Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label Vivek Mishra. Show all posts
Showing posts with label Vivek Mishra. Show all posts

12.1.12

अभिनन्दन है..

अभिनन्दन है , वंदन है तेरा ।
हे राष्ट्र पुरुष , हे महापुरुष ।
सामर्थ नहीं हम में इतना ,
कर पाए तेरा समुचित गुणगान ।
गुंजित है ये धरती सारी ,
गूँज रहा नभ में तेरा यशोगान।


स्वामी विवेकानंद जी की "जयंती"
'युवा दिवस’ (१२ जनवरी)

पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से
शत - शत नमन...!!

26.8.11

अरे देखो रे देखो भैया

अरे देखो रे देखो भैया , दस दिन बाद आज अचानक देश में राहुल गाँधी नजर आये है..... माँ  के आँचल से निकल कर लोकपाल पर संसद में जादू की छड़ी घुमाने आये है !

तो राहुल गाँधी कहते है संसद में...
अन्ना का अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है !अरे ये लोकतंत्र के लिए खतरा हो या न हो स्विस बैंक में खाता रखने वालो के लिए जरूर खतरा है।

लोकपाल को संविधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए !
अरे पहले लोकपाल बनाने की तो बात कीजिये राहुल बाबा... आगे का हाल आगे देखा जायेगा ।

संसद सर्वोपरि है !
कौन मना कर रहा है कि संसद सर्वोपरि नहीं है ? देश लोकपाल मांग रहा है और संसद में मात्र तफरीह हो रही है क्या ये साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संसद सर्वोपरि है ।

चुनी हुयी सरकार को अलग नहीं रखा जा सकता है !
अरे जनता की क्या औकात कि "सरकार" को अलग रखे... सरकार तो सरकार होती है । तभी तो अन्ना ने कहा है... " मॉल खाए मदारी , नाचे बन्दर "

अकेला लोकपाल भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं कर पायेगा , और लोकपाल भी भ्रष्ट हो सकता है !
अरे तो क्या यह सोंच कर भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए पहला कदम भी न उठाया जाय । और भ्रष्ट तो प्रधानमंत्री भी होते है तो क्यों नहीं उस पद को समाप्त कर देते हो ।

टैक्स चोरी रोंकने और राशन कार्ड, पेंशन आसानी से प्राप्त होने के लिए जैसे  भी ध्यान दिए जाने और कानून बनाये जाने की जरुरत है !
अरे राहुल बाबा सब सब चोरो का एक ही अब्बा...भ्रष्टाचार वही  ख़त्म करने का प्रयास करो सब अपने आप सही हो जायेगा  

19.8.11

ये क्रांति नहीं अब रुकनी है...


जैसा मन भावन रूप तेरा , 
वैसी मन भावन बात तेरी ।
अन्ना तुझको नाम दिया , 
गाँधी का तुझे काम दिया ।

लो आज सजा फिर मंच तेरा , 
जनता बिछाती पलक पांवड़े ।
स्वागत है हे जनता जनार्दन , 
कर दो तुम सत्ता का मर्दन ।

अफसोस, नहीं हम पास तेरे , 
फिर भी हर पल हैं साथ तेरे ।
ये क्रांति नहीं अब रुकनी है , 
यहाँ विश्व की निगाहें टिकनी है ।



यह सम्राट अशोक की धरती है , 
सत्य,अहिंसा की यह जननी है ।
यहाँ गाँधी ने उपवास किया ,
और बुद्ध ने यहाँ वास किया ।

नमन तुझे है आज के गाँधी , 
आभार तेरे पथ प्रदर्शन को ।
मेरी आँखे तरस रही हैं कबसे  ,
तेरा दर्शन प्रत्यक्ष करने को ।

कटिबद्ध है तेरे संग हम सब , 
जन लोकपाल को लाने को ।
बिना रक्तमय क्रांति किये , 
भारत से भ्रष्टाचार मिटाने को ।

सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2011 © ミ★विवेक मिश्र "अनंत"★彡3TW9SM3NGHMG

18.8.11

त्रिकाल

१. 


अब मनमोहन 'सिंह' जैसे प्रधान मंत्री से यही सुनना बाकि रह गया था ..
" अन्ना के अनशन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है.." 
अरे मै यह नहीं कहता कि यह असंभव है, कुछ भी हो सकता है....
मगर अगर एसा है तो बात गंभीर है , इसे साबित करो ना प्रधानमंत्री जी...
केवल जुबानी जमाखर्च क्यों ?
अरे तुम्हारी दर्जन भर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसिया क्या हिजड़ो कि तरह से अपना हाथ ताली बजाने में लगाये हुए है...जो उन्हें आपकी विदेशी हाथ के बात को प्रमाण सहित साबित करने के लिए सबूत नहीं मिल रहा है ?

२. 

देखा आदरणीय योग गुरु बाबा रामदेव जी...
अगर आप उस दिन डरकर "सलवार समीज" पहन कर महिलाओं के झुण्ड में न भागते
और अपनी गिरफ़्तारी होने देते तो जो हाल आज दिल्ली का है और जो जन-सैलाब उमड़ा हुआ है..
वो तब उसी दिन आपके गिरफ़्तारी के साथ हो जाता और आपको भी यू बे-आबरू होकर अपना अनसन न तोड़ना पड़ता...
आपकी ये एक छोटी सी भूल आपके राजनैतिक कैरियर और आपके दम-ख़म पर हमेशा एक बदनुमा दाग की तरह रहेगा इसका मुझे हमेशा अफसोस होगा..पर क्या करे.. आपमें वो नैतिक बल नहीं था जो पहले "महात्मा गाँधी और जे.पी" में था और अब अन्ना हजारे में है...

३.



बाबा तुलसीदास ने सही कहा था...
"विनय न मानत जलधि जड़,गए तीन दिन बीत..
बोले राम सकोपि तब , भय बिन होय न प्रीति "
तो लीजिये आज फिर
रामलीला मैदान की साफ सफाई हो रही है..
जिनके अहंकार को फूँका जाना है वो अपने पुतलो के साथ तैयार खड़े है...
और जिन्हें फूँकना है वो भी धनुष बाण लेकर दल-बल के साथ आने ही वाले है...
जनता भी आ रही है...
संग
जनता जनार्दन भी आ रहे है...
देखते है ये आग कितने देर धधकती है और अपनी लपटों में कितनो को जलाती और झुलसाती है...

17.8.11

अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो....

मित्रो अगर हमें भारत को वास्तव भ्रस्टाचार से मुक्त बनाना है तो केवल दूसरो के भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखने चिल्लाने और कानून बनवाने भर से  यह कार्य पूरा नहीं हो सकता जब तक सबसे पहले इसकी शुरुवात हम अपने आप से नहीं करते है, आत्मिक रूप से स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं करते है.. ।

तो क्यों ना सबसे पहले स्वयं शपथ लीजिये कि.... 
हम आज से अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में ना तो शामिल होंगे ना हीं उसका कारण बनेगे । भले ही उससे हमारा किसी भी प्रकार का हित क्यों न प्रभावित होता हो....।

मै शपथ पूर्वक पूरी तरह से तैयार हूँ......।
पर क्या आप सचमुच पूरी तरह तैयार है ?    
या सिर्फ टाइम पास करने के लिए, दूसरो पर रोब डालने के लिए "पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तरह  से बस " हम अन्ना अन्ना चिल्ला रहे है  ।

14.7.11

उफ़ आखिर कब तक...

लीजिये भारत की व्यावसायिक राजधानी मुम्बई पर एक बार फिर से हमला हो गया...
अभी कसाब हमारा अतिथि बना ही हुवा है , अफजल ससुराल में रहने जैसा मजा उठा ही रहा है की मीडिया को एक और ब्रेकिंग न्यूज मिल गयी... सीरियल ब्लास में फिर दहली मुम्बई



उफ़ आखिर कब तक...
कब तक हम सब बस नपुन्सको सा तमाशा देखते रहेंगे...
कब तक बार-बार होने वाले धमाको के बाद हमारे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री वही रटा-रटाया बयान देते रहेंगे कि "यह आतंकियों की सोंची समझी शाजिस है ? " अबे क्या बिना सोंचे समझे कोई इतना बड़ा ब्लास्ट तुम्हारे घर में घुस कर प्लांट कर सकता है ?
कब तक सांप निकल जाने के बाद हम खाली-पीली सारे देश में रेड एलर्ट जारी करके लकीर पीटने का तमाशा कर के जनता को बहलाएँगे ?

मीडिया चिल्ला रहा  है "कोई कुछ भी कर ले मुम्बई वासियों की एकता कोई नहीं तोड़ सकता है.." तो अंचार बनाकर छत पर सुखाने को रखो  एकता का... जब उनके मन में आता है तब घर में घुस कर मार जाते है और हम बस नपुन्सको सा अपनी एकता और अपनी जिन्दादिली पर tali बजा-बजा कर खुश हो लेते है ! 

इस से बेहतर तो ८० साल के बुजुर्ग अटल बिहारी ही थे जिन्होंने जन्मजात हरामियो के देश की सीमा पर कम से कम अपनी सेनाये तो चढ़ाकर उनको सबक सिखाने की तो ठानी तो थी... और एक बार पूरे विश्व कि सांसे तो रोंक दी थी ! 

यह सरकार तो बस खोखली बाते ही करती है... कभी शर्म-अल-शेख में मुह की खाती है , तो कभी अमेरिका के तलुवे चाटती नजर आती है !

गृह मंत्री कहते है कि हमारे पास एसी कोई व्यवस्था नहीं है जो पूर्व सूचना दे ??

गिनने पर आओ तो भारत में काम करने वाली इंटेलिजेंस एजेंसियों की पूरी सूची कम से कम एक पन्ने में समाएगी मगर सब बे-ताल नाच रहे है !और अपनी बीरता के डंका पीटने वाली बीर मराठा पुलिस के मुखबिर क्या खाली धंधेबाजो की खोज-खबर रखती है ? उसे क्यों नहीं कुछ सूंघने को मिलता है ?
और लोकल इंटेलिजेंस ? उनकी हालत क्या लोकल चाय जैसी हो गयी है ?


अरे हमारी राष्टीय सुरक्षा एजेंसिया जैसे एन.आई.ए. , आई.बी. और मिलिट्री इंटेलिजेंस के लोग क्या केवल तफरीह में मस्त रहते है ?
और क्या करती रहती है हमारी ' रा '  ? क्या उनके लोग पाकिस्तान में पिकनिक मना रहे हैं ....?
जबाबी कार्यवाही में क्यों नहीं वहां इससे बड़ा सीरियल ब्लास्ट प्लांट हो रहा है ?????? अगर दम है काउंटर इंटेलिजेंस में तो जाओ २४ घंटे में दहला कर दिखावो करांची और इस्लामाबाद की छाती...

और अगर कुछ नहीं हो सकता इंटेलिजेंस वालो से तो क्यों नहीं फिर से बोफोर्स तोपों का मुह वापस खोला जा रहा है ? अरे तोपे भले ही दलाली खा कर खरीदी गयी हों मगर जब वो गरजती है तो पाकिस्तानियों को अपनी माओ की कोख ही वापस याद आती है....
और पृथ्वी , अग्नि , अर्जुन आकाश क्या अजायबघर में रखने के लिए बनाये गए है ....?

4.7.11

माननीय जन-प्रतिनिधगण

आज जब विश्व के कई  देशो में तरफ जन-आन्दोलन की भरमार है , जनता और जागरुक होती जा रही है , अपने अधिकारों के लिए धरना , प्रदर्शन और क्रांति के लिए उतावली हुयी जा रही है... तब आईये देखते है  की विभिन्न देशों की जनता के द्वारा चुने गए माननीय जन-प्रतिनिधगण पार्लियामेंट में विचारो की स्वतंत्रता के नाम पर किस प्रकार अपनी आवाज बुलंद करते है और मतान्तर होने पर दूसरो को किस प्रकारजबाब देते है...

 ये है महान रोमन साम्राज्य के इटली का नजारा 

 ये है शांति के मसीहा जापान के प्रतिनिध 

 ये है झगडा करने के माहिर मैक्सिकन

ये जन क्रांति के प्रणेता रूस  की संसद


 साऊथ कोरिया 

 ताइवान

 टर्की 

उक्रेन 

और ये हैं भारत के भाग्य विधाता 
*************************
और अब देखिये इन सबसे अलग देश , जिससे हम अपनी तुलना करने की हमेशा सोंचते है ..



 महान चीन 
भले ही यहाँ संसद में बोलने की आजादी न हो मगर सोने की भरपूर आजादी है....!!

23.6.11

तख़्त बदल दो , ताज बदल दो...


तख़्त बदल दो , ताज बदल दो
बेईमानो का राज बदल दो  
देखो जनता आती है ,
परिवर्तन की आँधी लाती है  
जन-जन अब हाल बदल दो
मिलकर सत्ता की चाल बदल दो  
जाने कब ये बना था नारा , लेकिन अब भी लगता प्यारा  
सत्ता पाकर भी जनता को , नहीं किसी ने कभी दुलारा  
जाने कितने तख़्त बने , जाने कितने इतिहास बुने  
जाने कितने नेताओं को , अदल बदल कर हमने चुने  
मगर आज तक जनता का , नही कोई कल्याण हुआ  
जो भी सत्ता में जाकर बैठा , वो अपने में ही भार हुआ  
जाने कितने बदले ताज , जाने कितने बदले राज  
निरीह असहाय जनता का, बनता नहीं है कोई काज  
भूँखी-नंगी जनता का , उन्होंने भी नहीं हाल सुना 
बड़े अरमानो से हमने जिनको  अपना नेता चुना 
बदल गयी सब मर्यादाएं , भूल गयी पिछली भाषाए 
केवल सत्ता याद रही , और याद रही उसकी भाषाए 
भूल सभी जन-संघर्षो को , नेताओं ने बस दुराचार किया  
जनता की आकंक्षाओ से,खुल्लम-खुल्ला व्यभिचार किया 
याद रहे नहीं वादे उनको , भूल गए सब नाते उनको 
बीते थे कुछ एक माह ही , जब सत्ता में जाते उनको 
सत्ता है कुछ ऐसी ठगनी , मति-भ्रम वो कर देती है 
अच्छे अच्छो के मन में , लालच वो भर देती है 
फिर भी हमको लगता प्यारा , नारा ये कितना है न्यारा ।
खाकर लाठी-डंडो को भी , जनता ने इसे सदा दुलारा 
मन में आश जगाता है , कभी मृग-तृष्णा सा बहलाता है 
आज नहीं तो कल निश्चित ही , बदलेगा हाल बताता है 
सत्ता सुख का बँटवारा , आखिर जन-जन तक पहुंचेगा ।
आएगा एक दिन वो भी , जब सबका चेहरा चहेंकेगा 
मत आश करो नेता,बाबाओं का , ये सब चाटुकार हैं सत्ता के ।
तुम स्वयं ही अपने नेता हो , और योग्य भी हो तुम सत्ता के ।
मत देखो तमाशाई बन कर , कल घर तेरा भी जल सकता है 
हम जैसी बेबस जनता से ही , कोई जन आँधी बन सकता है 
तो आवो फिर से जोर लगाओ , क्यों बैठे हो तुम भी आ जाओ 
आओ धरने पर तुम भी आओ , अपना भी दुःख-दर्द सुनाओ 

9.2.11

आज और अब तक का बासी, गिद्ध-वाणी-1

नमस्कार
अनंत अपार असीम आकाश में आज से प्रारंभ हो रही गिद्ध-वाणी में आप सभी विचरण कर रहे प्राणियों का स्वागत है....

आज की गिद्ध वाणी में अब आप के समक्ष समाचार जगत से आज और अब तक  का बासी पर गिद्ध दृष्टि से देख कर गिद्ध उवाच प्रस्तुत है....
बासी खबर : वेश्यावृत्ति को मिले वैधानिक दर्जा - प्रिया दत्त ।
गिद्ध उवाच :  क्यों नही , यदि नेताओं को वैधानिक दर्जा दिया जा सकता है तो वेश्यायों के साथ बेद-भाव क्यों ?

बासी खबर : सीबीआई का शक तलवार दंपति पर ।
गिद्ध उवाच : नजूमियों जैसी हालत हो गयी है सी.बी.आई की , शुक्र है कसाब से पूँछताछ  का जिम्मा सी.बी.आई. को नही मिला था ।
बासी खबर :  ‘घोटाले’ में प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकते - भाजपा ।
गिद्ध उवाच : अब तक कितने प्रधानमंत्री ठोस जिम्मेदारी और जवाबदेही के दायरे में आये है ? , जैसे पिलपिले सवाल वैसे पिलपिले जबाब ।

बासी खबर : राहुल गाँधी ने सौकड़ो मील की यात्रा कर तीन बलात्कार पीड़ितों से मुलाकात की ।
गिद्ध उवाच : तो क्या हुआ , प्रत्येक युवराज को हक है की राजा बनने से पहले सभी तरह के अनुभवों से रूबरू होने का , और वैसे भी वर्तमान में देश में अन्य कोई गंभीर जटिल समस्या तो है ही नही सिवाय इसके कि प्रत्येक दिन आम जन के साथ राजनयिक जन बलात्कार कर रहे हैं ।

बासी खबर : जेपीसी गठन के लिए सरकार तैयार ।
गिद्ध उवाच : जब जेपीसी कोई कानूनी कार्यवाही कर ही नही सकती तो इतने दिन व्यर्थ का नाटक क्यों ? , जो नुकसान हुवा उसकी भरपाई कौन करेगा ? सही कहा गया है "जैसे ललका चाउर तैसे द्तचिहार गहंकी" ।
बासी खबर : विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री मायावती के औरैया दौरे के वक्त प्रमुख सुरक्षा गार्ड द्वारा अपने रुमाल से उनके जूते साफ करने की घटना को शर्मनाक तथा सामंतवादी सोच की निशानी करार दिया है।
गिद्ध उवाच : कौन सी बड़ी बात है , क्या आज कल नेताओं और अधिकारी के मध्य आपसी सामंजस से थूका-चाटा वाला रिश्ता नहीं विकसित हो रहा है ? फिर तेल लगाने का सबको हक है , और सैंडिल पोंछना भी तो ड्‍यूटी का हिस्सा ही है।

बासी खबर : तिवारी को कराना होगा डीएनए टेस्ट ।
गिद्ध उवाच : बड़ी मुश्किल है , एक का दावा स्वीकार हो गया तो आगे ना जाने कितने और दावे खड़े हो जायेगे ?

बासी खबर : पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर रविवार को लंदन में एक बैठक के दौरान जूता फेंका गया, लेकिन मीडिया की खबरों के अनुसार जूता उनसे दूर गिरा।
गिद्ध उवाच : अफ़सोस नामुराद निशानेबाजों के कारण मुसर्रफ़ साहेब उन महान हस्तियों में शामिल होने से बाल बाल चूक गए जिन्हें इतिहास जूता खाने के लिए याद करेगा ।


तो इसी के साथ अगली गिद्ध वाणी के प्रकाशन तक गिद्ध हस्त प्रणाम..



23.1.11

आवो तुम्हे पालतू बनायें....

मित्रों
चलिए आज आपको पालतू बनाने के कुछ गुण सिखाता हूँ.....(आखिर इतने वर्षों से मै पालतू बन और बना ही तो रहा हूँ)
तो  ध्यान दें !
मानव हो या पशु ,
अगर उसे पालतू बनाना है , अपने हिसाब से नचाना है , तो सबसे पहले उसकी प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करना होगा
अर्थात
"किसी की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके ही उसे पालतू बनाया जा सकता है ।"
क्योंकि ...
जब तक उसमे प्रतिरोधक क्षमता शेष है , तब तक वह कभी ना कभी , कहीं ना कहीं , सही और गलत कि पहचान अपने से करने कि कोशिश अवश्य करेगा... और यह पालतूपन की जगह उसमे जंगलीपन की निशानी है ।
हाँ यह अलग महत्वपूर्ण विषय है कि हम उसकी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नष्ट करते है ?

पहला तरीका :

हम चाहें तो उसे राजनयिक तरीके से , सामूहिक भौतिक वाद के तहत अतिरिक्त लाभ पहुँचाते हुए, उसकी भावनाओं को सहलाते हुए , या उसे किसी कल्पित ख्वाब को दिखाते हुए अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही छोड़ने के लिए लालयित कर सकते हैं ...

या

दूसरा तरीका :

हम उसे कूटनैतिक और तानाशाही/लालफीताशाही तरीके का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार से शारीरिक, मानसिक, भौतिक या भावनात्मक स्तर पर अपनी ताकत का दुरूपयोग करके लगातार उस समय तक प्रताणित कर सकते हैं जब तक कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को स्वयं ही थक कर चुका ना दे ।
परन्तु..

जहाँ प्रथम तरीके से हम किसी को भी आसानी से पालतू बना सकते हैं और उसे इस बात का पता भी नहीं चल पाता है कि वह कब पालतू बन गया है - वहीँ दूसरे तरीके से हमे उसे बार बार यह जताना पड़ता है कि हम उसे अपना पालतू बनाना चाहते हैं और इस क्रम में उसे भी अपनी प्रतिरोधक क्षमता का लगातार अहसास बना रहता है , ठीक उस समय के पहले तक जबकि प्रतिरोधक क्षमता पूर्णतया चुक ही ना जाये ।

तो आप अपनी जन्मजात आदत , पसंद और सुविधानुसार कोई भी एक तरीका अजमा सकते हैं....

हाँ एक अंतर जो दोनों तरीको में मायने रखता है वह यह है कि, जब कोई स्वयं से पालतू बनने को राजी हो जाता है तो वह अपनी समस्त उर्जाओं , क्षमताओ और अपनी काबिलियत के साथ एक जिंदादिल पालतू बनता है और उसके पालतू बनने से आपको वास्तविक रचनात्मक लाभ मिलता है।

परन्तु

जब हम उसे अपने शक्ति प्रदर्शन से पालतू बनाते हैं तो वह अपनी पूरी उर्जा, क्षमता और अपनी काबिलियत को खोकर सिर्फ एक मुर्दा जैसा पालतू रह जाता है और तब यह हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उसका कैसे इस्तेमाल कर पा रहें है , ना कि उस पर कि वह स्वयं हमारे किस काम आ रहा है । वास्तव में यहाँ मात्र हमारे अहम् की ही मात्र पूर्ति होती है ना की कोई रचनात्मक लाभ ।

तो

अगर आप किसी को पालतू बनाने को सोंच रहे हों तो सबसे पहले आप को निश्चित करना होगा कि आप क्या चाहते है ?
एक जिन्दा बफादार पालतू या मुर्दा-मजबूर पालतू .....!!!!!!!

इति
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

22.1.11

हम सच मा झूंठे कवितायित है....

मित्रों

आज किसी ब्लाग पर कुछ पढ़ते हुए एक संदर्भित लाइन "हम झूठै-मूठे गायित है, आपन जियरा बहलायित है| " पढ़ने को मिली

हालाँकि पूरी रचना तक मै नही पहुँच पाया मगर यही एक लाईन  सीधे दिल में उतार गयी...
फिर कुछ इन्ही शब्दों और भाव में (हालाँकि यह बोलचाल की भाषा मेरी लिए थोड़ी असहज है क्योंकि इसे सुनने और बोलने का अवसर नहीं मिला और आदत भी नहीं है मगर यह थोड़ी परिचित भी है क्योंकि है तो हिंदी ही और वो भी उत्तर प्रदेश के ही किसी क्षेत्र की।) लिखने को मन बैचैन होने लगा...

फिर देखते है कि मेरा मन अपने मन की कितना कर पाता है........ ?

तौ देखा समझा जाई , कुछ गलती होई तो बतावा जाई ...
 [ हमका ना समझौ तुम ब्लागर , हम झूठै ब्लाग पे आयित है ।
आपन जियरा बहलावे का , हम कबो-कबो ब्लागियायित है ।
सोंचित है हमहूँ मन मा , कुछ दुसरेव के ब्लाग पर पढ़ी लेई ।
जे जे हमरेप किहिस टिप्पणी है , कुछ उनहुक टीका कई देई । 
पै का कही ससुर नौकरी का , हमै टैमवै नाहि मिलि पावत है ।
टैम मिळत है जब कबहू , तब सार नेटे नाहि चलि पावत है ।

हमका ना समझेव तुम कवित्त , हम सच मा झूठै-मूठे कवितायित है ।
आपन जियरा बहलावे का , हम कबो-कबो ब्लाग पै लिख जायित है ।
फिर लिख देयित है सब वहै पुँराना , जो अपने डायरी मा पायित है ।
अब तो ताजा कुछ लिखै का , ससुर मौके नाहि निकारि पायित है ।
कबहूँ सोंचित है हम करब का , जब कुल संचित कविता चुकि जाई ?
प्यासे लगे पै लंठन सा का , तुरंतै नवा कवित्त कुवाँ खोदा जाई ??


हमका ना समझैव तुम लेखक , हमहू झूठै बहाँटियायित है ।
अनाप सनाप लिखिकै बस , हम आपन जियरा बहलायित है ।
पूजा करी भले ना कबहूँ , टीका लम्बा सदा लगायित है ।
कोई भले लपेटे मा आवै ना , हम तो भौकाल बनायित है ।
सीधे सपाट हम बोलित है , लल्लो चप्पो नाहि कै पायित है ।
दुसरेक छोड़ो अपनेव कबहूँ , हम ना तेल लगाय पायित है । ]

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

14.1.11

Making Of A New Kalidas



कालिदास जैसा अपने को महान बनाने के लिए 'मूर्ख' होना कोई आर्हता नही है , और ना ही ये आवश्यक है की उसके लिए मूर्खों सा अपने ही घर के आँगन में लगे फलदायी वृक्षो की शाखाएं या उससे भी भी अधिक मूर्खता करते हुए समूचे वृक्ष को ही कटाने पर जुटे रहें ।

पर

अफसोसजनक विडम्बना यह है की आज भी कुछ मूर्ख अपने को कालिदास साबित करने हेतु पूर्णतया विचार करके योजनाबद्ध तरीके से पेड़ की उन्ही शाखों को जिस पर आज वो बैठे हुए है , इस आस में कटाने में लगे है कि किसी ना किसी दिन उस पेड़ के नीचे सुसताते पथिक और पेड़ के ऊपर बसेरा करने वाले पंछी भयवस ही सही उन्हें कालिदास के नाम से संबोधित करेंगें ।

वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?

वाह वाह क्या हुनर है आपके हाथों में ?
पोर-पोर उँगलियों के भरे है अनुभव से ।
और क्यों ना हों ऐसा जब वर्षों से ,
आपको महारथ है हवाई किले बनाने में ।

पहले भी बहुत से फर्जी रजवाड़ों के , बनाये थे ठेके पे किले आपने हवावों के ।
आज भी अपने नेता और युवराज से  , मिले हैं ठेके हवाई किले बनाने के ।
आपके बनाये किले सब अनोखे हैं , उनमे हवा के ईंटो की हवा से चुनाई है ।
हवा के दरवाजे पर हवा की सफाई है , हवा के कमरों में हवा की रंगाई है ।

कोई भी चले हवा , किले को ना छु पाई है ।
अंदर और बाहर की हवा , आपस में ना मिल पाई है ।
भेद सब हवा के , हवा ही समेटे है ।
हवाई किलो में देखो , हवा के ही बेटे हैं ।
निश्चित ही किसी दिन आपको , निशाने पाक भी मिल जायेगा ।
आपके मकबरे पर एक ना एक दिन , लादेन भी फातिया पढने आएगा ।
महाराज जयचंद जैसा ही , आदर से आपका नाम जग में लिया जायेगा ।
अफ़सोस मगर तब तक आप जैसों के कारण , यह देश कई टुकड़ों में बँट जायेगा  ।

© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

3.1.11

चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी

मित्रो

नव-वर्ष २०११ की आप सभी को शुभ-कामनाये,

आशा करता हूँ कि यह वर्ष सभी को ज्यादा सुख , ज्यादा कमाई (सफ़ेद और काली दोनों मलाई ) का अवसर देगा ,
जो किन्ही भी कारणों से नही खा पा रहे हो सफ़ेद के संग काली मलाई , उन्हें अवश्य सर्वजन हित में संसद से गैर-भ्रष्टाचार  कानून पास कराकर उठा ले जाय सी.बी.आई.........!!
खैर मुद्दे पर आता हूँ...
वर्षों पहले जब कुछ काल-पात्र-स्थान मुझको दुखित कर रहे थे तो उन्ही परिस्थित जन्य कारणों से उपजे आवेग में उक्त पंक्तिया मेरी डायरी के पन्नो में संकलित हुयी थी , और उस समय की अपनी ज्यादा लपलपाती जिह्वा से मैंने इसका बहुत बार प्रसार कर काफी तारीफे भी बटोरी थीं (अपने जैसे ही प्रताणित जनो से), शायद इसी कारण से ये पंक्तिया बार बार मेरे मानस पटल छाई रहती हैं ।
पर जब मैंने ब्लॉग लिखने का फैसला किया तो सबसे पहले मुझे सलाह दिया गया कि ब्लॉग पर कुछ भी लिखना मगर चंद नन्द और घोड़ी या उसके जैसा और कुछ मत लिखना... और मैंने भी उक्त सलाह को गाँठ बांध कर रख ली थी... मगर देश-समाज-धर्म-राजनीति और रोजी-रोटी से जुड़े हालात को देखते देखते ना जाने कब और कैसे वो गाँठ कहीं चुपके से खुल गयी...
तो अंतत: आज आपके समक्ष ब्लाग पर भी प्रस्तुत है... "चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी जनाब"
वैसे आपको सजग कर दूँ कि "चूतिया" शब्द हमारे लखनऊ में सामान्यतया मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाता है  पर जिस जगह पर रहकर मै ब्लाग अपडेट कर रहा हूँ वहां के लोग इसका मनमाना संधि-विच्छेद कर के इसे गाली में गिनते है .. अब आप चाहे जो समझे एक चूतिया की घोड़ी के हाथो तीर कमान से निकल रहा है.......तो आप मेरे तीर पर अपनी नजरे इनायत कीजिये.....

चंद लोग चूतिया होते है ,
उनसे आगे चूतिया-नन्द भी होते है ,
और जब-जब ऐसे चंद चूतिया ,
या फिर उनके नन्द चूतिया ,
तलवे चाटकर या किस्मत से ,
भूले भटके सत्ता में होते है ,
तो फिर चारो तरफ जहाँ तक ,  
उनकी भूंखी-नंगी दृष्टि पसरती है ,
और फिर जिनकी किस्मत के ,
वो बन जाते है भाग्य विधाता ,
वो सब जन आखिर मजबूरन या ,
स्वयं अपनी इच्छा से जुटते है ,
जब जब उनके रथ के आगे ,
तो फिर हाल देखकर उनका ,
जग देता है उन्हें एक ख़िताब ,
है अगर चूतिया स्वामी तेरा ,
तो फिर क्यों ना हुए आप
चूतिया की घोड़ी जनाब ।।
 © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

16.12.10

लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक

ना ना .... जरा दो मिनट रुक जाइये  

पोस्ट पढ़े बिना सिर्फ टाइटिल देख कर यह मत सोंच लीजिये कि मैं किसी हालीवुड की  'XX' या 'XXX' श्रेणी की फिल्म का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहा हूँ या किसी भोजपुरिया फिल्म का शीर्षक अपने ब्लाग पर लगा दिया है।

वैसे भी मै वही कहता या लिखता हूँ जो मेरे दिल की बात होती है और दिल की बात कहते समय मै शब्दों पर कम अपने भावों पर ही ध्यान देता हूँ , तो जो दिल में बात उठती है वो लगभग वैसी की वैसी ही सामने प्रगट हो जाती है बिना सेंसर हुए ...
सुना है ना आपने " पर्दा नही जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या ...."

और आज तो मै "लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी" के मध्य देश और समाज के विकास की भी बात करने जा रहा हूँ .....
अब आप भी सोंच रहे होंगे कि "लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम हुयी" जुमले का देश और समाज के विकास से क्या वास्ता..?
चलिए ज्यादा भूमिका बाँधे बिना पहले यह बताता हूँ कि आज अचानक यह विषय लेकर मै क्यों बैठ गया...

हुआ यह कि आज मै इतना त्रस्त हो गया कि मजबूरन यह पोस्ट लिखने के लिए बैठ गया....
और त्रस्त भी क्यों हुआ... हर पाँच मिनट पर मुन्नियों के बदनाम होने से ।

क्या ? आप सोच रहे है कि मै फिर शब्द जाल में उलझाने लगा...
नही नही ऐसा नही है...
वास्तव में यदि काल पात्र समय का सही से विवरण ना दिया जाय और बात को सन्दर्भ से अलग कर के एकतरफा देखा या प्रस्तुत किया जाय तो अर्थ का अनर्थ होने लगता है । और मै तो वैसे ही अनर्थकारी चर्चा छेड़ने जा रहा हूँ इसीलिए  प्रयास कर रहा हूँ कि इसमे अनर्थ की जगह अर्थ ही आप के समक्ष प्रस्तुत हो ..

आगे आपका विचार , उस पर मेरा नियंत्रण नही है ,

अरे जब लोकतंत्र के ज़माने के ऐ. राजा और स्थायी रोजगार की तलाश में लगे अंग्रेजो के ज़माने के दिग्गी राजा पर आज देश के सर्वश्रेष्ट व्यक्तियों में शामिल सोनिया जी और मनमोहन जी का नियंत्रण नही है और जिसके जो मन में आ रहा है वो अनाप सनाप तरीके से बेधड़क  होकर कर रहा है या रात नशे में किसी पुरातन धटना से सम्बन्धित कोई सपना देख कर देश का लाभ-हानि विचारे बिना सुबह महज अपनी कब्जियत दूर करने के लिए और अपना तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने हेतु कुछ भी बक दे रहा हो और वो दोनों चुपचाप तमाशबीन बने रह जाय वहां हमारा आपका एक दूसरे पर क्या नियंत्रण...?

तो फिर चलिए " लौंडा बदनाम हुआ.... से मुन्नी बदनाम होने तक के काल में हुए देश और समाज के विकास" पर सीधी बात..
आज १५ दिसम्बर की रात थी , और हिन्दू धर्म के लिए इस माह की यह आखिरी रात थी जब भोले-भाले नवयुवको को बलि-वेदी पर चढ़ाया जा सकता हो मतलब विवाह-वेदी पर बैठाया जा सकता हो,भोले-भाले नवयुवको की बात इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि आजकल बेचारे भोले-भाले नवयुवक ही घर परिवार,धर्म और समाज के कहने (उकसाने) पर बेदी पर बैठते है वरना जो भोले-भाले नहीं है वो घर-परिवार और समाज को ठेंगा दिखाकर ठसके से "लिव-इन" जैसे सम्बन्ध को अपनाने लगे हैं (हमारे ज़माने में तो जीवन साथी पाने का यह तरीका केवल अमेरिका जैसे देशो में ही था और बेचारा अपना मुल्क तब बहुत पिछड़ा हुआ था.., यह मत सोंचिये की अगर तब सुविधा होती तो मै क्या करता, यहाँ सवाल सुविधा होने और ना होने का है ) ।

तो समाज में रहने के कारण मुझे भी आज तीन-चार शादियों में शामिल होने का निमंत्रण मिला था, कहीं निमंत्रण वर पक्ष से था तो कहीं कन्या पक्ष से ।
हालाँकि आज मै अपनी रोजी-रोजगार के कार्य से कुछ ज्यादा ही थका था , साथ ही कुछ एसिडिटी की समस्या भी ना जाने कहाँ से पैदा हो गयी थी और कुछ मौसम भी सर्द था जिसके कारण कुछ भी खाने का मन भी नही था तो पहले सोचा कि कहीं ना जाऊं और बाद में ना आ पाने का कोई उचित कारण खोज कर क्षमा मांग लूँगा (क्योंकि मात्र थका होना, एसिडिटी होना और मौसम सर्द होना जैसे कुल तीन कारण किसी को ????-वेदी पर चढ़ाये जाने के अवसर पर ना शामिल होने हेतु शायद पर्याप्त नही है ) मगर फिर ख्याल आया कि कम से कम कन्या पक्ष के निमंत्रण का तो आदर किया ही जाना चाहिए तो मै तैयार हो गया ।

संयोग से कार्यालय की कार और उसका चालक भी अभी साथ ही था जिससे मुझे स्वयं से ज्यादा तकलीफ भी नही करनी थी बस अपना भार उस पर ( कार पर भौतिक रूप से और उसके चालक पर मानसिक रूप से ) लाद देना था और एक जगह से दूसरी जगह उपस्थिति दर्ज कराकर वापस आ जाना था । और संयोग से मेरे एक अजीज बड़े भाई साहब भी साथ ही थे तो सफर में बात करने वाला भी मिल गया, फिर क्या था चल पड़े सवार और सवारी।

यात्रा की शुरुवात करते समय तक जो दुश्वारियां गिनाई वो तो थी ही अब गोरखपुर जैसे पुराने शहर की असली समस्या सामने आने लगी कि,  हर सड़क-हर गली और शायद पूरा शहर आज बारात और उसके बारातियों से जाम है , तो कार से किया जाने वाला सफ़र भी पैदल यात्रा के समान ही था और फिर जैसे ही एक बारात या मैरज-हॉउस से आगे बढ़े वैसे ही फिर अगला मिल जाय.... 

आखिर में खींझ कर मैंने अपने सहयात्री से कहा " देख रहे है भाई साहेब आज भाई-बंधू और समाज के लोग कितने स्वार्थी और दूसरों के दुःख में खुश होने वाले हो गए है कि बेदी पर चढ़ने जाते हुए एक मासूम के भावी परिणाम को सोच कर मारे ख़ुशी के नाच- नाच कर "चांस पे डांस" का अवसर नही खोना चाहते है ।
भाई साहेब ने जबाब दिया कि कहाँ भैया...! देख रहे हो आज तक कभी कोई बारात बिना "यहाँ  चौड़ी छाती बीरो की...इस देश का यारों क्या कहना ..."  जैसा जोशीला गाना सुने बिना उठ पाती है ?

तभी मुझे ध्यान आया कि पिछले पौन घंटे से हर पाँच मिनट पर जो गाना सबसे ज्यादा बार-बार बज रहा है वो तो "मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए" है । और यह ध्यान आते ही मेरे मन में ख्याल आया कि पहले तो बचपन में मै जब किसी शादी-बारात में जाता था तो ज्यादातर लोग "बारात में नाचने गाने वाली नचनियों की पार्टी जिसमे शामिल महिलाओं को उस ज़माने में पतुरिया कहा जाता था" को ले जाते थे और फिर पूरी रात नाच गाना चलता रहता था , वर और कन्या पक्ष दोनों तरफ के लोग खा-पी कर शुरू से अंत तक नाच गाना देख-सुन कर आनंदित होते रहते थे और उस ज़माने में वो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त मर्यादित आचरण ही था हाँ नचनियों को ना लाना जरुर वर पक्ष को अपमानजनक स्थित में पहुंचा देता था ....

तो उस ज़माने में जो गाना सबसे ज्यादा प्रचलित था वो "लौंडा बदनाम हुवा नसीबन तेरे लिए " ही था क्योंकि वो आज भी मुझे याद है , और मुझे यह भी याद है की बचपन में मैंने किसी से इस गाने का अर्थ जब पूंछा था तो जबाब में शायद थप्पड़ ही मिला था अर्थ तो समय ने समझाया ।

तो दोनों गानों के बोल एक साथ जेहन में आते ही एकाएक मुझे समझ में आया कि मेरे बचपन से लेकर अब तक वास्तव में देश और समाज ने क्या क्या प्रगति कर ली है और क्या क्या परिवर्तन हो चुके हैं ? मैंने भाई साहेब से कहा देखिये पहले की बारात और आज की बारात में क्या क्या अंतर आ गया है ...

पहली प्रगति:- पहले लौंडा बदनाम होता था और अब मुन्नी बदनाम होने लगी है ....  अर्थात पुरुष वर्चस्व समाप्त हो गया , महिला वर्ग की भी खुले आम भागेदारी सामने आने लगी है ।

दूसरी प्रगति:- सट्टा बंधा कर अनावश्यक दूसरों पर पैसा खर्च कर एक-दो नाचने वालियों की जगह समाज में आया ज्यादा खुलेपन के कारण अब घर परिवार, दोस्तों के परिवार और मोहल्ले से बारात में आने वाली महिलाएं ही बारात में नाच कर बराती,घराती और मार्ग पर चलने वाले लोगों के मनोरंजन की जिम्मेदारी अपने कंधो (मतलब अपने कमर पर) ले चुकी हैं ,जिसके कारण पतुरिया जैसा भौड़ा शब्द भी कहीं ना कही अपनी मान्यता खो चुका है, खर्चा कम होने लगा है, नाच गाने हेतु दूसरों पर निर्भरता समाप्त हो गयी है । इस प्रगति से कृपया महिलाएं नाराज ना हों क्योंकि पुरुष तो पहले भी जन्मजात नचनिया था आज भी है ।

तीसरी प्रगति :- पहले प्राय: बेचारे घराती अपना पेट पकडे  और मुह बाँधे चुप-चाप तब तक इंतिजार करते थे जब तक बाराती ना डकार ले लें , मगर अब ज्यादातर पहले घराती ही डकारता है फिर जूठे-कूठे मेज , स्टाल पर बेचारा बराती भोजन करता है अर्थात घरातियों पर बारातियों की श्रेष्ठता लगभग समाप्त हो गयी है

चौंथी प्रगति :- पहले बिकाऊ दुल्हे के पिता द्वारा दहेज़ मांगे जाने पर और उसे उचित मूल्य ना चुका पाने पर ना केवल कन्या का पिता वरन कन्या पक्ष के अन्य सम्मानितगण भी अपना शीश नवाने लगते थे और अब ज्यादा मोल भाव करने पर दुल्हे , उसके पिता और लगे हाथ बारात में शामिल बे-सहारा बाराती भी दो पल में लतिया-जुतिया दिये जा रहे हैं , आगे का सत्कार बड़ी ससुराल में होने लगता है , तो दहेज़ की समस्या का भी कुछ-कुछ निदान हो रहा है

पाँचवी प्रगति :- जैसा की पहले ही कह चुका हूँ कि जो बेचारे भोले भाले नही है उनको इन सब बन्धनों से दूर कहीं शांति और ज्यादा खुलेपन से अभी तो भारत के मेट्रो शहरों में लागू लिव इन रिलेशन को अपना लेने की सुविधा मिलाने लगी है, आगे उम्मीद है कि पूरे देश में इसकी मान्यता मिल ही जाएगी ।

और सबसे अंत में
छठवीं प्रगति :- अब तो भारत में भी शादी करने और हनीमून मनाने हेतु एक कन्या और एक युवक के जोड़े के होने की बाध्यता समाप्त हो रही है , कानूनन अप्रत्यक्ष  रूप से सहमति देश का विधान दे ही चुका है , आगे भारत के भावी कर्णधार पूत उसे नवीन दिशा दे ही देंगे जिससे पूरब और पश्चिम का अधिकांश अंतर समाप्त हो गया है और जो शेष रह गया है वो भी जल्दी ही समाप्त हो जायेगा और फिर पूरब पश्चिम से आगे होगा

तो चलिए बात समाप्त करता हूँ , आगे मुझसे सहमत होना ना होना आपकी मर्जी ... वैसे भी मुझे इससे कभी फर्क नही ही पड़ता है ..क्योंकि रात बहुत ज्यादा हो गयी है , और कई शादियों में शामिल होने के बाद भी मुझे भूंखे पेट (एसिडिटी के कारण) सोना भी है ।

आपका अपना (यही लिखा जाता है कुटनीतिक तौर पर जबरदस्ती अपनापन दिखने के लिए)
विवेक (मिश्र..अनंत)
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

5.12.10

यदि इम्तहान उनका है ये , तो इम्तहान मेरा भी है ।

किसी ने क्या खूब कहा है :-
"वो बुझाये मै जलूँ , यह जुस्तजू दोनों में थी ।
इम्तहां उनका भी था , और इम्तहां मेरा भी था ।।"

आप सभी का पुन:  स्वागत है..

मै नही कहता कि मैंने  , किसी दर पर शीश झुकाया नहीं ।
पर हर दर पर फ़ौरन मुझको , शीश झुकाना भाया नहीं ।
यूँ वो भी कोई शीश है जो , हर दर पर झुक जाता हो ?
पर वो दर भी क्या दर है , जो शीश झुका ना पाता हो ?
अगर नहीं है मन में श्रधा , फिर शीश झुकाने का क्या मतलब ?
दिल में नही है चाह अगर , तो सीने से लगाने का क्या मतलब ?

मत कहना अभिमान इसे , ये तो है निर स्वाभिमान ही ।
शीश झुकाने का आडम्बर , कर सकता कोई बेईमान ही ।
हाँ कुछ दर ऐसे भी होते हैं , जिनको भाती है चाटुकारिता ।
सत्ता मद में होकर चूर , वो करते जाते हैं व्याभिचारिता ।
ऐसे दर जब मुझे झुकाना चाहेंगे , मै शीश उठाये रखूँगा ।
वो डर, भय लोभ दिखायेंगे ,  मै फिर भी सच ही बोलूँगा ।


विजय किसे मिल पाती है , वक्त ही तय कर पायेगा ।
स्वाभिमान और आडम्बर, जब आपस में टकराएगा ।
जब गरिमामय होगा दर , मै स्वयं से शीश झुकाऊंगा ।
वर्ना हर दर से मै वापस , बिना शीश झुकाए जाऊंगा ।
यह तो है एक इम्तहान , जिसे हम दोनों को देना है ।
यदि इम्तहान उनका है ये , तो इम्तहान मेरा भी है ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

19.10.10

नक्कारखाने में तूती की आवाज

यसवंत जी
माँ , माँ होती है , उसके दुखों को सारा जग महसूस करता है...मुझे भी अपार दुःख और छोभ है
हम आपके साथ हैं..

इस समय मै आपसे यही कह सकता हूँ की ............


नक्कारखाने में तूती की आवाज भले दब कर रह जाती हो,
भीड़ के शोर में लूटे-पिटे लोगों की चीख न सुनी जाती हो ।

रात के अँधेरे में कुछ काले साये नजर बचाकर निकल जाते हों,
झूंठ को बचाने की जद्दोजहद में सच को भले लोग भूल जाते हों।

परोपकार का मुलम्मा लगाकर स्वार्थी अपना भला करते जाते हों, 
बेंचकर अस्मिता देश की नित नेता अपनी राजनीत चमकाते हो।

साधुवों के भेष में चोर-डाकू लम्पट छुप जाते हों,
बेचने को ईमान अपना  लोग बाजार सजाते हों।

फिर भी कभी महत्व तूती का नहीं मिट जाता है, 
ना ही सच की जगह, झूंठ दूर तक चल पाता है।

लगे भले ही देर मगर इन्साफ मिल ही जाता है, 
अंत में! सुखद अंत देर से ही सही पर आता है......।।

विवेक मिश्र 'अनंत'