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4.11.10

हिन्दू विरोधी आज़म फिर से सपा मै शामिल

सपा ने एक बार फिर साबित कर ही दिया की वह पूरी तरह हिन्दू विरोधी है. कल्याण सिंह के नाम पैर हो-हल्ला मचने वाला अजं खान हमेसा से ही अयोध्या में राम जन्म भूमि पैर मस्जिद निर्माण की तरफ ही रहा है. जिससे उसके अन्दर की हिन्दू विरोधी मंशिकता पूरी तरह छलकती है. मुलयम का समाजवाद केवल मुस्लिमो की गुलामी है. आज से मेरी अष्ठ समाजवादी पार्टी से पूरी तरह खत्म होती है। मै हिन्दू भाइयों से गुजारिस करता हू कि ऐसी हन्दू विरोधी पार्टी का समर्थन कतई न करैं।

3.11.10

व्यंग्य - बाल्टी भर पसीने की अमर कहानी

राज कुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़
बढ़ते तापमान और दिनों-दिन घटते जल स्तर से भले ही सरकार चिंतित न हो, मगर मुझ जैसे गरीब को जरूर चिंता में डाल दिया है। सरकार के बड़े-बड़े नुमाइंदें के लिए मिनरल वाटर है और कमरों में ठंडकता के लिए एयरकंडीषनर की सुविधा। ऐसे में उन जैसों के माथे पर पसीने की बूंद की क्या जरूरत है, इसके लिए गरीबों को कोटा जो मिला हुआ है। पसीने बहाने की जवाबदारी गरीबों के पास है, क्योंकि यही तो हैं, जिनके पास ऐसे संसाधन नहीं होते या फिर उन जैसे नुमाइंदों को फिक्र नहीं होती कि खुद की तरह तो नहीं, पर इतना जरूर सुविधा दे दे, जिससे गरीबों का खून ना सूखे। बड़े लोगों के लिए तमाम तरह की सुविधा किसी से छुपी नहीं है, लेकिन हम गरीबों को मिलने वाली सुविधा छिपाई तो नहीं जाती, वरन् हड़प जरूर ली जाती है। इन्हीं बातों को लेकर कुछ लिखने के लिए मैं बैठा था, इसी दौरान मुझे आंख लग गई और मैं गहरी सोच में डूब गया। मैं अपने गांव के मोहल्लों में तफरीह के लिए निकला, वहां मैंने देखा कि गांव के का एक व्यक्ति पसीने से तर-बतर है। हैण्डपंप से वह पानी लेने के लिए बहुत समय से नल के मुंह पर बाल्टी लगा रखा है और वह हैण्डपंप का, हैण्डल मार-मारकर थक गया है। उसके पहने हुए कपड़े पसीने से भीगे पड़े हैं और दूसरी ओर हैण्डल के पास रखी, दूसरी बाल्टी पसीने से भर रही है। वह हैण्डल पर हैण्डल, दिए जा रहा है, मगर हैण्डपंप है कि पानी ही नहीं उगल रहा है। मैंने पास जाकर उस व्यक्ति से पूछा, क्यों भाई, हैण्डपंप में तो पानी नहीं निकल रहा है, उल्टे तुम्हारे पसीने से दूसरी बाल्टी भर गई है। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि क्या करें भाई, गांव में गर्मी के कारण हैण्डपंप के हलक सूखे पड़े हैं। इसलिए कोषिष कर रहे हैं कि कैसे भी हैण्डपंप से पानी निकल आए, क्योंकि प्यास से कोई बड़ी चीज थोड़ी ना है। इसके बाद मैंने उससे पूछा कि हैण्डपंप से पानी के बजाय, बाल्टी पसीने से भर गई है, इसकी तुम्हें चिंता नहीं है ? इस पर उस व्यक्ति ने जवाब देते हुए जो कहा, उससे मेरे कान खड़े हो गए, हम तो गरीब हैं, भैया और गरीबों का सुनने वाला कौन है ? भला गरीबों का हमदर्द कोई होता है, क्या। उसने कहा कि यह कोई इसी साल की समस्या नहीं है, पिछले कई दषकों से हम तो ऐसे ही जी रहे हैं और हर बरस ऐसे ही हम जैसों का पसीना बहता है। गांव-गांव में कभी-कभार बड़े लोग आकर गर्मी मंे पानी की कोई कमी नहीं होने की तसल्ली दे जाते हैं, लेकिन हालात वही है, जैसे बरसों पहले थे। हमने भी इसे अपने कर्म का लेखा मान लिया है औेर जैसी बन पड़ रही है, वैसी जिंदगी जी रहे हैं। उसने कहा कि हम तो गंवार और गरीब हैं, भला हम जैसे लोगों को पानी की इतनी ज्यादा जरूरत, किस बात की है। जरूरत तो पानी पीने वाले उद्योगों को है, सरकार भी उन पर मेहरबान है। नदी-नालों में कल-कल कर बहता पानी पर, हम जैसे गरीबों का कोई हक हो सकता है ? हम तो इसी बात से मन को मसोसकर रख लेते हैं कि बड़े लोगों का जीना, जीना है और पानी पीने का हक भी उन्हें है, हम जैसे गरीबों के लिए हवा जो है, जिस पर ऐसे कारिंदों का कुछ नहीं चलता। हालांकि इस बात को लेकर भी हव चिंतित हैं कि जो हवा हमें मिली हुई है, उस पर भी अब उद्योगों के प्रदूषण का जहर घुल रहा है, उस पर भी अब उद्योगों के प्रदूषण का जहर घुल रहा है। इस तरह मैं तो सोच-सोचकर घबरा जा रहा हूं कि क्या हम जैसे गरीबों के बाल्टी-बाल्टी भर पसीने इसी तरह ऐसे ही बहते रहेंगे ? बाद में अचानक मैं जागा तो देखा कि मैं भी पसीने से तर-बतर हूं, क्योंकि बिजली जो चली गई थी। फिर मैं यही सोचकर मुस्कुराता रह गया कि बरसों से गरीबों के पसीने बहाने की अमर कहानी ऐसी ही चल रही है और यह तो गरीबों को होने वाली तकलीफों का एक छोटा सा हिस्सा ही है।

सफलता के सारे रहस्यों के भेद यहीं खुलते हैं।

सफलता के रहस्य (द्वितीय भाग)
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कोलीन “स्मरण-शक्ति की बुनियाद”

मस्तिष्क में विद्यमान एसीटाइलकोलीन स्मरणशक्ति के लिए मुख्य नाड़ी संदेश वाहक रसायन है। मस्तिष्क में इसकी कमी स्मरणशक्ति को सीधा प्रभावित करती है। कोलीन ही शरीर में ऐसीटाइलकोलीन का निर्माण करता है। यह नाड़ी कोशिकाओं के बाह्य आवरण “माइलिन शीथ”का निर्माण भी करता है। एसीटाइलकोलीन के निर्माण के लिए विटामिन बी-1, बी-5, बी-12 और विटामिन सी भी आवश्यक होते हैं। कलेजी, अंडे, सूखे मेवे, ब्रोकोली, मुर्गा, सालमोन मछली, सोयाबीन आदि इसके प्रमुख स्रोत हैं।

कोलीन लेने से मस्तिष्क को बहुत लाभ मिलता है। ड्यूक विश्वविद्यालय के चिकित्सा कैंद्र में शोधकर्ताओं ने गर्भवती चुहियों को कोलीन खिलाया और पाया कि उनके शिशुओं का मस्तिष्क ज्यादा बड़ा, बुद्धिमान तथा विकसित था, उनकी बुद्धिमत्ता, स्मरणशक्ति और सीखने की क्षमता संपूर्ण जीवन काल में अच्छी रही। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोलीन स्मरणशक्ति और शैक्षणिक-क्षमता वृद्धि करता है और गर्भावस्था में इसके सेवन से शिशु के मस्तिष्क का विकास बहुत अच्छा होता है।

कोलीन को यदि पर्याप्त मात्रा में युवाओं को दिया जाये तो वह स्मरणशक्ति में असिमित वृद्धि करता है। फ्लोरेंस सेफोर्ड विश्वविद्यालय में 41 लोगों को 500 मि.ग्रा. कोलीन 5 सप्ताह तक दिया गया तो शोधकर्ताओं ने पाया कि उनकी बुद्धिमत्ता, विद्वता, शैक्षणिक प्रवीणता तथा स्मरणशक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। यह भी देखा गया कि यदि कोलीन को अन्य स्मृति वर्धक तत्वों जैसे पाइरोग्लूटामेट के साथ लिया जाये तो कम मात्रा में ही भरपूर लाभ मिलता है।

कोलीन नाड़ी कोशिका, इनके बाहरी आवरण और नाड़ीसंदेश अभिग्राहकों के निर्माण और रख रखाव के लिए भी आवश्यक है।

मेसाचुसेट्स तकनीकी संस्थान के डॉ. रिचर्ड वर्टमेन ने कहा है कि एसीटाइलकोलीन का निर्माण बढ़ाने वाली दवायें जैसे पाइरेसिटेम आदि को कोलीन के साथ ही लेना चाहिये वर्ना हो सकता है कि मस्तिष्क का सारा कोलीन एसीटाइलकोलीन के निर्माण में खर्च हो जाये और इस कोलीन की कमी के कारण नाड़ी कोशिकाओं का निर्माण बाधित हो जाये।

फोसफेटाइडिल कोलीन या पी.सी., जो लेसीथिन में पाया जाता है, रक्त से मस्तिष्क को जाने वाली दुर्गम राह सहजता से पार कर मस्तिष्क में आसानी से प्रवेश कर जाता है। शुद्ध कोलीन में मछली जैसी गंध होती है पर कोलीन से भरपूर लेसिथिन गंधहीन होता है, इसलिए लोग लेसीथिन लेना अधिक पसंद करते हैं। लेसीथिन के दानें और सम्पुट दवा विक्रेता के पास मिल जाते हैं।


मात्रा

कोलीन क्लोराइड

500 मि.ग्रा. -2 ग्राम प्रति दिन

लेसीथिन

5-10 ग्राम लगभग 1 बड़ी चम्मच प्रति दिन

फोसफेटाइडिल कोलीन

1-2 ग्राम प्रति दिन

सीटीकोलीन

500 मि.ग्रा. -1 ग्राम प्रति दिन

सीटीकोलीन

एक और रसायन सीटीकोलीन होता है, जो शरीर में जा कर कोलीन में परिवर्तित हो जाता है। यह मस्तिष्क में डोपामीन और अन्य नाड़ी संदेश वाहक रसायनों की मात्रा बढ़ाता है। इसका प्रयोग सिर की चोट और मस्तिष्क-आघात के रोगियों के उपचार में भी किया जाता है क्योंकि यह मस्तिष्क की कोशिकाओं पर रक्त-अल्पता के दुष्प्रभाव नहीं होने देता है। यह स्मरणशक्ति और शैक्षणिक क्षमता भी बढ़ता है।

डी.एम.ए.ई. (डाइमिथाइलअमाइनोईथेनोल)

डी.एम.ए.ई. का अच्छा स्रोत सरडीन मछली है। यह भी रक्त वाहिकाओं तथा मस्तिष्क के बीच की बाधाओं को सुगमता से पार कर मस्तिष्क में जल्दी से प्रवेश कर जाती है। मस्तिष्क में यह बुद्धिमत्ता और स्मृति बढ़ाती है।

डी.एम.ए.ई. मस्तिष्क में एसीटाइलकोलीन का निर्माण बढ़ाती है, तनाव कम करती है, एकाग्रता व शैक्षणिक क्षमता बढ़ाती है, मनोदशा को उत्कृष्ट रखती हैऔर मस्तिष्क को स्फूर्तिमान, सतर्क तथा उत्तेजित रखती है।

स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए डी.एम.ए.ई. की मात्रा 100-300 मि.ग्रा. प्रति दिन है, इसे सुबह या दोपहर में ही लें शाम को नहीं लें। इसका असर आने में 2 से 3 सप्ताह लगते हैं। परंतु यह प्रतीक्षा बहुत अच्छा परिणाम देकर जाती है।

पाइरोग्लूटामेटऔर फोस्फेटाइडिलसेरीन

नाड़ीसंदेश-वाहकों की संचार-क्षमता सुचारू व सक्रिय अभिग्राहक-स्थलों पर निर्भर करती है। अभिग्राहक-स्थलों को भलीभांति सक्रिय रहने के लिए दो पोषक तत्व फोस्फेटाइडिलसेरिन और ओमेगा-3 फैट डी.एच.ए.नितांत आवश्यक हैं। पाइरोग्लूटामेट ऐसीटाइलकोलीन अभिग्राहक-स्थलों की संख्या और उनका अभिग्रहण बढ़ाते हैं जिससे मस्तिष्क की संदेश अभिग्रहण-क्षमता में वृद्धि होती है। इस तरह ये स्मृति, बुद्धिमत्ता और शैक्षणिक-प्रवीणता में वृद्धि करते हैं।

पाइरोग्लूटामेट मस्तिष्क का“सूचना एवं प्रसारणमंत्री”

पाइरोग्लूटामेट मुख्य अमाइनो-अम्ल है जो मस्तिष्क और स्पाइनल-द्रव्य में प्रचुरता से विद्यमान रहता है और स्मृति एवं मस्तिष्क के सभी क्रिया-कलापों में भारी सुधार लाता है। ये इतना ज्यादा असर दायक है कि इसके कई प्रतिरूपों से निर्मित औषधियां एल्ज़िमर्स रोग, जिसके मुख्य लक्षण शैक्षणिक दुर्बलता एवं स्मृति-दोष है, के उपचार में दी जाती हैं। इस परिवार की औषधियों जैसे पाइरेसिटेम आदि पर बहुत परीक्षण हुए हैं और शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पंहुचे हैं कि यह दुर्बल स्मृति वाले व्यक्तियों की ही नहीं बल्कि सामान्य व्यक्तियोंकी भी स्मृति, बुद्धिमत्ता और शैक्षणिक प्रवीणता में अभूतपूर्व सुधार आता है।

पाइरोग्लूटामेट के कार्य –

• एसीटाइलकोलीन के निर्माण मे सहायक हैं।

• ऐसीटाइलकोलीन के अभिग्राहक स्थलों की संख्या में वृद्धि करते हैं।

• मस्तिष्क के बांये और दांये गोलार्धों तथा मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के बीच सम्पर्क, संवाद, सहयोग और समन्वय में वृद्धि करते हैं। और इस तरह यह स्मृति, बोधन शक्ति, शिक्षण-क्षमता और एकाग्रता बढ़ाते हैं यानी आपको बुद्धिमान और विद्वान बनाते हैं।

• पाइरोग्लूटामेट मछली, दूध, दही, मक्खन और सब्जियों में पाये जाते हैं।

फोस्फेटाइडिलसेरिन “स्मृति-अणु”

फोस्फेटाइडिलसेरिन जिसे “स्मृति-अणु”के नाम से भी जाना जाता है। यह सचमुच मस्तिष्क में उत्साह, स्फूर्ति और जोश भर देता है। यह फोस्फोलिपिड परिवार का सदस्य है और यकृत, रक्षा-प्रणाली, नाड़ियों तथा मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक है।

इस पर बहुत शोध हुई है और शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पंहुचे हैं कि यह मस्तिष्क में प्रचुर मात्रा में होता है और स्मृति, मनोदशा, शैक्षणिक-क्षमता, तनाव-प्रबन्धन कौशल और एकाग्रता में वृद्धि करता है। यह मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाओं के बीच सम्पर्क, संवाद,समन्वय, संचारव सहयोग को सरल, सहज, स्निग्ध, सुचारु व सशक्तबनाता है क्योंकि यह नाड़ी कोशिका के बाह्य आवरण, एसीटाइलकोलीन के अभिग्राहक स्थलों के निर्माण का मुख्य “अणु” है।

वैसे तो यह थोड़ा बहुत हमारे शरीर में बनता रहता है, परंतु यह मात्रा पर्याप्त नहीं होती है । हमारे भरपूर कलेजी युक्त मांसाहारी भोजन खाने वालों को यह 50 मि.ली. तक प्रतिदिन मिल जाता है जबकि भोजन में भी यह बहुत कम होता है। आम शाकाहारी आहार से यह मात्र 10 मि.ली. प्रतिदिन ही मिल पाता है। हां नियमित इसकी प्रतिदिन की खुराक 100-300 मि.ग्रा. है ।

शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि आहार में डी.एच.ए. अत्यंत कम दिया जाये तो मस्तिष्क के हिप्पोकेंपस, जो स्मरणशक्ति का केंद्र है, में फोस्फेटाइडिलसेरिन का स्तर बहुत कम हो जाता है।तथा जब डिमेंशिया के रोगी को फोस्फेटाइडिलसेरिन दी जाती है तो उसकी स्मृति और बोधन क्षमता में अपार वृद्धि होती है। इसका यह मतलब हुआ कि डी.एच.ए. हिप्पोकेंपस मेंफोस्फेटाइडिलसेरिन का स्तर बढ़ाता है और फोस्फेटाइडिलसेरिन स्मृति और बोधन क्षमता में भारी सुधार करता है।

जिंको बिलोबा रक्तसंचारवर्धक वस्मृतिवर्धक

जिंको बिलोबा पूर्वी देशों में हजारों वर्षों से स्मृतिवर्धक औषधि के रूप में प्रयोग में आती रही है। चीन के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार 2800 बी.सी. से जिंको को औषधि के रूप में काम में लिया जा रहा है। जिंको मस्तिष्क को एकाग्रता देता है, ऊर्जावान बनाता है और मनोदशा प्रसन्न रखता है। जिंकोस्मृति-विकार, अवसाद, रक्तसंचार-दोष, दुर्बल विचारशीलता आदि में लाभप्रद है। इसमें दो मुख्य तत्व फ्लेविनोइड्स और टरपेन लेक्टोन होते हैं।

जिंको बिलोबा एक बलवान प्रति-ऑक्सीकारक है, जो विटामिन ई और अन्य प्रति-ऑक्सीकारकों के साथ मिल कर मस्तिष्क की मुक्तकणों से रक्षा करता है।

जिंको नाड़ी-संदेशवाहकों का निर्माण करता है, एसीटाइलकोलीन के अभिग्राहकों को स्वस्थ रखने में सक्रिय भूमिका निभाता है। जिंको का मुख्य कार्य मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं का विस्तारण और बिंबाणु प्रेरक घटक(एक पदार्थ जो रक्त को गाढ़ा करता है) की कार्य प्रणाली में अवरोध पैदा करना है। इसका सीधा मतलब है कि यह मस्तिष्क को ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ाता है।

नीदरलैंड के लिम्बर्ग विश्वविद्यालय के क्लेजनेन और पॉल निप्सचाइल्ड ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि जिंको रक्त-संचार दोष के रोगियों की स्मृति, एकाग्रता, मनोदशा और ऊर्जा में वृद्धि करता है।

जिंको के सामान्यतः 40, 60 और 80 मि.ग्रा. के सम्पुट उपलब्ध हैं। सामान्यत: इसकी मात्रा 120-180 मि.ग्रा. प्रति दिन है यानी 60 मि.ग्रा. के 1 या 2 सम्पुट सुबह और शाम को लेना है। इसका असर आने में एक या दो महीने लग जाते हैं। यदि दो महीने बाद भी फायदा न हो तो मात्रा 240 मि.ग्रा. प्रति दिन कर देना चाहिए। चूंकि जिंको रक्त को पतला करता है अतः रक्त को पतला करने की दवाएं जैसे कॉमाडिन, हिपेरिन या एस्पिरिन लेने वाले सतर्कता बरतें।

एसीटाइल-एल-कार्निटीन मस्तिष्क का उत्कृष्ट ईंधन

अमाइनो एसिड एसीटाइल-एल-कार्निटीन मस्तिष्क का उत्कृष्ट ईंधन है। इसका एसीटाइल घटक एसीटाइलकोलीन (मुख्य नाड़ी संदेशवाहक) का निर्माण करता है। एसीटाइल-एल-कार्निटीन एक बलवान प्रति-ऑक्सीकारक है और मस्तिष्क को मुक्त-कणों से सुरक्षा प्रदान करता है और संपूर्ण नाड़ीतंत्र को स्वस्थ व युवा रखता है।

यह नई कोशिकाओं के निर्माण में सहायक है और मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बीच संपर्क, संवाद और सहयोग बनाये रखता है। फोस्फेटाइडिलसेरीन के साथ लेने पर यह ज्यादा लाभप्रद है। इसकी 250-1500 मि.ग्रा. की खुराक प्रतिदिन भोजन से 1 घंटा पूर्व या 1 घंटा बाद लेना चाहिये। यह बहुत मंहगा हैतथा इसेमधुमेह, यकृत रोग या वृक्क रोग के मरीज को नहीं देना चाहिये।

सदाबहार पौधे में पाया जाने वाला रहस्यमय पूरक तत्व विनप्रोसेटीन

विनप्रोसेटीन सदाबहार के पौधों में पाये जाने वाली ऐसी औषधि है जो हमारी संज्ञानात्मकता या बोधन-क्षमता और स्मृति बढ़ाती है। यह मस्तिष्क का रक्त प्रवाह बढ़ाती है यानी मस्तिष्क को ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाती है। इसकी 5 और 10 मिली. ग्राम. की टिकिया मिलती हैं। इसकी 5 मिली. ग्राम की टिकिया सुबह शाम को दी जाती है। बाद में आवश्कतानुसार मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

ब्राह्मी या बकोपा मोनिएरा

ब्राह्मी का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है। ब्राह्मी पौधे का तना जमीन पर फैलता जाता है। जिसकी गांठों से जड़, पत्तियां, फूल और बाद में फल भी लगते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कड़वी और काले चिन्हों से मिली हुई होती है। ब्राह्मी के फूल छोटे, सफेद, नीले और गुलाबी रंग के होते हैं। ब्राह्मी के फलों का आकार गोल लम्बाई लिए हुए तथा आगे से नुकीलेदार होता है जिसमें से पीले और छोटे बीज निकलते हैं। ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है। इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं।

ब्राह्मी के गुण-दोष एवं प्रभाव

आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘भाव प्रकाश निघन्टू’ के अनुसार ब्राह्मी शीतल, हल्की, सारक, मेधाकारक (बुध्दि वर्धक) कसैली, कड़वी, आयुवर्धक रसायन, स्वर एवं कंठ को उत्तम करने वाली, स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली, कुष्ठ, पांडु, प्रमेह, रक्त विकार, खाँसी, विष, सूजन और ज्वर को हरने वाली होती है।

ब्राह्मी विशेष रूप से मस्तिष्क संबंधी रोगों में विशेष रूप से फायदेमंद पाई गई है। ब्राह्मी की मुख्य क्रिया मस्तिष्क एवं मज्जा तंतुओं पर होती है। यह मस्तिष्क को शान्ति और मज्जा को ताक़त देता है। इसलिए ब्राह्मी का प्रयोग मस्तिष्क एवं मज्जा तंतुओं के रोगों में करते हैं। अधिक मानसिक परिश्रम करने वाले लोगों को यह बूटी विशेष लाभकारी पाई गई है। मस्तिष्क की थकान एवं उन्माद में यह विशेष लाभ दर्शाती है।

ब्राह्मी घृत आयुर्वेद की एक दवा है जो सभी प्रमुख दवा कम्पनियों की मिलती है। रस रत्नाकर नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ में लिखा है कि ब्राह्मी घृत को प्रतिदिन एक से दो तोला दूध में डालकर पीने से मनुष्य का कंठ सुधरता है और स्मरणशक्ति प्रबल हो जाती है। कठिन-से-कठिन शास्त्र भी एक बार पढ़ने से याद हो जाते हैं।

अन्य आयुर्वेद औषधियां

स्मरणशक्ति एवं बुद्धि बढ़ाने वाली कुछ अन्य जड़ी-बूटियाँ जैसे शंखपुष्पी, बच, शतावरी, ज्योतिष्मती, अश्वगंध,आंवला, शहद आदि और खाद्य-पदार्थों में अनार, बथुवा, जौ , लहसुन, सैंधा नमक, गाय का दूध और घी, मालकांगनी, बैंगन आदि बुद्धि-वर्धक हैं।

' योग चिंतामणि ' के अनुसार--- गिलोय, ओंगा, वायविडंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच, सोंठ और शतावर इन सबको बराबर लेकर कूट-छानकर चूर्ण बनावें और प्रात: काल चार माशे मिश्री के साथ चाटें , तो तीन हजार श्लोक कंठस्थ करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। निघंटु के अनुसार--- बच का एक माशा चूर्ण जल, दूध या घृत के साथ एक मास सेवन करने से मनुष्य पंडित और बुद्धिमान बन जाता है। चरक के अनुसार शंखपुष्पि विशेष रूप से बुद्धि-वर्धक है। साथ ही ' गायत्री मन्त्र ' का जप करने से भी बुद्धि में निखार आता है।

ग्लूटामीन एक और मस्तिष्क का ईंधन

ग्लूटामीन एक अमाइनो एसिड है जो मस्तिष्क के लिए सीधा ईंधन का कार्य करता है। ग्लूटामीन मस्तिष्क को अधिक सक्रिय बनाता है और किसी भी दुर्व्यसन से दूर रखता है।यह गाबा और ग्लूटामेट नामक नाड़ी संदेशवाहक बनने में सहायक है और स्मृतिवर्धक है। इसे 2-5 ग्राम प्रति दिन भोजन से 1 घंटा पूर्व या 1 घंटा बाद लेना चाहिये।

विटामिनबी ग्रुप “मस्तिष्क के घनिष्ट मित्र”

मस्तिष्क के लिए विटामिन बी अत्यंत आवश्यक हैं। यह मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाते हैं और हानिकारक मुक्त-कणों से मस्तिष्क की रक्षा करते हैं।

विटामिन बी कोशिकाओं को लिए ऊर्जा हेतु ग्लूकोज बनाते हैं, हमारी संज्ञानात्मकता या बोधन क्षमता बढ़ाते हैं और नाड़ी संदेश वाहक बनाने में सहायता देते हैं। संक्षेप में कहें तो विटामिन बी मस्तिष्क के सबसे अच्छे मित्र हैं। आइये नीचे देखते हैं ये किस प्रकार मित्रता निभाते हैं।

विटामिन बी1 (थायमिन)

थायमिन सम्पूर्ण नाड़ी तंन्त्र को स्वस्थ रखते हैं और मस्तिष्क को उर्जा देने हेतु कार्बोहाइड्रेट से ग्लूकोज का निर्माण करते हैं। इनके स्रोत दूध, गैंहूँ का चोकर, चावल, दालें, मुर्गा, मछली, कलेजी आदि हैं।

विटामिन बी3 (नायसिन)

स्मरणशक्ति बढ़ाता है। एक शोध में विभिन्न आयु केलोगों को 141 मि.ग्रा. प्रति दिन नायसिन दिया गया। सभी उम्र के लोगों की स्मरण शक्ति 10-40 % बढ़ी।

विटामिन बी5 पेन्टोथेनिक एसिड

मानसिक चेतना और स्मृतिवर्धक है। यह एसीटाइलकोलीन के निर्माण में भी सहायक हैं। आप रोजाना 250-500 मि.ग्रा. विटामिन बी5 का सेवन करके स्मरण शक्ति को प्रखर बना सकते हैं।

विटामिन बी6 (पाइरीडोक्सीन)

नाड़ी संदेशवाहक बनने में सहायता देते हैं।यह अमाइनो एसिड्स को सीरोटोनिन नामक नाड़ी संदेशवाहक में परिवर्तित कर देते हैं।सीरोटोनिन की कमी से अवसाद और अन्य मानसिक रोग होते हैं। एक शोध में यह पाया गया कि डिप्रेशन के 20% रोगी पाइरीडोक्सीन की कमी से ग्रसित थे। स्मरणशक्ति को तराशने के लिए 20-100 मिली. ग्रा. की मात्रा लेना चाहिये।

विटामिन बी12 (सायनाकोबाल्मिन)

विटामिन बी12 बोधन क्षमता, नाड़ी संदेश वाहकों के निर्माण, लाल रक्त-कणों के निर्माण, वसा अम्लों के चयापचय, नाड़ियों के बाहरी विद्युतरोधी आवरण माइलिन के निर्माण तथा नाड़ी कोशिकाओं के स्वस्थ व सक्रिय रहने के लिए आवश्यक है।

इसकी कमी वृद्धावस्था में होने वाली मानसिक दुर्बलता, भ्रम और असमंजसता का मुख्य कारण है। सामान्यत: इसकी मात्रा 10-100 माइक्रोग्राम प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा है। वृद्धावस्था और विभिन्न रोगों में ज्यादा मात्रा यानी 1000 माइक्रोग्राम प्रतिदिन दी जाती है।

फोलिक एसिड

भी मस्तिष्क को ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है। इसकी प्रतिदिन की मात्रा 400 माइक्रोग्राम है।

मस्तिष्क और स्वास्थ्य को क्षतिग्रस्थ करने वाले खाद्य पदार्थ

आज हम आपको यह भी बता देते हैं कि कुछ खाद्य पदार्थ हमारे मस्तिष्क और शरीर दोनों के लिए ही बहुत हानिकारक हैं, हालांकि ये देखने में बड़े लुभावने, रंग-बिरंगे तथा स्वाद में बहुत लजीज़ होते हैं। पर ये आपको असफलता की गहरी खाई में ले जायेंगे। इनसे आपको परहेज करना ही होगा । आज के बाद आप इन हानिकारक खाद्य पदार्थों के सेवन की कल्पना भी नहीं करेंगे।

शराब और अन्य नशीले पदार्थ मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करते हैं। उच्च “रक्त-शर्करा सूचकांक” वाले खाद्य पदार्थ जैसे मैदा से बनी डबल रोटी, पाव, बन्स, बर्गर, पित्ज्ज़ा, पास्ता, पेटीज़, केक, पेस्ट्री, कुकीज़, ज्यादा मीठे खाद्य पदार्थ आदि के सेवन से रक्त-शर्करा के स्तर में भारी उतार-चढ़ाव होता है, जिससे मस्तिष्क शिथिल और चिढ़चिढ़ा हो जाता है। रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के बनाने वाले रिफाइंड तेल से बने जंक फूड, बर्गर,कचौरियां, समोसे, चाट आदि का सेवन भी मस्तिष्क के रक्त संचार को कम करते हैं और हानिकारक है। निम्न लिखित हानिकारक खाद्य पदार्थों से पूर्ण परहेज रखें।

ट्रांस फेट व हाइड्रोजिनेटेड फैट (वनस्पति घी या देसी भाषा में डालडा)

मदिरा

कृत्रिम रंग

कृत्रिम शर्करा जैसे सेक्रीन, एस्पार्टेम (शुगर फ्री) इत्यादि

कार्बोनेटेड पेय पदार्थ

ज्यादा मीठे पेय पदार्थ

मैदा से बने बेकरी उत्पाद

धूम्रपान, जर्दायुक्त गुटका आदि


निचोड़

मस्तिष्क में होने वाली समस्त चयापचय क्रियाओं में वृद्धि, बुद्धि तथा स्मृति में अविश्वसनीय सुधार लाने के लिए हमने आपके आहार में थोड़ा परिवर्तन किया है, कुछ पोषक तत्व व औषधियां लेने की सलाह देर हैं ताकि आपके अध्ययन, आपके परिश्रम का आपको पूरा फल मिले, आपको सभी परीक्षाओं में आपके अन्य सहपाठियों से ज्यादा अंक प्राप्त हों, आपको सर्वोच्च स्तर (टॉप रैंक) प्राप्त हो, आप हमेशा सबसे आगे रहें और आपको मनचाहे कॉलेज में प्रवेश मिले। आपके लिए बनाये गये कार्यक्रम का निचोड़ इस प्रकार है।

1- ओमेगा-3 एक “सात सितारा पोषक तत्व” है। इसके लिए आप रोज 30 ग्राम अलसी का सेवन करें। पहले तो रोज अलसी को छोटे कॉफी ग्राइंडर में सूखा पीसें। पिसी अलसी को दूध या दही में मिला कर लें। इसे आटे में मिला कर रोटियां बनवा सकते हैं। इसे सलाद, उपमा, पोहे, सब्जी आदि फर भी डाल कर ले सकते हैं। इसे अंकुरित भी कर सकते हैं। आजकल “फ्लेक्सओमेगा” नाम से आधुनिक तकनीक द्वारा विशेष तौर पर विद्यार्थियों के लिए “जैविक” अलसी से तैयार किया रेडी टू ईट प्रोडक्ट बाजार में उपलब्ध है। इसका प्रयोग विद्यार्थियों के लिए बहुत सुविधाजनक है। शीघ्र ही अलसी के अन्य उत्पाद जैसे बिस्कुट, ब्रेड आदि बाजार और आपके कोचिंग इंस्टिट्यूट की केन्टीन में भी उपलब्ध होंगे। ओमेगा-3 के लिए मछलीहारी लोग सप्ताह में 3-4 बार सालमोन, मेकरेल, हेरिंग, हेलीबुट, सरडीन आदि मछलियां खा सकते हैं। याद रहे सभी मछलियों में ओमेगा-3 नहीं होता है।मछली के संपुट नहीं खायें तो ही अच्छा है।

2- पूरे वर्ष नियमित रूप से अच्छी मल्टीविटामिन की गोली खायें।

3- उपरोक्त वर्णित स्मृति व बुद्धि वर्धक पौषक तत्वों में से 2 या 3 तत्वों को चुन कर सेवन करें। कोलीन अति आवश्यक है। अच्छा यही होगा कि आप अपने चिकित्सक से परामर्श लें और औषधि-प्रपत्र प्राप्त करके किसी समीप के औषधि विक्रेता से अपनी दवाएं खरीदें।

शब्दकोष

मैंने उपरोक्त लेख हमारी जननी हमारी मातृभाषा हिन्दी में लिखा है। मैंने पूरी कोशिश की हैं कि इस लेख में पराई और विदेशी अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कम से कम करूं। यह पराई भाषा नागिन के समान निरन्तर हमारी हिन्दी भाषा को डस रही है और हमारी युवा पीड़ी हिन्दी भाषा को भूलती जा रही है और हिंदी भाषा में ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी शब्दों की घुसपेठ जारी है। हमें इस सांस्कृतिक आतंकवाद का उन्मूलन करना ही होगा। आओ प्रण करें कि आज से हम हिंदी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करेंगे। फिर भी आपकी सुविधा के लिए मैं नीचे शब्दकोष संलग्न कर रहा हूँ ताकि आप लेख को पूरी तरह समझ सकें।


उम्र भर लिखते रहे............!!!

उम्र भर लिखते रहे,हर्फ़-हर्फ़ बिखरते रहे
बस तुझे देखा किये,आँख-आँख तकते रहे....!!
उम्र भर लिखते रहे.....
कब किसे ने हमें कोई भी दिलासा दिया
खुद अपने-आप से हम यूँ ही लिपटते रहे....!!
उम्र भर लिखते रहे.......
आस हमारे आस-पास आते-आते रह गयी..
हम चरागों की तरह जलते-बुझते रह गए.....!!
उम्र भर लिखते रहे.....
हम रहे क्यूँ भला इतने ज्यादा पाक-साफ़
लोग हमें पागल और क्या-क्या समझते रहे...!!
उम्र भर लिखते रहे....
आज खुद से पूछते हैं,जिन्दगी-भर क्या किये
पागलों की तरह ताउम्र उल्टा-सीधा बकते रहे....!!
उम्र भर लिखते रहे....!!!

"प्यार अँधा होता है"

उम्र भर का सफ़र दो पल में ख़त्म,
पर भ्रमर को फूलों से प्यार होता है;
लाख जल जायेंगे, लाख मिट जायेंगे,
पर परवानों को "लौ" से प्यार होता है;

फसल पकने से पहले ही ना जाने क्यूँ,
कृषक को खेतों से प्यार होता है;
उसके आने से शायद हो "अंत मेरा"
पर शबनम को किरणों से प्यार होता है;

बच्चे की सूरत देखे ही बिन,
माँ को बच्चे से प्यार होता है;
मौत के साये में लिपटते ही क्यूँ;
इन्सां को जिन्दगी से प्यार होता है;

क्यूंकि शायद "प्यार अँधा होता है"..............................

Manish Singh "गमेदिल"

झूठे निकले सभी जवाब

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मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
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अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
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तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
-----
***गोविंद गोयल

कोलाहल

जिंदगी की दौड़ यूँ ही रोजमर्रे की,
मन में मची घमासान हलचल.
बाहर 'सब चलता है' की नीरव शांति,
अंदर 'आख़िर क्यूँ' का कोलाहल.

भौतिकता कि इस लंगड़ी दौड़ में,
कैसे हो समाज की मुश्किलें हल.
हर कोई आज बस यही सोच में,
वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.

जब तक खुद पे ना बन पड़े,
विरोध का सुर कहाँ निकलता है.
वरना सब के दिल में बस यही स्वर,
कि भई आजकल सब चलता है.

चिंतन यही मन में, कैसे बनेगी,
बिगडती हुई ये बात ये हालात.
आखिर कौन उठाएगा अपना हाथ,
कहाँ से होगी बदलाव की शुरुआत.

।।आप सभी को धनतेरस, दीपावली और भैयादूज की ढेरों शुभकामनांए।।


।।आप सभी को धनतेरस, दीपावली और भैयादूज की ढेरों शुभकामनांए।।


दिवाली पर ऐसा कुछ करने का संकल्प ले जा ेराम राज की ओर ले जाये

अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व हैं दीपावली। अंधकार से आशय उस अंधेरे से नहीं हैं जो कि बिजली का बटन दबाते ही टयूब लाइट की रोशनी से समाप्त हो जाता हैं और ना ही उजाले का यह आशय हैं जो कि टयूब लाइट से निकलने वाला प्रकाश होता हैं। अंधकार से आशयसामाजिक बुराइयों से हैं और प्रकाश का आशय हैं सदगुण।

आज से 63 साल पहले हमारा देश गुलामी के अंधेरे से मुक्त हो गया हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं कि इन सालों में अंधकार तो गहन होता गया हैं लेकिन प्रकाश की रोशनी कमजोर पड़ती जा रही हैं। आज सामाजिक बुराइयों को साधन बनाकर खुद को इतना अधिक प्रकाशवान कर लेते हैं कि वे समाज के आदर्श बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने में लोगों को संकोच तक नहीं होता हैं। भ्रष्टाचार समाज में शिष्टाचार का रूप लेता जा रहा हैं। अत्याचार पर रोक लगाने का जिन कंधों पर दायित्व हैं वे परदे के पीछे उनके संरक्षक की भूमिका में दिखते हैं। अधिकार संपन्न लोग अपनी सनक में कुछ भी करते देखे जा सकते हैंं। इन अंधकारों में गुणव्यक्ति कहीं खो गयाहैं जिसे देश में कभी गुणों के कारण सम्मान मिला करता था।

रावण बुराइयों और अत्याचार का प्रतीक था जिसका सदगुणों के प्रतीक राम ने वध यिा था और ऋषि मुनियों तथा मानव मात्र को अत्याचार से छुटकारा दिलया था। यह विजय प्राप्त करके राम जब अयोध्या वापस आये थे तब अयोध्यावासियों ने घी के दिये जलाकर उनका स्वागत किया था जिसे हम आज भी दीपावली के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। दीप जलाकर,फटाके फोड़ कर और मां लक्ष्मी की पूजन करने मात्र से दिवाली मनाने का उद्देश्य पूरा नहीं होता हैं। आज आवश्यकता इस बात की हैं कि जिन आर्दशों और सदगुणों के माध्यम से राम ने रावण का वध किया था उन आदशोZं को अंगीकार करें और सामाजिक बुराइयों के रूप स्थापित होते जा रहे रावण राज के अन्त की दिशा में अपने कदम बढ़ायें। अन्यथा हर साल रावण का पुतला तो हम जलाते रहेंगें लेकिन आसुरी शक्तियां देश में फलती फूलती रहेंगी और राम राज का सपनी देखने वाले इस भारत वर्ष में राम ना जाने कहां गुम हो जायेंगें।

इस दिवाली पर हम ऐसा कुछ कर गुजरने का संकल्प ले जो कि हमें राम राज की ओर ले जाये यही दीपावली पर हमारी शुभकामनायें हैं।

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अलसी चालीसा




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2.11.10

किसी ने तो पशु खाया आप ने क्या किया ??
आज  दिल ने कहा की एक और सच बात आप सब  से सांझी की जाए |
मेरा  शहर उत्तरप्रदेश सीमा से लगता है|
यहाँ से पशुओं को ले जाया जाता है अर्थार्त पशु तस्करी का बोर्डर ,
मेरे  सीमावर्ती जिले में में एक बहुत बड़ा बूचड़खाना और अनेक छोटे - छोटे भी है वहाँ रोजाना हजारों पशु कटते है |  
जिनमे गाय,भैंस,कटड़ा ,बछड़ा ,बैल होते है |
कुछ मीट लोकल बिक  जाता है और बहुत बड़ी मात्रा में पैक/फ्रीज़ कर के अन्य शहरों राज्यों में भेजा जाता है | 
हड्डियां फैक्ट्री में जंतु चारकोल(दवा उद्योग में प्रयुक्त)
चमड़ा आगरा को,
चर्बी उद्योगों में घरेलू उत्पादों में,
खून नालो से होता हुआ नदी/नहर  में,
बदबू हवाओं में होती हुई सांसो ने ली,    
नाके पर से ये पशु निम्न तरीको से बोर्डर पार होते है|
१. ट्रको,कैंटरो,ट्रालो से 
२.सीमावरती गावों से झुंडो में 
३ .यमुना नदी के रास्ते कच्चे से 
पहले नम्बर वाला तरीका जयादा प्रचलित है |
दूसरा व तीसरा तरीका तब प्रयोग होता है जब माल पास से ही ख़रीदा गया हो या रोजाना वाले  छोटे व्यपारी (तस्कर)
अब  दूसरा पहलु :-
लोकल शहर में कई दल है जो दबाव गुटों की तरह सक्रिय रह कर इन पशुओं को छुडवाते है
और
नाम ,पुण्य कमाते है अख़बारों में नाम फोटो (मुक्त पशुओं व तस्करों के साथ) आती है | 
तस्कर अगले दिन कोर्ट में (कुल में से नाम नात्र ही )
पुण्य  आत्माए अपने अपने घरों को 
नाके पर सुरक्षाकर्मी अपने काम पर 
ट्रक थाने में(बतौर पार्किंग)
और पशु देखे जरा यहाँ
मजबूर है कूड़ेदानो में मुँह मारने को 
पोलीथीन निगल कर पेट दर्द से तड़प-तड़प  कर मरने को |
 हजारों की संख्या में पशु खेतों में फसलों को खाते हुए खदेड़ कर फिर से  बार्डर पार या फिर मार दिए जाते है कीटनाशक दे कर |

पशु  भी घर घर जा कर भीख मांगने को मजबूर है |
ट्रेनों के नीचे आने को ,
सड़कों पर मरने को ,
दुत्कार खाने को ,
छोटे तस्करों के हाथो पैदल फिर वहीँ पहुचने को मजबूर है |
कहने को तो गोशालाएं  भी है पर वहाँ भी दुधारू पशुओं की ही जरूरत है मुफ्त में चारा खोरो की नहीं  |
अब बताओ इन के लिए क्या बदला 
अगर ये दूध देते तो पंजाब ,हरियाणा ,हिमाचल के पशुपालक इन को क्यूँ बेचते इनको मात्र २००-३०० रूपयों में 
और एक दर्दनाक बात :-
तस्कर इन का वजन बढ़ाने के लिए इनको पानी में कापर सल्फेट घोल के पिलाते है जो किडनी (गुर्दों) की कार्यप्रणाली को बाधित करती है जिस कारण शरीर में पानी की मात्रा बढ़ जाती है  जिस से वजन बढ़ जाता है कंयुकी वहाँ तो इन्होने तोल कर के ही बिकना है
कुछ  तो ट्रकों में ही मर जाते है 
लाशें भी काट कर बेच दी जाती है 
अंत में 
किसी का रोजगार चल रहा है,किसी की भूख मिट रही है ,कोई पुण्य कमा रहा है|

व्यंग्य - सरकार के सरकारी पुलाव



राजकुमार साहू, जांजगीर

सरकार के काम करने के अपने तौर-तरीके होते हैं और वह जैसा चाहती है, वैसा काम कर सकती है। भला आम जनता की इतनी हिम्मत कहां कि उन्हें रोक सके। सरकारी कामकाज में सरकार और उनके मंत्रियों की मनमानी तो जनता वैसे भी एक अरसे से बर्दाष्त करती आ रही है। जनता तो बेचारी बनकर बैठी रहती है और सरकार भी हर तरह से उनकी आंखों में धूल झोंकने से बाज नहीं आती। विकास के नाम पर सरकार के सरकारी पुलाव तो जनता पचा जाती है, मगर जब सुुरक्षा की बात आती है तो फिर जनता के पास रास्ते नहीं बचते। वैसे तो सरकार का दायित्व बनता है कि वे जनता की हिफाजत के लिए तमाम तरह की पहल करे और नीतियां बनाए, किन्तु यह सब ना हो तो फिर जनता आखिर जाएं तो जाएं कहां ? जनता इन्हीं बातों को सोच-सोचकर आधी हुई जा रही है, पर सरकार के कारिंदे हैं कि दोहरा हुए जा रहे हैं। इन दिनों देष के कई इलाकों में हो रहे माओवादी और नक्सली हमले से मेरा दिल दहला हुआ है और जनता भी भयभित है, मगर सरकार है कि बातों-बातों के सरकारी पुलाव पकाने से बाज नहीं आ रही है। खून के प्यासे फल-सब्जियों की तरह निर्दोश लोगों के गला रेते जा रहे हैं और सरकार में बैठे ओहदेदार नुमाइंदे बयान देकर चुप बैठ जाते हैं। हम तो समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ये जान के दुष्मन आखिर सरकार की नीतियांे के खिलाफ हैं या फिर जनता के बीच दहषतगर्दी फैलाना चाहते हैं। रोज-रोज की झंझट से जनता भी त्रस्त है, लेकिन सरकार के पास सरकारी पुलाव जो है, उसी से सरकार अपना काम चला रही है। इन घटनाओं के आगे महंगाई जैसी देष की सबसे बड़ी समस्या गौण हो चुकी हैं। बाहर में बैठे जनता के सेवक भी इस बात को भूले बैठे हैं, क्योंकि इन हिंसाओं के बाद इसके उपर और किसी तरह की समस्या हो ही नहीं सकती। देष के आधे राज्य इस आग में जल रहे हैं, पांच प्रदेषों में तो जनता बेचारी ऐसी ही मारी जा रही है।ं सरकार देखती है, सुनती है और चिंता व्यक्त करती है, लेकिन माथे पर चिंता की एक भी षिकन कहीं नहीं दिखता, आसमान को सिर पर उठाने जैसी हरकत जरूर होती है। देष में तमाम तरह की समस्याएं हैं और सरकार इन समस्याओं को मिनटों में खत्म करने का दावा करती है, या कहें कि कुछ ही मामले, तुरंत-फुरत निपटाए भी जाते हैं, लेकिन देष की इस गंभीर समस्या पर सरकार ने कितना कदम आगे बढ़ाया है, यह तो पता नहीं चलता, मगर सरकार पुलाव के कड़ा स्वाद का पता जरूर चल जाता है। मैं देष की इस बड़ी समस्या से सहम गया हूं और सोच रहा हूं कि जब सरकार कुछ कर नहीं सकती तो फिर जनता के हितों की रक्षा की ताल ठोंकने का भला क्या मतलब। जतना चिल्ला-चिल्लाकर थक जा रही है और प्रभावित क्षेत्रों में जान लेने की बीमारी कोढ़ की तरह बढ़ती जा रही है, किन्तु सरकार किस धुन पर राग मिला रही है, इसे जनता समझ नहीं पा रही है। केवल चिंता जता लेने से ही समस्या खत्म होने वाली नहीं है, लेकिन उनको कौन समझाए कि इस तरह इस मर्ज का इलाज संभव नहीं है। सरकार तो उनसे बात करना चाहती है और दुष्मन है कि मिठी बातों का जवाब, बंदूक की गोलियों से देता है। हम यही मानते हैं कि बातचीत से जरूर छोटी-मोटी समस्या को सुलझायी जा सकती हो,ं पर यह बीमारी ऐसी हो गई है, जिस पर फौरी तौर पर कोई दवा नहीं खोजी गई तो फिर यह एक ऐसी संक्रामक बीमारी का रूप ले लेगी, जिसके प्रभाव से ना तो जनता बच पाएगी और ना ही सरकार। फिर सरकार के सरकारी पुलाव, धरी की धरी रह जाएंगे। बातों से किसी से वैचारिक जीत संभव है, लेकिन मौत की इस लड़ाई में माहिर उन लोगों से ऐसे जीत लेने की उम्मीद करना, उस तरीके से हो जाता है, जैसे पत्थर से पानी निकालना। अब तो मेरा दिल भर आया है और मैं सोच रहा हूं कि आखिर यह मौत का आतंक रूकेगा कब, और जनता कब, चैन की नींद सो पाएगी ? हम यही कहेंगे कि तब, जब सरकार अपने सरकारी पुलाव के कड़वा स्वाद से सबक लेना सीख जाएगी।

अनुदान में हो रहा भ्रस्टाचार

कटनी. केंद्र  एवं राज्य सरकारों द्वारा कृषको को सिचाई हेतु स्प्रिंकलर सिस्टम ट्यूब बेल  एवं अन्य कृषि उपकरणों पर दिए जाने वाले अनुदान में भारी भ्रष्टाचार किया जा रहा है. कृषि विभाग के अधिकारी अनुदान मिलने वाले कृषि  उपकरणों एवं ट्यूबबेल  के कोटेशन के आधार पर भुगतान सीधे उपकरण एवं ट्यूबबेल  सप्लाई करने वाली एजेंसी को करते है.
उनमे अधिकारी भारी भ्रस्टाचार करते है. यदि कोई कृषक बीस फुट लम्बा सिचाई पाईप किसी एजेंसी से सीधे नकद रूपये देकर खरीदता है तो उसकी कीमत चार सौ बताई जाती है तथा वही पाईप अनुदान के रूप में कृषि विभाग के अधिकारियो की मिलीभगत से किसानो की 650 रूपये में दिया जाता है. जिससे कृषको को मिलने वाले अनुदान की कीमत 75 प्रतिशत से घटकर लगभग 40 प्रतिशत पर आ जाती है.
जिले के किसानो ने कलेक्टर से मांग की है की इस तरह होने वाले लाखो रूपये के भ्रस्टाचार की न केवल जाँच की जाए बल्कि इस पर तत्काल अंकुश लगाते हुए दोषियों पर कार्रवाई की जाए. साथ ही ऎसी व्यस्था की जाए की कृषक अपनी इच्छानुसार जहा से चाहे वहा से सिचाई उपकरण खरीद सके एवं अनुदान की राशी सीधे कृषको के खाते में पहुचे.

छात्रावास स्थापना दिवस मनाया

कटनी आदिमजाति आश्रमशाला चिखला में मध्य प्रदेश स्थापना दिवस के साथ-साथ छात्रावास स्थापना दिवस मनाया गया. इस अवसर पर जनपद पंचायत रीठी सी ई ओ पंकज जैन ने कहा की सरकार आदिवासी बच्चो के चहुमुखी विकास के प्रयास कर रही है और इन आश्रम शालाओ में पढने वाले बच्चे संस्कारवान बने और देश के अच्छे नागरिक बने ऎसी सरकार की मंशा है.


जिला पंचायत सदस्य सुरेश सकवार ने कहा की आश्रम शाळा में पढने वाले बच्चे अपने माँ-बाप की आशाओं  के अनुरूप पढाई कर उनका नाम रोशन करे. इस अवसर पर प्रधानाचार्य शर्मा, शुशील राय, ग्राम पंचायत पटोहा सरपंच दिग्विजय सिंह, ग्राम पंचायत सचिव ने भी संबोधित किया. इस दौरान भाषण, निबंध, गीत प्रतियोगिता में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार भी बाटे गए. आभार छात्रावास अधीक्षक कुंजबिहारी परोहा ने व्यक्त किया. इस दौरान चिखला ग्राम के ग्रामीणजन भी उपस्थित रहे.

1.11.10

बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है-ब्रज की दुनिया

जीवन का कोई ठिकाना नहीं.कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता.इसी अनिश्चितता ने जन्म दिया बीमा के व्यवसाय को.निश्चित रूप से बीमा कम्पनियों ने लाखों-करोड़ों घरों को उजड़ने से बचाया है.बीमा अच्छी चीज है इस पर तो विवाद हो भी नहीं सकता;लेकिन बीमा-एजेंटों की खुदगर्जी के चलते बीमा गले का फाँस भी बन सकती है.अचानक आपके घर कोई पूर्व परिचित व्यक्ति आ धमकता है.एक बड़ा-सा बैग लेकर और इतनी मीठी बातें करना शुरू करता है कि आप उसे अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक मान बैठते हैं.आपके दिलों-दिमाग पर कब्ज़ा कर चुकने के बाद वह धीरे से आपके सामने बीमा करवाने का प्रस्ताव रख देता है.पहली बार में आप फँस गए तो ठीक नहीं तो वह आपसे विचार करने का आश्वासन लेकर चल देता है और जब दोबारा आता है तो १-२ किलोग्राम अपने खेत में उपजी गोभी,आलू या कोई अन्य खाद्य-सामग्री लेकर आता है.अब तो आपको फंसना ही है.आप कहते हैं कि मेरा बीमा कर दो तो वह आपको बच्चों का बीमा कराने से होनेवाले लाभों को गिनाने लगता है.आप भी मान लेते हैं कि इसी में आपका फायदा है लेकिन आपको यह पता नहीं होता कि इसमें आपसे ज्यादा उसका फायदा होने वाला है.बच्चा ज्यादा दिन तक जिएगा और एजेंट को ज्यादा दिनों तक बोनस/कमीशन प्राप्त होता रहेगा.यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना.कभी-कभी एजेंट धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर (बगुला भगत बनकर) भी आपको प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है.जब तक तीन प्रीमियम जमा नहीं हो जाता तब तक हो सकता है वह पैसा जमा करने के लिए समय पर हाजिर हो जाए.तीन प्रीमियम तक उसे आपके द्वारा जमा राशि पर सीधे कमीशन प्राप्त होता है.कई बार हो सकता है कि एजेंट पहले प्रीमियम की राशि ही आपसे झटककर दुर्लभ हो जाए.अब आप आगे पैसा जमा करें या न करें आपकी बला से,उसे तो प्रथम जमा से १० से ४०% तक का कमीशन प्राप्त हो ही गया.एक बात और आप जब भी बीमा कराएँ सालाना ही कराएँ नहीं तो आपको प्रत्येक ३ या ६ महीने पर खुद एलआईसी कार्यालय जाने का दुर्भाग्य प्राप्त हो सकता है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब तक आपसे और पॉलिसी मिलने की सम्भावना रहती है एजेंट आता रहता है और जैसे ही आपकी आर्थिक स्थिति ख़राब हुई गदहे की सिंग की तरह गायब हो जाता है.ये सिर्फ सुख के साथी होते हैं.दुःख की घड़ियों में कन्धा देने के बजाये पीठ दिखा जाते हैं.एक बार मेरा एक बीमा एजेंट कई बार समय देने के बाद ठीक ३१ मार्च को यानी वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन हाजिर हुआ और भीड़ का हवाला देते हुए मुझे साथ चलने को कहा.उसके बाद जो हुआ उसे मैं याद तो नहीं करना चाहता लेकिन व्यापक जनहित में बताये देता हूँ.माशाल्लाह तब मैंने सचमुच का किशोर हुआ करता था अब सिर्फ नाम का रह गया हूँ.मुझे अपनी ताकत पर स्वाभाविक तौर पर अभिमान था.एक पंक्ति में चिपक गया.अब पंक्ति खिसकने का नाम ही नहीं ले रही थी.मेरे अलावा पंक्ति में खड़े सारे लोग एजेंट थे और थोक में रसीद कटवा रहे थे.दिन तो रोज ही ढलता था और आज भी ढलता है लेकिन उस दिन वक़्त गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा था.सूरज जब अपनी समस्त प्रकाशराशि  समेट कर जाने लगा तब जाकर मेरी बारी आई.घुटनों में जोश की जगह दर्द भर गया था और पेट में चूहे दंड पेलने लगे थे.किसी तरह जान बच सकी.कहाँ तो जीवन को जोखिम से बचाने के लिए बीमा कराया और कहाँ यही बीमा जान जाने का कारण बनते-बनते रह गई.तो श्रीमान अगर आपके घुटनों में दम हो तभी करवाईये बीमा.सरकार ने जनता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जगह-जगह संग्रह केंद्र खोल दिए हैं.लेकिन यहाँ भी खुद जमा करने जाने में कम परेशानी नहीं.हो सकता है आप जिस संग्रह केंद्र पर जमा करने जाएँ वहां का लिंक फेल हो.बार-बार जाने पर भी कैडबरी के विज्ञापन के पप्पू की तरह फेल ही मिले.इन परिस्थियों में आपको सब कामकाज छोड़कर कई-कई बार संग्रह केंद्र के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.तब आप अपने आपको अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फँसा हुआ महसूस करेंगे,ठीक मेरी तरह.हाथ तो डाल दिया अब निकालें कैसे?चिंता करने से कोई लाभ नहीं आयु के साथ-साथ आपकी बुद्धि भी क्षीण होगी और खुदा न करे मर-मरा गए तो आपको कुछ नहीं मिलेगा,परिवार मालामाल जरूर हो जाएगा.जैसे हर समस्या का समाधान होता है उसी तरह इसका भी समाधान है और वह है सरकार यानी केंद्र के हाथों में.केंद्र को चाहिए कि वह संशोधन करके ऐसा प्रावधान कर दे कि जिससे पोस्ट ऑफिस एजेंटों की तरह बीमा एजेंटों को भी तभी कमीशन या बोनस का लाभ मिले जब वो खुद जमा कराने जाएँ अन्यथा यह राशि ग्राहक को ही दे दी जाए,आखिर वह बेवजह घुटनों का दर्द जो सहता है.अभी तो भैया सीधे माल महाराज के मिर्जा खेले होली वाली स्थिति है.और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो उसे विज्ञापित कर यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि बीमा आग्रह की विषय-वस्तु है.बल्कि इसके बदले यह प्रसारित/प्रकाशित करना चाहिए कि बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है.

जनसुविधायें-जनअधिकार बहाल हों

जनसुविधायें बद से बदतर होती जा रहीं हैं। जनसमस्यायें सुरसा की तरह मुॅंह बाये जनता का सुख चैन लील रही है। भ्रष्टाचार का रावण,तानाशाही रूपी मेघनाद एवं माफिया रूपी कुंभकर्ण के बदौलत जनता की शान्ति रूपी सीता का हरण कर चुका है ।जाने कब इन कलयुगी राक्षसों की लंका का भेदन रामभक्त कोई हनुमान करेगा?
आज आम नागरिक का जीवन नारकीय स्थिति में पहुॅंच गया है। घण्टों विद्युत कटौती के कारण नौकरशाहों,माफियाओं,पूॅंजीपतियों और राजनैतिज्ञों को छोडकर सारी जनता का जीवन कोढ में खाज सरीखा हो गया है ।जन-गण-मन के भाग्य विधाता वातानुकूलित कमरों में जनरेटरों के सहारे अपने ऐश्वर्य का भोग और निर्लज्जता पूर्वक प्रदर्शन करते हुए बेचारी जनता जनार्दन के कल्याण हेतु कार्यक्रम बनाते रहते हैं।अनियंत्रित व भ्रष्टाचार से सराबोर विकास व कल्याण का रथ जन-भावनाओं को रौंदता हुआ भाग्यविधाताओं की तिजोरी भरता हुआ तेजी से दौड रहा है ।इनके मनमाने,अदूरदर्शी,पाखण्ड भरे जनविरोधी कृत्यों का प्रतिफल कौन,कब,कैसे और कहॉं देगा?इन कलयुगी राक्षसों का संहार कौन करेगा?राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे पर दोषारोपण करते देख जनता का मन क्लान्त हो चुका है। चुनाव में मतदान के प्रति उदासीनता राजनैतिक दलों व व्यक्तियों में चारित्रिक गिरावट के ही कारण है ।समस्याओं के खिलाफ आवाज बुलन्द करने वाला जनसमर्थन के अभाव में जटायु की भॉंति सीताहरण विफल करने के प्रयास में असहाय बेचारगी व पराजय झेलता दिखायी पडता है ।जनसमस्याओं
पर आन्दोलन का स्थान नेता,नेता पुत्रों,सम्बन्धियों से सम्बन्धित मामलों पर जो कि वर्चस्व के लिए स्वप्रायोजित होते हैं,ने,ले लिया है।नेताओं का जन्मदिन जनता को साक्षात स्वर्ग के दर्शन करा देता है।नेताओं के जन्मदिन पर कार्यकर्ता जो कि जनता का ही हिस्सा है,समुद्र रूप धारण कर सडको। पर फैले दिखते हैं।फिर क्या अपनी समस्याओं के लिए जनता भी जिम्मेदार नहीं है?दलीय कार्यक्रमों,नेताओं के स्वागत में किन्नरों सा उत्साह प्रदर्शन और अपनी ही समस्याओं से लडने के लिए वक्त की कमी और कोई सुनता नहीं-जैसा मिथ्या प्रलाप ।यह जो आत्महत्या करने जैसा कदम भारत का आमजन उठाता आ रहा है,यह भ्रष्टाचारियों,पूॅंजीपतियों और वंशानुगत राजनीति को संजीवनी दे रहा है ।रही सही कसर अपराधियों द्वारा राजनीति की लंका पर प्रभावी पहरेदारी-कब्जेदारी के प्रयासों ने पूरी कर दी है।

संतुष्टि जनता के लिए अभिशाप बन चुकी है।जो हमारा हक है,उसका आधा या कोई भी हिस्सा हमें मिल रहा है,चलो,कोई बात नहीं, मिल तो रहा है,यह भाव जनसुविधाओं में लगातार कटौती का एक कारण बना है।सरकारी योजनाओं में लाभार्थी से धन-उगाही,अपात्रों द्वारा लाभ अर्जित करने हेतु लोकसेवकों को प्रलोभन देना,दबंगों की मदद से असहायों की भूमि पर कब्जा,सार्वजनिक सम्पत्ति पर कब्जा,कमीशनखोरी,घटिया निर्माण,शिक्षा-स्वास्थ्य-ग्राम्य विकास जैसे महकमों में व्याप्त अनाचार जनता के साथ साथ देश को भी रसातल में ले जा रहें हैं।असंतोष की ज्वाला कहीं जल ही नहीं रही है,धुॅंआ का आभास मात्र हो रहा है ।हालात तो यह है कि जनसमस्या से निजात पाने के लिए जनता को सडक पर होना चाहिए,पर हाय रे बेबसी...
क्या इसी स्वतन्त्र भारत की अवधारणा संजोयें सरदार भगतसिंह ने फॉंसी के फन्दे को स्वीकारा था?क्या महामानव महात्मा गॉंधी ने इसी स्वराज्य के लिए यहॉं की जनता की आजादी की लडाई लडी थी? सरदार भगतसिंह की कल्पना- जनता के लिए जनता की सरकार -कब साकार होगी?आजाद भारत का शासन प्रशासन व पुलिसिया तंत्र ब्रिटिश काल की दरिंदगी को शिकस्त दे रहा है।
शासन को गम्भीरतापूर्वक मनन् करना चाहिए-लोगों के दिलोदिमाग में आग सुलग रही है।यह आग कभी भी विकराल रूप धारण कर सकती है,ज्वालामुखी बनकर फूट सकती है।किसका आशियाना असंतोष रूपी यह लावा जला दे,इसका ठिकाना नहीं है ।जागो हे शासन सत्ता के मद में चूर राजनेताओं-जागो ।अगर अब भी तुम्हारी सत्ता मद में चूर निद्रा भंग नहीं हुई तो विभिन्न अंचलों में फैली हुई गरीब,मेहनतकश रियाया के असंतोष की आग,तथाकथित अराजकता,माओवाद,नक्सलवाद,क्षेत्रवाद,भाषावाद आदि के रूप में फैली असंतोष की यह आग हवा रूपी चन्द झोंकों के इन्तजार में सुलग रही है ।यह हवा शासन की दमन नीति ही बनेगी,इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।इस असंतोष की आग को न तो उपेक्षित किया जा सकता है,न बुझाया जा सकता है।हॉं,जनता की आवाज को सुनकर,जनहित के कार्यों को ईमानदारी से करके,जनसुविधाओं-अधिकारों की तत्काल बहाली करके इसको सकारात्मक रूप में अवश्य परिवर्तित किया जा सकता है ।निश्चित ही यह कार्य सत्ता के शीर्ष पर आसीन नीतिनिर्धारकों को करना ही पडेगा,और उन्हे करना भी चाहिए, वरना् इतिहास तो दोहराया ही जाता है।

पंचायती चुनाव-लोकतन्त्र या भीड़तन्त्र
अरविन्द विद्रोही

उ0प्र0 में पंचायती चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं।चार चरणों में सम्पन्न हुए पंचायती चुनावों ने लोकतन्त्र के वर्तमान स्वरूप को ही कठघरे में खडा कर दिया है।चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित चुनाव आचार संहिता की प्रतिक्षण धज्जियां उडाते हुए तमाम प्रत्याशियों ने अपनी पूॅंजी एवं शक्ति के दम-खम पर ईमानदार-कर्मठ व नेक प्रवृत्ति के सामाजिक सोच रखने वाले प्रत्याशियों को प्रारम्भिक दौर में ही नेपथ्य में धकेल दिया था।निरंकुश,धनमद व शक्तिमद में चूर तमाम प्रत्याशियों ने पंचायत चुनाव में जनप्रतिनिधि निर्वाचित होने के लिए कोई भी अनैतिक रास्ता छोडा नही।प्रलोभन का रास्ता विफल हो जाने पर विपक्षी की हत्या जैसा जघन्य कृत्य भी उ0प्र0 पंचायत चुनाव में घटित हुआ।प्रत्याशी की हत्या में शामिल नामजद आरोपी पंचायत चुनाव में प्रत्याशी बने रहे,यह स्वच्छ व निर्भीक मतदान कराने की चुनाव आयोग की घोषणा का मजाक व माखौल नहीं है तो आखिर है क्या?

जनता का प्रतिनिधि बनने के लिए व्यावसायिक व आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों ने विगत 3-4 महीने बहुत ही मशक्कत की है।जिन्होंने कभी भी किसी भूखे को नही खिलाया न ही किसी प्यासे को कभी पानी पिलाया,वही लोग पंचायती चुनाव में विभिन्न पदों पर निर्वाचित होने के लिए दावतों का आयोजन प्रतिदिन करते रहे।शराब की रिकार्ड तोड बिक्री चुनाव में शराब के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल का प्रत्यक्ष प्रमाण है।उपहार के रूप में साड़ी,कपड़ा के साथ-साथ नकदी ने मतदाताओं के आंखों पर व्यक्तिगत स्वार्थ व धनलोलुपता की पट्टी बांध दी थी।

चुनाव आचार संहिता का माखौल उडाते हुए पूॅंजी के दम पर चुनाव लड़ रहे आपराधिक व गैर सामाजिक प्रवृत्ति के प्रत्याशियों ने शराब बांट कर व शराब पिला कर मतदाताओं का समर्थन जुटाने व मत हासिल करने पर ज्यादा जोर दिया।यह अनैतिक तरीका काफी असरदायक व फायदेमंद साबित हुआ।इस अनैतिक कृत्य के खिलाफ गिने-चुने ईमानदार सामाजिक प्रत्याशियों ने जनता के बीच आवाज उठानी प्रारम्भ की।जनता के एक बडे तबके का रूझान भी शराब-खेरी के खिलाफ बनना प्रारम्भ हुआ।बहुतायत में मतदाताओं ने शराबखोरी व पैसा वितरण जैसा घृणित अनैतिक काम करने वालों को चुनावों में शिकस्त देने के लिए ईमानदार व सशक्त प्रत्याशी की तलाश भी प्रारम्भ की।इन परिस्थितियों को भंापकर व्यावसायिक क्षेत्र के तमाम प्रत्याशियों ने भी सामाजिक-राजनैतिक ईमानदार प्रत्याशियों के वक्तव्यों को दोहराना व जनता के बीच कहना शुरू कर दिया।साथ ही साथ उन्होने एक कुशल व्यावसायी की भांति अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए शराब पिलाने में पैसा न खर्च करके जगह-जगह हैण्डपम्प लगवाने,मरम्मत करवाने,मंदिर-मस्जिद का सौन्दर्यीकरण करवाने,क्षेत्र के बीमार लोगों को आर्थिक सहायता करने,क्षेत्र के मृत व्यक्तियों के अंत्येष्टि संस्कार में शामिल होकर आर्थिक सहायता करना आदि जैसा आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का काम मरना प्रारम्भ किया।क्षेत्र की एक आबादी पैसे की ताकत पर शराब,साड़ी व नकदी के जरिए बहक गई तथा धार्मिक व व्यक्तिगत लाभ के दृष्टिकोण से तमाम मतदाता व्यावसायिक प्रत्याशियों की तरफ चले गये।मतदाताओं का बड़ा तबका जातिवाद में फंसा रहा।जातिवाद,तात्कालिक लाभ,शराबखोरी,धार्मिक उन्माद,प्रलोभन व आतंक के जाल में फंस कर आदर्श चुनाव संहिता ने दम तोड़ दिया और तमाम शिकायतों व प्रत्यक्ष प्रमाणों के पश्चात भी चुनाव आयोग मौन रहा।

सामाजिक-राजनैतिक आचरण को नकारते हुए चुनाव जीतने की लालसा में जिस प्रकार का आचरण बहुतायत में प्रत्याशियों ने किया और उनके अनैतिक आचरण के प्रभाव में आकर जाति-धर्म के फेर में पड़कर,धन वितरण,शराब खोरी,व्यक्तिगत तात्कालिक लाभ के फेर में पड़कर जो समर्थन व मत देने नहीं अपितु बेचने का कार्य जाने-अनजाने मतदाताओं ने किया है,उसका परिणाम मतगणना के पूर्व ही सामने आ चुका है।सामाजिक-राजनैतिक चरित्र के प्रत्याशियों की बहुतायत में हार व धनवान,व्यावसायिक व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की जीत सुनिश्चित मानी जा रही है। सम्पन्न हुए पंचायती चुनाव ने सही अर्थों में साबित कर दिया है कि लोकतनत्र अब भीड़तन्त्र में बदल गया,जहां आदर्श-शुचिता-सदाचरण-ईमानदारी-नेकी जैसी बातें बेमानी हैं।

अपने मन के रावण को मारें, मन का अंधेरा मिटायें - दीप पर्व मनायें

फिर इस वर्ष भी हमने,हम सबने लंकेश रावण के पुतले का दहन कर डाला।नव दुर्गा का उपवास रखा,शक्ति रूपों की पूजा की,माॅं स्वरूप् कन्याओं को भरपूर भोजन कराया,उन्हें भेटें दी।अब हम सभी को दीपावली की तैयारी में लगना है।सुख,समृद्धि,खुशियों के त्यौहार,मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी के लंका विजय व वनवास पूरा करने के पश्चात् अयोध्या वापस आने की प्रसन्नता में मनाया जाने वाला दीप पर्व भी हमें मनाना है।अंधकार भगाने के प्रतीक स्वरूप दीपावली का यह पुनीत पर्व सम्पूर्ण परिवार तथा समाज को बहुप्रतीक्षित सदैव रहा है।साथ ही साथ धनतेरस,नरक चैदस,गोवर्धन पूजा,भैया दूज,कलम दवात आदि पर्व हम श्रद्धा-भक्ति व धूमधाम से मनायेंगें।सदियों से इन त्यौहारों को मनाने की परम्परा है और निःसन्देह सदैव रहेगी।

प्रत्येक त्यौहार-परम्परा का एक विशेष महत्व होता है।उसके मूल में एक सन्देश-भाव छिपा रहता है।महापराक्रमी विद्वान दशानन लंकेश रावण पर अयोध्या के राजकुमार-वनवासी राम की विजय सिर्फ एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर विजय नहीं थी।न ही यह विजय राक्षसों की सेना पर वानरों,भील आदि रामभक्तों की सेना की विजय मात्र थी।वस्तुतःयह विजय थी-सत्ता के मद में चूर महापराक्रमी रावण के द्वारा स्त्री के अपमान के फलस्वरूप् उत्पन्न परिस्थितियों एवं असत्य के राही एवं मदमस्त रावण पर मर्यादा की स्थापना हेतु पिता के आज्ञा पालन हेतु अयोध्या छोड़कर वन में विचरण करने वाले सत्य के राही राम की।यह विजय थी-असत्य पर सत्य की।

सत्यमेव जयते।सत्य की विजय हो।कैसे?कभी सोचा हमने? आज तो जन-मन-गण की सोच ही थक चुकी है या साफ-साफ कहें तो सोच निस्प्राण होकर विकृत अवस्था को प्राप्त हो चुकी है।जहां जिस धरा पर आदिकाल से वसुधैव-कुटुम्बकम् की अवधारणा स्थापित रही हो,वहां पाश्चात्य सभ्यता व पूंजीवाद इतना प्रभावी हो गया है कि पैसों के लिए परिवार भी विखण्डित हो रहे हैं।पारिवारिक विखण्डन अब व्यक्ति के आंतरिक टूटन की वजह बन गई है।अंधाधुंध आर्थिक उन्नति की मंजिलें तय करते-करते मनुष्य मानसिक-सामाजिक-चारित्रिक रूप से बिखरता जा रहा है।इन नैतिक मूल्यों का हनन व्यक्ति-परिवार-समाज सभी को हानि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे रहा है।

हां,तो बात फिर से दीपावली पर्व के सन्दर्भ में।दीप पर्व की हमारे वर्तमान जीवन में उपयोगिता की,असत्य पर विजय प्राप्त कर के अयोध्या वापस लौटे मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम चन्द्र जी के सम्मान व स्वागत में आयोजित हुए इस दीप पर्व के आज हमारे द्वारा परम्परागत रूप से मनाये जाने की प्रासंगिकता पर।माॅं कैकेयी द्वारा माॅंगे गये पिता से वरदान की लाज रखने हेतु,पिता के वचनों की,राजधर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए पत्नी-भाई समेत वन जाने जैसा आचरण क्या आज हमारे समाज में करने की कोई सोच भी सकता है?आज तो हालात यह हो गई है कि पुत्र के विवाहोपरान्त बेचारे माॅं-बाप ही घर से कब निकाल दिये जायें,इसका ही ठिकाना नहीं है।रिश्तों को भौतिकता रूपी दीमक चाट चुका है।लालच का बिच्छू अपना जहर लोगों के नसों में उतार चुका है।मिथ्याचरण मनुष्य के आभूषण रूप में सुशोभित हो रहा है।सदाचार मानव स्वभाव से विलुप्त हो चुका है और व्यभिचार आम जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है।आज कहां हैं राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र,कहां है भरत-शत्रुध्न और लक्ष्मन जैसे भाई?क्या कोई स्त्री सीता जैसा कष्ट सहने का,पति के साथ दुःखमय जीवन जीने का निर्णय ले सकती है?त्याग की भावना की जगह वासना-पूर्ति की अभिलाषा अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका है।तो क्या हमें अपने अन्दर के राक्षस रूपी इन विकारों को,आसुरी प्रवृत्तियों को खत्म करने का प्रयास नहीं करना चाहिए? क्या परम्परागत रूप से महाविद्वान पुलस्त्य ऋषि के नाती,महापराक्रमी,बलवान,ज्ञानी,शिवभक्त परन्तु अहंकारी,सत्ता मद में चूर,राक्षसी प्रवृत्ति के,स्त्री उत्पीड़क लंकेश रावण के पुतले का दहन कर के ही हम दशहरा मनाते रहेंगें?सिर्फ परम्परा के निर्वाहन हेतु दीप पर्व मनायेंगें?

आइये......समाज के हितार्थ स्वयं की आन्तरिक आसुरी शक्तियों के खिलाफ धर्मयुद्ध की शुरूआत करें। अन्र्तद्वन्द छेड़े। चेतना को नया आयाम दें।नया सबेरा लाने की दिशा में कदम बढ़ायें।अपने मन के लंकेश को सदाचार रूपी बाणों से नाभि प्रहार यानि दुराचरण का खात्मा करके आसुरी शक्ति को परास्त कर परिवार-समाज की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें।यदि मानव एैसा करे तो श्री रामचन्द्र जी के लंका विजय के उल्लास में,अयोध्या वापसी की प्रसन्नता में आज तक मनाये जा रहे इन पर्वों की,दीप पर्व की प्रासंगिकता हमारे वर्तमान में है अन्यथा सिर्फ अवकाश,थोड़ा सैर-सपाटा,मन बहलाव व ईश्वर भक्ति के ढ़ोंग के लिए दीपावली मनाना कोई मायने नहीं रखता।

किसान संघर्ष-बारदौली से अब तक

30जून,1927 को ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी में जकडी़ भारतमाता के कर्मयोगी सपूतों-अन्नदाता किसानों पर बम्बई प्रदेश की सरकार ने बारदौली जनपद,सूरत ताल्लुक का लगान 20:25 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था।यह वही समय था जब ब्रिटेन की तीनों प्रमुख पार्टियों:कंजरवेटिव,लिबरल और लेबर के प्रतिनिधि साइमन कमीशन के नाम से भारत में तत्कालीन शासन व्यवस्था के काम करने के तरीके का पता लगाने,शिक्षा की दशा,प्रातिनिधिक संस्थाओं के विकास की स्थिति आदि का पता करने घूम रही थी।इस कमीशन का पूरे भारत में जोरदार तरीके से विरोध किया गया था।

लगान में वृद्धि के विरोध में बारदौली के किसानों ने अपना संगठित स्वरूप खड़ा किया।बढ़े हुए लगान का प्रतिरोध करने के लिए आन्दोलन स्वयं किसानों ने खडा किया।किसानों को जागृत किया,एकत्र किया,बड़ी विशाल किसान सभा का तत्काल आयोजन हुआ।किसानों का एक प्रतिनिधि-मण्डल लगान में अनुचित वृद्धि को वापस लेने की मांग को लेकर सरकार के राजस्व अधिकारी से मिला,ज्ञापन दिया।होना क्या था?किसानों को दर्द देने वाले हाथ दवा देने से रहे।किसान अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गये।16सितम्बर,1927 को दूसरी किसान सभा का आयोजन किया गया।बम्बई की लेजिस्लेटिव कौसिंल बढ़े हुए लगान को वापस लेने व वसूली रोकने का प्रस्ताव भेज चुकी थी परन्तु सरकार सहमत न हुई।इस दूसरी सभा में तमाम कंाग्रेसी नेता और कौंसिल के सदस्य शामिल हुए थे।निर्णय ले लिया गया-बढ़ा हुआ लगान नहीं देंगे।

सरकार खामोश रही,किसान सुलगते रहे।4फरवरी,1928 को किसानों ने फिर सभा करके अपना निर्णय लगान नही देंगे को दोहराया तथा वल्लभ भाई पटेल को अपना नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया।निमंत्रण मिलते ही पटेल महात्मा गांधी से मिले।महात्मा गांधी से इजाजत लेकर,उनसे गहन विचार-विमर्श करने के पश्चात् पटेल ने बारदौली के किसानों का आन्दोलन अपने हाथों में लिया।गांधी का ब्रह्मास्त्र सत्याग्रह लेकर उनके विश्वस्त पटेल ने किसानों की फौज के सेनापति का दायित्व उठाया।

12फरवरी,1928 को किसानों का सम्मेलन हुआ।फैसला हुआ-जब तक सरकार लगान की दरें संशोधित करने के लिए वचनबद्ध नहीं होगी,तब तक किसान सरकार को लगान नहीं देंगे।बारदौली के गांवों में एक-एक पुराने कांग्रेसी को जिम्मेदारी देकर किसानों को आंदोलन की रूपरेखा बताने में लगा दिया पटेल ने।लगानबंदी के साथ-साथ असहयोग भी प्रारम्भ हो गया।सरकारी महकमें के लोगों से बोलना,बैलगाड़ी देना,सामान बेचना सब बन्द कर दिया किसानों ने।क्या यह सब शान्तिपूर्वक हो रहा था?सरकार दमन पर उतर आई।मवेशियों की कुड़की प्रारम्भ हुई,किसानों ने शान्ति बनाये रखी।फिर सामूहिक कुड़की का दौर चला।पुलिस और उनके पठान किसानों के घरों में घुसते,मारते-पीटते और घर की चीजों और जानवरों को लेते जाते।इन कार्यों के विरोध में केन्द्रीय विधानसभा के अध्यक्ष विठ्ठल भाई पटेल ने वाइसराय को पत्र लिखकर अपने पद से इस्तीफा देने की धमकी दी।

किसानों पर हो रहे इस दमन चक्र की आग पूरे देश में फैल रही थी।हर तरफ से लगान कम करने की मांग उठने लगी।बारदौली के किसानों के समर्थन में देश में चारों तरफ सभाओं का आयोजन हुआ।बम्बई और संयुक्त प्रान्त में भी किसानों ने लगानबंदी का अनुसरण करने का ऐलान किया।आन्दोलन को व्यापकता देने के लिए गांधी जी ने पूरे देश में एक साथ बारदौली दिवस मनाने की अपील की।तारीख तय हुई-12जून,1928।बारदौली दिवस पर आयोजित एक सभा में तत्कालीन कंाग्रेस अध्यक्ष डा0अंसारी ने कहाः-बारदौली के लोग जमाने से चली आई दासता से हमारे गुलाम मुल्क की मुक्ति के पलटन के हरावल हैं।

किसानों की जनशक्ति को देख,अन्नदाता के विराट संगठित रूप को देख,भारतीयों की भीष्म प्रतिज्ञा को देखकर बंबई के गवर्नर ने पटेल को धमकी भी दी।पर गांधी के सैनिक और किसानों सेनापति पटेल ने लौह पुरूष की दृढ़ता दिखाई।वह टस से मस न हुआ।फलतःबारदौली के किसानों की विजय हुई,पुराना लगान लागू हो गया।गुलामी की जंजीर की एक कड़ी लौह पुरूष पटेल के नेतृत्व में अन्नदाता किसान के विराट रूप ने तोड़ दी।सरकार ने वायदा किया कि सभी गिरफतार लोगों को छोड़ दिया जायेगा तथा कुड़की की सारी सम्पत्ति वापस होगी।इस वायदे के आधार पर जुलाई 1928 को आंदोलन समाप्त कर दिया गया।11-12अगस्त,1928 को सारे गुजरात में बारदौली विजय का उत्सव मनाया गया।यहां पर ही किसान शक्ति ने पटेल को सरदार की उपाधि से विभूषित किया था।हर तरफ महात्मा गाॅंधी की जय और सरदार पटेल की जय गुंजायमान हो रही थी।लेकिन अफसोस बाद में बारदौली के किसानों से किया गया वायदा निभाया न गया।किसानों को जेल से रिहा न किया गया।जब्त सम्पत्तियां भी वापस न की।वाइसराय ने अपने वायदों की कोई कीमत न रखी।गांधी जी ने वायसराय को इस वायदाखिलाफी के विषय में कई पत्र लिखे,परन्तु कोई असर न हुआ।बहरहाल,एक सत्य यह भी है कि यही बारदौली का सत्याग्रह है जिसने कांग्रेस,गांधी जी और उनके अनुयायियों की जनप्रियता सारे देश में बहुत बढ़ाई परन्तु किसानों के साथ हुई वायदाखिलाफी पर ये लोग कुछ न कर सकें।बारदौली सत्याग्रह ने गांधी जी के लिए राजनीति में पुनःप्रवेश और कांग्रेस की बागडोर फिर से अपने हाथ में लेने का मार्ग प्रशस्त किया।

आज आजादी के 62 वर्षों बाद भी किसानों का शोषण-उत्पीड़न बन्द नहीं हुआ है।विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए मनमाने तरीके से किसानों की उर्वरा भूमि का अधिग्रहण जन विरोधी कृत्य है। अपने अथक परिश्रम से जिस भूमि पर अपना खून पसीना बहा कर,तपती दोपहरी में,भयानक सर्द मौसम में और भीषण बरसात में सपरिवार दिलो-जान लगा कर,अपना,अपने परिवार एवं समाज के उदर पोषण हेतु अन्न उपजाता है,वही भूमि,विकास के नाम पर अधिग्रहीत कर के,कंक्रीट के जंगलों में बदल दी जा रही है।सम्पूर्ण देश में भूमि अधिग्रहण के मामलों ने किसानों से उनका हक छीन लिया है।विभिन्न सरकारी आवासीय योजनाओं के लिए कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण तो बदस्तूर जारी ही है,प्रापर्टी डीलरों ने भी किसानों की जमीनों की खरीद-फरोख्त कर के मोटा पैसा कमाने के साथ ही साथ भारत की कृषि आधारित व्यवस्था को बरबाद करने में और किसानों को बर्बादी,शराब खोरी तथा बेरोजगारी की तरफ ढकेलने जैसा कार्य किया है। भूमाफियाओं के काले कारनामें अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं।विभिन्न अदालतों में भी भूमि सम्बन्धित मामले लम्बित पड़े हैं।धार्मिक स्थल,कब्रिस्तान की जमीनें भी जमीन के इन दलालों ने नहीं छोड़ी हैं।रही-सही कसर किसानों की बेशकीमती उर्वरा भूमि पर शासन-प्रशासन की दृष्टि ने पूरी कर दी है।ग्राम समाज,बंजर,नजूल आदि जमीनों के रहते हुए कृषि योग्य उर्वरा भूमि का अधिग्रहण,ब्रितानिया जुल्मों सितम् की याद दिलाता है।किसानों का कोई पुरसा हाल नहीं है,आम जन मॅंहगाई के बोझ तले कराह रहा है।भारत के वर्तमान कृषि मंत्री सत्ता मद में चूर हो कर,बार-बार कालाबाजारियों को शह देने वाले गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य देकर हिन्दुस्तान की रियाया का मजाक उड़ा रहें हैं।किसानों के हितों,आम जनता के हितों के बजाए कृषि मंत्री मिल मालिकों व जमाखोरों को प्रोत्साहन देने का जन विरोधी कार्य करने में मशगूल हैं।आज किसान बेबस होकर,अपनी शक्ति से आन्दोलन की राह पर खड़ा है।भूमि अधिग्रहण,चकबन्दी,नहर कटान,बाढ़ की विभिषिका,नकली खाद,बीजों की कमी,कृषि लागत में वृद्धि,शैक्षिक स्थिति,स्वास्थ्य-परक समस्याओं से जूझ रहा किसान आज ठगा जा रहा है।दुर्भाग्य वश किसानों का नेतृत्व भी किसानों की शक्ति के बल पर,इनको संगठित करके,अपनी राजनैतिक हैसियत,आर्थिक मजबूती बनाने में लगा रहता है।अधिकारों की बहाली व प्राप्ति के संघर्ष के स्थान पर समझौतों की परिपाटी डाल रखी है,किसानों के इन रहनुमाओं ने।किसान वर्षों से अपनी समस्याओं से जूझ रहा है और राजनीति व नौकरशाही के गठजोड़ में किसानों का शोषण अनवरत् जारी है।

कृषि आधरित भारत की संरचना,महात्मा गांधी के ग्राम्य स्वराज्य की अवधारणा,आज हमारे हुक्मरानों की अनियंत्रित और जनविरोधी विकास की भेंट चढ़ रहीं हैं।आज किसानों के द्वारा ‘‘सरदार’’ की उपाधि से विभूषित वल्लभ भाई पटेल को अपना आदर्श मानने वालों को किसानों के हित की लड़ाई में अपना सर्वस्व दांव पर लगा देना चाहिए। सरदार वल्लभ भाई पटेल को सच्ची श्रद्धाजंली होगी-किसानों की कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण का बन्द होना।युग दृष्टा सरदार भगत सिंह ने कहा था,-‘‘वास्तविक क्रांतिकारी सेनायें तो गांवों और कारखानों में हैं।

आज भी अन्नदाता किसान बेहाल है,किसान हित का दावा करने वाले सभी लोगों को एकजुट होकर बुनियादी जरूरतों के लिए लड़ना चाहिए यही सच्ची श्रद्धाजंलि होगी सरदार वल्लभ भाई पटेल को।

मां को न्याय दिलाने को मायावती को पत्र भेजा


'ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज' में प्रभात खबर और हरिवंश पर एक अध्याय







आप अपने पदों से ऊपर उठकर इंसानियत के नाते इन लड़कियों की लाचार मां की मदद कीजिये...

हो सके तो इंसानियत के नाते इस ब्लॉग को पढ़कर एक विधवा माँ क़ी ह़र संभव मदद कीजिये...हमने तो कुछ लोगों को पुलिस और प्रशासन क़ी लापरवाही से उत्पन्न इस इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना के लिए जिम्मेवार लोगों को सख्त सजा का आग्रह किया है | ऐसे मामले बढ़ते जा रहे है इसलिए इस दिशा में कुछ ठोस करने के लिए हमसब को बहुत मेहनत करनी होगी...पढिये इस ब्लॉग को ...
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आपका-जय कुमार झा

निःषुल्क चिकित्सा षिविर आयोजित

देहरादून 31 अक्टूबर 2010, महिला कॉग्रेस की राष्ट्रीय महामंत्री, कौमी एकता की संयोजक व पूर्व मेयर मनोरमा डोबरियाल शर्मा ने आज मेहूवाला ग्राम में उत्तराखण्ड लोकतन्त्र अभियान द्वारा आयोजित विषाल निःषुल्क चिकित्सा षिविर के मुख्यअतिथि के रूप में रिब्बन काट कर उदघाटन किया। इस अवसर पर अपने सम्बोद्धन में उन्होंने कहा कि देहरादून के विभिन्न क्षेत्रों में जनता को विभिन्न बिमारियों से इलाज के लिए इस तरह के निःषुल्क केम्प के आयोजन किये जाएगें। जिसमें विभिन्न बिमारियों के इलाज हेतु निःषुल्क दवा वित्ररण के साथ-साथ विषेषज्ञों डाक्टरों की सहायता ली जा रही है। उन्होंने कहा कि वे इस षिविर में अपनी सेवा देनें वाले सभी डाक्टरों का आभार प्रकट करती है। उन्होंने कहा कि जनता की सेवा वे इसी प्रकार करती रहेगी। षिविर में चर्म रोग विषेषज्ञ डा0 तरूण मित्तल, नेत्र रोग विषेषज्ञ डा0 योगम्बर बर्त्वाल, नाक,कान,गला, रोग विषेषज्ञ डा0 आलोक जैन,जनरल फिजीषियन डा0 आर यादव, बाल रोग विषेषज्ञ डा0 डी.पी. जोषी, सर्जरी रोग विषषेज्ञ डा0 मनीष आनन्द, हृदय रोग विषषेज्ञ डा0 संजय गाँधी। आदि ने भारी संख्या में पहुचंे लोगो को अपनी सेवायें प्रदान की व निःषुल्क इलाज के लिए दवा का वितरण भी किया गया। उन्होनें कैम्प का शुभारम्भ करने से पहले पूर्व प्रद्यानमंत्री स्व0 श्रीमती इदिंरा गाँधी के पुण्य तिथि पर श्रद्वान्जलि अर्पित की। व स्व0 सरदार वल्लभ भाई पटेल जी की जयंती पर भी उनको नमन किया। उक्त मेडिकल कैम्प को सफल बनाने में आयोजक उत्तराखण्ड लोकतन्त्र अभियान के अध्यक्ष शेर सिंह लटवाल, संयोजक, कुलदीप डोबरियाल, महामंत्री रविकान्त रावत, सचिव सतीष कुमार, हाजी नूरहसन, जिलाध्यक्ष अल्पसंख्यक, कॉग्रेस कमेटी डा0 एम.एस. अन्सारी, बी.डी.सी. सदस्य मुकेष चौहान बीना देवी, मौ0 फारूक, ग्राम प्रधान, मौ0 इरषाद, बीना शर्मा, सावित्री भारती, मौ0 रिसालुद्दीन साहव हक्कानी, मौ0 ज़हीर अहमद आदि लोगो का विषेष योगदान रहा।

कंाग्रेस हाईकमान ने यषपाल का बढ़ाया कद।

देहरादून, कांग्रेस प्रदेष अध्यक्ष यषपाल आर्या की पुनः ताजपोषी कर कांग्रेस हाइकमान ने उत्तराखण्ड में उनके कद को और अधिक बढ़ा दिया है जबकि प्रदेष अध्यक्ष पद को लेकर उनके विरोधी गुट लगातार उनकी ताजपोषी ना होने का पिछले काफी समय से ताना बाना बुनते रहे लेकिन कांग्रेस की राश्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने पिछले लोकसभा चुनाव में पांचों लोकसभा की सीटों का कांग्रेस की झोली में आना महत्वपूर्ण माना और प्रदेष अध्यक्ष के कुषल नेतृत्व के कारण ही पांचों सीटों पर विजयश्री हासिल किए जाने का श्रेय उन्हें पुनः प्रदेष अध्यक्ष पद पर ताजपोषी कर दे डाला। हाईकमान के सामने जिस तरह से यषपाल आर्या का कद ऊंचा हुआ है। उसे लेकर 2012 के होने वाले विधान सभा चुनाव में लोकसभा की पांचों सीटों की तरह सभी सीटों पर जीत दर्ज किए जाने की जिम्मेदारी भी यषपाल आर्या के कंधों पर आ गई है। माना जा रहा है कि कांग्रेस आगामी होने वाले विधान सभा चुनाव में बिना मुख्यमंत्री पोजैक्ट किए ही विधानसभा चुनाव लड़ेगी। इसके साथ ही पार्टी को एकजुटता के साथ चुनाव में जुटने का मूलमंत्र भी तैयार करेगी क्योकि हाईकमान किसी भी कीमत पर लोकसभा चुनाव की तरह प्रदेष की सभी सीटों पर कब्जा करने का खाका तैयार करने में जुटी हुई है। हालाकि यषपाल आर्या के विरोधी को उनकी प्रदेख अध्यक्ष पद पर ताजपोषी से नाखुष नजर आ रहे है लेकिन हाईकमान ने साफतौर पर नाराजगी जताने वाले कांग्रेसी नेताओं को एआइसीसी का सदस्य बनाते हुए एकजुटता के साथ 2012 में पुनः सत्तवापसी किए जाने की बाते साफतौर पर कही है। प्रदेष अध्यक्ष पद पर पुनः यषपाल की ताजपोषी ने यह संकेत भी दे दिए है कि प्रदेष मे यदि कांग्रेस बहुमत से अधिक विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है तो इसका श्रेय कांग्रेस के प्रदेष अध्यक्ष को देते हुए उन्हें 2012 में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर भी बैठाया जा सकता है क्योंकि उत्तराखण्ड के कांग्रेसी नेता हरीष रावत को कांग्रेस हरिद्वार से सांसद बनाते हुए केन्द्रीय मंत्री बना चुकी है और अब पुनः हरीष रावत को प्रदेष की राजनीति में सक्रीय ना करते हुए उन्हें केन्द्रीय नेता के रूप में पेष करेगी। यषपाल आर्या के सरल स्वभाव के साथ साथ सभी कां्र्रग्रेसी नेताओ को साथ लेकर चलने का जहां मांदा है वहीं कांग्रेस की नजर दलित वोटो पर भी टिकी हुई है क्योकि उत्तराखण्ड की सभी विधान सभाओ में दलित वोटों का आंकड़ा लाखों में है और कांग्रेस इसे किसी भी कीमत पर खोना नही चाहती क्योकि उत्तराखण्ड दौरो के दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी व कांग्रेस राश्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी दलित वोटो का गहन मंथन कर चुकी है और पूरे देषभर में कांगेस की नजर आगामी होने वाले विधान सभा चुनाव में खासतौर से दलित वोटों पर लगी हुई है क्योंकि दलित वोटो के साथ साथ यदि पार्टी के कैडर वाटों को जोड़ दिया जाए तो किसी भी प्रदेष में कांगेस को विधानसभा चुनाव में विजयश्री हासिल करने में ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नही पड़ेगी हालाकि यषपाल आर्या की पुनः प्रदेष अध्यक्ष पद पर ताजपोषी से जहां दलित समुदाय के साथ साथ हर वर्ग में खासा उत्साह बना हुआ है वहीं उनकी साफ छवि को देखते हुए उन्हें अगले मुख्यमंत्री के रूप में भी देखा जा रहा है। पुनः प्रदेष अध्यक्ष पद पर बनने के बाद यषपाल आर्या से हुई बातचीत में उन्होने कहा कि कांग्रेस हाईकमान ने उन्हे जो जिम्मेदारी दी है उसे वह बखूबी निभाऐगे। और सभी को साथ लेकर 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्जकर पुनः सत्ता वापसी की जाएगी। उन्होने कहा कि वह सरकार की जनविरोधी नीतियों को लेकर सदन से लेकर सड़को तक आन्दोलन कर चुके है लेकिन इसके बाद भी भाजपा सरकार विकास कार्याे में कोई ध्यान नही दे रही और जल्द ही आगामी रणनीति तय कर सरकार के खिलाफ आन्दोलन षुरू किया जाएगा। एक सवाल के जवाब में श्री आर्या ने कहा कि उन्हें पुनः प्रदेष अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है और वह उस पर पूरी तरह खरा उतरने प्रयास करेंगे कुल मिलाकर यषपाल आर्या के प्रदेष अध्यक्ष बनने के बाद उनके सर्मथको में खुषी एवं नए उत्साह का संचार हो गया है वहीं 2012 में विजयश्री हासिल कर पुनः कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी आ गई है। अब देखना होगा कि यषपाल किस तरह से पुनः अपनी पारी की षरूआत करते हुए भाजपा को सत्ता से दूर करने में कामयाब हो पाते हैं।09837261570

मिलावट के खेल में अधिकारी हुए फेल

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
दीपावली आते ही मिलावटखोर एक बार फिर सक्रिय हो गए है लेकिन इस बार शहर में नकली माल तैयार करने की जगह कटनी के आसपास बसे गावो में नकली मावा और घी तैयार किया जा रहा है. माल तैयार होने के बाद यहाँ से कई जिलो में नकली माल की सप्लाई हो रही है. दिलचस्प बात यह है की खाद्य एवं सम्मिश्रण विभाग सब कुछ जानते हुए भी मिलावटखोरो पर कार्रवाई करने में कंजूसी बरत रहा है.



हर चीज मिलावटी

दाल - बटर की दाल

बेसन - पीला रंग

मावा - डालडा और एसेंस

घी - डालडा, रिफाइंड और एसेंस

शक्कर - सफ़ेद पावडर

लाल मिर्च - लाल रंग

रिफाइंड - पाम आयल

दूध - vaiitanar, सपरेटा, शेम्पू

मिनरल वाटर - अशुद्ध पानी

हल्दी - पीला रंग



खाद्य विभाग करता है फर्ज अदायगी

खाद्य एवं औषधीय सम्मिश्रण विभाग में जब नए इंस्पेक्टरों की शहर में पोस्टिंग हुई थी, तो काफी कार्रवाई हुई लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे बाहर से आये अधिकारियो के शहर में संपर्क बढ़ते गए, कार्रवाई औपचारिकता बनकर रह गई. आलम यह है की आधी जगह जो कार्रवाई की जाती है वह तो कागजो में दिखाई जाती है जबकि अधिकांस जगह तो मामला बिना दर्ज हुए ही निपटा दिया जाता है.

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यह ईमेल मुझे उस एकाउन्ट से प्राप्त हुई है जिसमे एकाउन्ट होना तो दूर मैं कभी उसकी साईट पर भी नहीं गया।

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Sun, Oct 31, 2010 at 4:54 PM
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