Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

4.2.10

हरिद्वार -महाकुंभ 2010

 हरिद्वार में अखाडों की पेशवाईयों के विभिन्न पहलू







हरिद्वार महाकुंभ में अखाडों द्वारा शाही पेशवाइयों में विभिन्न रंग दिखायी दिये धर्म व संस्कृति के साथ साथ सामाजिक जनजागरूकता के संन्देश भी छाये रहे.............प्रस्तुत है अखाडों की पेशवाईयों की झलकियां ।










































































आखिर यह देश किसका ?

आज सुबह से ही सोच रहा हूँ की आखिर यह देश किसका है ? कुछ बातें ऐसी होतीं हैं की सोचने पर मजबूर कर देती है मैं भी कुछ इसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूँ |मेरे दोस्त कहते हैं की मैं राजनीती की ही बात करता हूँ |आखिर आप ही बताएँ बात भी क्या करूँ, देश में इसी शब्द की तो मांग है
मैं सोच रहा हूँ की क्या बताऊंगा जब कोई मुझसे यह पूछेगा की आप बतलायिए की यह देश वाजिब में किसका है तो क्या कहूँगा मैं ? मैं पशोपेश में हूँ ,मैं सोचता हूँ की यह देश हर किसी का है| जब हमनें देस्व्ह की आजादी की खातिर लड़ाई लड़ी थी तब तो हमारा देश था भारत लेकिन आज देश नहीं हमारा धर्म और राज्य ही सब कुछ हो गया है |किसी से पूछो की आप कहाँ से हैं तो वह कहेगा की मैं तो यूपी का हूँ मैं पंजाबी हूँ कोई शुरू में नहीं कहता की मैं भारत का हूँ ? आज देश की समस्या का यही कारण है |आज हमारे आपके जैसे लोग जो थोडा बहुत अपने को ज्ञानवान कहतें है अपने को छोड़कर दूसरे की बात शायद ही कभी करतें हैं |सिर्फ मैं खुश रहूँ यही बात हर हमेशा आज हर कोई सोच रहा है |देश का चाहे जो भी हो उन्हें क्या मतलब उनको तो ठीक ठाक जीवन बिताने के लिए पैसा मिल ही जाता है ,दुसरे चिजों से क्या काम ?सच बात तो यह है की आज हम मतलबी और स्वार्थी हो गएँ हैं |दुसरे के सुख दुख मे कभी हम मिल्कर साझीदार होते थे पर आज हमारे बीच दुरियाँ हो गयीं हैं| आज हम अपने पड़ोसियों को नहीं पह्चानते तक नहीं है क्या कारण है इसका ? लेकिन जब देश मे क्रेडिट लेने की बात आती है तो हम सबसे आगे रह्तें हैं
यही तो एक कारण है की आज हमारे देश मे इतनी गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है|देश आज दो धुरियों में विभाजित हो रहा है लेकिन फिर भी किसी का सही से ध्यान इस ओर नहीं गया हैं अब आप ही बताएँ की यह देश आखिर है किसका ?

आप भी जाने अमृत 'वाणी'..com के बारे में


कम्प्यूटर टीवी ओर मोबाईल से हर जमात में अन्दरूनी तब्दीली का ऐसा दौर चला कि जिनके कभी मुंह भी ढंग- ढांग के नहीं थे उनमे कई लोग आजकल बहुमंुखी प्रतिभाओं के धनी हो गए । कुछ बरसांे पहले तक जिनकी जिन्दगी का कोई स्पेशल परपज नहीं था ,उनमें कितने ही मल्टीपरपज हो कर ‘'अधजल गगरी छलकत जाय’’ वाली उक्ति को पूर्ण चरितार्थ करने में लग गए ।

भूल- भूलैया नुमा इस दुनिया की उबड़-खाबड़ पथरीली अंधेरी घाटियों में भटकते-भटकते अनगिनत पत्थरों से अनगिनत ठोकरंे खाते-खाते इन लहूलूहानी कदमों को कुदरती तजुर्बे के कुछ किमती हीरे मिल ही गए ।

मां शा रदा की खास मेहरबानी से कलम और ख्याली औजारांे से वक्त के खाते में से वक्त बेवक्त कुछ-कुछ वक्त निकाल कर उन तमाम हीरों को जहंा तक मुनासिब हुआ तराशने की मैं मेरी ओर से लाजवाब कोषिशें करता रहा हूं । तराशते -तराशते अल्फाजी अक्ष जिस-जिस सूरत पर आकर ठहर गया मैं वही उसकी मुक्कमल मंजिल मान कर रूहानी कामयाबी के उन नूरानी पैमानों को दिल से आखिरी सलाम अर्ज कर छोटी सी जिंदगानी के सफरनामें की मेरी छोटीसी किताब के पन्ने पलटता गया ।

मेरी वेब साईट मेरे निजी ख्यालों का यानि कि जिंदगी से जुड़े हुए रूहानी नजरियों का वो कागजी पुलिंदा है जो ठसाठस भरे हुए बैंक लोकर्स से भी लाखों गुना ज्यादा अपनी जाईन्दा औलादों की तरहां बेहद अजीज है।

मेरी नज्में मेरी तहरीर के ये मीठे खंजर आपके जिगर के आजू-बाजू होकर निकल जावेंगे या किसी मुसाफिर की तरहां कुछ पल ठहर सकेंगे ।

बेशक यह भी मुनासिब है कि मेरे ख्याल आपके दिलों दिमाक में मकान मालिक की तरहां जम जाए और आपके पुष्तैनी सोच को भटकता हुआ राहगीर बनादे । मेरे तोहफों का आखिरी अंजाम किसकिष्म का होगा इस मुतालिक इस वक्त मैं आपसे कोई वादा इसलिए भी नहीं करना चाहूंगा कि मैं वादा खिलाफीको कतई पसंद नहीं करता हूं ।

मुझे तो बस इतनीसी बात परी ही बेहद नाज है कि ये नुष्खे, नज्म ,षायरी,मुक्तक और रूबाइयां ये तमाम अक्ष मेरे रूहानी अल्फाज हैं । मेरे जजबात जमाने के जिगर के वास्ते किस हद तक मरहम का काम करने में कामयाब होंगे या कितनी माकूलन सीहत ,कितना षुकुन ,कितनी तसल्ली ,कितनी खुषी दे सकेंगे ये फैसलें भी आने वाले वक्त की आम जबान से हीसुन सकेंगे । इनके वास्ते आज मैं मेरी ओर से कोई भी वक्त मुकर्रर नहीं करने की गुस्तखी नहीं कर सकता हूं ।

मेरी कलम कभी स्ट्र्ीम कभी डीजल तो कभी इलेक्ट्र्कि टे्र्नों की माफिक अपनी ही बिछाई हुई पटरियों पर वक्त बेवक्त अक्सर चलती ही रही । कभी पटरियों पर ट्र्ेन तो कभी ट्र्ेन पर पटरी माजरा कैसा भी रहा हो मगर रफ्तारे सफर बरकरार रही ।

मुनाफे की उम्मीदों में हर रोज घाटा खा-खा कर भी आज दिन तक लगातार चलते रहने का कुदरती मादा इन कदमों में अब तलक कैसे बरकरार है यह होंसला और यह राज बेशक काबिले तारीफ है।

मेरी नज्म की नब्ज देख-देख कर जमाने की बदलती तष्वीरों का अंदाजा मामूली समझदार शख्स की बड़ी आसानीसे लगा सकेंगे । मसलन मेरी कलम कभी मजहबी ईबादत में झुकी रही तो कभी वतन को , कभी खुद के दिल को कामयाबी हासिल कराने में अक्सर मददगार रही ।

मंच के कई फनकारों की निजी डायरियों के किसी न किसी कोने में ‘राजस्थानी ’हास्य कवि अमृत‘वाणी’ के नाम से मेरे फोन नं. व पता आसानी से पढ़ने में आ जाए इस तरह कई डायरियों में उतारे गए हैं । राजस्थानी जबान में कई चालीसा काव्य हास्य व्यंग्य रचनाएं एक खण्ड काव्य ;राजस्थानी सुंदर काण्ड.,हिन्दी में कुछ व्यंग्य कविताएं उर्दू में मुक्तक गजल, षायरी, अंग्रेजी में कविताएं और अनमोल वचन आदि कई प्रकार की रचनाओं की रचना करते रहना और उन्हे एक से एक खूबसूरत शक्ल देते रहना मेरा वह पैदाईषी हूनर है जो ताजिंदगी मेरी पीढ़ियों की जिंदगी नवाजता रहेगा ।

मेरा मेहनतकश दिल वो अजिब गुलदस्ता है जिसका एक-एक गुल अपने आपमें जन्नती गुलशन है ।

आइए! आइए! जनाब आप रोज-रोज आते रहिए मेरी इस वेब साईट पर । मुझे पूरा-पूरा यकीन है कि जब-जब भी आप इस चमन में दाखिल होंगे हर बार एक से एक नई खुशबू आपका ऐसा साया बन कर साथ चलेगी कि जिंदगी के मुरझाए हुए तमाम फूलों को कई बरसों तलक तरो ताजा रख सकेंगी ।

अमृत‘वाणी’






अधिक जानकारी के लिए हमारी वेब साईट पर लोग इन करे :-व्व्व.अमृतवाणी.कॉम
आप हमें मेल भी कर सकते हे हमारा mail id हें |
info@amritwni।com / amritwni.com@gmail.com

सठिया गए हैं बाल ठाकरे............


पहले सचिन तेंदुलकर और अब शाहरुख़ खान, दोनों को ही सामना करना पद रहा है बाल ठाकरे के तीखे तेवरों का. अब पता नहीं किसकी बरी आएगी??????? आखिर चाहते क्या हैं बाल ठाकरे????? किसी को भी कुछ भी बोलना शायद आदत बन गयी है बाल ठाकरे की. हाल ही में शिवसेना की पत्रिका सामना में बाल ठाकरे का राहुल गाँधी पर १ बयां आया की सही उम्र में शादी न होने से राहुल अपना आपा खो बैठे हैं. किसी के निजी ज़िन्दगी पर हस्तक्षेप करना ऐसा उम्रदर और नमी शक्सियत को शोभा नहीं देता. भला यह कौन समझाए बाल ठाकरे को, और तो और यह भी कहा मुंबई सभी भारतियों की है लकिन किसी इतालियन मम्मी की नहीं हो सकती. मैं तो बाल ठाकरे को बहुत ही समझदार समझता था, पर शायद बाल ठाकरे भी निकले पढ़े लिखे गंवार, वो भूल गए की सोनिया गाँधी ने भारतीय मूल निवासी से शादी की और भारत की नागरिकता भी सोनिया गाँधी को हासिल हैं, क्या बाल ठाकरे अपने कानून को भारत के कानून से ज्यादा महत्व देने लगे हैं और अगर वो ऐसा करना चाहते हैं तो यह तो सरासर बेवकूफी कहलाएगी. कभी कभी बात करने लगते हैं की महाराष्ट्र में सिर्फ मराठियों को ही नौकरी मिलनी चाहिए. मैं कहता हूँ सिर्फ नौकरी ही क्यूँ धंधे भी वोह सिर्फ अपने महाराष्ट्र तक सीमित करलें और बेच के ही देखे मुंबई में बने हुए कई चीज़ों को जिसमे कार से लेकर धागे तक भी शामिल हैं, क्या सिर्फ महाराष्ट्र के बाज़ार से ही महाराष्ट्र तरक्की कर लेगा. और यह भी कहता हूँ जिस दिन महाराष्ट्र के अलावा बाकि राज्यों ने मुंबई में बने कार और दुसरे वस्तुएं खरीदना बंद कर दिए तो उस दिन मुंबई भी सिर्फ १ गाँव के अलावा कुछ नहीं रहेगा, पर ये बात बाल ठाकरे को समझ में कहाँ आएगी. क्यूंकि अब तो मुझे यकीन हो गया है की बाल ठाकरे अब सठिया गए हैं, और सठियाये हुए लोगों की बातों का मुद्दा बनाना बेवकूफी है. अपील है मेरी टीवी चैनलों से की बाल ठाकरे की बेहूदा टिप्पणियों को प्रमुखता से दिखाना बंद करें, और यह मान लें की बाल ठाकरे सठिया गए हैं.

आइफा अवार्ड समारोह हुआ सम्पन्न










































































































3.2.10

हम्माल

हम्माल

उस

सियाले में

अकस्मात

जंगल की हवा में समाहित

वनद्रुमों की मदनीय सुवास से

नहाई शाम में

घर लौटे

धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग

लगढग नग्न

लीतड़ा पहने

युगों से विशाल भार को काँधें लिये

आदिम रहस से भरे अंतस की

पहरेदारी करता

वह हरहठ

युवा हम्माल

जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते

श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित

कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती

गहन सिसियाँद से बेपरवा

सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर

उस के जाँगर पर आसक्त

वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी

उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह

पसीनाई चेहरा

जिस पर झुकती है वह

साँझ की तरह

दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में

और डूब जाता है वह युग्म

प्रेम के गहन पुरातन पाश में।

प्रणव सक्सेना

amitraghat.blogspot.com

लो क सं घ र्ष !: अब पशु भी हिन्दू मुसलमान होने लगे

अब कातिलों को भी जाति और धर्म के नाम पर पहचान की जा रही है वास्तव में कातिल कातिल है उसकी कोई जाति है उसका कोई धर्म है, लेकिन समाज में नियोजित तरीके से जो देश की एकता और अखंडता को नहीं बनाये रखने में विश्वास करते हैं वह लोग कातिलों को हिन्दू, मुसलमान सिख, ईसाई में बांटने लगे हैंक्या महात्मा गाँधी की हत्या, श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या, राजीव गाँधी की हत्या क्या हिन्दुवों ने की है ? मैं कहूँगा नहीं संविधान न्याय कहेगा नहीं, कातिल कातिल है, दंगाई दंगाई है , लुटेरा लुटेरा है, आतंकी आतंकी हैजब कुछ इनकी पैरवी करने वाले लोग जाति और धर्म के नाम पर पैरवी करने लगते हैं और गलत तथ्यों के आधार पर झूंठे आंकड़े पेश करने लगते हैं तो वह किसी कातिल की पैरवी कर रहे होते हैं उसके गुनाह को छोटा करके धर्म के आधार पर दूसरे का गुनाह बड़ा करके बताते हैंजोश में होश खोकर वह संविधान देश विरोधी हरकतें करने लगते हैंविष वृक्षों की नई-नई नर्सरियां पुराने इतिहास के गलत तथ्यों पर तैयार करते हैं उनका राष्ट्रवाद सिर्फ इतना है कि जाति और धर्म, क्षेत्र और भाषा के नाम पर हमारे समाज में युद्ध होता रहे और साम्राज्यवादी शक्तियों के मंसूबे पूरे होते रहे
अब लोग हिन्दू टाईगर्स भी होने लगे हैं उनकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ कि हिन्दू मैथोलॉज़ी के मानने वाले काफी लोग शाकाहारी हैं और टाईगर्स शुद्ध मांसाहारी हैयह टाईगर किसका मांस खाना चाहता हैअपने देश के किसी नागरिक का ? कल को धर्म के आधार पर टाईगर पैदा होने लगेंगे तब इंसान और इंसानियत क्या रहेगी ? अच्छा यही है कि टाईगर मत बनो, लुप्तप्राय वन्य जीव है। चिड़ियाघर में जगह खाली है रहने का शौक है तो आराम से वहां रहो। हिन्दू टाईगर नहीं होता है वह सौम्य, दयालु करुणामय तथा सर्वे भवन्ति सुखना में विश्वास रखने वाला है

सत्ता की ओछी राजनीती !!!!!!!!

एक समय वो था जब गाँधी के विचारों की धूम थी...हर लफ्ज़ से एक विचार टपकता था..लोगों का एक हुजूम उनके पीछे अहिंसा की पूजा करने निकलते थे...जुल्म और सितम की हदों को पार कर विचारों को रौंदने वाले अंग्रेजों ने भी उस महान आत्मा के आगे अपने आप को नतमस्तक कर दिया...उन विचारों ने भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में अपना परचम लहराया और एक नयी मिसाल कायम की...अहिंसा के उस महान पुजारी को सहत्राब्दी पुरुष का स्थान दिला दिया जिसने एक सुनहरे भारत का सपना देखा था...वही गांधी आ जिनके अनुयायी भारत में तो नहीं बचे हाँ लेकिन दुनिया के हर कोने में जरुर मिल जाते हैं उनके विचारों को आत्मसात किये...शान्ति का एक सन्देश लिए हुए....वहीँ गांधी जिनके सपनों का भारत एक आदर्श भारत होता....लेकिन आज उसी भारत में अहिंसा और झूठ ने इस क़दर अपने पाँव पसार लिए हैं की सत्य और अहिंसा के लिए शायद जगह ही नहीं बची...हर मोड़ पर..हर गली में सिर्फ एक ही चीज दिखाई देती है....हिंसा हिंसा और हिंसा.....
ये वही भारत है जिसकी आज़ादी के लिए भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद ...सुभाष चन्द्र बोस जैसे लोगों ने अपने जान की आहुति दे दी.....सिर्फ एक सपने के लिए जिसमे उन्होंने देखा था की उनका भारत और उसमे रहने वाले लोग हंसी ख़ुशी एक साथ रहेंगे.... आज़ादी के बादयहाँ अमन होगा चैन और सुकून होगा कुछ ऐसा ही सपना होगा उन लोगों .... उन लोगों ने गोरों को तो भगा दिया...लेकिन उन तानाशाह अंग्रेजों को नहीं भगा पाए जो आज अपनी अंग्रेजी भूल मराठा राग अलाप रहे हैं... हमारे परम पवित्र संविधान में ये लिखा है की " हम भारत के लोग भारत की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता को बचायेंगे"वहीँ संविधान के एक अंश में ये भी लिखा है की भारत में द्विशासन प्रणाली तो होगी लेकिन नागरिकता सिर्फ एक होगी....वहीँ ये भी लिखा है की यहाँ की नागरिकता सिर्फ और सिर्फ एक होगी यानी भारत में रहने वाला निवासी भारतीय होगा और उसे भारत में कहीं भी रहने और रोजी रोटी का जुगाड़ करने का अधिकार होगा...लेकिन ऐसा हो नहीं रहा....खुलेआम भारतीय संविधान की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं और हमारा प्रशासन खामोश है....
ओह!!!! नहीं हमारा प्रशासन खामोश नहीं हम खामोश हैं...!! क्यूंकि हम ही हैं वो जिन्होंने उन्हें ये अधिकार दे रखा है की वो कुछ भी करें हम कुछ नहीं करेंगे...हाँ!!!! शायद ऐसा ही है नहीं तो उनकी क्या मजाल की हमें बिहारी..उत्तरभारतीय....गुजराती और मराठी कह कर बुलाएँ...!!!
आज महाराष्ट्र में किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती की वो किसी को बिहारी या उत्तरभारतीय कह कर नहीं डराता!!! एक बात शायद उन्हें नहीं पता की अपने घर में तो कुत्ता भी शेर होता है.....और तो और आज सामना में हिंदुत्व के कथित रखवाले बाला साहेब ठाकरे जी का बयान सुना तो बड़ा ही अचरज हुआ...उन्होंने ने कहा है की भारत सबका है और मुंबई में सबको रहने का अधिकार है लेकिन ये कोई धर्मशाला नहीं है....अरे गुरुदेव !! अगरसबको रहने का अधिकार है तो धर्मशाला की बात कहाँ से आई...भाई हम तो अपने घर में हैं...तो आप होते कौन हैं हमें भगाने वाले...अमारे बुजुर्गों ने सही ही कहा है की ६० साल के बाद आदमी सठिया जाता है....अब इसके आगे तो मैं कुछ नहीं कहूँगा....
हाँ!! अब बात आती है की आखिर ये सब हो क्यूँ रहा है....सब ये कह रहे हैं की ये देश सबका है तो आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है और अगर एशिया है तो सिर्फ बयान ही क्यूँ आ रहे॥!! आखिर कुछ ऐसा क्यूँ नहीं हो रहा की इसका कोई पुख्ता हल निकाला जा सके...शायद ये मुद्दा राजनीति के गलियारों में सत्ता पाने का अच्छा जरिया बना हुआ.....खैर कुछ भी हो मैं तो ठाकरे बधुओं की कोई गलती ही नहीं मानता...मैं तो उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्य सरकारों को ही दोष दूंगा और उनसे कहूँगा की आप बयान बाजी न ही करें तो अच्छा है...भाई अब बयान बाजी करने का क्या मतोलब...जब काम करने का वक़्त था तब तो आप लोगों ने खूब गुलछर्रे उडाये......अब ब्यान बाजी कर रहे हो....भाई अगर कुछ करना है तो कुछ ऐसा करो की बिहार और उत्तर प्रदेश स लोगों का पलायन ही न हो......और अगर नहीं तो चुप करो क्यूंकि अब तक तो जो था वो था ही....जिस यु पी ..बिहार ने लाखों लोगों को ज़मीन से आसमान पर पहुँचाया है वो लोग ये भी जानते हैं की किसी को कैसे गिराना है...ये बात तो शायद आप लोगो ने सुनी ही होगी की " जब गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की ओर भागता है" वैसे ही जब किसी को अपनी बर्बादी करवानी होती है वो यु पी...बिहार की से पंगा लेता है....
जय हिंद...!!!

ख़त्म होते भारत के शेर........



पन्ना,4 दिसंबरः मध्यप्रदेश के "पन्ना टाइगर रिजर्व" के पर्यटक जोन में पिछले लगभग दो माह से सैलानियों को बाघ दिखायी नहीं देने से जहां उनमें गहरी निराशा है. वहीं क्षेत्रीय लोग बाघों की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाने लगे हैं.
इस क्षेत्र में आने वाले वन्य जीव प्रेमी पर्यटक बाघ के दर्शन न होने पर तेंदुआ आदि को देख कर ही संतोष कर रहे हैं.ब्रिटेन से आये पर्यटकों के एक समूह ने यूनीवार्ता को बताया कि उन्होंने लगभग एक सप्ताह तक प्रयास कि या लेकिन बाघ के दर्शन नहीं हुये.

क्या ऐसी ही हालत थी "पन्ना टाइगर रिजर्व" की नहीं न? तो भला अब भारत में ऐसी स्थिति कैसे आ गयी. हाल ही में १ सर्वे से पता चला की भारत में अब सिर्फ १४०० के लगभग शेर बचे हैं. मतलब हमारी आगे आने वाली पीढ़ी शेर के बारे में वैसे ही पढ़ा करेगी जैसे की हमने "दयानासौर्स" के बारे में पढ़ा है.

ऐसी स्थिति सिर्फ शेर की नहीं बल्कि हाथी और गेंडों की भी है.
१ रिपोर्ट अनुसार नई दिल्ली, २००९, 27 फरवरीः देश के विभिन्न इलाकों में जंगली जानवर का शिकार बेधड़क जारी हैं. सरकार ने माना है कि पिछले तीन वर्षो में 10 बाघ और 57 हाथियों का शिकार किया गया है, लेकिन 105 घड़ियाल केवल करीब ढ़ाई माह में और पिछले लगभग सवा वर्ष में 11 गैंडे मारे गये.
पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री एस रघुपति ने आज लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि 8 दिस्मबर 2007 से 2 फरवरी 2008 के बीच 105 घडियाल मारे गये हैं. उन्होंने हालांकि कहा कि इसके कारण का अभी पता नहीं चला है.
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्योग और असम के आसपास के इलाकों मेंवर्ष 2007 में 18 और 2008 में अब तक 4 गैंडों का शिकार किया गया. उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्ष में देश के विभिन्न हिस्सों में 10 बाघों और 57 हाथियों का शिकार किया गया. इसके अलावा इसी अवधि में 4 बाघ और 21 हाथी कथित रुप से सड़क दुर्घटनाओं में मारे गये.

इनसब वारदातों के कारण साफ़, शेरोन की खाल हाथी के दन्त और गेंडों की सिंह की भरी मात्र में तस्करी और कालाबाजारी.
टाइगर रिजर्व के बारे में बहुत से लोगों ने पहले भी लिखा है पर अब सिर्फ किताबों में पढने का वक़्त नहीं रहा. अगर आपको वाकई में भारत के वन्य प्राणियों को बचाना है, या फिर आप चाहते हैं, की विदेशी सैलानी भारत के वन्य प्राणियों का आनंद ले जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को भी मदद मिले तब कुछ करना होगा. रोक लगानी होगी इनके शिकार पर, अगर आपको किसी भी वन्यप्राणी की तस्करी या शिकार की खबर मिलती है तो तुरंत ही अपने क्षेत्र के वन विभाग अधिकारी को इसकी सूचना दें अगर सरकारी कर्मचारी भी इसे लेकर जिम्मेदार नहीं तो आप मीडिया कइ भी मदद ले सकते हैं.

2.2.10

जनपक्ष का हमारा प्यारा कोओरडीनेटर रिकी

जनपक्ष आजकल एक ऐसी पत्रिका जिसने पूरे उत्तराखंड में तहलका मचाया। मैं शुरू से ही इस पत्रिका के साथ जुड़ गया था कारन था रामनगर से गणेश दा का फ़ोन आया था की जनपक्ष एक बड़ा मैगजीन है और तुम जरुर ज्वाइन करो। ओ पी पाण्डेय भाई भी इसी के लिए काम कर रहे हैं। हम बस पकड़ कर देहरादून होटल द्रोण में पहुँच गए। एक रूम में हम रुके सुबह एक मीटिंग थी और साथ में ही एक कॉर्पो रेट टाइप की पार्टी भी थी। इसी दौर में हमारा परचिय जनपक्ष के कोओरडीनेटर रिकी से भी कराया गया। पहली बार ऐसा लगा था की किसी हाउस में काम कर रहें हैं। रिकी को तब करीब से जाना जब जनपक्ष के शाश्त्री नगर गली नंबर चार हरद्वार रोड देहरादून पर पहुंचा। रिकी पूरी जनपक्ष की टीम में सबसे अलग था। सभी को ही ऐसा लगता था। वोह हमेशा मजाक के मूड में रहता था पर अपने काम के लिए काफी गंभीर रहता था। डेस्क के अंदर कभी कभार तू तू में में हो जाया करती थी जो हर एक बड़े संसथान में होती है। मुझे अच्छा नहीं लगता था पर रिकी बीच में आ कर चुटकी जरूर लेता था। और ऐसी मजाक करता था की सब तनातनी छोड़ कर फिर से सहज हो जाते थे। वोह भी ऐसे समय में जब सभी की चहेती पत्रिका का पाठक आशा लगाके रहता था की इस बार का अंक पिछले से भी अच्छा होगा। पर जब किसी भी बड़े संस्थान में माहोल सहज ना हो तो सर्जना भी अच्छी नहीं हो सकती और पाठकों को भी वोह नहीं मिल पाता जिसकी उमीद के साथ वोह अपने दस रुपए खर्च करतें हैं। माहोल सहज हो जाये तो ऐसी सर्जना के पड़ने वाले को दिल को छू जाये। रिकी को कोई कुछ भी कहे वोह बुरा नहीं मानता था वो हमेशा मुस्कराता रहता था शायद यह एक अच्छे कोओरडीनेटर की ड्यूटी होगी। उसकी बात का कोई बुरा नहीं मानता था। ठेठ गडवाली में "भाई साहिब प्रणाम" हिंदी में बोलता था। " में उसे प्यार से "रिकी दा ग्रेट" या "और रिकी डीअर" से ही बुलाता था। राजेन तोद्रिया जी कलम को नतमस्तक होए हुए सभी जनपक्ष के लिए दिन रात एक कर रहे थे। देहरादून से जनपक्ष छपवानी महंगी पड़ी तो नॉएडा में इम पी प्रिंटर्स पर प्रिंट करने का फैसला हुआ। इसी दौरान जनपक्ष डीटीपी डेस्क ने भी बड़ी सैलरी पर और कहीं काम शुरू कर दिया। अब तो रिकी को डी टी पी भी देखना था। मैंने रिकी को कोरेल ड्रा में काम करते हुए देखा तो पुछा की क्या कोरेल द्रव भी आता है। मजाक में बोला कोओरडीनेटर हूँ सब कुछ आना चाहिए। इसी समय में संतोष वर्मा ने जनपक्ष की डेस्क संभाली। हम वर्मा जी कह कर बात करते थे। रिकी कोई भी पेज तियार करता तो जरुर कहता वर्मा जी या अक्सर भाई साहिब देखना तो कैसा बना है। फिर वोह राजेन तोडरिया जी को दिखाता। डेड लाइन के दिन सभी की म्हणत बाद जाती। थापा जी और रिकी की ड्यूटी लगी की वोह तुरंत नॉएडा निकलें।
रिकी हमेशा अपने आप को जनपक्ष के निर्देशक के रूप में आंकता है उसकी दिन रात की मेहनत जनपक्ष के हर एक अंक को पिछले अंक से आगे निकल देती और धीरे धीरे जनपक्ष आजकल लोगो की चहेती पत्रिका बन गई थी। मुझे रिकी की मेहनत रंग लाती दिखी दे रही थी क्यों के में भी वर्मा जे और रिकी के साथ पेज तियार कराने में लग जाता था।
मेरा चुनाव ई टी वी में हो गया और में लखनऊ चला गया। पर जनपक्ष में दो लोगो को फ़ोन हमेशा करता था रिकी को और मनमीत रावत को। लखनऊ, लाकीम्पुर खीरी, पलिया, मेरठ, फर्रुखाबाद से भी में इन्हें फ़ोन जरुर करता था। मुझे पता चला की जनपक्ष के निर्देशक रिकी सहारा समय में डेस्क पर आ गए हैं और मनमीत रावत के साथ साथ कंचन नागर कोटि हिंदुस्तान में।
में भी फर्रुखाबाद से काशीपुर वापिस आ गया और अपने बिज़नस में ध्यान देने लगा लेकिन मनमीत और रिकी से बात होती रही। एक दिन अछंक में देहरादून जाने की सोची और में देहरादून पहुँच कर रात रुक गया। तोदरिया जी के दफ्तर में बैठ कर को फ़ोन मिलाया तो एक घर सदमा लगा। मनमीत ने बताया की रिकी हमें छोड़ कर चला गया है। उसका एक्सिडेंट हो गया है।
रिकी ने अपना एक विजटिंग कार्ड मुझे दिया था जिस पर उसने अपने हाथ से अपना मोबाइल नंबर लिख कर दिया था। वोह कार्ड हमेशा एक निशानी की तरह मेरे पर्स में रहा जो आज भी है। कुछ दिन पहले मैंने अचानक उस नंबर को अपने मोबाइल से मिलाया तो उस पर घंटी गई। आगे से फ़ोन उठा तो मैंने पुछा की क्या यह नंबर रिकी का है। " हाँ बेटा" शायद रिकी के किसी परिवार के मेम्बर की आवाज़ थी। मुझसे आगे कुछ नहीं बोला गया और सिर्फ इतना ही कह पाया "सॉरी अंकल" मैंने मोबाइल काट दिया।
अब जब भी में देहरादून को याद करता हूँ तो सबसे पहले रिकी की याद आती है। वोह रिकी जिसे में "रिकी दा ग्रेट" और "रिकी डीअर" कहा करता था।
कभी कभी मुझे लगता है के जनपक्ष जैसी पत्रिका का निर्देशक रिकी मुझे देहरादून आने के लिए कह रहा है। एक ऐसा निर्देशक जिसका हर एक अंक सुपर हिट होता था।
मैंने ऑरकुट पर सर्च किया तो रिकी जनपक्ष का प्रोफाइल मिला मैंने स्क्रैप किया
"रिकी तू हमेसा हमारे साथ है"

प्रेम अरोड़ा
काशीपुर
9012043100
9837793421
prem.voi@gmail.com

लो क सं घ र्ष !: संघ व शिवसेना की नूराकुस्ती

image source: google
महाराष्ट्र में शिवसेना मनसे अपने राजनीतिक आधार को बनाये रखने के लिए अपनी विघटनकारी विचारधारा का प्रयोग कर रही हैइस खे में अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेसी सरकार का भी नैतिक समर्थन मनसे शिवसेना को प्राप्त है अन्यथा मनसे शिवसेना की कोई हैसियत नहीं है कि वह भारतीय संघ से युद्ध करके रह सकेमहाराष्ट्र का आम आदमी भी इन विवादों से दूर है लेकिन कांग्रेस सरकार इन विघटनकारी तत्वों के खिलाफ कोई विधिक कार्यवाही करके इन तत्वों को बढ़ावा दे रही हैसंघ परिवार ने हमेशा दोहरा चरित्र अपनाया हैएक तरफ शिव सेना के हिंदुत्ववादी रुख को समर्थन देती रहती है दूसरी तरफ नए मुखौटे के साथ उत्तर भारतियों को संरक्षण देनी की बात कर रही हैयह क्या संरक्षण देंगे ? भारतीय संघ अगर संरक्षण नहीं दे सकता है तो विघटनकारी तत्वों के संरक्षण संघ परिवार आम आदमी को कैसे संरक्षण दे सकते हैंसंघ के बयान का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि उत्तर भारत में उनके जनाधार को धक्का लगेइससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिव राज सिंह चौहान ने घोषणा की थी कि मध्य प्रदेश में दूसरे प्रान्तों के लोग कल कारखानों में कार्य नहीं कर सकते हैं जिस पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई और अंत में उनको अपना बयान वापस लेना पड़ाभाषाई विवाद, प्रांतीयता का विवाद हिन्दू मुसलमान, सिख ईसाई का विवाद खड़ा करके संघ परिवार इस देश की एकता और अखंडता को तार-तार कर देना चाहता है
ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड व इंग्लैंड सहित कई मुल्कों में वहां के नस्लवादी व विघटनकारी विचारधारा के लोग भारतीयों का विरोध कर रहे हैं वहीँ महाराष्ट्र में उन्ही कि विचारधारा से ओतप्रोत लोग उत्तर भारतीयों का विरोधी कर रहे हैं। यह संकट साम्राज्यवाद का संकट है। उत्तर भारतीय विवाद में संघ परिवार तो शिवसेना से अपने सम्बन्ध ख़त्म करने जा रहा हैअघोषित रूप से उनके सम्बन्ध आज भी बरकरार हैं और आने वाले दिनों के चुनाव में उनके गठजोड़ होने हैंयह नूराकुस्ती मात्र दिखावा है और कुछ नहीं

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

बिग बी और मैं !


यह शीर्षक भ्रामक है. इससे यह आभास हो सकता है कि मैं बिग बी यानी अमिताभ बच्चन के साथ किसी फिल्म में काम कर रहा हूं या फिर उनकी किसी फिल्म की पटकथा लिख रहा हूं. ऐसा कुछ भी नहीं है. पत्रकार हूं. लेकिन फिल्म की पटकथा लिखने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. वैसे, यह बात अंगूर खट्टे होने जैसी भी लग सकती है. फिर भी सच तो सच है.
आज से कोई 31 साल पहले 1979 में पहली बार कलकत्ता आया था. तब यह कलकत्ता ही था कोलकाता नहीं. घूमने आया था. एक परिचित के घर रहा. उसी समय जीवन का पहला कैमरा खरीदा-आगफा क्लिक थ्री. वही उस समय सबसे बेहतर था. फिल्म का एक रोल लगाने पर उससे बारह ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें खींची जा सकती थी. तब मैंने कलकत्ता के ज्यादातर दर्शनीय स्थल देखे थे. विक्टोरिया मेमोरियल और बिड़ला प्लेनेटोरियम के सामने उस कैमरे से खिंचवाई गई तस्वीर अब भी एक फोटो फ्रेम में सुरक्षित रखी है. लेकिन उस बार एक चीज नहीं देख पाया. नेताजी इंडोर स्टेडियम. हालांकि उसमें देखने लायक कोई बात थी भी नहीं. लेकिन उसे नहीं देखने का मुझे काफी गहरा अफसोस हुआ दो साल बाद. क्यों? इस सवाल का जवाब आगे चल कर.
बचपन में मुझे फिल्में देखने का भारी शौक था. सातवीं-आठवीं कक्षा में कुछ दोस्त भी ऐसे ही मिल गए थे. हर नई फिल्म पहले दिन पहले शो में देखना तो आदत-सी बन गई थी. इसके लिए स्कूल से गायब रहने लगा. कई बार जेबखर्च के पैसे जुटा कर फिल्में देखता था कई बार स्कूल की फीस से. चरस, महबूबा और ऐसी ही न जाने कितनी फिल्में पहले शो में देखी थी उस दौर में. टिकट की खिड़की पर चाहे जितनी भी भीड़ हो हमें टिकटें जरूर मिल जाती थीं. किनारे से धक्का-मुक्की कर किसी तरह टिकट खिड़की के भीतर हाथ पहुंचाने की कला में मैं धीरे-धीरे उस्ताद हो गया था. अपनी इसी कला की वजह से हर बार टिकट कटाने का जिम्मा मुझे ही मिलता था.
फिल्में देखने लगा तो जाहिर है हीरो-हीरोइनों के प्रति दिलचस्पी भी बढ़ने लगी. आखिर में जेबखर्च के तौर पर मिलने वाले पैसों में से बचा कर मैं हर हफ्ते धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन से लेकर जितेंद्र और विनोद खन्ना तक को पत्र भेजने लगा. हजारों नहीं तो सैकड़ों पोस्टकार्ड तो जरूर भेजे होंगे. लेकिन अफसोस कि किसी ने एक पत्र का भी जवाब तक नहीं दिया. लेकिन इससे मेरा हौसला कम नहीं हुआ. पत्र भेजना जारी रहा. लेकिन इसबीच, एक दिन फिल्म देखने के लिए स्कूल से पेट दर्द का बहाना बना कर निकलते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. घर आने पर पिता जी ने छाते के बेंत से ऐसी धुलाई की कि मां को बेंत के दाग और दर्द दूर करने के लिए कई दिनों तक देशी शराब मेरे बदन पर मलनी पड़ी थी. उसके बाद पढ़ाई पर ध्यान दिया. लेकिन मेरी संगत के चलते ही पिता जी ने तय कर लिया था कि हाईस्कूल के बाद इंटर के लिए मुझे देवरिया भेजना है. वहां शिवाजी इंटर कालेज में मेरे मामा पढ़ाते थे. मैं परीक्षा देकर वहां चला गया. वहीं 12वीं में पढ़ते हुए पहली बार घूमने के लिए कलकत्ता आया था.

कलकत्ता से लौटने के कोई दो साल बाद जब बिग बी की फिल्म याराना देखी तब मुझे नेताजी इंडोर स्टेडियम नहीं देखने का भारी अफसोस हुआ. फिल्म का एक गीत उसी स्टेडियम में फिल्माया गया था. खैर, जीवन की जद्दोजहद कई यादों और दर्द को धूमिल कर देती है. यही मेरे साथ भी हुआ. बीते दस सालों से कलकत्ता में रहते हुए कई बार नेताजी इंडोर स्टेडियम में जाना हुआ. कभी पत्रकार के तौर पर तो कभी बेटी के स्कूल के सालाना समारोह में. लेकिन बीते महीने बेटी के स्कूल के समारोह में जाने पर मेरा 29 साल पुराना अफसोस खत्म हो गया. अशोक हाल ग्रुप आफ स्कूल्स की ओर से हर चार साल पर बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है-स्पेक्ट्रम. अबकी स्पेट्रक्म में बिग बी ही मुख्य अतिथि थे. जगह थी नेताजी इंडोर स्टेडियम. वहां बैठे हुए लग रहा था मानो समय का पहिया एक पल में तीन दशक पीछे घूम गया.
बिग बी उस समारोह में पूरे ढाई घंटे बैठे रहे. उन्होंने भी अपने भाषण में इस स्टेडियम में हुई अपनी शूटिंग के दौर को याद किया. और मैंने भी एक अफसोस को मिटा लिया. जगह भी वही थी, आदमी (अमिताभ) भी वही, बस समय का पहिया तीन दशक आगे बढ़ गया था. लेकिन कहते हैं न कि देर आयद दुरुस्त आयद. जीवन में कई अफसोस रहेंगे. लेकिन अब उनमें से कम कम एक तो कम हो गया है. बस, इसी का संतोष है.

भड़ास blog

भड़ास blog

नहीं होने देंगे बस्तर का विकास.........


छत्तीसगढ़ के नेताओं ने जैसे कसम सी खाली है की बस्तर में अगर जनता ने उन्हें चुना है तो सिर्फ नेता सिर्फ पैसे ही कमाने में लगे रहेंगे, और उनकी जेब बेरोजगार और अनपढ़ लोगों के कारण भरी रहे इसके लिए वो कुछ भी कर सकते हैं. बस्तर के लोगों को बस्तर में ही अगर नौकरी और शिक्षा मिल जाये तो इन नेताओं की खटिया तो कड़ी हो ही जाएगी. बस्तर के लोगों को रोज़गार , शिक्षा के साथ साथ चिकित्सा के लिए भी अगर कोई अच्छे कदम उठा रहा है तो वो है N.M.D.C. नगरनार प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही NMDC ने अपने चिकित्सा अधिकारीयों को नगरनार भेज दिया है. और क्या चाहिए बस्तर के लोगों को. मेरे खायाल से बस्तर के लोगों को तो इस बात की ख़ुशी है की उन्हें रोज़गार मिल, चिकित्सा और शिक्षा मिलेगी, जिस तरह दक्षिण बस्तर के बैलाडीला के लोगों को सुविधा मिल रही है, उसी तरह की सुविधाएं उन्हें भी मिलने लगेंगी, पर यह बात नेताओं के कहाँ समझ आएगी, पहले एन.जी.ओ. की आड़ में हिमांशु कुमार बस्तर विकास में अपने रोड़े अटका रहा था. उसी तरह कई नेता भी इसी कार्य में लग गए हैं. बस्तर संसद बलिराम कश्यप और उनके कई समर्थक १० फ़रवरी से नगरनार में धरने पर बैठने वाले हैं, मांग है आदिवासियों की ज़मीन आदिवासियों को दे दी जाये. हमने देखा है, आदिवासियों की ज़मीन कई सालों से बेकार पड़ी हुई है. उसमे अभी तक कृषि के लिए कुछ भी कदम नहीं उठाये गए हैं. अब अगर किसी कंपनी ने उस ज़मीन का सही उपयोग करना चाहा है वोह भी ऐसा उपयोग जो की उन आदिवासियों के हित में ही है. तो अब क्या परेशानी है कश्यप जी को. अगर NMDC आदिवासियों की ज़मीन ले रही है तो उसके बदले उन्हें अच्छे रोज़गार भी देगी. मुझे फिल्म शूल का १ दृश्य याद आ गया जिसमे बच्चू यादव बिहार विधानसभा में कहते हैं की "१ तो नदी में पानी कम है और पॉवर प्लांट लगाकर उससे भी बिजली निकली जाएगी तो खेतों की सिंचाई कैसे होगी." इसे कहते हैं गंवार. मैं पूछता हूँ क्या बस्तर के नगरनार में प्लांट खुलना चाहिए??? कृपया अपने विचार व्यक्त करें............

संघ की घोषणा स्वागत योग्य-ब्रज की दुनिया

कथित धर्मनिरपेक्षवादियों के बीच राष्ट्र विरोधी संगठन के रूप में बदनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब मुंबई में उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठाया है.अभी तक कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाले दल रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधे हुए थे.ऐसे में संघ की घोषणा का हम सभी राष्ट्रवादियों की तरफ से स्वागत किया जाना चाहिए.इससे निश्चित रूप से शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का मनोबल गिरेगा और वे अपनी करनी से बाज आयेगे.संघ अखिल भारतीय संगठन है और महाराष्ट्र तो इसका केंद्र ही है.इसलिए हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि अब महाराष्ट्र में पिछले कुछ समय से चल रहे सारे उपद्रव और उत्पात शांत हो जायेंगे.चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जो भी इतिहास रहा हो वो देश की एकता और अखंडता की कट्टर समर्थक है. उसने अपने इस कदम द्वारा यह साबित भी कर दिया है.संघ प्रमुख के बयान देने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने मरता क्या न करता की तर्ज पर कहा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी.क्या पिछले दो सालों  से भारत  का संविधान लागू नहीं था या फ़िर मंत्रीजी की नैतिकता घास चरने चली गई थी .अब जब  उन्हें लगा कि संघ कहीं वाक ओवर ले ले तब उन्हें संविधान और अपने कर्त्तव्य की याद आ गई!

1.2.10

लो क सं घ र्ष !: मौका मिला तो कफ़न नोच लेंगे

image source: google search

साम्राज्यवादी मुल्कों ने दुनिया के काफी देशों को लूटा है खसोटा है छोटे से देश हैती को इस कदर साम्राज्यवादियों ने वहां की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन किया है कि पर्यावरण पारिस्थितकी की व्यवस्था ही डगमगा गयी और भयंकर भूकंप आया लाखों लोग मारे गए अनाथ बच्चों की तादाद कई हजारों में हो गयी अब साम्राज्यवादियों के एक गिरोह को हैती पुलिस ने पकड़ा है जिसके पास से 33 बच्चे बरामद हुए हैं इन बच्चों को डामिनिकन रिपब्लिक ले जाया जा रहा थामानव तस्कर हैती में जगह जगह राहत और बचाव के बहाने कैम्प लगाये हुए हैं जो मानव संसाधन की तस्करी भी कर रहे हैं
ब्रिटिश साम्राज्यवाद का जब सूरज अस्त नहीं होता था तो वह गुलाम देशों से आदमियों को ले जा कर कमर के नीचे गरम लोहे से नंबर डाल कर छोटे-छोटे मुल्कों में खेती करवाते थेयूरोप की समृद्धि का राज भी यह है कि मानव को गुलाम बना कर उनकी श्रम शक्ति से अपने वहां कार्य करना ही था उसके एवज में कोई भुगतान नहीं था। आज जब दुनिया हैती के भूकंप पीड़ितों की मदद कर रही है तो साम्राज्यवादी देशों के एजेंट मदद के बहाने अनाथ बच्चों की तस्करी में लगे हुए हैं साम्राज्यवाद जिसका मुख्य उद्देश्य मुनाफा है मुनाफे के लिए वह हमेशा कफ़न तक नोच लेते हैं

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

हमने अपने जीवन को तो सवार लिया लेकिन उन बेजुबानो का क्या दोष था?

Just 1411 left.
जैसा की आपको फोटो को देखकर ही पता चल गया होगा की में आप सब के सामने क्या विचार रखना चाहता हूँ. पिछले दिनों में मैंने जब ये देखा की हमारे भारतवर्ष देश में जहाँ का राष्ट्रीय पशु चीता हैं और पिछले कई दशको पहले हमारे देश में इनकी संख्या लगभग 40,000 के आस-पास थी लेकिन अब इनकी संख्या सिर्फ 1411 ही रह गयी हैं. अब आप लोग सोचंगे की इसमें हम क्या कर सकते हैं, इनके अवैध शिकार को कैसे रोकेंगे तो आप लोगो का सोचना भी ठीक हैं लेकिन इन सबमे कहीं न कहीं हमारा ही दोष हैं, कैसे ???

कुदरत और प्रकृति ने हमारे देश को ही नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी को जीवन से नवाजा हैं और हर तरफ जहाँ भी नजर जाती हैं वहां हमें इस जीवन की विभिन्न उदहारण देखने को मिल जायंगे. और कुदरत ने सब को अपने मुताबिक जीवन व्यापन करने का हक़ दिया हैं. लेकिन हम मनुष्यों ने तो सिर्फ ये एक सोच बना ली हैं की ये पृथ्वी सिर्फ हमारी हैं और सारा अधिपत्य इसपर हमारा ही हैं. क्या ये हम सही कर रहे हैं ???? लेकिन मैं आपको बतलाना चाहता हु की हम भी पहले कभी इन बेजुबानो की तरह ही थे..... और हमने अपने आप को इतना विकसित किया की हम बाकियों को भूल गए.
शायद में भी इसके बारे में कभी बात नहीं करता, अगर में ये न देखता. लेकिन अब मुझे भी दुःख होता हैं की पिछले कुछ दशको में जो इनकी संख्या में इतनी गिरावट आई हैं की हमारी आने वाली नयी पीड़ी को हमें इनके बारे में बताने के लिए उन्हें किसी संग्राहलय में ले जाना पड़ेगा जहाँ पर इनकी भी हड्डियों का एक ढाचा या इनका पुतला बना होगा ठीक वैसे ही जैसे हमें अभी डायनासोरो के बने होते हैं.

और तो और हो सकता हैं की हमारे देश का राष्ट्रीय पशु के सूचक के रूप में हमें कोई और जीव मिल जाये...............
लेकिन क्या ये सही हैं और कितने हद तक ??????
अभी भी हमने कुछ न किया तो शयद ये नौबत आ जाये की हम अपने बछो को आगे चल कर ये बताये की :-
बेटा हमारा राष्ट्रीय पशु "?????" हैं.
और उसने हमसे गलती से ये प्रश्न पूछ लिया की पहले तो हमारा राष्ट्रीय पशु चीता था लेकिन अब कैसे बदल गया ? तो आप लोग तैयार हैं न इसका जवाब देने के लिए...........
मैंने तो तैयारी कर ली हैं की मुझसे जितना होगा में उतना इसके बारे में दुसरे लोगो को जागरूक करूँगा. आप भी करे.
और धन्यवाद् दे Aircell कंपनी को जिन्होंने इसके लिए लोगो को जागरूक करने के लिए अपना एक कदम इस दिशा की ओर बढाया हैं और हमें याद दिलाया की ......
हमने अपने जीवन को तो सवार लिया लेकिन उन बेजुबानो का क्या दोष था?
 देखे Save The Tigars और आप भी इस मुहीम में जुड़े.

क्यों बलात्कार कि शिकार भुगते सजा

नीलम की मौत ने एक सवाल खड़ा कर दिया है हमारी न्याय व्यवस्था और सामाजिक मान्यताओ पर. बलात्कार करता तो पुरुष है पर इसकी सजा उस महिला को ताजिंदगी भुगतनी पड़ती है . यह कैसा समाज है जो पीडिता को ही परेशां करने में कोए कसार नहीं छोड़ता . मुझे तो इसका एक ही हल नजर आता है . भले ही किसी बुरा क्यूँ न लगे . बलात्कार करने वाले पुरुषो का एक छोटा और सामान्य सा ऑपरेशन करके उन्हें एस काबिल ही न छोड़ा जाये कि वो दुबारा यह हरकत करने काबिल ही न राह जाये.
किसी भी लड़की के साथ यैसा करते समाया उन्हें यही लगता हिया कि कि पैसे के जोर से या दबाव डालकर वो पीडिता कि आवाज दबा देगे . पहले तो मुकदमा ही जाने कितना लम्बा खिचेगा , इतने समाया में पीडिता सामाजिक जिल्लत से मजबूर होकर या तो केस वापस ले लेगी या अपनी जान दे देगी . इन अपराधियों के मन में डर बिठाने कि जरूरत है . इसलिए उन्हें अंग भंग कर देना ही सबसे अच्छा विकल्प है. कम से कम वे भी पीडिता कि तरह जिन्दगी भर सजा भुग्तेगे. हर बार उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने क्या किया है.इस एक सजा के अतिरिक्त उन्हें आजाद छोड़ दिया जाये.
जब इस तरह कि कुछ नजीरें सामने आएगी तभी ये घटनाये रुकेगी.

सानिया की समझ


भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा की सोहराब मिर्ज़ा से सगाई टूट गई है|टेनिस की दुनिया की एक खूबसूरत बाला ने इसे खुद का फैसला बताया है |शायद सानिया समझ गयी ! टेनिस की सनसनी कही जाने वाली सानिया का यह, या तो परिपक्व समझ है या फिर खेल से उनका प्रेम यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन एक बात तो स्पष्ट है की इन खिलाड़ियों कों आदर्श मानने वाले भारतीय नवोदित युवा खिलाडियों के लिए एक आस फिर जग गयी है | क्या सानिया फिर से कोर्ट पर मेहनत करते हुए ज्यादे और जिन्दगी कों सहजता से लेते हुए कम देखी जायेंगी ?

कुछ दिनों पहले सानिया मिर्जा़ की ओर से बयान आया था कि वो शादी के बाद टेनिस से संन्यास ले लेंगी| सानिया के इस बयान ने उनके चहेतों का दिल तोड़ दिया था |लेकिन इसे किस्मत का खेल कहें या देश कों टेनिस की दुनिया में कुछ और सम्मान दिलाने का मौक़ा |एक टेनिस प्रेमी के रूप में देश के तमाम लोग उन्हें खेलते हुए देखना चाहेंगे|अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में 34 वें नंबर तक पहुँचने वाली सानिया का करियर चोटों से जरूर प्रभावित रहा है लेकिन वो शायद इसे बेहतर कर सकती है |

साल २०१० की शुरूआत सानिया के लिए ज्यादे अच्छी नहीं कही जा सकती है | उनके सगाई के बाद के बयान से सगाई टूटने तक हर एक टेनिस प्रेमी के मन में एक सवाल उभर रहा है की क्या वो फिर से उसी रंग में दिखेंगी जिसके लिए उन्हें इतनी सोहरत मिली थी |क्या उनका कैरियर ढलते सूरज की तरह तो नहीं जो पश्चिम दिशा की और चल चुका है ? अब हम सब कों इस बात का इंतज़ार है की क्या सानिया की समझ उनके लिए कुछ अच्छे पल लाएगा ?
वक्त की नजाकत कों दखते हुए तो बस हम यही कह सकते है की खुदा उनकी जिन्दगी में समिर्धी और खुशहाली दे |उनका निजी जीवन खुशियों से भर जाए , और वो देश कों टेनिस के रैकेट के माध्यम से चन्द और खुशियाँ दे पाएं आज जिसे वो पारस्परिक समझ कह रही है क्या ये उनकी जिन्दगी में एक खिलाड़ी के रूप में उन्हें फायदा देगा या नुकसान ये तो आने वाला समय ही बताएगा |

कब्र से कोई नहीं लौटा नामवर जी

इसबार के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह की चार किताबों के लोकार्पण का विज्ञापन 3-4 दिन पहले पढ़ा था , पढ़कर झटका लगा और सवाल उठा कि क्या नामवरजी को भी लोकार्पण जैसे बेहूदे कर्मकांड की जरुरत है ? क्या गुरुदेव भी साहित्यिक कर्मकांड में विश्वास करते हैं ? आखिरकार कर्मकांड पर क्यों उतर आए हैं नामवर जी ? असल समस्या यह है कि आलोचना को कब्रिस्तान तक पहुँचाने वाले नामवरजी ही हैं ,अब वह चाहते हैं कि आलोचना कब्र से लौट आए, गुरुदेव जानते हैं कब्र से कोई नहीं लौटा। अब कुछ आलोचना के वर्तमान हालात पर बातें करें।

आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है 
       आलोचना की दो पध्दतियां प्रचलन में हैं,इनमें पहली है रामविलास शर्मा की,दूसरी है नामवर सिंह की। दोनों के अंधभक्तों की कमी नहीं है। आलोचना में इसी अंधभक्ति के कारण सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा हुई हैं। आलोचना में ठहराव अंधभक्ति और अनुकरण के कारण पैदा होता है। दूसरी ओर आलोचना पध्दति में श्रध्दा के तत्व का कोई स्थान नहीं है। आलोचना के लिए श्रद्धा की बजाय आलोचनात्मक विवेक की जरूरत होती है।

 किसी भी आलोचक की आलोचना एकांगी ढ़ंग से,वकील की शैली में नहीं की जानी चाहिए। आलोचना का अर्थ वकील की दलीलें नहीं है। आलोचक को वकील नहीं होना चाहिए। इसके अलावा आलोचना मे ठहराव आत्मगतबोध के कारण भी आता है,आलोचना को इच्छित दिशा में मोड़ना,आत्मगतता के तत्व का हावी हो जाना,आलोचना के यथार्थ से कट जाने का संकेत है।आलोचना मूलत: संवाद है,सापेक्ष संवाद है,समस्याकेन्द्रित संवाद है,पध्दतिगत संवाद है,आलोचना विनिमय है। आलोचना देती है तो लेती भी है। जो आलोचना इस दोहरी प्रक्रिया से नहीं गुजरती वह ठहराव की शिकार हो जाती है।
         वर्तमान युग जनतंत्र का युग है,इस युग का नायक है मनुष्य। मनुष्य और मानवतावाद इस दौर के विचारधारात्मक संघर्ष की धुरी हैं। किसी भी विचारधारा अथवा व्यवस्था की कसौटी है मानवाधिकार,पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के प्रति उसका रुख क्या है ? नामवरजी ने इन पहलुओं पर कुछ भी नहीं लिखा। पितृसत्ता और साम्राज्यवाद की आलोचना के बिना आलोचना अप्रासंगिक है। 
         आलोचना जब एकांगी हो जाती है तो आलोचना में गतिरोध पैदा होता है,गतिरोध को तोड़ने अथवा आलोचनात्मक विकास की बुनियादी शर्त है आलोचना के सकारात्मक तत्वों की मींमासा पर जोर। मौजूदा आलोचनात्मक गतिरोध का एक अन्य कारण है अकादमिक स्तर पर आलोचना की सैध्दान्तिकी और पध्दति के पठन-पाठन,अनुसंधान की संरचनाओं और परंपरा का अभाव। इसी के गर्भ से यह भाव भी पैदा हुआ है कि कम लिखो और ज्यादा कमाओकम लिखो और ज्यादा कॉमनसेंस से सोचो और बोलोहिन्दी में ज्यादा लिखने वाले को खराब और कम लिखने वाले को ज्यादा बेहतर माना जाता है।गोया ज्यादा लिखना पतन की निशानी हो !
           आलोचना में गतिरोध का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है आलोचना का वाचिक परंपरा तक सीमित रहना।अकादमिक अनुशासन,लिखित रूप में आलोचना के कम से कम प्रयास हुए हैं। आलोचना में ढर्रे पर सोचने की आदत है। आलोचना के ठहराव का एक अन्य कारण यह भी है उसमें सामान्यत: हीनताबोध है ,कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि गंभीर आलोचना तो फलां-फंला आलोचक ही कर सकता हैहम तो बेहतर सोच ही नहीं सकते।वहीं दूसरी ओर सोचने वाले आलोचकों की हालत इस कदर पतली है कि वे सोचते और पढ़ते कम बोलते ज्यादा हैं। अथवा दोहराते ज्यादा हैं। दोहराने वालों अथवा वाचाल किस्म के आलोचकों में आलोचनात्मक विनम्रता नहीं है,वे अन्य को कम पढ़ते हैं,जिसे पढ़ते हैं उसका नाम ,संदर्भ छिपाते हैंअन्य की बातों को अपने नाम से,मौलिक समीक्षा के नाम से चलाते हैं । अपने लेखन में हिन्दी के अनुसंधान कार्य को उल्लेख योग्य नहीं समझते। इस सबका परिणाम है आलोचना में पैदा हुआ मौजूदा गतिरोध। नामवर जी इसके आदर्श रहे हैं।
       संभवत: हमारे स्वनाम धन्य आलोचकों को आलोचना में गतिरोध नजर ही न आए। यदि वे स्वाभाविक रूप में सोच रहे हैं कि गतिरोध नहीं है तो वे गलत हैं।सवाल किया जाना चाहिए हिन्दी में 'कविता के नए प्रतिमानके बाद आलोचना की कोई भी उल्लेखनीय कृति क्यों नहीं आयी ?यानी चालीस साल से ज्यादा समय गुजर चुका है और आलोचना में किसी कृति का न आना उल्लेखनीय दुर्घटना ही कही जाएगी। यह बात दीगर है कि इस दौर में नामवरजी के हजारों व्याख्यान हुए हैं,आलोचना में अनेक संपादकीय लेख आए हैंकिंतु उनके द्वारा आलोचना की किसी किताब का न आना,महज संयोग नहीं है। इसी तरह रामविलास शर्मा 'निराला की साहित्य साधनाके बाद आलोचना की कोई महत्वपूर्ण किताब नहीं दे पाए। जबकि इस बीच उनकी डेढ़ दर्जन किताबें आयीं। मै यहां आलोचना की मुकम्मल किताब के संदर्भ में ध्यान खींच रहा हूँ। इस तथ्य की ओर ध्यान खीचने का अर्थ यह नहीं है कि इस बीच आलोचना में कुछ भी लिखा ही नहीं गया। लिखा गया है ढ़ेरों किताबें आई हैं हजारों लेख छपे हैंहमने शब्दों और तर्कों के मैदान में परास्त करने का शास्त्र रचा है,आलोचना नहीं रची है।

 आलोचना जब परास्त करनेएक-दूसरे को ओछा दिखानेमीन-मेख निकालने,छिद्रान्वेषण करने और बदनाम करने के लिए लिखी जाती है तो उसे आलोचना नहीं कहते। नामवर सिंह के द्वारा दिए गए असंख्य साक्षात्कार और लेख धीरे-धीरे किताबी शक्ल में आने शुरू हो गए हैं।उनका संवाद और साक्षात्कार विधा के रूप में मूल्यांकन होना अभी बाकी है। क्या यह सुनियोजित आलोचना है आलोचना के अनुशासन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी आलोचना है ? इस बीच में यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आलोचना किसे कहते हैं 
आलोचना का कोई एक रूप,प्रकार,स्कूल आदि तय करना मुश्किल है,आलोचना अनेकरूपा है। आलोचना को किसी एक स्थान,एक विचारधारा आदि में सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हम जब आलोचना का वर्गीकरण करते हैं तो यह एक स्वाभाविक कार्य है,क्योंकि प्रत्येक किस्म की आलोचना स्वयं की संरचनाओं की भी आलोचना होती है। अच्छी आलोचना वह है जो आत्म-चेतस हो। चूंकि हिन्दी में आलोचना की आकांक्षा अभी भी बची है,बिखरे हुए रूप में आलोचना लिखी जा रही है अत: वह मौजूदा ठहराव से भी मुक्त होगी। आलोचना का स्वरूप बदलेगा। 

आलोचना का नया बदला हुआ रूप बहुत कुछ सम-सामयिक विचार,संचार तकनीक,पध्दति और इण्टरडिसिपिलनरी एप्रोच पर निर्भर है।आलोचना जितना एकांगी दायरों की कैद से मुक्त होगी वह ज्यादा जनतांत्रिक होगी। मसलन् नए दौर में आलोचना भी अपने को वर्चुअल बना चुकी है। आलोचना के वर्चुअल होने का अर्थ है आलोचना का अकेलापन। पहले आलोचना साहित्य से जुड़ी थी,साहित्य के पाठक से जुड़ी थी,आलोचक,लेखक और कृति के बीच प्रत्यक्ष संबंध था,किंतु लंबे समय से यह संबंध टूट चुका है। लेखक और आलोचक के बीच अंतराल पैदा हो गया है।
         आज स्थिति यह है कि आलोचक और लेखक दोनों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की इच्छा तो है किंतु दोनों में एक साथ रहने,संवाद करने और एक-दूसरे से सीखने और सिखाने की आकांक्षा खत्म हो गयी है। फलत: लेखक अकेला है और आलोचक भी अकेला है। दोनों में अलगाव पैदा हो गया है। अब ये दोनों एक-दूसरे से सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं,आलोचना नहीं चाहते। आलोचना रचना का स्पर्श करके निकल जाती है जिसे हम पुस्तक समीक्षा के नाम से जानते है।पुस्तक समीक्षा आलोचना का स्पर्श है,आलोचना नहीं है। रचना से बड़ा लेखक का अहं हो गया है। लेखक आलोचक की कंपनी पसंद करता है किंतु आलोचना पसंद नहीं करता,आलोचना करते ही नाराज हो जाता है। आलोचना वह है जिसमें विश्लेषण हो,व्याख्या हो,गहराई में जाकर विवेचन किया गया हो,शब्दों के बाहुल्य या शब्दों के अभाव को आलोचना नहीं कहते। रचना के मर्म का उद्धाटन किया जाय। आलोचना का काम यह भी है कि वह रचना को उसके व्यक्त लक्ष्य के परे ले जाय,पाठक को अनुशासित करने की बजाय खास किस्म की गतिविधि के लिए प्रेरित करे। आलोचना का बुनियादी कार्य है प्रतिरोध करना और धर्मनिरपेक्ष बनाना।जो आलोचना कठमुल्लापन अथवा पोंगापंथीभाव पैदा करती है उसे आलोचना नहीं कहते। आलोचना को जनतंत्र चाहिए। आलोचना और जनतंत्र की प्रक्रियाओं के गर्भ से धर्मनिरेक्ष समीक्षा विमर्श पैदा होता है। हिन्दी आलोचना में पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष का अभाव। नामवर सिंह साक्षात प्रमाण हैं उन्होंने कभी पितृसत्ता के खिलाफ नहीं लिखा। 

एनजीओ का गोरखधंधा-ब्रज की दुनिया

कभी संत विनोबा भावे ने किसी एनजीओ के कामकाज से खुश होकर कहा था कि अब सरकारी तंत्र में असर नहीं रहा अगर कहीं असर है तो असरकारी संगठनों में.लेकिन मैंने वर्तमान में बिहार में संचालित कई एनजीओ के कामकाज को गहराई से देखने के बाद पाया कि यहाँ तो सबकुछ गड़बड़ घोटाला है.आजकल कई सारे काम जो पहले बिहार सरकार खुद करती थी उसने एनजीओ के हवाले कर दिया है.कई पूंजीपति रूपयों की थैली लेकर घूम रहे हैं और संपर्क कर रहे हैं एनजीओ संचालकों से.मतलब किसी की पूँजी किसी का नाम.एनजीओ संचालक कुल कार्य पूँजी का ३ प्रतिशत तक पाकर भी खुश.हर्रे लगे न फिटकिरी रंग भी चोखा होए.जहाँ तक इस मामले में सरकारी भ्रष्टाचार का प्रश्न है तो तंत्र कुल रकम का लगभग ४५ से ५५ प्रतिशत तक गटक जा रहा है.एनजीओ के बैनर तले चाहे एनजीओ खुद काम करे या किसी और को काम करने की अनुमति दे वे खर्च करते हैं लगभग २५ प्रतिशत और इस तरह बचत है लगभग २० प्रतिशत तक.अब अगर १ रूपया में से सिर्फ २५ पैसा ही कार्य स्थल पर खर्च हो तो विकास कितना होगा यह कोई भी समझ सकता है?कहने का तात्पर्य यह कि सरकारी तंत्र जब तक भ्रष्ट रहेगा असरकारी संगठनों के कामकाज में असर नहीं आनेवाला चाहे सरकार कोई भी इंतजाम क्यों न कर ले.कोई भी एनजीओ वाला घूस देना नहीं चाहता लेकिन बिना दिए काम ही न चले तो कोई करे भी तो क्या करे?आखिर एनजीओ की तरफ से गतिविधि भी तो चलनी चाहिए.