12.1.12
26.8.11
अरे देखो रे देखो भैया
अन्ना का अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है !अरे ये लोकतंत्र के लिए खतरा हो या न हो स्विस बैंक में खाता रखने वालो के लिए जरूर खतरा है।
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19.8.11
ये क्रांति नहीं अब रुकनी है...
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18.8.11
त्रिकाल
" अन्ना के अनशन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है.."
अरे तुम्हारी दर्जन भर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसिया क्या हिजड़ो कि तरह से अपना हाथ ताली बजाने में लगाये हुए है...जो उन्हें आपकी विदेशी हाथ के बात को प्रमाण सहित साबित करने के लिए सबूत नहीं मिल रहा है ?
२.
देखा आदरणीय योग गुरु बाबा रामदेव जी...
अगर आप उस दिन डरकर "सलवार समीज" पहन कर महिलाओं के झुण्ड में न भागते
और अपनी गिरफ़्तारी होने देते तो जो हाल आज दिल्ली का है और जो जन-सैलाब उमड़ा हुआ है..
वो तब उसी दिन आपके गिरफ़्तारी के साथ हो जाता और आपको भी यू बे-आबरू होकर अपना अनसन न तोड़ना पड़ता...
आपकी ये एक छोटी सी भूल आपके राजनैतिक कैरियर और आपके दम-ख़म पर हमेशा एक बदनुमा दाग की तरह रहेगा इसका मुझे हमेशा अफसोस होगा..पर क्या करे.. आपमें वो नैतिक बल नहीं था जो पहले "महात्मा गाँधी और जे.पी" में था और अब अन्ना हजारे में है...
३.
बाबा तुलसीदास ने सही कहा था...
"विनय न मानत जलधि जड़,गए तीन दिन बीत..
बोले राम सकोपि तब , भय बिन होय न प्रीति "
तो लीजिये आज फिर
रामलीला मैदान की साफ सफाई हो रही है..
जिनके अहंकार को फूँका जाना है वो अपने पुतलो के साथ तैयार खड़े है...
और जिन्हें फूँकना है वो भी धनुष बाण लेकर दल-बल के साथ आने ही वाले है...
जनता भी आ रही है...
संग
जनता जनार्दन भी आ रहे है...
देखते है ये आग कितने देर धधकती है और अपनी लपटों में कितनो को जलाती और झुलसाती है...
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17.8.11
अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो....
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14.7.11
उफ़ आखिर कब तक...
लीजिये भारत की व्यावसायिक राजधानी मुम्बई पर एक बार फिर से हमला हो गया...
अभी कसाब हमारा अतिथि बना ही हुवा है , अफजल ससुराल में रहने जैसा मजा उठा ही रहा है की मीडिया को एक और ब्रेकिंग न्यूज मिल गयी... सीरियल ब्लास में फिर दहली मुम्बई
उफ़ आखिर कब तक...
कब तक हम सब बस नपुन्सको सा तमाशा देखते रहेंगे...
कब तक बार-बार होने वाले धमाको के बाद हमारे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री वही रटा-रटाया बयान देते रहेंगे कि "यह आतंकियों की सोंची समझी शाजिस है ? " अबे क्या बिना सोंचे समझे कोई इतना बड़ा ब्लास्ट तुम्हारे घर में घुस कर प्लांट कर सकता है ?
कब तक सांप निकल जाने के बाद हम खाली-पीली सारे देश में रेड एलर्ट जारी करके लकीर पीटने का तमाशा कर के जनता को बहलाएँगे ?
मीडिया चिल्ला रहा है "कोई कुछ भी कर ले मुम्बई वासियों की एकता कोई नहीं तोड़ सकता है.." तो अंचार बनाकर छत पर सुखाने को रखो एकता का... जब उनके मन में आता है तब घर में घुस कर मार जाते है और हम बस नपुन्सको सा अपनी एकता और अपनी जिन्दादिली पर tali बजा-बजा कर खुश हो लेते है !
इस से बेहतर तो ८० साल के बुजुर्ग अटल बिहारी ही थे जिन्होंने जन्मजात हरामियो के देश की सीमा पर कम से कम अपनी सेनाये तो चढ़ाकर उनको सबक सिखाने की तो ठानी तो थी... और एक बार पूरे विश्व कि सांसे तो रोंक दी थी !
यह सरकार तो बस खोखली बाते ही करती है... कभी शर्म-अल-शेख में मुह की खाती है , तो कभी अमेरिका के तलुवे चाटती नजर आती है !
गृह मंत्री कहते है कि हमारे पास एसी कोई व्यवस्था नहीं है जो पूर्व सूचना दे ??
गिनने पर आओ तो भारत में काम करने वाली इंटेलिजेंस एजेंसियों की पूरी सूची कम से कम एक पन्ने में समाएगी मगर सब बे-ताल नाच रहे है !और अपनी बीरता के डंका पीटने वाली बीर मराठा पुलिस के मुखबिर क्या खाली धंधेबाजो की खोज-खबर रखती है ? उसे क्यों नहीं कुछ सूंघने को मिलता है ?
और लोकल इंटेलिजेंस ? उनकी हालत क्या लोकल चाय जैसी हो गयी है ?
अरे हमारी राष्टीय सुरक्षा एजेंसिया जैसे एन.आई.ए. , आई.बी. और मिलिट्री इंटेलिजेंस के लोग क्या केवल तफरीह में मस्त रहते है ?
और क्या करती रहती है हमारी ' रा ' ? क्या उनके लोग पाकिस्तान में पिकनिक मना रहे हैं ....?
जबाबी कार्यवाही में क्यों नहीं वहां इससे बड़ा सीरियल ब्लास्ट प्लांट हो रहा है ?????? अगर दम है काउंटर इंटेलिजेंस में तो जाओ २४ घंटे में दहला कर दिखावो करांची और इस्लामाबाद की छाती...
और अगर कुछ नहीं हो सकता इंटेलिजेंस वालो से तो क्यों नहीं फिर से बोफोर्स तोपों का मुह वापस खोला जा रहा है ? अरे तोपे भले ही दलाली खा कर खरीदी गयी हों मगर जब वो गरजती है तो पाकिस्तानियों को अपनी माओ की कोख ही वापस याद आती है....
और पृथ्वी , अग्नि , अर्जुन आकाश क्या अजायबघर में रखने के लिए बनाये गए है ....?
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4.7.11
माननीय जन-प्रतिनिधगण
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23.6.11
तख़्त बदल दो , ताज बदल दो...
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9.2.11
आज और अब तक का बासी, गिद्ध-वाणी-1
अनंत अपार असीम आकाश में आज से प्रारंभ हो रही गिद्ध-वाणी में आप सभी विचरण कर रहे प्राणियों का स्वागत है....
आज की गिद्ध वाणी में अब आप के समक्ष समाचार जगत से आज और अब तक का बासी पर गिद्ध दृष्टि से देख कर गिद्ध उवाच प्रस्तुत है....
बासी खबर : वेश्यावृत्ति को मिले वैधानिक दर्जा - प्रिया दत्त ।
गिद्ध उवाच : क्यों नही , यदि नेताओं को वैधानिक दर्जा दिया जा सकता है तो वेश्यायों के साथ बेद-भाव क्यों ?
बासी खबर : सीबीआई का शक तलवार दंपति पर ।
गिद्ध उवाच : नजूमियों जैसी हालत हो गयी है सी.बी.आई की , शुक्र है कसाब से पूँछताछ का जिम्मा सी.बी.आई. को नही मिला था ।
बासी खबर : ‘घोटाले’ में प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकते - भाजपा ।
गिद्ध उवाच : अब तक कितने प्रधानमंत्री ठोस जिम्मेदारी और जवाबदेही के दायरे में आये है ? , जैसे पिलपिले सवाल वैसे पिलपिले जबाब ।
बासी खबर : राहुल गाँधी ने सौकड़ो मील की यात्रा कर तीन बलात्कार पीड़ितों से मुलाकात की ।
गिद्ध उवाच : तो क्या हुआ , प्रत्येक युवराज को हक है की राजा बनने से पहले सभी तरह के अनुभवों से रूबरू होने का , और वैसे भी वर्तमान में देश में अन्य कोई गंभीर जटिल समस्या तो है ही नही सिवाय इसके कि प्रत्येक दिन आम जन के साथ राजनयिक जन बलात्कार कर रहे हैं ।
बासी खबर : जेपीसी गठन के लिए सरकार तैयार ।
गिद्ध उवाच : जब जेपीसी कोई कानूनी कार्यवाही कर ही नही सकती तो इतने दिन व्यर्थ का नाटक क्यों ? , जो नुकसान हुवा उसकी भरपाई कौन करेगा ? सही कहा गया है "जैसे ललका चाउर तैसे द्तचिहार गहंकी" ।
बासी खबर : विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री मायावती के औरैया दौरे के वक्त प्रमुख सुरक्षा गार्ड द्वारा अपने रुमाल से उनके जूते साफ करने की घटना को शर्मनाक तथा सामंतवादी सोच की निशानी करार दिया है।
गिद्ध उवाच : कौन सी बड़ी बात है , क्या आज कल नेताओं और अधिकारी के मध्य आपसी सामंजस से थूका-चाटा वाला रिश्ता नहीं विकसित हो रहा है ? फिर तेल लगाने का सबको हक है , और सैंडिल पोंछना भी तो ड्यूटी का हिस्सा ही है।
बासी खबर : तिवारी को कराना होगा डीएनए टेस्ट ।
गिद्ध उवाच : बड़ी मुश्किल है , एक का दावा स्वीकार हो गया तो आगे ना जाने कितने और दावे खड़े हो जायेगे ?
बासी खबर : पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर रविवार को लंदन में एक बैठक के दौरान जूता फेंका गया, लेकिन मीडिया की खबरों के अनुसार जूता उनसे दूर गिरा।
गिद्ध उवाच : अफ़सोस नामुराद निशानेबाजों के कारण मुसर्रफ़ साहेब उन महान हस्तियों में शामिल होने से बाल बाल चूक गए जिन्हें इतिहास जूता खाने के लिए याद करेगा ।
तो इसी के साथ अगली गिद्ध वाणी के प्रकाशन तक गिद्ध हस्त प्रणाम..
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23.1.11
आवो तुम्हे पालतू बनायें....
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।
हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?
पहला तरीका :
हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...
या
दूसरा तरीका :
हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।
परन्तु..
जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।
तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....
हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है।
परन्तु
जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।
तो
अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!
इति
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22.1.11
हम सच मा झूंठे कवितायित है....
आज किसी ब्लाग पर कुछ पढ़ते हुए एक संदर्भित लाइन "हम झूठै-मूठे गायित है, आपन जियरा बहलायित है| " पढ़ने को मिली।
हालाँकि पूरी रचना तक मै नही पहुँच पाया मगर यही एक लाईन सीधे दिल में उतार गयी...
फिर कुछ इन्ही शब्दों और भाव में (हालाँकि यह बोलचाल की भाषा मेरी लिए थोड़ी असहज है क्योंकि इसे सुनने और बोलने का अवसर नहीं मिला और आदत भी नहीं है मगर यह थोड़ी परिचित भी है क्योंकि है तो हिंदी ही और वो भी उत्तर प्रदेश के ही किसी क्षेत्र की।) लिखने को मन बैचैन होने लगा...
फिर देखते है कि मेरा मन अपने मन की कितना कर पाता है........ ?
तौ देखा समझा जाई , कुछ गलती होई तो बतावा जाई ...
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14.1.11
Making Of A New Kalidas

कालिदास जैसा अपने को महान बनाने के लिए 'मूर्ख' होना कोई आर्हता नही है , और ना ही ये आवश्यक है की उसके लिए मूर्खों सा अपने ही घर के आँगन में लगे फलदायी वृक्षो की शाखाएं या उससे भी भी अधिक मूर्खता करते हुए समूचे वृक्ष को ही कटाने पर जुटे रहें ।
पर
अफसोसजनक विडम्बना यह है की आज भी कुछ मूर्ख अपने को कालिदास साबित करने हेतु पूर्णतया विचार करके योजनाबद्ध तरीके से पेड़ की उन्ही शाखों को जिस पर आज वो बैठे हुए है , इस आस में कटाने में लगे है कि किसी ना किसी दिन उस पेड़ के नीचे सुसताते पथिक और पेड़ के ऊपर बसेरा करने वाले पंछी भयवस ही सही उन्हें कालिदास के नाम से संबोधित करेंगें ।
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वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?

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3.1.11
चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी
मित्रो
नव-वर्ष २०११ की आप सभी को शुभ-कामनाये,
आशा करता हूँ कि यह वर्ष सभी को ज्यादा सुख , ज्यादा कमाई (सफ़ेद और काली दोनों मलाई ) का अवसर देगा ,
जो किन्ही भी कारणों से नही खा पा रहे हो सफ़ेद के संग काली मलाई , उन्हें अवश्य सर्वजन हित में संसद से गैर-भ्रष्टाचार कानून पास कराकर उठा ले जाय सी.बी.आई.........!!
खैर मुद्दे पर आता हूँ...
वर्षों पहले जब कुछ काल-पात्र-स्थान मुझको दुखित कर रहे थे तो उन्ही परिस्थित जन्य कारणों से उपजे आवेग में उक्त पंक्तिया मेरी डायरी के पन्नो में संकलित हुयी थी , और उस समय की अपनी ज्यादा लपलपाती जिह्वा से मैंने इसका बहुत बार प्रसार कर काफी तारीफे भी बटोरी थीं (अपने जैसे ही प्रताणित जनो से), शायद इसी कारण से ये पंक्तिया बार बार मेरे मानस पटल छाई रहती हैं ।
पर जब मैंने ब्लॉग लिखने का फैसला किया तो सबसे पहले मुझे सलाह दिया गया कि ब्लॉग पर कुछ भी लिखना मगर चंद नन्द और घोड़ी या उसके जैसा और कुछ मत लिखना... और मैंने भी उक्त सलाह को गाँठ बांध कर रख ली थी... मगर देश-समाज-धर्म-राजनीति और रोजी-रोटी से जुड़े हालात को देखते देखते ना जाने कब और कैसे वो गाँठ कहीं चुपके से खुल गयी...
तो अंतत: आज आपके समक्ष ब्लाग पर भी प्रस्तुत है... "चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी जनाब"
वैसे आपको सजग कर दूँ कि "चूतिया" शब्द हमारे लखनऊ में सामान्यतया मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाता है पर जिस जगह पर रहकर मै ब्लाग अपडेट कर रहा हूँ वहां के लोग इसका मनमाना संधि-विच्छेद कर के इसे गाली में गिनते है .. अब आप चाहे जो समझे एक चूतिया की घोड़ी के हाथो तीर कमान से निकल रहा है.......तो आप मेरे तीर पर अपनी नजरे इनायत कीजिये.....
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16.12.10
लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक
ना ना .... जरा दो मिनट रुक जाइये
और आज तो मै "लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी" के मध्य देश और समाज के विकास की भी बात करने जा रहा हूँ .....
पहली प्रगति:- पहले लौंडा बदनाम होता था और अब मुन्नी बदनाम होने लगी है .... अर्थात पुरुष वर्चस्व समाप्त हो गया , महिला वर्ग की भी खुले आम भागेदारी सामने आने लगी है ।
दूसरी प्रगति:- सट्टा बंधा कर अनावश्यक दूसरों पर पैसा खर्च कर एक-दो नाचने वालियों की जगह समाज में आया ज्यादा खुलेपन के कारण अब घर परिवार, दोस्तों के परिवार और मोहल्ले से बारात में आने वाली महिलाएं ही बारात में नाच कर बराती,घराती और मार्ग पर चलने वाले लोगों के मनोरंजन की जिम्मेदारी अपने कंधो (मतलब अपने कमर पर) ले चुकी हैं ,जिसके कारण पतुरिया जैसा भौड़ा शब्द भी कहीं ना कही अपनी मान्यता खो चुका है, खर्चा कम होने लगा है, नाच गाने हेतु दूसरों पर निर्भरता समाप्त हो गयी है । इस प्रगति से कृपया महिलाएं नाराज ना हों क्योंकि पुरुष तो पहले भी जन्मजात नचनिया था आज भी है ।
तीसरी प्रगति :- पहले प्राय: बेचारे घराती अपना पेट पकडे और मुह बाँधे चुप-चाप तब तक इंतिजार करते थे जब तक बाराती ना डकार ले लें , मगर अब ज्यादातर पहले घराती ही डकारता है फिर जूठे-कूठे मेज , स्टाल पर बेचारा बराती भोजन करता है अर्थात घरातियों पर बारातियों की श्रेष्ठता लगभग समाप्त हो गयी है ।
चौंथी प्रगति :- पहले बिकाऊ दुल्हे के पिता द्वारा दहेज़ मांगे जाने पर और उसे उचित मूल्य ना चुका पाने पर ना केवल कन्या का पिता वरन कन्या पक्ष के अन्य सम्मानितगण भी अपना शीश नवाने लगते थे और अब ज्यादा मोल भाव करने पर दुल्हे , उसके पिता और लगे हाथ बारात में शामिल बे-सहारा बाराती भी दो पल में लतिया-जुतिया दिये जा रहे हैं , आगे का सत्कार बड़ी ससुराल में होने लगता है , तो दहेज़ की समस्या का भी कुछ-कुछ निदान हो रहा है।
पाँचवी प्रगति :- जैसा की पहले ही कह चुका हूँ कि जो बेचारे भोले भाले नही है उनको इन सब बन्धनों से दूर कहीं शांति और ज्यादा खुलेपन से अभी तो भारत के मेट्रो शहरों में लागू लिव इन रिलेशन को अपना लेने की सुविधा मिलाने लगी है, आगे उम्मीद है कि पूरे देश में इसकी मान्यता मिल ही जाएगी ।
और सबसे अंत में
तो चलिए बात समाप्त करता हूँ , आगे मुझसे सहमत होना ना होना आपकी मर्जी ... वैसे भी मुझे इससे कभी फर्क नही ही पड़ता है ..क्योंकि रात बहुत ज्यादा हो गयी है , और कई शादियों में शामिल होने के बाद भी मुझे भूंखे पेट (एसिडिटी के कारण) सोना भी है ।
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5.12.10
यदि इम्तहान उनका है ये , तो इम्तहान मेरा भी है ।
किसी ने क्या खूब कहा है :-
"वो बुझाये मै जलूँ , यह जुस्तजू दोनों में थी ।
इम्तहां उनका भी था , और इम्तहां मेरा भी था ।।"
आप सभी का पुन: स्वागत है..
मै नही कहता कि मैंने , किसी दर पर शीश झुकाया नहीं ।
पर हर दर पर फ़ौरन मुझको , शीश झुकाना भाया नहीं ।
यूँ वो भी कोई शीश है जो , हर दर पर झुक जाता हो ?
पर वो दर भी क्या दर है , जो शीश झुका ना पाता हो ?
अगर नहीं है मन में श्रधा , फिर शीश झुकाने का क्या मतलब ?
दिल में नही है चाह अगर , तो सीने से लगाने का क्या मतलब ?
मत कहना अभिमान इसे , ये तो है निर स्वाभिमान ही ।
शीश झुकाने का आडम्बर , कर सकता कोई बेईमान ही ।
हाँ कुछ दर ऐसे भी होते हैं , जिनको भाती है चाटुकारिता ।
सत्ता मद में होकर चूर , वो करते जाते हैं व्याभिचारिता ।
ऐसे दर जब मुझे झुकाना चाहेंगे , मै शीश उठाये रखूँगा ।
वो डर, भय लोभ दिखायेंगे , मै फिर भी सच ही बोलूँगा ।
विजय किसे मिल पाती है , वक्त ही तय कर पायेगा ।
स्वाभिमान और आडम्बर, जब आपस में टकराएगा ।
जब गरिमामय होगा दर , मै स्वयं से शीश झुकाऊंगा ।
वर्ना हर दर से मै वापस , बिना शीश झुकाए जाऊंगा ।
यह तो है एक इम्तहान , जिसे हम दोनों को देना है ।
यदि इम्तहान उनका है ये , तो इम्तहान मेरा भी है ।
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29.11.10
Sahara Comosale ... An Intro
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19.10.10
नक्कारखाने में तूती की आवाज
यसवंत जी
माँ , माँ होती है , उसके दुखों को सारा जग महसूस करता है...मुझे भी अपार दुःख और छोभ है
हम आपके साथ हैं..
इस समय मै आपसे यही कह सकता हूँ की ............
विवेक मिश्र 'अनंत'
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