बिच्छू डॉट कॉम की समीक्षा से पत्रिका मैनेजमेंट इतना आहत होगा, इसका अंदाजा हमें नहीं था। हमने तो सुना था की राजस्थान की माटी में बहुत सहनशीलता है और ग्राहता का भाव भी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह तब लगा, जब पत्रिका के कर्मचारियों ने बिच्छू सर्च किया, तो स्क्रीन पर पत्रिका प्रकट हुई। जब पत्रिका भू-पल्लवित हुई, तब बिच्छू डॉट कॉम ने पत्रिका के प्रयोगों का स्वागत किया, खबरों की तारीफ की। कालांतर में पत्रिका के नवजात, प्रौढ़ और थके-थकाए सम्पादकीय साथियों ने जब खबरों में तथ्यात्मक गलतियाँ की या पुरानी खबरों को री-ड्राफ्ट किया या छपी-छपाई खबरों को ज्यों का त्यों परोसा, तो उनकी खिंचाई भी हमने की। इससे खूटी पर टंगे लोग, सूली पर टंगे लोग, कोहनी पर टंगे लोग, बरगद की बात करते हैं गमले में उगे लोग, यानि बोनसाई पत्रकारों को इससे बुरा लगा और उन्होंने पत्रिका के कंप्यूटर पर बिच्छू बंद करवा दिया। धन्यवाद् गुलाब कोठारी साहब !
कोठारी जी, तीन माह पूर्व जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परिवार ने राजस्थान में आपके अख़बार का बहिष्कार किया था, तब अपने राजस्थान पत्रिका के प्रथम पेज पर विशेष सम्पादकीय में लिखा था, कि बूढे़ मुर्गे अख़बार पढ़ना बंद कर देंगे, तो इससे कोई फर्क नही पड़ेगा। लेकिन युवा चूजों को संघ परिवार कब तक अख़बार पढ़ने से रोकेगा? वे संघ परिवार के बूढे मुर्गों के सामने नहीं, छुप-छुपकर पत्रिका पढेंगे।
इसी तर्ज पर मैं आपसे कहना चाहता हूँ, कि आपके यहाँ के नाकाबिल, थकी-थकाई मानसिकता वाले पत्रकार अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकते, लेकिन जो नई पीढी है, जो पत्रकारिता में अपने लाभ-शुभ के लिए नहीं आई है, उसे बिच्छू देखने से कैसे रोकेंगे ?
वैसे भी अच्छे टाँगे वाले अपने घोड़ों को झांप बाँध कर दौड़ते है। लेकिन पत्रकारिता तांगे की रेस नहीं, विचार-आलोचना-समालोचना का आईना है। इस आईने में शायद पत्रिका की 'सम्पादकीय बहुंयें' स्वयं को बद-सूरत पा रही होंगी।
अवधेश बजाज
संपादक
