंपति ने आत्महत्या की है। मीडिया से लेकर सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठनों ने तो औपचाकिरता निभाकर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। हां सोशल मीडिया पर यह मामला जरूर मजबूती से उठा। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मामला प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का है। प्रधानमंत्री भी ऐसे कि देश के विकास का ढिंढोरा पूरे विश्व में पीटते फिर रहे हैं। दूसरे देशों में जा-जाकर अपनी कीर्तिमान गिना रहे हैं। संपन्न लोगों के बीच में जाकर सेल्फी ले रहे हैं। अमेरिका जैसे देश में जाकर अपनी महिमामंडन में कार्यक्रम करा रहे हैं।
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1.11.19
ऑस्ट्रेलिया में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो पुस्तकों का लोकार्पण हुआ
ऑस्ट्रेलिया के खूबसूरत शहर पर्थ की अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संस्कृति’ तथा हिन्दी समाज ऑफ पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (HSWA) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक सुरुचिपूर्ण एवम आत्मीय आयोजन में भारत से आए सुपरिचित लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों ‘समय की पंचायत’ और ‘जो देश हम बना रहे हैं’ का लोकार्पण किया गया.
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31.10.19
क्या प्रशांत किशोर गैर-भाजपा पार्टियों को कमजोर करने के भाजपाई एजेंडे के मोहरे हैं!
प्रशांत किशोर की राजनीतिक ईमानदारी पर शक के बादल... कहीं वे मोदी के पेरोल पर दूसरी पार्टियों को कमजोर करने का काम तो नहीं कर रहे हैं !
-निरंजन परिहार-
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की विश्वसनीयता पर शक के बादल गहराने लगे है। राजनीतिक हलकों में महाराष्ट्र के मामले में प्रशांत किशोर की राजनीतिक सूझबूझ, रणनीतिक तैयारी और ग्राउंड रियलिटी को समझने की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं। इसके साथ सबसे बड़ा सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि क्या वे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कमजोर करने के लिए बीजेपी और नरेंद्र मोदी के रोल पर तो काम नहीं कर रहे हैं। प्रशांत किशोर के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोल पर होने का यह सवाल इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि बिहार में जेडीयू, उत्तर प्रदेश और गुजरात में कांग्रेस व अब महाराष्ट्र में शिवसेना को प्रशांत किशोर के चुनावी सहयोग ने ताकतवर करने के बजाय कमजोर किया है।
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लघुकथा- सब्ज़ी मेकर
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26.10.19
भगवान चित्रगुप्त जी महाराज परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं, जानिए पूरी कथा....
संजय सक्सेना,लखनऊ
पांच त्योहारों की श्रृंखला में दीपावली का सबसे अधिक महत्व है तो भैयादूज और इसी दिन पड़ने वाली भगवान चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती की अपनी अलग महत्ता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। तद्नुसार इस बार 29 अक्टूबर को भैयादूज और चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती मनाई जाएगी। इस दिन कायस्थ समाज कलम-दवाज की पूजा करके अपने अराध्य चित्रगुप्त जी महाराज की पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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19.10.19
यूपी में आइजीआरएस की सभी सेवाएं ठप, सीएम हेल्पलाइन नंबर ने भी काम करना बंद कर दिया!
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14.10.19
रेल यात्रा या जेल यात्रा ...!!
तारकेश कुमार ओझा
ट्वीटर से समस्या समाधान के शुरूआती दौर में मुझे यह जानकार अचंभा होता
था कि महज किसी यात्री के ट्वीट कर देने भर से रेल मंत्री ने किसी के लिए
दवा तो किसी के लिए दूध का प्रबंध कर दिया। किसी दुल्हे के लिए ट्रेन की
गति बढ़ा दी ताकि बारात समय से कन्यापक्ष के दरवाजे पहुंच सके। क्योंकि
रेलवे से जुड़ी शिकायतों के मामले में मेरा अनुभव कुछ अलग ही रहा। छात्र
जीवन में रेल यात्रा से जुड़ी कई लिखित शिकायत मैने केंद्रीय रेल मंत्री
समेत विभिन्न अधिकारियों से की। लेकिन महीनों बाद जब जवाब आया तब तक मैं
घटना को लगभग भूल ही चुका था। कई बार तो मुझे दिमाग पर जोर देकर याद
करना पड़ा कि मैने क्या शिकायत की थी। जवाबी पत्र में लिखा होता था कि
आपकी शिकायत मिली.... कृपया पूरा विवरण बताएं जिससे कार्रवाई की जा सके।
जाहिर है किसी आम इंसान के लिए इतना कुछ याद रखना संभव नहीं हो सकता था।
रोज तरह - तरह की हैरतअंगेज सूचनाओं से मुझे लगा कि शायद प्रौद्योगिकी के
करिश्मे से यह संभव हो पाया हो। बहरहाल हाल में नवरात्र के दौरान की गई
रेल यात्रा ने मेरी सारी धारणाओं को धूल में मिला दिया। सहसा उत्तर
प्रदेश स्थित अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ यात्रा का कार्यक्रम बना। 12815
पुरी - आनंदविहार नंदन कानन एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में बड़ी मुश्किल से
हमारा बर्थ कन्फर्म हो पाया। खड़गपुर के हिजली से ट्रेन के आगे बढ़ने के
कुछ देर बाद मुझे टॉयलट जाने की जरूरत महसूस हुई। भीतर जाने पर मैं हैरान
था , क्योंकि ज्यादातर टॉयलट में पानी नहीं था। मैने तत्काल ट्वीटर से
रेलवे के विभिन्न विभागों में शिकायत की। मुझे उम्मीद थी कि ट्रेन के
किसी बड़े स्टेशन पहुंचते ही डिब्बों में पानी भर दिया जाएगा। शिकायत पर
कार्रवाई की उम्मीद भी थी। लेकिन आद्रा, गया, गोमो और मुगलसराय जैसे बड़े
जंक्शनों से ट्रेन के गुजरने के बावजूद हालत सुधरने के बजाय बद से बदतर
होती गई। पानी न होने से तमाम यात्री एक के बाद एक टॉयलटों के दरवाजे खोल
रहे थे। लेकिन तुरंत मुंह बिचकाते हुए नाक बंद कर फौरन बाहर निकल रहे
थे। क्योंकि सारे बॉयो टॉयलट गंदगी से बजबजा रहे थे। वॉश बेसिनों में भी
पानी नहीं था। इस हालत में मैं इलाहाबाद में ट्रेन से उतर गया। हमारी
वापसी यात्रा आनंद विहार - पुरी नीलांचल एक्सप्रेस में थी। भारी भीड़ के
बावजूद सीट कंफर्म होने से हम राहत महसूस कर रहे थे। लेकिन पहली यात्रा
के बुरे अनुभव मन में खौफ पैदा कर रहे थे। सफर वाले दिन करीब तीन घंटे तक
पहेली बुझाने के बाद ट्रेन आई। हम निर्धारित डिब्बे में सवार हुए। लेकिन
फिर वही हाल। इधर - उधर भटकते वेटिंग लिस्ट और आरएसी वाले यात्रियों की
भीड़ के बीच टॉयलट की फिर वही हालत नजर आई। किसी में पानी रिसता नजर आया तो किसी में बिल्कुल नहीं। कई वॉश बेसिन में प्लास्टिक की बोतलें और
कनस्तर भरे पड़े थे। प्रतापगढ़ से ट्रेन के रवाना होने पर मुझे लगा कि
वाराणसी या मुगलसराय में जरूर पानी भरा जाएगा। लेकिन जितनी बार टॉयलट गया
हालत बद से बदतर होती गई। सुबह होते - होते शौचालयों में गंदगी इस कदर
बजबजा रही थी कि सिर चकरा जाए। ऐसा मैने कुछ फिल्मों में जेल के दृश्य
में देखा था। लोग मुंह में ब्रश दबाए इस डिब्बे से उस डिब्बे भटक रहे थे
ताकि किसी तरह मुंह धोया जा सके। बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चों की हालत
खराब थी। फिर शिकायत का ख्याल आया... लेकिन पुराने अनुभव के मद्देनजर ऐसा
करना मुझे बेकार की कवायद लगा। इसी हालत में ट्रेन हिजली पहुंच गई। हिजली
के प्लेटफार्म पर भारी मात्रा में पानी बहता देख मैं समझ गया कि अब साफ -
सफाई हो रही है... लेकिन क्या फायदा ... का बरसा जब कृषि सुखानी...।
ट्रेन से उतरे तमाम यात्री अपना बुरा अनुभव सुनाते महकमे कोस रहे थे। मैं
ट्वीटर से समस्या समाधान को याद करते हुए घर की ओर चल पड़ा।
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TARKESH KUMAR OJHA
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13.10.19
गृह मंत्री संविधान और अपनी शपथ का ध्यान रखें, एक वर्ग को भय-अनिश्चितता में रखना उचित नहीं
गृह मंत्री अमित शाह यह भूल जाते हैं कि अब वह केवल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष नहीं बल्कि देश के गृह मंत्री भी हैं, यही नहीं वह शायद यह भी भूल जाते हैं कि सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री के तौर पर उन्होंने क्या शपथ लिया था अन्यथा नागरिकता और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के सिलसले में वह ऐसे बयान न देते जो हमारे संविधान के शब्दों और उसकी आत्मा के खिलाफ है। गृह मंत्री जानते हैं की संविधान की धारा 14 और 15 के तहत इस देश में सभी नागरिकों को सामान अधिकार प्राप्त हैं और सरकार धर्म जाति क्षेत्र और लिंग के आधार पर किसी से किसी प्रकार का भेद भाव नहीं कर सकती उन्होंने सांसद और मंत्री के तौर पर जो शपथ ली है उस में भी यही कहा गया है कि वह उक्त आधारों पर देश के किसी नागरिक से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे फिर वह ऐसे बयान कैसे दे सकते हैं की सरकार नागरिकता का जो क़ानून बनाने जा रही है उस से हिन्दुओं सिखों जैनियों बौद्धों ईसाईयों आदि को डरने की ज़रूरत नहीं क्योंकि सरकार उन सबको भारत की नागरिकता दे देगी उनके इस बयान से स्पष्ट है कि केवल मुसलमानों को घुसपैठिया बता कर उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। यह तो सम्भव है की सरकार लोक सभा में अपने बहुमत और राज्य सभा में अपने मैनेजमेंट से उक्त क़ानून पास करा ले और राष्ट्रपति जिस प्रकार आँख बंद कर के सरकार के हर क़ानून को मंज़ूरी दे रहे हैं उसी प्रकार इस क़ानून को भी मंज़ूरी दे दें लेकिन गृह मंत्री को जान्ना चाहिए की उक्त क़ानून को ठीक उसी तरह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जायेगी जैसे धारा ३७० को समाप्त करने के लिए दी गयी है और संविधान की उक्त धाराओं के चलते सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून को निष्क्रय कर देगा क्योंकि संविधान इस सिलसले में बिलकुल स्पष्ट है।
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3.10.19
हे राम! कैसा हो गया गांधी का देश
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यह शहर हर साल डूबता है पर यहाँ के नेताओं और अफसरों का शर्म नहीं डूबता
दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर जहाँ बाढ़ नदी से नहीं, नाले के पानी से आता है... 30 वर्षों से इस शहर पर एक ही दल का राज है. कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह शहर प्रत्येक वर्ष बाढ़ से नहीं नाले के पानी से हीं डूब जाता है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिहार के ऐतिहासिक राजधानी पटना की. निम्न और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार जिन्हें सरकार की ओर से न कोई सब्सिडी मिलती है और न हीं इन तक कोई बाढ़ राहत पहुँच पाती है, वो हर साल अपने घर के बहुत मेहनत से ख़रीदे लाखों के सामान को अपनी आँखों के सामने डूबते और बर्बाद होते देखते हैं.
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इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा : चमनलाल
नागपुर. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर चमनलाल ने वर्तमान परिस्थितियों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश की जा रही है. जो असल देशभक्त हैं उन्हें दरकिनार कर उन लोगों को आजादी के आंदोलन का नायक बनाने की कोशिश की जा रही है जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। इसलिए नागरिकों को बेहद सजग रहते हुए तर्कों और तथ्यों के आधार पर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश करना चाहिए.
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क्या भारतीय राजनीति ने गांधी का रास्ता खारिज कर दिया?
‘हिंद स्वराज’ के बहाने गांधी की याद... महात्मा गांधी की मूलतः गुजराती में लिखी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज्य’ हमारे समय के तमाम सवालों से जूझती है। महात्मा गांधी की यह बहुत छोटी सी पुस्तिका कई सवाल उठाती है और अपने समय के सवालों के वाजिब उत्तरों की तलाश भी करती है। सबसे महत्व की बात है कि पुस्तक की शैली। यह किताब प्रश्नोत्तर की शैली में लिखी गयी है। पाठक और संपादक के सवाल-जवाब के माध्यम से पूरी पुस्तक एक ऐसी लेखन शैली का प्रमाण जिसे कोई भी पाठक बेहद रूचि से पढ़ना चाहेगा। यह पूरा संवाद महात्मा गांधी ने लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए लिखा था। 1909 में लिखी गयी यह किताब मूलतः यांत्रिक प्रगति और सभ्यता के पश्चिमी पैमानों पर एक तरह हल्लाबोल है। गांधी इस कल्पित संवाद के माध्यम से एक ऐसी सभ्यता और विकास के ऐसे प्रतीकों की तलाश करते हैं जिनसे आज की विकास की कल्पनाएं बेमानी साबित हो जाती हैं।
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गाँधी एक व्यक्ति नही विचार हैं
पूर्व में गाँधी जयंती थी। जाहिर है खूब विचार विमर्श चला। गाँधी प्रासंगिक है या अप्रसांगिक। गाँधी किसका है और किसका नहीं है। गांधी बीजेपी का है या कांग्रेस का। एक दूसरे कि विचारधारा को गलत सावित करने के लिए और अपनी विचारधारा को सही बताने के लिए इतिहास , राजनीति, की बड़ी - बड़ी बातें की तथा अंत में एक दूसरे को या गांधी को कोसने के सिवा और कुछ नहीं शेष मिला । पर आखिर में गांधी है किसका ? तेरा या मेरा ।
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2.10.19
कौन माई का लाल है जो भागलपुर के हिंदुस्तान और भास्कर में डिप्टी मेयर को छपने से रोक सके!
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हनी ट्रैप : गिरते मूल्य, उलझता चरित्र
भौतिकवाद की आपाधापी एवं पश्चिम सभ्यता के अनुसरण ने न केवल भारतीय संस्कृति को तहस-नहस किया है बल्कि सामाजिक मूल्यों का भी हृास किया हम सिर्फ गंदगी के दलदल में धसने की अंधी दौड़ में सिर्फ दौड़े ही जा रहे है। समय का चक्र तेजी से घूम रहा है। पश्चिम के लोग भारतीय मूल्यों एवं सस्कृति को तेजी से अपना रहे है क्यांेकि, उसके न केवल अपने फायदे है बल्कि शांति प्राप्ति का भी मार्ग है । भारतीय मूल्यों में नैतिकता को सर्वोच्च माना गया है तभी तो कहा भी जाता है ''पैसा गया तो कुछ नहीं, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया लेकिन इज्जत गई तो सब कुछ गया'' यह बात बड़े दीर्घ अनुभवों के बाद बात कही गई।
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तीन साल से जेल में बंद 954 करोड़ के घोटाले के आरोपी यादव सिंह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
नोएडा अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह को उच्चतम न्यायालय से जमानत मिल गई है। मंगलवार को तीन सदस्यीय पीठ ने यादव सिंह की जमानत याचिका मंजूर कर ली। करोड़ों के घोटाले का आरोपी यादव सिंह पिछले तीन साल से जेल में बंद थे।उनपर 954.38 करोड़ रुपए के एग्रीमेंट बांड को गलत तरीके से जारी करने का आरोप है। पीठ ने यादव सिंह को जमानत देते हुए ट्रायल कोर्ट को जमानत की शर्त निर्धारित करने के लिए कहा। हालांकि, सीबीआई ने यादव सिंह की जमानत याचिका का विरोध किया।
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छिंदवाड़ा में हुआ था असहयोग आंदोलन का शंखनाद
महात्मा, बापू राष्ट्रपिता, किसी भी संबोधन से आप स्मरण करेंगे तो आपके जेहन में उस व्यक्ति की छवि उभर कर आएगी जिसे हम गांधीजी कहते हैं. ये वो व्यक्तित्व हैं जिनके बिना भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव के लिए सम्पूर्ण जीवन जीने वाले इस महान संत के चरणकमल से मध्यप्रदेश एक बार नहीं, कई कई बार स्वयं को गौरवांवित किया है. अविभाजित मध्यप्रदेश में गांधीजी की दस अविस्मरणीय यात्राएं हुई थी. सबसे पहली बार वे 1918 में इंदौर आए थे. मार्च महीने में गांधीजी की यात्रा चार दिनों की थी. तब उन्होंने भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 8वें अधिवेशन का उद्घाटन किया था और यहीं से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की मांग उठी थी. बाद में उन्होंने एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था. गांधी की दूसरी यात्रा वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य में कंडेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में हुई थी. कंडेल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित सुंदरलाल शर्मा के कार्यों से गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पंडित शर्मा को अपना गुरु बना लिया.
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25.9.19
नोटबंदी से भी ख़राब हालात हैं महाराष्ट्र में!
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आयुष्मान भारत योजना की गड़बड़ियों पर पहरा
देश में आज सरकारी अस्पतालों में जहां चिकित्सा सुविधाओं एवं दक्ष डाॅक्टरों का अभाव होता है, वहीं निजी अस्पतालों में आज के भगवान रूपी डॉक्टर एवं अस्पताल मालिक मात्र अपने पेशा के दौरान वसूली व लूटपाट ही जानते हैं। उनके लिये मरीजों की ठीक तरीके से देखभाल कर इलाज करना प्राथमिकता नहीं होती, उन पर धन वसूलने का नशा इस कदर हावी होती है कि वह उन्हें सच्चा सेवक के स्थान पर शैतान बना देता है। केन्द्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना आम व्यक्ति को बेहतर तरीके से असाध्य बीमारियों की चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिये प्रारंभ की गयी थी, लेकिन इस बहुउद्देश्यीय योजना को भी पलीता लगाने में कोई असर नहीं छोड़ी गयी है। लेकिन इस योजना में गडबड़ी एवं धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ जिस सख्ती से कार्रवाई की जा रही है, वह अनूठी एवं कारगर है, सरकार की सक्रियता एवं जागरूकता की परिचायक है।
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18.9.19
यूपी में पहचान छिपाकर रह रहे हैं दस लाख घुसपैठिए!
अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना वजह नहीं कहा है कि असम की तरह ही यूपी में भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार किया जाना चाहिएं। दरअसल,वोट बैंक की सियासत के चलते बंग्लादेशियों के लिए यूपी हमेशा सुऱिक्षत ठिकाना रहा। यह बंग्लादेशी अपने को असमिया बताकर अपनी नागरिकता छिपाते रहे तो वोट के सौदागरों ने इन्हें न केवल पाला-पोसा बल्कि इनको यहां की नागरिकता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाजवादी सरकार के समय बड़ी संख्या में बंग्लादेशियों ने यहां घुसपैठ की तो कुछ नेताओं/पार्षदों ने अपने पैड पर लिखकर देना शुरू दिया कि वह इन्हें(बंग्लादेशियों को) लम्बे समय से पहचानते हैं।
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12.9.19
'वन मैन आर्मी' जैसी योगी सरकार के ढाई साल
भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने एक नये कल्चर को जन्म दिया है। अब केन्द्र की मोदी सरकार हो या फिर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें सब की सब जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड करने को लेकर काफी उतावली रहती हैं। पूर्व में जो चलन देखने को मिलता था उसमें केन्द्र और राज्य की सरकारें साल-दर-साल अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखती थी, लेकिन जब से मोदी युग शुरू हुआ है तब से 100 दिन, छहः-छहः महीने के काम का हिसाब जनता को दिया जाने लगा है। इसी क्रम में आजकल मोदी सरकार अपने सौ दिन पूरे होने का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने पेश कर रही हैं तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 19 सितंबर से अपनी सरकार के ढाई साल के कामों का लेखा-जोखा जनता के सामने रखेगी। यह नई परम्परा है तो इसके फायदे भी अनेक हैं। इस परम्परा को सरकार की मार्केेटिंग का फंडा भी कहा जा सकता है। एक तरफ सरकार को रिपोर्ट कार्ड के बहाने अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिल जाता है दूसरे सरकार के कामकाज में पारदर्शिता भी बनी रहती है। इसका प्रभाव यह होता है कि पांच साल बाद जब चुनाव होते हैं तब जनता के सामने अपनी सरकार के कामकाम का ढिंढोरा पीटने में ज्यादा मेहनत नहीं पड़ती है। 19 सितंबर 2019 को योगी सरकार के ढाई साल पूरे हो जाएंगे।
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बेसिक शिक्षा विभाग अलीगढ़ ने किया सूचना अधिकार का उल्लंघन, आयोग में तलब
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‘जय श्री राम’ को ‘जेएसआर’ बनाने वाली मानसिकता
हिन्दुस्तान में ऐसे लोगों की लम्बी-चैड़ी फौज है जिनका समाज और देशहित से कोई लेना-देना नहीं है।इसमें कुछ कद्दावर नेताओं,टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों से लेकर कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भी शामिल है जो हर समय, हर मसले पर मौके-बेमौके अपनी राजनीति चमकाने के लिए निकल पड़ता है। चाहें कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाने की बात हो या फिर पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की, इनको सबूत चाहिए होता है। देश में या सीमा पर किसी आतंकवादी को मारा जाता है तो इन्हें मानवाधिकारों की रक्षा की चिंता होने लगती है। परंतु देश पर कोई संकट या प्राकृतिक आपदा आती है तो यह लोग देश का साथ देने की बजाए अपने एसी कमरों में कैद हो जाते हैं।
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11.9.19
इस साल संयुक्त राष्ट्र के अति महत्वपूर्ण सम्मेलन का हिस्सा बनेंगी एक्ट्रेस दीया मिर्जा
संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव और 196 मंत्रियों की उपस्थिति में करेंगी स्वागत समारोह को होस्ट
UNCCD के चौदहवें COP के लिए रिसेप्शन होस्ट करेंगी दीया मिर्जा
पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन पर लोगों के लिए एक निरंतर आवाज़ रही दीया मिर्ज़ा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता फैलाने के लिए अथक प्रयास किया है। इस वर्ष भी जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण के सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलनों में से एक का आयोजन सोमवार को राजधानी दिल्ली में होगा।
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सरदार सरोवर में जल स्तर 138.68 मीटर तक बढ़ाने का विरोध जारी रखे मप्र शासन
नर्मदा बचाओ आंदोलन और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई 8 घंचे तक घमासान चर्चा
बड़वानी| नर्मदा चुनौती सत्याीग्रह में चले मेधा पाटकर और नर्मदा घाटी के विस्थापित प्रतिनिधियों के उपवास की समाप्ति के वक्त जैसा कि तय हुआ था, आंदोलन द्वारा उठाए सभी सवालों और मुद्दों पर नर्मदा घाटी विकास विभाग से विस्तृत चर्चा 9 सितंबर 2019, सोमवार को हुई। भोपाल में तेज बारिश के कारण निर्णय लिया गया कि आंदोलनकारी नर्मदा नघाविप्रा, इंदौर पर ही पहुँचेंगें जहां भोपाल से आए मंत्री, श्री सुरेन्द्रसिंह बघेलजी, अधिकारियों एवं आंदोलन के 35 साथी – देवराम कनेरा, रणवीर तोमर, गोखरु सोलंकी, सुरभान भीलाला, सुरेश प्रधान, राहुल यादव, वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र व अन्य – मेधा पाटकरजी के साथ पूरे 8 घण्टे चर्चा निर्णय में भिड़े रहे। इस बैठक में मध्यस्थ के रुप में भूतपूर्व मुख्य सविच श्री शरदचंद्र बेहार जी के अलावा वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान शामिल थे।
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Prime Minister ensure addressal of Social-Environmental Concerns before Inauguration
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10.9.19
जैकलीन आई एम कमिंग : पीटर मेंडलिस बनकर 'मुगेऱीलाल' के साथ साकार हुए 'हसीन सपने'
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9.9.19
यूपी में बूढ़ी कांग्रेस को मिले युवा नेतृत्व तो बने बात
उत्तर प्रदेश में कांगे्रस के हौसलों को उड़ान नहीं मिल पा रही है। प्रियंका वाड्रा गांधी की तमाम कोशिशों के बाद भी कांगे्रसी लगातार मिलती हार से उबर नहीं पा रहे हैं। कांगे्रस के छोटे-बड़े नेताओं ने मायूसी की चादर ओड़ रखी है तो कार्यकर्ताओं ने भी हवा का रूख भांप कर अपने आप को ‘समेट’ लिया है। कांगे्रस के सामने समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश कांगे्रस में जान फूंकने वाले उसके तमाम दिग्गज नेता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां से वह कांगे्रस के पक्ष में बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं कर सकते हैं। इन बुर्जुग नेताओं के पास न तो अब इतनी इच्छाशक्ति बची है कि वह जनता के बीच जाकर कांगे्रस विचारधारा को प्रचार-प्रसार कर सकें, न ही इन नेताओं के पास किसी बड़े आंदोलन को लम्बे समय तक चलाने की शारीरिक ताकत है। रही सही कसर राहुल गांधी के अमेठी से वानयाड पालयन ने पूरी कर दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की रायबरेली संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव जीतने सोनिया गांधी भी राज्य में कभी नहीं दिखाई देती हैं।
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भारत में सबसे अधिक महिलाएं करती हैं आत्महत्या
प्रभुनाथ शुक्ल
आत्महत्या जिंदगी का सबसे प्राणघातक फैसला है। जीवन में कई स्थितियां ऐसी बनती हैं जब इंसान उससे लड़ नहीं पाता। जब उसे समस्या का निदान नहीं दिखता तो उसके पास एक मात्र विकल्प आत्महत्या होती है। आत्महत्या कोई भी आदमी कर सकता है। वह उच्च शिक्षाविंद्, वैज्ञानिक, अभिनेता, राजनेता, महिलाएं, युवा या फिर आम आदमी। आत्महत्या के संबंध में यह तर्क मनगढ़ंत हैं कि पढ़े-लिखे लोग आत्महत्या कम करते हैं या नहीं करते। भारत में कई उदाहारण हैं जहां सफल व्यक्ति अपनी जिंदगी से पस्त होकर ऐसा कदम उठाता है। जिसके बारे में आम आदमी यह सोच भी नहीं सकता है कि संबंधित व्यक्ति इस तरह का भी फैसला ले सकता है। देश में कई आईएएस, आईपीएस, राजनेता, फिल्मी हस्तियां आत्महत्या कर चुके हैं। दक्षिण भारत में काफी किंग के नाम से मशहूर हस्ती इसका ताजा उदाहरण हैं। जिन्होंने भारी आर्थिक नुकसान की वजह से ऐसा कदम उठाया। आत्महत्याओं को हम समय रहते रोक सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर ऐसी सोच पैदा नहीं होती है। आधुनिक जीवन शैली बेहद प्रतिस्पर्धात्मक हो चली है। व्यक्ति हर बात को अपनी सफलताओं और असफलताओं से जोड़ देता जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं होती हैं। पूरी दुनिया में हर साल 10 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। विश्व में होने वाली कुल आत्महत्याआंे का 21 फीसदी भारत में होता है। लोगों को आत्महत्या से बचाने के लिए 2003 से पूरी दुनिया में 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या निवारण दिवस मनाया जाता है। मानोचिकित्सक मानते हैं कि सामाजिक जागरुकता की वजह से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है।
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2020 का विधान सभा चुनाव पार्टियों की आईटी टीम लड़ेगी
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव के साथ अमरेंद्र पटेल की बातचीत
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव कहते हैं कि मीडिया संस्थागत बदलाव का ही नहीं, बल्कि व्यवस्थागत बदलाव का भी केंद्र रहा है। सामाजिक बदलाव का भी कारक रहा है। मीडिया की तकनीकी बदल रही है और इसका कार्य क्षेत्र और स्वरूप भी बदल गया है। पत्रकार अमरेंद्र पटेल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि 2020 का विधान सभा चुनाव पार्टियों की आइटी टीम लड़ेगी और इसकी कवायद भी शुरू हो गयी है। वीरेंद्र यादव से अमरेंद्र पटेल की हुई बातचीत प्रस्तुत है:
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7.9.19
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को फ्री मेट्रो राइड पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को उच्चतम न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाई है।उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं को दिल्ली मेट्रो में फ्री सवारी के प्रस्ताव पर कहा है कि एक तरफ लुभावने वादे और दूसरी तरफ नुकसान के दावे यह साथ-साथ नहीं चल सकते हैं।एक तरफ दिल्ली सरकार मुफ्त सवारियां कराने जा रही है और दूसरी तरफ वह उच्चतम न्यायालय से चाहती है कि केन्द्र सरकार को निर्देश दे कि 50 फीसदी ऑपरेशनल नुकसान की वे भी भरपाई करे।
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6.9.19
होइहि सोइ जो कमलनाथ रचि राखा!
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
सियासत की करवट, उधेड़बुन में उलझी मध्यप्रदेश कांग्रेस, बारिश के मौसम में भी भोपाल का बढ़ता तापमान, अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ के खिलाफ मंत्री के ऊँचें स्वर, आबकारी अधिकारी की सौदेबाजी, विधायकों को हिस्सा दिलवाना, अपनी ही सरकार के मंत्री का पुतला जलना, राजा-महाराजा का बगावत पर उतर आना, प्रदेश कांग्रेस की कमान के लिए छटपटाना, पूर्व अध्यक्ष का दुःख जाहिर करना, बंटाधार का चिट्ठी-पत्री का खेल खेलना आदि बहुत सी घटनाएँ बीते हफ्ते मध्यप्रदेश कांग्रेस के भाग्य में जुड़ तो गई किन्तु इसके पीछे मुख्यमंत्री कमलनाथ की चुप्पी भी विचारणीय और निर्णायक बनी हुई है।
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5.9.19
निलंबित TFI के भ्रष्ट तानाशाहों, व्यभिचारियों को खुला पत्र.....
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यूपी कांग्रेस : गिरता जनाधार, प्रियंका पर ऐतबार
कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा सियासत की पुरानी खिलाड़ी हैं। कभी वह अपनी माॅ सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी तक सिमटी थीं। आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश (जिसे मोदी-योगी का गढ़ माना जाता है) में कागे्रस को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी प्रियंका पर डाली गई तो मानों कांगे्रसियों को हौसले की उड़ान मिल गई। होता भी क्यों नहीं, प्रियंका को वर्षाे से कांगे्रस का छिपा हुआ ट्रम्प कार्ड माना जा रहा था। पूर्वी यूपी की प्रभारी बनते ही प्रियंका ने पूर्वांचल से भाजपा और मोदी की जड़े खोदने के लिए खूब हाथ-पैर मारे। मोदी एंड टीम को लगातार कोसा। पूर्वी उत्तर प्रदेश की करीब 50 सीटों के प्रत्याशी उनके ही द्वारा तय किए गए,लेकिन नतीजा शून्य रहा। प्रियंका का न तो जादू चला, न कोई चमत्कार हुआ। कांगे्रस का वोट प्रतिशत और सीटें जीतने दोनों के मामले में पिछड़ गई। अर्थात कांगे्रस को सबसे बुरा वक्त प्रियंका ने दिखा दिया था।
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4.9.19
बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी पर हमला
जे.पी.सिंह
अयोध्या मामले में जैसे जैसे उच्चतम न्यायालय में सुनवाई आगे बढ़ रही है और हिन्दू पक्ष विवादित स्थल के मालिकाने का अबतक कोई ठोस सबूत पांच सदस्यीय संविधान पीठ को नहीं दिखा सका है वैसे वैसे मंदिर समर्थकों में बेचैनी बढ़ती जा रही है। नतीजतन अब अदालत के बाहर मुस्लिम पक्षकारों के वकील को धमकी देने के साथ-साथ वादी पर भी हमला शुरू हो गया है।बाबरी मस्जिद मामले के वादी इकबाल अंसारी पर हमला करने और मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी देने का आरोप लगा है। साथ ही जान से मारने की धमकी दी गई है। इकबाल अंसारी ने यह हमले का आरोप अंतरराष्ट्रीय शूटर वर्तिका सिंह पर लगाया है।बाबरी मस्जिद के पक्षकार मोहम्मद इकबाल और अंतरराष्ट्रीय शूटर कहने वाली वर्तिका सिंह के बीच झड़प ने सुरक्षा में चूक उजागर कर दी।
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3.9.19
लखनऊ में पूर्व पीएम अटल जी के नाम पर बनेगा मेडिकल विश्वविद्यालय
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कैबिनेट की बैठक में छह महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी मिली है। इसमें प्रमुख रूप से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय के लिए राज्य सरकार द्वारा लखनऊ में 50 एकड़ जमीन को मंजूरी देना शामिल है। योगी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर सरकार चिकित्सा विश्वविद्यालय स्थापित करने जा रही है। इसके लिए लखनऊ के मॉल क्षेत्र में जमीन चिह्नित की गई है।
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31.8.19
चमत्कार है तो नमस्कार है ....!!
तारकेश कुमार ओझा
डयूटी के दौरान लोगों के प्रिय - अप्रिय सवालों से सामना तो अमूमन रोज ही होता है। लेकिन उस रोज आंदोलन पर बैठे हताश - निराश लोगों ने कुछ ऐसे अप्रिय सवाल उठाए , जिसे सुन कर मैं बिल्कुल निरूत्तर सा हो गया। जबकि आंदोलन व सवाल करने वाले न तो पेशेवर राजनेता थे और न उनका इस क्षेत्र का कोई अनुभव था। तकरीबन दो सौ की संख्या वाले वे बेचारे तो खुद वक्त के मारे थे। एक सरकारी संस्थान में वे प्राइवेट कर्मचारी के तौर पर कार्य करते हैं जिसे सरकारी भाषा में संविदा , कैजुयल या कांट्रैक्चुयल कर्मचारी भी कहा जाता है। आंदोलन उनका शौक नहीं बल्कि ऐसा वे इसलिए कर रहे थे, क्योंकि उन्हें पिछले नौ महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी। मेरे धरनास्थल पर पहुंचते ही उन्होंने जानना चाहा कि मैं किस चैनल से हूं। मेरे यह बताने पर कि मैं किसी चैनल से नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया से हूं। उनके मन का गुबार फूट पड़ा। नाराजगी जाहिर करते हुए वे कहने लगे कि चैनलों पर हम रोज देखते हैं कि पड़ोसी मुल्क अपने मुलाजिमों को तनख्वाह नहीं दे पा रहा। हम इसी देश के वासी हैं और हमें भी पिछले नौ महीने से वेतन नहीं मिला है... लेकिन हमारा दुख -दर्द कोई चैनल क्यों नहीं दिखाता। उनके सवालों से मैं निरुत्तर था। वाकई देश में किसी बात की जरूरत से ज्यादा चर्चा होती है तो कुछ बातों को महत्वपूर्ण होते हुए भी नजर अंदाज कर दिया जाता है। पता नहीं आखिर यह कौन तय कर रहा है कि किसे सुर्खियों में लाना है और किसे हाशिये पर रखना है। सोचने - समझने की शक्ति कुंद की जा रही है और चमत्कार को नमस्कार करने की मानवीय कमजोरी को असाध्य रोग में तब्दील किया जा रहा है। यही बीमारी जेएनयू में विवादित नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार को राष्ट्रनायक की तरह पेश करने पर मजबूर करती है। 2011 में अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन सफल रहने पर हम उन्हें गांधी से बड़ा नेता साबित करने लगते हैं। लेकिन कालांतर में यह सोचने की जहमत भी नहीं उठाते कि वही अन्ना आज कहां और किस हाल में हैं और उनके बाद के आंदोलन विफल क्यों हुए। नामी अभिनेता या अभिनेत्री का एक देशभक्तिपूर्ण ट्वीट उसे महान बना सकता है, लेकिन अपने दायरे में ही पूरी ईमानदारी से कर्तव्यों का पालन करते हुए जान की बाजी लगाने वालों के बलिदान कहां चर्चा में आ पाते है। अक्सर सुनते हैं मेहनतकश मजदूर , रेलवे ट्रैक की निगरानी करने वाले गैंगमैन या प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड डयूटी के दौरान जान गंवा बैठते हैं। वे भी देश का ही कार्य करते हुए ही मौत के मुंह में चले जाते हैं, लेकिन उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता या ध्यान देने की जरूरत भी नहीं समझी जाती। लोकल ट्रेनों से निकल कर मायानगरी मुंबई के शानदार स्टूडियो में गाने वाली रानू मंडल के जीवन में आए आश्चर्यजनक बदलाव से हमारी आंखें चौंधिया जाती है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि 90 के दशक के सवार्धिक सफल पाश्र्व गायक मोहम्मद अजीज करीब दो दशकों तक गुमनामी के अंधेरे में खोए रहे। उनकी चर्चा तभी हुई जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। किसी कथित टैलेंट शो में गाकर प्रसिद्ध हुए गायक हमें अपनी और आकर्षित करते हैं लेकिन उन गुमनाम गायकों की कभी भूल से भी चर्चा नहीं होती जो अपने जमाने के नामी गायकों की संताने हैं । पिता की तरह उन्होंने भी गायन के क्षेत्र में करियर बनाना चाहा, लेकिन सफल नहीं हो सके। हमें कौन बनेगा करोड़पति में चंद सवालों के जवाब देकर करोड़पति बनने वालों पर रीझना सिखाया जा रहा है , लेकिन लाखों लगा कर डिग्रियां हासिल करने के बावजूद चंद हजार की नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसने वाले देश के लाखों नौजवानों की चिंता हमारे चिंतन के केंद्र में नहीं है। क्योंकि इससे बाजार को भला क्या हासिल हो जाएगा। बल्कि ऐसी भयानक सच्चाईयां हताशा और अवसाद को जन्म देती है। लेकिन चमत्कार को नमस्कार करने की यह प्रवृति एक दिन कहां जाकर रुकेगी , सोच कर भी डर लगता है।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*
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TARKESH KUMAR OJHA
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चिन्मयानंद मामला : सुप्रीम कोर्ट में पेश छात्रा नहीं लौटना चाहती यूपी, 4 दिन दिल्ली में रहेगी
उच्चतम न्यायालय ने स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ अपने यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद लापता हुई एलएलएम की छात्रा को 4 दिनों के लिए अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में रहने की व्यवस्था करने का निर्देश रजिस्ट्री को दिया है। भाजपा के पूर्व सांसद एवं पूर्व गृहमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर शोषण के आरोप लगाने वाली पीड़ित लड़की को यूपी पुलिस उच्चतम न्यायालय लेकर पहुंची जहां जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस ए.एस.बोपन्ना ने उससे बात की।
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बैंकों का विलय कर अर्थव्यवस्था को फिर अस्थिर कर रही है मोदी सरकार!
आने वाले 5 साल में देश को पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए नेक्स्ट जेनरेशन बैंकों का होना जरूरी है। ऐसा दावा करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को सरकारी बैंकों के मेगा कंसॉलिडेशन प्लान की घोषणा की। अब देश में सरकारी बैंकों की संख्या मौजूदा 27 से घटकर 12 रह जाएगी। 6 छोटे सरकारी बैंकों का भारतीय स्टेट बैंक में तथा विजया बैंक, देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में पहले ही विलय हो चुका है। इस तरह, एसबीआई तथा बैंक ऑफ बड़ौदा विलय के बाद 10 सरकारी बैंकों में पहले ही शीर्ष दो बड़े बैंकों में तब्दील हो चुके हैं।
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मोदी राज में भारत से सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिना
आर्थिक विकास दर में गिरावट के बाद भारत से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिन गया है। अर्थव्यवस्था की हालत और बदतर हुई, जून तिमाही में जीडीपी विकास दर घटकर 5 फीसद रह गयी है। यह साढ़े छह वर्षों का निचला स्तर है। साल 2013 के बाद जीडीपी ग्रोथ का यह सबसे बुरा दौर है।यह तब है जब जीडीपी की गणना 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद बदली प्रणाली से की गयी है जबकि यूपीए सरकार के मानदंडों से यदि गणना की जयकछुआ चाल से इसका समाधान सम्भव नहीं है बल्कि इसके लिए तीव्र गति से प्रयास करना पड़ेगा। तो यह मात्र 2 से 2. 5 फीसद के बीच ही बैठेगी।जीडीपी के वर्तमान हालात आर्थिक आपातकाल सरीखे हो गए है। कछुआ चाल से इसका समाधान सम्भव नहीं है बल्कि इसके लिए तीव्र गति से प्रयास करना पड़ेगा। सरकार को समझना होगा कि अब शेखी बघारने से काम नहीं चलेगा क्योंकि जीडीपी का गिरकर 5 फीसदी पर पहुंचना, उसके अब तक के दावों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।
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अडानी का नाम आते ही कहां चला जाता है मोदी का राष्ट्रवाद?
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25.8.19
कृष्ण के दृष्टिकोण आज के सामाजिक सन्दर्भ में
हिन्दू धर्म में हम कृष्ण को गुरु मानते हैं। मेरे अनुसार कृष्ण केवल गुरु ही नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो अन्धकार से प्रकाश में ले जाते हैं। कृष्ण ने तो अन्धकार को नजरअंदाज करते हुए भूत-वर्तमान और भविष्य के प्रकाश को स्थापित करने का कार्य किया है। कृष्ण ने इंद्र को छोड़कर प्रकृति पूजन को बताया। यह भी किसी सूर्य के प्रकाश से कहाँ कम है? लेकिन आज के समय के अनुसार गोवर्धन तक ही पूजन समाप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि अंधाधुंध प्रकृति दोहन के कल्चर में जब हम कॉलोनी के बागों की स्थापना कर उनका पोषण करते हैं तो भी कृष्ण की याद आती है, जब हम हमारे मोबाइल पर स्क्रीन गार्ड्स और कवर लगाते हैं तब भी वही याद आते हैं कि, "जो चीज़ तुम्हारे लिए फायदेमंद है उसकी सुरक्षा करो उस पर पूरी श्रद्धा रखो। अपनी पॉजिटिव एनर्जी उसे दो।"
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22.8.19
चार मंत्रियों को बाहर करने के बाद योगी ने बाकी नए-पुराने मंत्रियों को पढ़ाया नैतिकता का पाठ
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21.8.19
योगी सरकार की यदुवंशियों को लुभाने की तैयारी, धूमधाम से मनाई जा रही है श्री कृष्ण जन्माष्टमी
लखनऊ। धर्म और राजनीति दो अलग-अगल विषय हैं। संविधान निर्माताओं ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था ताकि किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हो। सब जानते हैं कि भारत विभिन्न धर्मो, भाषाओं-जातियों वाला देश है। अनेकता में एकता भारत की शक्ति है। ऐसे में किसी एक या सभी धर्मो को साथ लेकर राजनीति करना मुश्किल ही नहीं असंभव थी। मगर कड़वी सच्चाई यह भी है कि भले ही हमारे संविधान निर्माताओं ने दूर की सोच रखते हुए देश का तानाबान धर्मरिनपेक्ष के रूप में तैयार किया था,लेकिन सियासतदारों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए समय-समय पर धर्म और राजनीति में घालमेल करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा।
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पीलीभीत में पत्रकार सुधीर पर जानलेवा हमले से पत्रकार यूनियन नाराज
लखनऊ। उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बैठक सोमवार को गोमतीनगर स्थित प्रांतीय कार्यालय में संपन्न हुई, जिसमें पत्रकार उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई और सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई।
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बेपटरी होती यूपी की कानून व्यवस्था
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19.8.19
जब जज बनकर फैसले करने लगे कलम के जिगोलो
अमितेश अग्निहोत्री
दैनिक जागरण ने पहलू खान की मॉब लिंचिंग में गिरफ्तार सभी अभियुक्तों के बरी होने की खबर तस्कर पहलू खान हत्याकांड के सभी आरोपित बरी शीर्षक के साथ लगाई है।अगर आप के अंदर संविधान,कानून और पत्रकारिता के मूल्यों की रत्ती भर समझ है तो अपना सर पीट लीजिये। दैनिक जागरण कथित रूप से हिंदी पट्टी का नम्बर 1 अखबार है। यह स्थान इन्हें ऐसे ही नही मिला है। पत्रकारिता को ताक पर रखकर पत्तेचाटी करने के लम्बे और सतत कालखण्ड के बाद आज यह शीर्ष पर पहुचे है।
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वीआईपी कल्चर पर बार-बार मोदी-योगी का ‘हथौड़ा’
नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान वीआईपी कल्चर पर ‘हथौड़ा’ चलाते हुए वर्ष 2017 में मंत्रियों और अफसरों की गाड़ी पर लाल-नीली बत्ती(जो स्टे्टस सिम्बल हुआ करता था) लगाए जाने पर रोक लगाई थी तो इसकी चैतरफा प्रशंसा के साथ-साथ इस पर खूब सियासत भी हुई थी। गैर भाजपाई राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के फैसले को अपने राज्यों में लागू करने से मना कर दिया था। उस समय उत्तर प्रदेश में नई-नई योगी सरकार बनी थी। अन्य राज्यों से इत्तर योगी सरकार ने सबसे पहले लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म करने के लिए इसे प्रदेश में लागू कर दिया। गौरतलब हो, मोदी सरकार ने पहली मई 2017 से लाल बत्ती हटाने के लिए मोटर व्हीकल एक्ट से वो नियम ही हटा दिया था, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें वीआईपी लोगों को लाल बत्ती लगाने की इजाजत देती थीं। लाल बत्ती हटाने के आदेश के साथ ही 28 साल पुरानी परंपरा खत्म हो गई थी। वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सख्त फैसले लेने के लिए जाने जाती है। पहले उसने मोदी सरकार की पहल पर मंत्रियों और अधिकारियों की गाड़ी पर लगने वाली लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म किया तो उसके बाद मंत्रियों और नेताओं से सम्पति का ब्योरा मांग लिया। इसी प्रकार प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए बदमाशों के एनकांउटर का रास्ता भी चुना।
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आखिर आजादी के सही मायने क्या हैं.....
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370 व 35 ए हटाना कितना सही, कितना गलत और कितना सफल
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15.8.19
करणी दान सिंह राजपूत बीकानेर संभााग के 'राजस्थान सेवा गौरव पत्रकारिता' पुरस्कार से सम्मानित
बीकानेर के रवीन्द्र मंच पर आयोजित समारोह में यह सम्मान करणीदानसिंह राजपूत की माता हीरा और पिता रतनसिंह की सीख एवं पत्रकारिता के इतिहास का वर्णन करने के बाद प्रोफेसर चतुर्वेदी स्मृति संस्थान जयपुर की ओर से रविवार 4 अगस्त 2019 को प्रदान किया गया। समारोह में स्वामी श्री समवित सोम गिरी जी महाराज (महंत श्री लालेश्वर महादेव मंदिर बीकानेर) श्री गुलाबचंद कटारिया (नेता प्रतिपक्ष राजस्थान विधानसभा व पूर्व गृह मंत्री राजस्थान सरकार) श्री अरुण चतुर्वेदी (पूर्व कैबिनेट मंत्री राजस्थान सरकार) के द्वारा प्रदान किया गया। श्री राजपूत को शाल और पीताम्बर व साफा ओढा कर मढे हुए सुनहरे सम्मान प्रशस्ति पत्र को प्रदान कर सम्मानित किया गया।
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हिंदुओं के साथ ही आजादी के बाद मुसलमानों ने भी गांधी को नहीं समझा : प्रियंदव
बनारस : बीएचयू में एनी बेसेंट हाल में कला संकाय एवं प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद की याद में हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार एवं इतिहासविद प्रियंवद का एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। अपने व्याख्यान में इतिहास और दर्शन के सम्बंधों पर चर्चा करते हुए प्रियंवद ने कहा कि यह इतिहास पर निर्भर करता है कि वह किसे कितना स्थान देता है. उन्होंने इतिहास पर अपनी बात रखते हुए कि वह बौद्धिकता के रसायन से बना हुआ सबसे खतरनाक उत्पाद है जो राष्ट्रों को अहंकारी और निरर्थक बनाता है। इसके उदाहरण भारत विभाजन की घटना में देखे जा सकते हैं।
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आजादी के विरोधी और अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार देशभक्त नहीं गद्दार हैं
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चौपाल के मोहनकृष्ण बोहरा पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण
जोधपुर। पढ़ो तो पूरा पढ़ो, तल तक जाओ। आगे बढ़ो तो उत्स तक जाओ।' हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक प्रो. मोहनकृष्ण बोहरा ने उकत विचार अपने अस्सीवें जन्मदिन पर चौपाल द्वारा आयोजित समारोह में व्यक्त किये। जोधपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के सभागार में आत्मीय जन को सम्बोधित करते हुए प्रो बोहरा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत एक पंजाबी कथन से की: तुस्सी साड्डा जुलूस करना चांदे हो, यानि आप लोग मेरा जुलूस निकालना चाहते हो।
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अब कैसे कृष्ण, कैसे राम निकलेगा (ग़ज़ल)
एक न एक दिन तेरा घर भी जलेगा
नज़र बंद हो अपनी बोई नफरतों में
फिर रहीम और कबीर कहाँ मिलेगा
चाँद को चुराके रात को दोष देते हो
इंतज़ार करो , आसमाँ भी पिघलेगा
जाति,धरम,नाम सबसे तो खेल लिया
अब कैसे कृष्ण , कैसे राम निकलेगा
पानी,हवा,मिटटी सब तो बँट गए हैं
किस आँगन में अब गुलाब खिलेगा
सब को बदल दिया खुद को छोड़के
सच को झूठ से और कितना बदलोगे
सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन, नई दिल्ली
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14.8.19
जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं ....!!
तारकेश कुमार ओझा
जीवन के खेल वाकई निराले होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि ना - ना करते आप वहां पहुंच जाते हैं जहां जाने को आपका जी नहीं चाहता जबकि अनायास की गई ऐसी यात्राएं न सिर्फ सार्थक सिद्ध होती हैं बल्कि यादगार भी। जीवन की अनगिनत घटनाओं में ऐसी दो यात्राएं अक्सर मेरे जेहन में उमड़ती - घुमड़ती रहती है। पहली घटना मेरे किशोरावस्था की है। पत्रकारिता का ककहरा सीखते हुए उस दौर में रविवार, धर्मयुग , दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी तमाम लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बंद हो चुकी थी। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के इस काल - खंड में साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर कुछ नए अखबारों का प्रकाशन शुरू हुआ। कम कीमत वाले इन पत्रों के साथ चार रंगीन पृष्ठों का सप्लीमेंट और एक छोटी सी पत्रिका भी रहती थी। लिहाजा देखते ही देखते ऐसे साप्ताहिक पत्रों ने अच्छा - खासा पाठक वर्ग तैयार कर लिया। देश के चार महानगरों से हिंदी व अंग्रेजी में निकलने वाले एक साप्ताहिक पत्र का एक पन्ना आंचलिक खबरों के लिए था। शुरूआती दौर में मुझे ऐसे किसी मंच की बेताबी से जरूरत थी, लिहाजा बगैर किसी औपचारिक बातचीत के मैने उस समाचार पत्र के क्षेत्रीय कार्यालय को डाक से खबरें भेजना शुरू कर दिया। अमूमन हर हफ्ते प्रकाशित होने वाली बाइ लाइन खबरों ने मुझे क्षेत्र का चर्चित पत्रकार बना दिया था। हालांकि मेरी प्राथमिकता पहचान के साथ पारिश्रमिक भी थी। क्योंकि यह मेरे करियर के शुरूआती दौर के लिए प्राण वायु साबित हो सकती थी। बेरोजगारी का कलंक मेरे सिर से मिट सकता था। लेकिन उस दौर के दो ऐसे समाचार पत्रों ने लिखित घोषणा के बावजूद एक चवन्नी भी कभी पारिश्रमिक के तौर पर नहीं दी तो मैं निराशा के गर्त में डूबने लगा। क्योंकि अंतहीन प्रतीक्षा के बाद भी कभी कोई मनीआर्डर तो आया नहीं, उलटे ज्यादा तगादा करने पर खबरें छपना भी बंद हो जाती थी। इस बीच शहर में एक वित्तीय कंपनी का कार्यालय खुला। इसके कई कर्मचारी मेरे परिचित थे। तब फोन आदि नहीं बल्कि सीधे घर पहुंचने का जमाना था। लिहाजा इसके कुछ कर्मचारी कई बार मेरे घर यह कहते हुए आ पहुंचे कि आपको महाप्रबंधक बुला रहे हैं। मैं असहज हो गया। क्योंकि मैं जानता था कि अखबारों में समाचार छपवाने के लिए मुझे बुलाया जा रहा है, जबकि तात्कालीन परिस्थितियों में यह मुश्किल था। लिहाजा मैने कन्नी काटने की भरसक कोशिश की। लेकिन काफी अनुनय - विनय के बाद मुझे उनके दफ्तर जाना ही पड़ा। महाप्रबंधक काफी भद्र आदमी था। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि उनकी कंपनी का विज्ञापन किसी समाचार पत्र में छपवा दूं। इसके लिए कोलकाता जाना पड़े तो चले जाएं, कंपनी के आदमी साथ होंगे। आपको केवल साथ जाना पड़ेगा। मन से राजी न होते हुए भी आखिरकार मुझे कोलकाता निकलना पड़ा। कंपनी के दो मुलाजिम मेरे साथ थे, जिनमें से एक मेरा सहपाठी रह चुका था। ट्रेन से कोलकाता का रुख करते हुए भी कई बार लगा कि ऐसा कुछ हो जाए, जिससे मैं इस अनचाही यात्रा से बच सकूं। रेल अवरोध या तकनीकी समस्या। लेकिन मेरी एक न चली। उधेड़बुन के बीच हम हावड़ा स्टेशन पर थे। पूछते - पाछते बस से उसी साप्ताहिक समाचार पत्र के दफ्तर जा पहुंचे। जहां भविष्य की तलाश में पहले भी दो - एक बार जाना हुआ था। मुझे याद है कोलकाता के एजेसी बोस रोड पर उस अखबार का दफ्तर था। आफिस के कर्मचारी अचानक मुझे अपने बीच पाकर हैरान थे। मैने अनमने भाव से मकसद बताया। कुछ देर में ही 3450 रुपये का विज्ञापन फाइनल हो गया। रसीद बनाते समय कुछ कर्मचारियों ने जब मुझसे कमीशन लेने को कहा तो मैं पशोपोश में पड़ गया। क्योंकि साथ गए लोगों के सामने मेरी इमेज खराब हो सकती थी। दूसरी तरफ दफ्तर के लोगों का कहना था कि एजेंसियों को हम 15 फीसद देते हैं। आप हमारे सहयोगी हैं। इसलिए हम आपको केवल 10 फीसद कमीशन दे सकते हैं। इस लिहाज से यह 345 रुपये बन रहा था। लड़कपन के उस दौर में यह मेरे लिए 3 लाख से कम न था। , या कहें इससे भी ज्यादा । ये रुपये मुझे बगैर मांगे या उम्मीद के मिल रहे थे। मैं जिस क्षेत ्र में हाथ पांव मार रहा था, उसमें कमाई भी हो सकती है यह तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उधेड़बुन के बीच साथ गए लोगों ने यह कहते हुए मुझे धर्मसंकट से उबारा कि अखबार से अगर आपको कुछ मिल रहा है तो इसमें भला हमें क्या ऐतराज हो सकता है। कमीशन के पैसे बैग में रख कर दफ्तर से बाहर निकला तो मैं जिंदगी की पहेली पर हैरान था। क्योंकि लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जहां से मुझे कभी अठन्नी भी नहीं मिली, वहीं से बगैर मांगे इतने पैसे मिल गए कि दशहरा - दिवाली मन जाए।
अनचाही और आकस्मिक यात्रा की एक और मजेदार घटना युवावस्था में हुई। जब मैं अप्रत्याशित रूप से पत्रकारिता से रोजी - रोटी कमाने में सक्षम हो चुका था। तब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बिल्कुल नई बनी थी। इसकी नेत्री ममता बनर्जी राजनैतिक तनातनी के लिए तब खासे चर्चित चमकाईतला आने वाली थी। जो मेरे ही जिले की सीमा क्षेत्र में है। एक रोज सुबह अखबार का काम निपटाने के बाद स्टेशन से बाहर निकला तो चमचमाती टाटा सुमो खड़ी नजर आई। तब इस गाड़ी में चढ़ना बड़े फक्र की बात मानी जाती थी। पता लगा कुछ परिचित नेता वहां जा रहे हैं। कुछ देर बाद सभी सुमो के नजदीक खड़े मिले । मुझे देखते ही बोल पड़े, आपको लिए बगैर नहीं जाएंगे। मेरे लिए यह काफी आकर्षक प्रस्ताव था, क्योंकि चमकाईतला जाने के लिए हमें केशपुर होकर जाना था, जो उन दिनों राजनैतिक हिंसा के लिए अंतर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। लेकिन दुविधा यह कि मेरी प्राथमिकता शहर की खबरें होती थी। मुझे लगा कि मैं बाहर रहा और शहर में कोई बड़ी घटना हो गई तो... इसके साथ तब दोपहर के भोजन के बाद मुझे हल्की झपकी लेने की भी बुरी आदत थी। लिहाजा मैं वहां जाने से आना - कानी करने लगा। लेकिन नेताओं ने एक झटके से सुमो की अगली सीट का दरवाजा खोला और आग्रहपूर्वक मुझे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठा दिया। इस तरह जीवन की एक और आकस्मिक यात्रा यादगार बन गई। हम हंस पड़े जब सुमो का चालक लगभग रूआंसा हो गया जब उसे पता चला कि गाड़ी केशपुर होकर गुजरेगी। लगभग रोते हुए ड्राइवर बोल पड़ा... बाल - बच्चेदार हूं सर... और वाहन में बैठे सब लोग हंसने लगे।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*
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TARKESH KUMAR OJHA
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13.8.19
हमे ऐसा हिंदुस्तान बनाना है...ईद-उल-अज़हा की मुबारकबाद
जय-हिंद
लिंक---
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=396796227856291&id=100025777510340
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drhuda
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10.8.19
संगठन पर्व सदस्यता अभियान-2019
#संगठन_पर्व_2019
#साथ_आएं_देश_बनायें
जय हिंद-जय भारत
जय राष्ट्रवाद
मोबाइल no- 9837357723
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drhuda
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6.8.19
galgotia के पाप का घड़ा फूटा, धोखाधड़ी में ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया गिरफ्तार
कई वर्षों से और कई तरह के फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी और बेईमानी करने करने वाले ‘गलगोटियाज’ के पाप का घड़ा भर गया दिखता है. खबर है कि तगड़ा विज्ञापन देकर मीडिया का मुंह बंद रखने वाले गलगोटिया पर 122 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में कार्रवाई हुई और galgotia university के निदेशक ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया को गिरफ्तार कर लिया गया. गलगोटिया यूनिवर्सिटी के चेयरमैन का पुत्र है ध्रुव गलगोटिया और पत्नी हैं पद्यमिनी गलगोटिया. गिरफ्तारी की कार्रवाई आगरा पुलिस ने की. आगरा के थाना हरीपर्वत की पुलिस ने गलगोटिया विश्वविद्यालय के दोनों निदेशकों मां-बेटे पद्मिनी और ध्रुव को गुड़गांव से गिरफ्तार किया. शंकुतला एजूकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया की पत्नी हैं पद्मिनी. उनके खिलाफ आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया था.
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मायावती की सियासत में मोदी-योगी विरोध के साथ राष्ट्रवाद का भी चटख रंग
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमों मायावती ने काफी सोच-समझकर धारा 370 के खिलाफ मतदान किया है। ऐसा करते समय उन्होंने यह भी नहीं सोचा की उनके इस फैसले से उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है। संभवता माया को मुस्लिम वोटों से अधिक दलित वोट बैंक की चिंता तो रही ही होगी,इसके अलावा वह यह भी नहीं चाहती होंगी कि कोई उनके ऊपर कोई अम्बेडकर विरोधी होने का ठप्पा लगाए। क्योंकि मायावती की पूरी सियासत संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर के इर्दगिर्द ही चलती रही है। अम्बेडकर के नाम को जितना मायावती ने भुनाया उतना शायद ही किसी ने भुनाया होगा।
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5.8.19
2.8.19
तारकेश्वर : गरीबों का अमरनाथ ....!!
तारकेश कुमार ओझा
पांच, दस, पंद्रह या इससे भी ज्यादा ...। हर साल श्रावण मास की शुरूआत के साथ ही मेरे जेहन में यह सवाल सहजता से कौंधने लगता है। संख्या का सवाल श्रावण में कंधे पर कांवड़ लेकर अब तक की गई मेरी तारकेश्वर की पैदल यात्रा को लेकर होती है। आज भी शिव भक्तों को कांवड़ लेकर तारकेश्वर की ओर जाता देख रोमांच से भर कर मैं उन्हें हसरत भरी नजरों से देर तक उसी तरह देखता रहता हूं मानो गुजरे जमाने का कोई फुटबॉल खिलाड़ी नए लड़कों को फुटबॉल खेलता देख रहा हो। पहले श्रावण शुरू होते ही मेरे पांव सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर धाम की ओर जाने को बेचैन हो उठते थे। सोच रखा था जब तक शरीर साथ देगी हर श्रावण में कंधे पर कांवड़ लटका कर सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर तक की पैदल यात्रा अवश्य करुंगा। हालांकि कई कारणों से मेरी यह कांवड़ यात्रा पिछले कई सालों से बंद है। लेकिन इस यात्रा के प्रति मेरा लगाव अब भी जस का तस कायम है। हालांकि यह सच है कि पिछले दो दशकों की अवधि में कांवड़ यात्रा में बड़ा परिवर्तन आया है। क्योंकि पहले यह यात्रा नितांत व्यक्तिगत आस्था का विषय थी। तब कांवड़ यात्रा को न तो इतना प्रचार मिलता था और न ये राजनीतिकों की रडार पर रहती थी। भोले की भक्ति मुझे संस्कार में मिली , लेकिन तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा के प्रति मेरी दो कारणों से आसक्ति हुई। पहला कांवड़ लेकर पैदल चलते समय शिव से सीधे साक्षात्कार से हासिल आध्यात्मिक अनुभव से मिलने वाली असीम शांति और दूसरा सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर तक पग - पग पर नजर आने वाला स्वयंसेवी संस्थाओं का अनन्य सेवा भाव। जिसे प्रत्यक्ष देखे बिना महसूस करना मुश्किल है। पता नहीं स्वयंसेवकों में यह कैसी श्रद्धा जाग उठती है जो महंगी से महंगी चीजें कांवड़ियों को खिलाने के लिए उन्हें बेचैन किए रहती है। बगैर मौसम की मार या दिन - रात की चिंता किए। कांवड़िए के कीचड़ से सने पांवों को भी सहलाने और जख्मों पर मरहम लगाने से भी उन्हें गुरेज नहीं। वाकई बाबा भोले की गजब महिमा है। कहते हैं जब तक बाबा बुलाए नहीं कोई उनके दरबार में नहीं पहुंच सकता। आप बनाते रहिए योजना पर योजना। लेकिन बदा नहीं होगा तो सारी प्लानिंग धरी की धरी रह जाएगी। वहीं कोई ऐसा बंदा भी कांवड़ लेकर बाबा के दरबार पहुंच जाता है, जिसने कभी इस बारे में सोचा तक नहीं था। अपनी कांवड़ यात्रा के दौरान मैने ऐसे कई लोगों को पैदल चलते देखा जिनकी भाव भंगिमा और देह भाषा बताती है कि वे बगैर एयरकंडीशंड के शायद नहीं रह पाते होंगे, नंगे पांव जमीन पर चलना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन भक्ति के वशीभूत वे भी कांवड़ लिए चले जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 58 किलोमीटर की दूरी पर बसा तारकेश्वर हुगली जिले का प्रमुख शहर है। इस शहर का नाम भी तारकेश्वर मंदिर के ऊपर ही पड़ा। इस मंदिर के निर्माण और आस्था का रोचक इतिहास है। पूर्व रेलवे के हावड़ा - सेवड़ाफुल्ली - तारकेश्वर रेल खंड का यह आखिरी स्टेशन है। वाकई तारकेश्वर धाम की कांवड़ यात्रा को यदि गरीबों का अमरनाथ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि आस्थावान ऐसे लोगों का बड़ा समूह जिनके लिए तीर्थ , रोमांच या भ्रमण आदि पर खर्च करना संभव नहीं है श्रावण में तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा वे भी हंसते - हंसते कर जाते हैं। दीघा या अन्य किसी स्थान का बस का किराया भी जितनी रकम से संभव न हो उससे भी कम पैसे में तारकेश्वर की यात्रा मुमकिन थी। यह सब स्वयंसेवी संस्थाओं की उदारता से संभव हो पाता है। कांवड़ यात्रा के दौर में मैने खुद अनुभव किया और दूसरे श्रद्धालुओं से भी पता लगा कि दूसरे तीर्थ या भ्रमण स्थल के विपरीत तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा में पैसे कभी बाधक नहीं बनते। क्योंकि रास्ते में खान - पान से लेकर दवा तक का निश्शुल्क इंतजाम बहुतायत में रहता है। सेवड़ाफुल्सी से जल लेकर चलने पर पहला पड़ाव डकैत काली होती है, जो पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब तो डकैत काली से पहले ही कई स्वयंसेवी संस्थाओं के शिविर नजर आने लगे हैं। इसके बाद तो थोड़ी - थोड़ी दूर पर सड़क के दोनों ओर शिविर ही शिविर दिखाई देते हैं, जो कांवड़ियों की सेवा को हमेशा तत्पर नजर आते हैं। सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर के बींचोबीच काशी विश्वनाथ नाम का बड़ा बड़ा शिविर हैं, जहां पहुंच कर कांवड़ियों को खुद के वीआइपी होने का भ्रम होता है। गर्म पानी के टब में थके पांवों को डुबों कर राहत पाने का सुख निराला होता है। इसके बाद भी कई शिविरों से होते हुए कांवड़िए जब लोकनाथ पहुंचते हैं तो उन्हें अहसास हो जाता है कि वे बाबा के मंदिर पहुंच चुके हैं। यहां जल चढ़ाने के बाद कांवड़िये बाबा के मंदिर की ओर रवाना होते हैं। कहते हैं बाबा इस चार किलोमीटर की दूरी पर भक्त की की कड़ी परीक्षा लेते हैं, क्योंकि नजदीक पहुंच कर भी भक्तों को लगता है उनसे अब नहीं चला जाएगा। लेकिन रोते - कराहते भक्त बाबा के दरबार में पहुंच ही जाते हैं। दो दशक पहले तक की गई अपनी कांवड़ यात्राओं में मैने अनेक ऐसे श्रद्धालुओं को देखा जिनके लिए किसी तीर्थ पर सौ रुपये खर्च कर पाना भी संभव नहीं , लेकिन उनकी यात्रा भी हर साल बेखटके पूरी होती रही। वाकई तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा को गरीबों का अमरनाथ कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*
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TARKESH KUMAR OJHA
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30.7.19
ये 17 बागी विधायक न मंत्री बन पाएंगे न उपचुनाव लड़ पाएंगे!
कर्नाटक की बीएस येदियुरप्पा सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया है और इसके बाद स्पीकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कर्नाटक में अब सत्ता पूरी तरह से भाजपा के हाथ में आ गई है और राजनितिक ड्रामें के एक अंक का पटाक्षेप हो गया है।लेकिन कर्नाटक के नाटक में सबसे बड़े लूजर फिलवक्त वे 17 बागी विधायक हैं, जो विधानसभा स्पीकर द्वारा ने केवल अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं बल्कि विधानसभा के कार्यकाल तक के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिए गए हैं। अब उनका येदियुरप्पा कैबिनेट में मंत्री बनने का सपना उच्चतम न्यायालय के पाले में चला गया है।स्पीकर के फैसले पर उच्चतम न्यायालय कोई राहत अयोग्य विधायकों को देता है या नहीं ,इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।
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