----चुटकी----
लिब्रहान आयोग
की जाँच,
डोंट वरी
किसी पर भी
नहीं आएगी आंच।
27.11.09
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गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर
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लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-3
संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य
ब्रिटिश एवं फ़्रांसिसी क्रांति के फलस्वरूप, यूरोप में पश्चिमी उदारवादी प्रजातंत्र का जन्म हुआ, परन्तु इस व्यवस्था में व्यापारिक एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का दबदबा बना रहा, जिसके कारण कार्य करने वाले वर्ग अर्थात् मजदूरों एवं किसानों को सामाजिक एवं आर्थिक न्याय नहीं मिला। संयोगवश कम्पनियों एवं कारपोरेशनों को वैधानिक अधिकार दिया गया ताकि वे व्यापार आसानी से कर सकें। इसके साथ ही साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता की अवधारणा ने भी जन्म लिया। फैक्टरियों में 16 से 18 घण्टे तक काम लिया जाता था, बाल श्रम जोरांे पर था, अनाथालयों की दशा बड़ी दयनीय थी एवं जहाँ की स्थिति गुलामी से थोड़ी बेहतर थी, जिनका सजीव चित्रण मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार चाल्र्स डिकन्स ने अपनी किताबों में किया है। गुलामों एवं मजदूरों का व्यापारिक प्रतिष्ठानों के द्वारा अनियंत्रित शोषण किया जाता था। शासक वर्ग द्वारा समाजवाद के उदय के भय से एवं 19वीं शताब्दी में मजदूर संगठनों के यूरोप में उदय के कारण, फैक्टरी अधिनियम का निर्माण किया गया। कार्य के घण्टों एवं मजदूरी की दरों का निर्धारण किया गया। फैक्टरी जाँच इन्सपेक्टरों एवं मजदूर अदालतों का जन्म हुआ।
आर्थिक एवं राजनैतिक हित, जो इस युग में विजयी होकर सामने आए, उनकी पूर्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता की संवैधानिक अवधारणा के द्वारा की गई। उस समय न्यायपालिका सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक वातावरण से पूरी तरह पृथक थी। उस समय के प्रभावशाली वर्ग के द्वारा निरन्तर एवं संगठित धार्मिक प्रचार का परिणाम यह हुआ कि लोग एक उच्च दैवीय सत्ता की लालसा करने लगे जो उन्हें समाज के अन्याय से मुक्ति दिला सके एवं समाज का पुनर्गठन कर सके। इसके फलस्वरूप बहुत सी संस्थाओं में लोगों का अंधविश्वास उत्पन्न हो गया।
सितम्बर 1988 में कैलिफोर्निया के एटार्नी जनरल के पास एक शिकायत दर्ज की गई कि कैलीफोर्निया की यूनियन आयल कम्पनी का चार्टर रद्द घोषित कर दिया जाए। यह चार्टर अफगानिस्तान में अवैध कब्जे के सम्बन्ध में है। इस शिकायत को अमेरिका के 25 संगठनों के द्वारा दर्ज किया गया जिसमें नेशनल लायर्स गिल्ड आफ अमेरिका प्रमुख है। इस शिकायत में अमेरिका की राजनैतिक एवं न्यायिक संस्थानों का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया, ‘‘जायत कारर्पोरेशन उस राज्य (अफगानिस्तान) की सरकार चलाने वाली क्रिया कलापों में लिप्त है वे एक स्वतंत्र, सम्प्रभु राष्ट्र की चुनाव प्रक्रिया, कानून निर्माण प्रक्रिया एवं न्याय प्रक्रिया को दूषित करना चाहते हैं वे धन का प्रयोग करके राजनैतिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं, फिर भी हमारे एटार्नी जनरल एवं गवर्नर, कारपोरेट अपराधों के प्रति बहुत मृदुल रहते हैं वे इस भ्रम को बनाये रखना चाहते हैं कि जुर्माना एवं यदा कदा दण्ड से काम चल जाएगा। साथ ही साथ वे कारपोरेट ब्लैकमेल का भी शिकार हो रहे हैं जब यह कहा जाता है कि ‘‘अमित्रवत व्यापारिक वातावरण कम्पनी को राज्य (अफगानिस्तान) से बाहर निष्कासित कर देगा।’’
उपर्युक्त शिकायत अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों पर आधारित है जिनमें से दो हमारी परिचर्चा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उन कारणों पर रौशनी डालते हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक संस्थाओं के वर्तमान पतन से सम्बंधित है। साथ ही साथ ये भी स्पष्ट करते हैं कि न्यायिक एवं राजनैतिक संस्थाएँ, उस आर्थिक धोखा धड़ी का जवाब नहीं दे पा रही हैं जिसके द्वारा आर्थिक संसाधनों को मजदूर एवं मध्यम वर्ग से छीनकर बैंकों एवं आर्थिक संस्थाओं को हस्तांतरित किया जा रहा है ताकि धनी वर्ग का देश की राजनीति में दबदबा बना रहे।
स्टैण्डर्ड आॅयल आफ न्यू जेरेसी बनाम यूनाइटेड स्टेट्स नं0 221 यू0एस01 (1911) के मुकदमें में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कारपोरेट गतिविधियों की तुलना गुलामी प्रथा से की थी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ‘‘सौभाग्यवश देश को मानवीय गुलामी से आजादी हासिल हो गई है जैसा कि आज सभी महसूस करते हैं परन्तु देश एक अन्य प्रकार की गुलामी की गिरफ्त में है अर्थात वह गुलामी जो धन एवं पूँजी के कुछ हाथों एवं कारपोरेशनों के हाथों में केन्द्रीय करण से उत्पन्न होती है एवं ये लोग अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए देश के सम्पूर्ण व्यापार पर कब्जा कर रहे हैं जिसमें जीवन की आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन एवं उनकी बिक्री भी शामिल है।’’
जस्टिस बै्रन्डिस ने लिगेट कम्पनी बनाम ली (नं 288 यू0एस0 517, 580) के मुकदमे में सन् 1933 में कारपोरेशनों से संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रजातंत्र एवं उसकी संस्थाओं को जो गंभीर खतरा उत्पन्न था, उस पर चिन्ता व्यक्त की। जस्टिस ब्रैण्डिस ने कहा परिवर्तन जो मजदूरों एवं सामान्य जनता के जीवन में लाए गए हैं वे इतने आधारभूत एवं सुदूरवर्ती हैं कि विद्वानों ने विवश होकर विकसित हो रही कारपोरेट संस्कृति की तुलना, सामन्तवादी प्रथा से की हैं। इन परिवर्तनों के कारण बुद्धिजीवी एवं अनुभवी व्यक्ति यह कहने पर मजबूर हो गए हैं कि न्याय पालिका धनी वर्ग के शासन के प्रति कटिबद्ध है।’’
आज संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे जजों की अधिकता है जिन्होंने कार्पोरेशनों एवं उनके हितों को सर्वोपरि रखा है। कारपोरेट निर्णय प्रक्रिया एवं कारपोरेट अपराधों ने अप्रत्याशित कानूनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है। परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं नागरिक स्वतंत्रता की बलि दी जा रही है, चर्च एवं राज्य के पृथक्कीकरण के सिद्धांत को ताक पर रख दिया गया है, गैर कानूनी ढंग से लोगों की तलाशी ली जा रही है और उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है।
एक अक्टूबर सन् 2001-2002 में सुप्रीम कोर्ट खुलने की पूर्व संध्या पर सहायक न्यायाधीश जस्टिस साॅन्ड्रा डे ओ कोनर ने न्यूयार्क स्कूल आफँ लाॅ के ग्रीनविच विलेज कैम्पस में बोलते हुए ऐसे शब्द कहे थे जो किसी भी देश के सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत जज के लिए अप्रत्याशित थे। उन्होंने कहा कि 11 सितम्बर के आतंकवादी हमले के बाद लोगों के प्रजातंात्रिक अधिकारों पर अप्रत्याशित ढंग से प्रतिबंध लगा दिये गए। उन्होंने आगे कहा कि यह बहुत संभव है कि हम राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित आपराधिक मुकदमों के मामलों में अपने राष्ट्रीय संविधान की अपेक्षा युद्ध से सम्बंधित अन्तर्राष्ट्रीय कानून पर निर्भर करेंगे। हमारे ऊपर जो हमले हो रहे हैं उनसे विवश होकर हमें अपने आपराधिक जाँच, फोन टैपिंग एवं प्रवास से सम्बंधित कानूनों का पुनरावलोकन करना पड़ेगा।
लेखिका-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स
अनुवादक-मोहम्मद एहरार
मोबाइल - 9451969854
जारी ....
loksangharsha.blogspot.com
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Randhir Singh Suman
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खतरनाक मंसूबा तो नहीं था नापाक राणा का?
**अमरीका में गिरफ्तार खुंकार आतंकवादी संगठन लश्कर- ए- तयबा का पाकिस्तानी मूल का कनेडियन नागरिक आतंकवादी तहवुर राणा जरायम के लिये बदनाम हो रहे पश्चेमी उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ भी आया था. ये राजफास होते ही हमेशा की तरह देर से जागने वाले खुफिया विभागों के कान खड़े हो गए है. इतना ही नहीं वह अपनी पत्नी समराज अख्थर के साथ हापुड़ और आगरा भी गया था. उसने अपनी नापाक नीगाहों से खूबसूरती की मिसाल ताज को देखा. तहवुर राणा आगरा के होटल वीरेन इंटरनेशनल के रूम नंबर १०१ में ४ लोगों के साथ रुका था. आगरा के डीआइजी आदित्त्ये मिश्रा भी इसकी पुष्टि करते है. नेशनल इन्वेस्तीगेसन एजेंसी और ए.टी.एस मेरठ और आगरा में डेरा डालकर जाँच में लगी है. मुंबई हमलो से पहले लश्कर आतंकी हेडली को मेरठ से मेल किये जाने का भी पता चला है. लेकिन उसको मेल करने वाला कोन था और उसका मकसद क्या था इसका अभी पता नहीं चल रहा है. साइबर अपराध से जुड़े लोग जाच कर रहे है. वसे आतंकवादियो से मेरठ का रिस्ता कोई नया नहीं है. सालों पहले इसकी नीव अब्दुल करीम और सलीम पतला ने डाल दी थी एन दोनों को ही आज तक पकड़ा नहीं जा सका है. उनके पाकिस्तान में होने की सम्भावना जताई जा रही है. आतंकवादी आते है और आराम से चले जाते है. देश में कही भी आतंकवादी घटना हो उसके तार पश्चेमी उत्तर प्रदेश से जरूर जुडते है. पश्चिम के कई जिलों मे आतंकवादिओं का गहरा नाता है. साल में आधा दर्जन से भी अधिक आतंकवादिओं की गिरफ्तारी अक्सर चोकाती है. आतंकवादिओं की सक्रियता पर अंकुश लग पायेगा एसा संभव नहीं लगता. तहवुर राणा जेसा आतंकी आया और चला गया उस जेसे न जाने कितने आते है. ये अलग बात है की पता ही नहीं चलता. खतरनाक बात ये है की तहवुर राणा का आखिर मेरठ और आगरा जाने का मकसद क्या था. **नितिन सबरंगी
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Nitin Sabrangi
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एक साल पहले 26 / 11 के दिन टीवी चैनलों का कवरेज (3)
अपने ज्ञान के अभाव को पूरा करने केलिए चैनलों पर विदेश मंत्रालय के वर्तमान और भू.पू. अधिकारियों,पुलिस अफसरों और नेताओं के बयानों से ज्यादा कोई सामग्री चैनलों में नजर नहीं आयी। सरकारी लोगों को बिठाकर बातें करने से पेशेवर पत्रकारिता अपनी भूमिका अदा नहीं करती। हमारे चैनलों पर अभी तक आतंकवाद और आतंकी संगठनों के बारे में पेशेवर पत्रकारों और गैर सरकारी लोग तकरीबन नजर ही नहीं आते। जनता के प्रतिनिधि के नाम पर बेतुकी बातें करने वाले राजनीति,आतंकवाद आदि के न्यूनतम ज्ञान से शून्य सैलेबरेटी बैठे हुए थे। ये लोग कॉमनसेंस की अनर्गल बातें कर रहे थे। आतंकवादी प्रभाव को कॉमनसेंस ,अर्नगल और सरकारी सेंस के आधार पर पछाड़ना संभव नहीं है। चैनलों के पास खबरों का प्रधान स्रोत था पुलिस। इसके अलावा चैनल किसी भी स्रोत से खबर नहीं जुटा पा रहे थे।
चैनलों के कवरेज का एक सबसे बड़ा सकारात्मक तत्व था आतंकी खबरों का मुसलमान विरोधी खबर में तब्दील न होना। आतंक की खबर को आतंकियों तक सीमित रखने में इन्हें सफलता जरूर मिली। इसके कारण मुसलमान विरोधी भावनाएं पैदा नहीं हो पायीं। जबकि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय ऐसा नहीं हो पाया था, मुसलमान विरोधी भावनाओं को भड़काने में मीडिया सबसे आगे था।
पंजाब में सन् 80 के आतंकी दौर में हिन्दू और सिख विरोधी भावनाओं को भड़काने में पंजाब का प्रेस सबसे आगे था। अपवाद था 'ट्रिब्यून' समाचार पत्र। अन्य प्रमुख पंजाबी पत्रों में हिन्दू-सिख विरोधी वैचारिक लामबंदी चल रही थीं। यही स्थिति अन्य मौकों पर भी देखने में आयी है। अमेरिका के नाइन इलेवन कवरेज ने मुसलमान विरोधी भावनाओं को व्यक्त किया।
सन् 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी उन्माद पैदा करने में सरकारी टीवी दूरदर्शन की बड़ी भूमिका थी। जिसके कारण हजारों सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह बात इंदिरा गांधी की मौत की जांच करने वाले रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित की है। यह रिपोर्ट आज तक संसद में नहीं रखी गयी। भारत-विभाजन के समय प्रेस की साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने में भूमिका थी। यह बात प्रथम प्रेस कमीशन की रिपोर्ट में रेखांकित है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय प्रेस की साम्प्रदायिक भूमिका थी इसे प्रेस परिषद ने माना। कई समाचार पत्रों को इसके लिए सेंसर किया गया। इन सभी पिछले अनुभवों की रोशनी में कह सकते हैं कि मुंबई की आतंकी घटना का कवरेज कम से कम मुसलमान विरोधी नहीं था। पाक विरोधी भावनाओं से लबालब भरा था।
टीवी चैनलों ने बार-बार जिस चीज पर जोर दिया वह था भारत का 'लोकतंत्र'। मीडिया ने भारत के लोकतंत्र की बड़ी प्रशंसा की और आतंकी कवरेज के सत्य को गौण बनाया। कवरेज में बार-बार पाक का आना, भारत की तुलना में पाक का आना 'लोकतंत्र' को बड़ा बना रहा था। इस क्रम में आतंकी घटना से संबंधित तथ्यों की उपेक्षा हुई। 'लोकतंत्र' में आस्था के कारण ही भारत के पुलिस,अधिकारियों, अफसरों और विदेश सेवा के नौकरशाहों का कवरेज ज्यादा आया। इन सबने 'लोकतंत्र' पर ज्यादा दिया। तटस्थ किस्म के पेशेवर लोगों,सैलेबरेटी लोगों,राजनेताओं आदि के वक्तव्य ज्यादा पेश किए गए। घटना से संबंधित तथ्य कम से कम प्रस्तुत किए गए। 'लोकतंत्र' पर जोर देने के कारण ही घटना के तथ्यों को खोजने और प्रसारित करने की बजाय घटना पर विभिन्न किस्म की राय और और टॉक शो में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। चैनल मानकर चल रहे थे कि भारत को सुरक्षित रखना है तो लोकतंत्र को सुरक्षित करें। घटना के तथ्य भले ही हाथ से निकल जाएं। दुनिया लोकतंत्र के लिए है तथ्यों के लिए नहीं। इसके विपरीत नाइन इलेवन की घटना में लोकतंत्र गौण था, घटना के तथ्य मुख्य थे। अमरीकी पत्रकार मानकर चल रहे थे कि आज की दुनिया की सुरक्षा के लिहाज से 'लोकतंत्र' महत्वपूर्ण नहीं है, घटना के तथ्य महत्वपूर्ण हैं।
'लोकतंत्र' के पैराडाइम के आधार पर आतंक के खिलाफ वैचारिक प्रचार अभियान चलाया गया। पाक के झूठ का संगठित प्रत्युत्तर दिया गया। पाक के झूठ के खिलाफ पाक के मीडिया और पाक प्रशासन में असर हुआ। वहां बगावत पैदा करने में भारत के मीडिया को सफलता मिली। भारत के चैनलों के 'लोकतंत्र' पैराडाइम का ही असर था कि पाक के चैनलों का एक धड़ा और प्रशासन में भी पाक प्रशासन के असत्य के खिलाफ स्वर सुनने को मिले और अंत में पाक के अंदर और बाहर इस झूठ के खिलाफ दबाव तेज हुआ।
आज अमरीका,ब्रिटेन आदि से लेकर सुरक्षा परिषद तक पाक के झूठ के खिलाफ गोलबंदी दिखाई दे रही है उसमें भारतीय चैनलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत सरकार पहलीबार इस बात को विश्व जनमत को समझाने में सफल रही है कि पाक झूठ बोल रहा है। कहने का तात्पर्य यह है 'लोकतंत्र' को आधार बनाकर टीवी चैनलों ने जो विचार वर्षा की थी उसने पाक के झूठ को तबाह कर दिया। पाक बार-बार घटना के तथ्यों तक सीमित रखना चाहता था चैनलों ने इस सीमा को मानने से इंकार किया और व्यापक लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में घटना पर रोशनी डाली।
यह सच है चैनलों के पास तथ्य कम थे वे ही तथ्य थे जो सरकारी स्रोतों से आ रहे थे। 'पाक प्रशासन लंबे समय से झूठ बोल रहा है' इस एक नारे के इर्दगिर्द लोकतंत्र का जिस तरह से वातावरण बनाया गया उस वातावरण को पाक तोड़ नहीं पाया और यह कूटनीति,राजनीति के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी जीत थी। पाक को अंतत: मानना पड़ा पाकिस्तान के गैर सरकारी लोगों का मुंबई की आतंकी घटना में हाथ है।
एक बार जब विश्व जनमत को यह बात समझाने में सफलता मिल गयी कि पाक प्रशासन लंबे समय से झूठ बोल रहा है तो पाक प्रशासन को भी स्वीकार करना पड़ा आतंकियों के प्रशिक्षण कैंप पाक में हैं और कुछ कैंप बंद करा दिए गए हैं। अब तक पाकिस्तान यह मानने को तैयार नहीं था कि पाक में आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर हैं। चैनलों की वैचारिक बमबारी का यह सीधा परिणाम था। पाक प्रशासन को मजबूर होकर कैंप बंद कराने पड़े। आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। कुछ को गिरफतार किया कुछ को घरों में नजरबंद किया। पाक प्रशासन कल तक आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने से गुरेज करता था उसे भी आतंकियों के खिलाफ सक्रिय होना पड़ा। यह भारतीय चैनलों की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पहलीबार पाक प्रशासन ने आतंकियों से पृथक् करके अपने को प्रस्तुत किया।
टीवी चैनलों की दूसरी बड़ी उपलब्धि है कि उन्हें जो कुछ मिलता गया उसे दिखाते गए। इस क्रम में कुछ गलत और ज्यादातर सही हुआ है। जो गलत हुआ है ,वह पेशेवर अकुशलता के कारण हुआ है। चैनल यदि झूठ बोलते तो खबरें छिपाते। चैनलों ने झूठ नहीं बोला इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उनके पास जो भी खबर,अफवाह,रिपोर्ट,बयान आदि आया उसे दिखाते गए,इस क्रम में पुनरावृत्ति भी हुई। चैनलों का लगातार दिखाते रहना स्वयं में झूठ को नष्ट करने का औजार बन गया। चूंकि वे घटना के तथ्य कम और विचार अथवा अन्य चीजें ज्यादा दिखा रहे थे फलत: इससे कोई खास नुकसान नहीं हुआ बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रचार ज्यादा हुआ। तात्कालिक खबर, तात्कालिक विचार पर उसके प्रभाव के बारे में सोचे बगैर जोर दिया गया। इससे न तो राष्ट्र की कोई क्षति हुई और न आम जनता की। चैनलों के मालिक बड़े कारपोरेट घराने हैं अत: उन्होंने आतंकी घटना को तेजी से मुनाफे में तब्दील किया। रेटिंग बढ़ायी, ज्यादा विज्ञापन हासिल किए।
टीवी की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि थी कि इसने मुंबई की आतंकी घटना को लेकर 'डिसइनफॉर्मेशन' फैलाने का काम नहीं किया। प्रस्तुति में उत्तेजना,अतिरंजना और बोगस चीजें थीं। किंतु 'डिस इनफॉर्मेशन' नहीं था। चैनलों ने जिन सूचनाओं को संप्रेषित किया उनका सबसे बड़ा स्रोत सरकारी एजेंसियां थीं। जो थोड़ी बहुत सूचनाएं निजी प्रयासों से एकत्रित की थीं उनको भी बाद में पुष्टि का मौका मिला। टीवी से प्रसारित ज्यादातर खबरें बाद में पुष्ट हुई हैं। खबर सही है तो उसकी अन्य स्रोत से पुष्टि जरूर होगी।
'डिसइनफॉरमेशन' का मतलब सुचिंतित झूठ। यह ज्यादा नुकसान करता है। सुचिंतित झूठ का चैनलों ने एकदम प्रचार नहीं किया। हां, 'मिसइनफॉरमेशन' को कई बार जरूर देखा गया ,'मिस-इनफॉरमेशन' का मतलब है सबके द्वारा जो चीज स्वीकृत नहीं होती। अथवा भूल से दी गयी सूचना , यह सुचिंतित नहीं होती। इसलिए उसे हमेशा बोलते नहीं हैं। इसी तरह सूचना असत्य हो सकती है साथ ही नुकसानदेह भी हो सकती है।
टीवी चैनलों ने आतंकी खबरों के संदर्भ में 'षडयंत्र सैध्दान्तिकी' का व्यापक इस्तेमाल किया। आतंकियों ने कहां-कहां योजना बनायी होगी, कैसे तैयारी की होगी। इसके बारे में जितना भी कवरेज आया वह 'षडयंत्र सैध्दान्तिकी' के नजरिए पेश किया गया।
टीवी कवरेज में 'पीड़ित समाज' कम नजर आया। आतंक की घटनाओं के संदर्भ में पीड़ितों का सामने आना बेहद जरूरी है। हम नहीं जानते कि आतंकी कार्रवाई में जो लोग मारे गए उनके नाम क्या हैं, जो घायल हुए उनके नाम क्या हैं। इनके नाते-रिश्तेदारों पर क्या गुजरी। कभी -कभार किसी बड़े अफसर का कोई रिश्तेदार टीवी में नजर जरूर आया। आम तौर पर टीवी की 'पीड़ितों के आख्यान' में दिलचस्पी नहीं होती। यह टीवी या मीडिया की संवेदनहीनता है।
'पीडितों' को दिखाना जिस तरह अमरीकी मीडिया में 'टेबू' माना जाता है वही स्थिति हमारे मीडिया में भी है। 'पीडितों के आख्यान' का अर्थ है 'हीरो' और 'हमले में जीवित बचे लोगों' का आना। इनके नाम पर राजनीति का आना। आमतौर पर पीड़ित वे हैं जो निर्दोष हैं,असमर्थ हैं। पीड़ितों में से जब किसी को प्रस्तुत किया जाता है तो राजनीतिक लक्ष्य साधन के तौर पर पेश किया जाता है। इस मामले में आदर्श उदाहरण है हेमंत करकरे की मौत ,उसकी पत्नी और परिवार का आना,उनकी पत्नी का टीवी पर लंबा काव्य वक्तव्य और साक्षात्कार, केरल के मुख्यमंत्री सी.अच्युतानंदन का प्रसंग, मोदी का हेमन्त करकरे को एक करोड़ रूपये की सहायता राशि आदि का प्रसंग।
आतंक पीड़ितों का बहुत बड़ा समाज है। यह समाज उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर जम्मू-कश्मीर तक। दिल्ली से लेकर पंजाब तक फैला हुआ है। इन पीडितों को देखने,जानने, प्रस्तुत करने का मीडिया के पास न तो समय है और न सही समझ है। पीडितों के बृहत्तर समाज ने 'पीड़ितों की राजनीति' को भी पैदा किया है। यह मूलत: संकीर्णतावादी राजनीति है।
पीड़ितों की राजनीति ने असली और नकली पीडित का अंतर पैदा किया है। बड़े शहीद और छोटे शहीद का अंतर पैदा किया है। कश्मीर में खासकर कश्मीरी हिन्दू और गैर हिन्दू पीड़ितों के बीच इस अंतर को साफतौर पर महसूस किया जा सकता है। पंजाब ,असम में यह अंतर देखा जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि टीवी अथवा मीडिया के लिए 'पीड़ित' की केटेगरी में खास दिलचस्पी नहीं है। आमतौर पर पीड़ित का आख्यान व्यक्तिगत और नैतिक आख्यान बनकर सामने आता है। उसके व्यक्तिगत समाधान को ही पेश किया जाता है।
मीडिया का पीड़ितों के प्रति जो उपेक्षाभाव है उससे यही संदेश जाता है कि समाज में पीड़ित जैसी कोई केटेगरी नहीं है। पीड़ित तब ही कवरेज पाता है जब प्रतिवाद पर उतर आए और नाटकीय मुद्रा में अपने को पेश करे। ऐसे में मीडिया पीड़तों के दुख को नाटक या नजारे में तब्दील कर देता है। उसे ढोंग बना देता है। पीड़ितों के प्रति टीवी चैनलों का क्या रवैयया है इसे पीड़ित स्त्री के आख्यान की प्रस्तुति में सहज ही देख सकते हैं।
टीवी ने मुंबई आतंकी हमले के शिकार हेमन्त करकरे आदि अफसरों को पीड़ित की केटेगरी से निकालकर हीरो की केटेगरी में पेश किया। नाइन इलेवन की घटना मेेंं मारे गए लोगों को भी पीड़ित या शिकार की केटेगरी में रखने की बजाय हीरो बनाया गया था। आतंक के पीड़ित को मीडिया और सत्ता पीड़ित न कहकर 'शहीद' या 'हीरो' के रूप में प्रस्तुत करते हैं यह पीड़ित की अवधारणा और अवस्था को झुठलाना है।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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26.11.09
एक साल पहले 26 / 11 के दिन टीवी चैनलों का कवरेज (2)
आतंकी हमले की इमेज जब प्रस्तुत की जाती है तो देखना होगा कि क्या पेश किया जा रहा है और किस भाषा में पेश किया ज रहा है और लोग किस रूप में ग्रहण कर रहे हैं। मुंबई की आतंकी घटना के 59 घंटे के कवरेज में आरंभ किसी इमेज से नहीं होता है बल्कि सबसे पहले भाषा में खबर पेश की जाती है। शीर्षक था 'दो गुटों में फायरिंग'। इसके कुछ समय बाद इमेजों का प्रक्षेपण आरंभ होता है जो 59 घंटे तक चलता है। इसमें सबसे पहली इमेज 'टाइम्स-नाउ' चैनल पर आती है। जिसमें आतंकी हमलावरों को भागते,फायरिंग करते, पुलिस कास्टेबिलों के साथ मुठभेड़ करते, पुलिस गाड़ी को हाईजैक करते दिखाया गया।
आतंकी घटना के तथाकथित लाइव कवरेज ने दो सवालों को जन्म दिया है। पहला बुनियादी सवाल यह उठा है कि क्या मुंबई की आतंकी घटना के लाइव प्रसारण ने प्रसारण के एथिक्स का उल्लंघन किया है ? दूसरा सवाल ,क्या टीवी से प्रत्यक्ष आतंकी हिंसा का प्रसारण दिखाया जाना चाहिए ? इन दोनों सवालों पर विचार करने पहले यह ध्यान में रखना बेहद जरूरी है कि आतंकी हमला क्यों हुआ ? आतंकियों की मंशा क्या थी ?
आतंकी हमला राष्ट्रद्रोह है। किसी भी तर्क से इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता। 'इकनॉमिक टाइम्स',(हिन्दी, 30 नबम्बर 2009) में प्रकाशित एसोचैम के सचिव डी.एस. रावत के अनुसार आतंकी हमले से तकरीबन चार हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ।
अनेक मीडिया पंडितों का मानना है मुंबई के आतंकी हमले का लाइव कवरेज मूलत: टीवी के अभिजनवादी नजरिए की अभिव्यक्ति है। लाइव कवरेज के संदर्भ में यह तर्क एकसिरे से बेहूदा और बोगस है। यह संयोग की बात है कि मुंबई के हमले के निशाने पर अभिजन थे। किंतु यह हमला अभिजनों पर नहीं किया गया था। यह हमला भारत पर हुआ था। इस हमले का व्यापक कवरेज इसलिए हो पाया क्योंकि यह घटना मुंबई में घटी थी और टीवी चैनलों के लिए प्रसारण के फ्लो को बनाए रखना संभव था। यही घटना कहीं दूर-दराज के इलाके में घटी होती तो इतना व्यापक कवरेज नहीं आता। मीडिया की घटना तक सहज पहुँच ने इसके कवरेज को संभव बनाया।
यह भी कहा गया कि मीडिया ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के रेलवे स्टेशन की आतंकी-पुलिस मुठभेड़ और उसके बाद की परिस्थितियों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित न करके पांच सितारा होटलों पर हो रही मुठभेड़ पर ज्यादा ध्यान दिया। रेलवे स्टेशन पर साधारण लोग थे और पांच सितारा में अभिजन थे। रेलवे स्टेशन पर मारे जाने वाले लोग साधारण मध्यवर्ग के थे और पांचसितारा में जो लोग थे वे अभिजन थे। अपने अभिजनवादी नजरिए के कारण मीडिया ने पांचसितारा की मुठभेड़ को ज्यादा कवरेज दिया।
इस तरह के तर्कों के संदर्भ में पहली बात यह है कि आतंकियों के निशाने पर कभी कोई सामाजिक वर्ग या धर्म नहीं होता। आतंकी हमले का मूल लक्ष्य है 'भय' पैदा करना और ज्यादा से ज्यादा हत्या करके व्यापक कवरेज हासिल करना। आतंकी हमले के निशाने पर हमेशा राष्ट्र होता है। इस प्रसंग में सिर्फ जम्मू-कश्मीर का ही उदाहरण काफी होगा। जिन इलाकों में आतंकी कार्रवाई जारी है वे इलाके किसी भी दृष्टि से अभिजन इलाके नहीं हैं। यही स्थिति उत्तर-पूर्व के राज्यों में चल रही आतंकी कार्रवाई के संदर्भ में देख सकते हैं। यहां तक कि नक्सल आतंक से वे ही इलाके प्रभावित हैं जो किसी भी रूप में धनी नहीं हैं। आतंकी कभी जाति,दौलत,और धर्म देखकर हमला नहीं करते। आतंकियों का मूल निशाना राष्ट्र होता है। राष्ट्र को तबाह करने के लिए किसी का भी खून बहाया जा सकता है,कहीं पर भी हमला किया जा सकता है। किसी को भी बंधक बनाया जा सकता है और कहीं पर भी मुठभेड़ हो सकती है।
दूसरी बात यह कि टीवी कवरेज खासकर आतंकी कवरेज कितना होगा और कहां पर कैमरा होगा यह कभी दर्शक की स्थिति के अनुसार तय नहीं किया जाता। टीवी पर जब लाइव कवरेज आता है अथवा जब खबरें आती हैं तो उन्हें अभिजन ही नहीं देखते बल्कि साधारण लोग भी देखते हैं। अखबार में जब खबर छपती है तो उसे अमीर ही नहीं साधारण लोग भी पढ़ते हैं। आतंकी हमले के खिलाफ सबसे ज्यादा गुस्सा अगर कहीं नजर आता है तो साधारण आदमी में नजर आता है। क्योंकि सबसे ज्यादा उसे ही क्षति उठानी पड़ती है।
आतंक की खबरों का सबसे ज्यादा उपभोग अमीरों में नहीं होता। अभिजन में नहीं होता। टीवी कवरेज के बारे में यह मिथ है कि टीआरपी बढ़ाने के लिहाज से लाइव कवरेज का इस्तेमाल किया गया। यह संभव है टीआरपी बढ़े और यह भी संभव है टीआरपी घटे। किंतु यह निर्णय तुरंत नहीं लिया जा सकता। किसी भी घटना के कवरेज से मीडिया की टीआरपी बढ़ी है या घटी है यह इससे तय नहीं होग कि कितने लोगों ने देखा। बल्कि इससे तय होगा कि मीडिया की साख बढ़ी है या घटी है। जब भी कोई लाइव कवरेज आता है आम खबरों की तुलना में उसकी दर्शक संख्या हमेशा ज्यादा ही रहती है। यह बात क्रिकेट-फुटबाल मैच से लेकर मुंबई कवरेज तक सब पर लागू होती है। किंतु कवरेज का असर किसी समुदाय विशेष पर नहीं होता। समूचे समाज पर होता है। समाचार या लाइव कवरेज या क्रिकेट मैच का सीधा प्रसारण अथवा विज्ञापन का प्रसारण या सीरियल या फिल्म का प्रसारण हो ,यह प्रसारण सिर्फ दर्शकों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि उन्हें भी प्रभावित करता है जो लोग इसे नहीं देखते। जो लोग नीति निर्धारक हैं।
प्रसारण हुआ है तो प्रभाव भी होगा यह बात दावे के साथ कहना संभव नहीं है। प्रभाव हो सकता है और नहीं भी हो सकता। आमतौर पर आतंकी कवरेज का प्रभाव क्षणिक होता है। कवरेज का प्रभाव स्थायी तब ही होता है जब उस प्रभाव को लागू करने वाली सांगठनिक संरचनाएं निचले स्तर तक मौजूद हों।
मीडिया का प्रभाव तब ही होता है जब प्रभाव को लागू करने वाले संगठन सक्रिय हों। यह सच है कि मीडिया का लक्ष्य हमेशा अभिजन का कवरेज होता है किंतु सारी चीजें मीडिया के अनुसार नहीं चलतीं। मीडिया प्रवाह के अपने नियम हैं और ये नियम वर्गीय सीमाओं के परे काम करते हैं। मीडिया सिर्फ लक्ष्य के अनुसार ही प्रभाव नहीं छोड़ता। बल्कि अनेक ऐसी चीजें आ जाती हैं जिनकी मीडिया ने कल्पना तक नहीं की होता। मीडिया प्रवाह स्वयं में प्रधान कारक कभी नहीं रहा। मीडिया हमेशा तब ही भूमिका अदा करता है,तब ही प्रभावित करता है जब उसे लागू करने वाली संरचनाएं निचले स्तर तक सक्रिय हों। मीडिया सहयोगी होता है निर्णायक नहीं आमलोग हों या अभिजन हों। कोई भी मीडिया से निर्णायक तौर पर संचालित नहीं होता। इनके संचालन और नियमन के नियमों की जड़ें समाज में हैं। सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक प्रक्रियाओं में हैं।
कवरेज कैसा होगा ? यह इस बात पर निर्भर करता है कि दांव पर क्या लगा है ? दांव पर यदि निर्दोष लोगों की जिंदगी लगी है तो कवरेज भिन्न किस्म का होगा। यदि दांव पर आतंकी लगे हैं तो भिन्न होगा। दांव पर कुछ भी नहीं लगा है तो कवरेज की शक्ल अलग होगी।
विभिन्न टीवी चैनलों के लाइव कवरेज में सूचनाएं बहुत कम थीं। न्यूनतम सूचनाओं की बार-बार पुनरावृत्ति हो रही थी। सारवान खबरें एकसिरे से गायब थीं। इसका प्रधान कारण था टीवी चैनलों के पास संसाधनों की कमी। चैनलों के पास जितने भी संवाददाता थे वे सब एक ही स्थान पर विभिन्न दिशाओं में लगे हुए थे ,वे घटनास्थल पर खड़े थे और बाहर खबर के आने का इंतजार कर रहे थे।
खबर स्वयं चलकर नहीं आती। खबर को लाना होता है, बनाना होता है। अर्णव गोस्वामी,बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई आदि जितने भी टीवी पत्रकार थे वे न्यूनतम सूचनाएं संप्रेषित कर रहे थे। घंटों एक ही सूचना को दोहरा रहे थे। डीएनए अखबार ( 29 नबम्वर 2008) में वी .गंगाधर ने लिखा 43 घंटे गुजर जाने के बाद भी दर्शक यह नहीं जानते थे कि होटल में कितने आतंकी हैं, कितने लोग मारे गए हैं। चैनल बार-बार कह रहे थे कि आतंकियों से मुठभेड़ अंतिम चरण में है। किंतु अंत दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था। ज्योंही बंदूक की आवाज सुनाई देती थी अथवा विस्फोट की आवाज सुनाई देती थी चैनल पर बताया जाता था कि जंग तेज हो गई है। गंगाधर ने सवाल उठाया है कि ऐसा कहकर चैनलों ने दर्शकों को भ्रमित क्यों किया ?
दोनों पांच सितारा होटलों से लपटें उठती हुई नजर आ रही थी। ये लपटें कभी उठती थीं। कभी बुझ जाती थी। कभी सिर्फ धुंआ नजर आता था। कभी फायरिंग की आवाज आती थी। कभी होटल में फंसे लोग बाहर आते नजर आते थे। कभी कोई खिड़की खुली नजर आती थी। कभी किसी खिड़की से झांकता कोई चेहरा नजर आता था। कभी किसी आतंकी का शरीर झांकता था। कभी किसी आतंकी की लाश खिड़की से लुढ़कती नजर आ रही थी।
सड़कों पर झुंड बनाकर रिपोर्टर खड़े थे। कभी जमीन पर लेटकर रिपोर्टिंग कर रहे थे। कभी पुलिस बैन नजर आ रही थी। कभी कमाण्डो आपरेशन करते नजर आ रहे थे। कभी पोजीशन लेते नजर आ रहे थे। कभी हेलीकॉप्टर से होटल के पास की छत पर उतरते कमाण्डो नजर आ रहे थे। कभी टीवी पर आतंकियों के साक्षात्कार सुनाई दे रहे थे। कभी दर्शकों का हुजूम दिखाई देता था। कभी आतंकवादियों के चश्मदीदों के बयान दिखाए जा रहे थे तो कभी होटल से निकाले गए लोगों के बाइट्स दिखाए जा रहे थे। कभी पुराने फोटो दिखाए जा रहे थे। इस सारी प्रक्रिया में विभिन्न चैनलों पर पाक का आतंकी आख्यान चल रहा था।
दोनों होटलों से उठती हुई लपटें दिखाई दे रही थीं किंतु न्यूनतम सूचनाएं आ रही थीं। एनडीटीवी की बरखादत्त सांस रोके बिना अहर्निश बोल रही थी,किंतु कोई भी सारवान बात नहीं कह रही थी। राजदीप सरदसाई सीएसटी टर्मिनस में फायरिंग की अफवाहों में व्यस्त थे। सरदेसाई जैसे गंभीर पत्रकार भी चूक कर रहे थे। सरदेसाई ने पहले अफवाह को खबर बनाया। बाद में कहा यह अफवाह थी। सवाल यह है अफवाह थी तो पहले ही क्यों नहीं रोका ? यदि अफवाह थी तो दर्जनों बार पुनरावृत्ति क्यों दिखाई गयी ?
अर्णव गोस्वामी पाक की आतंकवाद के संदर्भ में क्या भूमिका रही है इसके आख्यान में व्यस्त थे। हिन्दी चैनलों में सबसे खतरनाक प्रसारण 'इण्डिया टीवी' का था। इस चैनल ने प्रसारण के दौरान दो आतंकियों का सीधे साक्षात्कार सुनाया। चश्मदीद गवाह पेश किया। ये चीजें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे खतरनाक थीं। खबरों को प्रसारित करने की दौड़ में यह चैनल सभी चैनलों से आगे था। इस चैनल में अनेक चीजें पहलीबार दिखाई गयीं जो अन्य चैनलों पर बाद में आयीं। जैसे आतंकियों को सबसे पहले समुद्री तट पर जिन धोबियों-मछुआरों ने देखा था उनमें से पहले जिस महिला ने देखा उसका साक्षात्कार दिखाया। कैसे हेलीकोप्टर से कमाण्डो उतर रहे हैं कितने कमाण्डो हैं, दो आतंकवादियों का होटल से सीधे साक्षात्कार आदि।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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समुन्दर के रास्ते से आतंक मचाने में निपुण और दुस्साहस से लबरेज १० आतंकियों की एक टोली ने ६० घंटे तक भारत की व्यापारिक राजधानी को बंधक बनाए रखा. २००१ में संसद पर हुए हमले के बाद यह आतंकवाद की सबसे बड़ी वारदात थी. इस वारदात ने साबित कर दिया कि ११५ करोड़ की आबादी वाले भारत की सुरक्षा व्यवस्था और खुफ़िया तंत्र में कितने छेद है. यह हमारी निजी सोच नहीं है. यह प्रत्येक आम भारतीय की सोच है. यह नकारापन खुफ़िया सूचना की, शहर पुलिस का ढुलमुलपन, राजनेताओं की हिचकिचाहट और व्यवस्थागत नाकामी को सबने स्पष्ट महसूस किया.
राजनीतिक विचार से बंटा हुआ भारत शायद आज भी यह जानने में अक्षम है कि अपने दुश्मन का क्या करना चाहिए. आतंकी जख्मों से लथपथ अपनी राष्ट्रवादी आत्मा पर किस तरह का मरहम लगाना चाहिए. न्याय प्रणाली की लचर कार्यवाही का फायदा आतंकी और उनके आका उठा रहे हैं. जिसका खामियाजा आम लोग अपनी जान गवांकर दे रहे हैं. आंतरिक सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने बजाय हमारे नेता जुबानी धींगामुस्ती में मशगूल है. इन राजनेताओं की कार्यप्रणाली कहीं प्रत्येक भारतवासी को कानून (अपनी सुरक्षा के लिए) को अपने हाथों में लेने को बाध्य न कर दे ?वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा..........!!
१. चार शहरों में एनएसजी हब बनाए गए.
२. एनएसजी के लिए मानव शक्ति बढ़ा दी गयी.
३. आपात स्थिति में बल को नागरिक हवाई जहाज़ की मांग करने की इजाज़त दी गयी.
४. मैक के माध्यम से खुफ़िया जानकारी बांटने के तंत्र को सक्रिय किया गया.
५. खुफ़िया एजेंसियां रोज मीटिंग करती हैं.
६. विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर हुआ.
७. आधे राज्य पुलिस सुधारों को लागू कर रहे है, जबकि दूसरे ऐसा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आड़े ले आते हैं.
८. केंद्र अधिक बटालियन तैयार कर रहा है और अधिक आईपीएस पुलिस अधिकारियों की भारती हो रही है.
९. आधुनिकीकरण राशि को कुछ राज्य कुशलतापूर्वक खर्च कर रहे हैं.
१०. आठ क्विक रिएक्शन टीमों का गठन हो चुका है.
११. मुंबई पुलिस ने अपने बजट, हथियारों और वाहनों में वृद्धि की है(फ़ोर्स वन का गठन).
१२. एटीएस आतंक से जुड़े सारे मामलों की पड़ताल करेगा.
१३. कसाब के खिलाफ़ ८६ आरोप तय किए गए, जिनमें देश के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने के लिए सबसे कड़ी सज़ा हो सकती है.
१४. अब तक १५४ गवाहों से पूछताछ हो चुकी है.
१५. पैसे के अवैध हस्तांतरण निरोधक क़ानून(संशोधन) पारित हो गया है.
१६. आरबीआई ने सारे एनबीएफसी को ग्राहकों का रिकॉर्ड रखने की सलाह दी है.
१७. सेबी ने स्टॉक एक्सचेंज से आतंक को पैसा देने वाली संयुक्त राष्ट्र की सूचीबद्ध संस्थानों पर नजर रखने के निर्देश दी गए हैं.
१८. कोस्ट गार्ड को अधिक निगरानी जहाज़ और विमान स्वीकृत किए गए.
१९. कोस्ट गार्ड के लिए विमानों की संख्या बढ़ाई गई.
२०. कर्मचारियों में ३० फीसदी वृद्धि को मंजूरी दी गई.
२१. कश्मीर घाटी में सुरक्षा और निगरानी बढ़ाई गई.
२२. यह माना गया की कश्मीर एक राजनीतिक मुद्दा है.
२३. संवाद प्रक्रिया की शुरुआत.
२४. पाकिस्तान पर दबाव बनाने के बाद उसने माना कि उसकी जमीन से हमले की योजना बनी और उसे अंजाम दिया गया.
२५. पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वार्ताकारों को शामिल किया गया.
२६. दस्तावेज सौंपने की कूटनीति से पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा.
एक साल में क्या नहीं हुआ
१. पाकिस्तान को २६/११ मुकदमे में तेजी के लिए मजबूर नहीं कर पाए.
२. हफीज़ सईद जैसी बड़ी मछलियां अब भी आज़ाद घूम रही हैं.
३. आतंक पर लगाम कसने की प्रतिबद्धता नहीं है.
४. असैनिक इलाकों से सेना हटाने और दंडमुक्ति कानूनों को हटाने जैसे भरोसा बढ़ाने वाले कदम नहीं उठाए गए.
५. बुनियादी संरचना विकास.
६. संवाद प्रक्रिया का संस्थानीकरण.
७. घरेलू जहाज़ निर्माण में तेजी नहीं आ पाई, एक निगरानी जहाज़ के निर्माण में अब भी पांच साल लग जाते है.
८. तटीय शहरों में उतरने के सारे स्थानों का नियमन अभी नहीं हो पाया है.
९. मरीन पुलिस को सीमा शुल्क विभाग द्वारा इस्तेमाल स्पीडपोस्ट के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं.
१०. आरबीआई और सेबी के वित्तीय दिशानिर्देशों को लागू करने में ढिलाई.
११. पैसे के अवैध हस्तांतरण और 'हवाला' मामले पर राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी, इसमें कई भ्रष्ट लोग संलिप्त हैं.
१२. मुकदमा बहुत तेजी से नहीं चल रहा है(कसाब का).
१३. अभी कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ करनी है.
१४. फैसले में दो महीने का समय लग सकता है.
१५. तटीय स्थानों का अब तक गठन नहीं हो पाया है.
१६. एनएसजी की तर्ज पर ही फ़ोर्स वन का गठन किया गया लेकिन अब तक इसे ठिकाना नहीं मिल पाया है.
१७. निगरानी नौकाओं के किए कर्मियों की भर्ती के नियम अभी तैयार नहीं हुए हैं.
१८. सभी के लिए प्रशिक्षण में सुधार नहीं हुआ.
१९. मानव शक्ति में वृद्धि अब भी एक भारी खामी है.
२०. आईबी में अधिकारियों की संख्या नहीं बढ़ी.
२१. तेजी से डाटा ट्रांसफर के लिए संयोजित टेक्निकल सुविधाएं हासिल नहीं की गयी.
२२. तट सुरक्षा बलों को राज्यों के मैक से अभी नहीं जोड़ा गया है.
२३. नाईट विजन डिवाइस और वेपन साइट्स जैसे नये और आतंक का मुकाबला करने वाले उपकरणों की खरीद नहीं हुई.
२४. ट्रुपर्स को अपनी रक्षा के लिए हल्की बुलेटप्रूफ जैकेट और हेल्मेट उपलब्ध नहीं कराए गए.
२५. शहरों के भीतर फौरी तैयारी के लिए हेलीकॉपटरों की व्यवस्था नहीं की गई.
(स्रोत - २ दिसम्बर, २००९. इंडिया टुडे)
सपनों की नगरी मुंबई जो कभी सोती नहीं. कहते हैं कि यहाँ रहने वाला हर मुम्बईया का जीवन सपने देखना है. शायद मुम्बईवासी आज एक साल पुराने स्तब्ध कर देने वाली दुर्घटना के सपनों को भुला पायेंगे ?एक साल कब बीत गया पता ही नहीं चला. शायद इसलिए कि हम ऐसी आतंकी वारदातों को सहने के आदी हो चुके हैं. आए दिन भारत में ऐसी वारदातें होती रहती हैं. निर्दोषों का खून बहता है. पुलिस आती है. जांच करती है. नेता भाषणबाजी करते हैं. सरकार मुआवजा देने कि घोषणा करती है. किसी को मुआवजा मिला कि नहीं इसकी जिम्मेदारी सरकार कि नहीं. मीडिया वाले ख़बर दिखाते और छापते हैं. सब कुछ अपने ढर्रे पर चलने लगता है. मुंबई भी अपने ढर्रे पर चल रही है. पुलिस भी अपने ढर्रे पर चल रही है. सरकार भी अपने ढर्रे पर चल रही है. मीडिया भी अपने ढर्रे पर चल रहा है. बीस साल से हम आतंकियों और आतंकवाद से निपटने का तरीका तलाश रहे हैं. २६/११ की हम ९/११ से तुलना करते हैं. ९/११ के बाद अमेरिका ने तो आतंकियों और आतंकवाद से निपटने का तरीका ढूंढ़ निकाला. लेकिन २६/११ के एक वर्ष बाद भी हम किंकर्तव्यविमूढ़ बने हुए है. क्योंकि हम सहनशील हैं, विनम्र हैं, अहिंसा के पुजारी हैं. हम ईंट का जवाब पत्थर से देना नहीं जानते हैं. हम नारों और वादों के देश में रहते हैं. इन्हीं नारों और वादों पर न जाने कितनी निर्दोष जानें जा चुकी हैं और न जाने कितनी जाने अभी जाएंगी. फिर कोई २६/११ होगा. निर्दोष मरेंगे. पुलिस आएगी. जांच करेगी. नेता भाषण देंगे. सरकार मुआवजा बांटेगी. मीडिया ख़बर छापेगा और दिखायेगा. आतंक विरोधी नारे लगेंगे. कैंडील मार्च होगा. वादे किए और कराए जाएंगे. २६/११ के बहाने हम फिर थोड़ा देशप्रेमी हो जाएंगे.
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.....
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