Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

29.10.10

यह दावा किसके दम पर ?

राजकुमार साहू

लेखक इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के पत्रकार हैं

अक्सर कहा जाता है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है और राजनीति भी इससे जुदा नहीं है। राजनीति में भी कई बार अनिश्चितताओं के दौर से राजनेताओं को गुजरना पड़ता है और वे जो चाहते हैं, वह सब नहीं होता तथा परिणाम उलट हो जाता है। ऐन चुनाव के पहले कई तरह के दावे उंची शाख रखने वाले नेताओं द्वारा किया जाता है, मगर जब नतीजे सामने आते हैं तो उन्हीं नेताओं के पैरों तले जमीं खिसक जाती है या यूं कह,ें सभी दावे की हवा निकल जाती है और मतदाताओं के रूख के आगे नेताओं के दावे बौने साबित हो जाते हैं। बावजूद कई नेता अटकलबाजी करने से सबक नहीं लेता। ऐसा ही राजनीतिक रूप से एक बड़ा दावा, दस जनपथ और देश के नं। 1 दामाद राॅबर्ट वाड्रा ने किया है। हालांकि वे अब तक राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, किन्तु उनके बयान से ऐसा ही कयास लगाया जा रहा है कि देर-सबेर वे राजनीति में कूद पड़ेंगे। वैसे राॅबर्ट वाड्रा फिलहाल बिजनेश में व्यस्त हैं और इसी काम में अपनी खुशी जताते हैं, लेकिन आखिर उन्हें कौन सा शुरूर सवार हो गया है कि वे दंभी मन से राजनीति के मैदान में कूदने की इच्छा जता रहे हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी और यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद, राॅबर्ट वाड्रा ने कुछ दिनों पहले एक अंग्रेजी अखबार से साक्षात्कार के दौरान, जो कुछ दावा किया, वह राजनीतिक हल्कों पर नजर रखने वाले किसी भी जानकार के गले नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि यदि वे राजनीति में कदम रखते हैं तो देश में कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं। उन्होंने कहा कि सही समय आने पर वे राजनीति में जरूर आएंगे। साथ ही उनका यह भी कहना है कि जब उन्हें लगेेगा, राजनीतिक क्षेत्र के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल हो गई है और पर्याप्त समय दिया जा सकेगा, तब वे राजनीति में आ जाएंगे। यहां हमारा यही कहना है कि राजनीति में जो चाहे आ जाएं और जहां चाहे वहां से चुनाव मैदान में उतर जाएं, लेकिन दस जनपथ के दामाद राॅबर्ट वाड्रा का वह दावा कि उन्हें कोई चुनाव नहीं हरा सकता।ं उन्होंने जो कहा है, उसका यही मतलब निकाला जा सकता है, क्योंकि वे किसी भी जगह से चुनाव जीतने का दमखम दिखा रहे हैं। यहां एक बात और है, आखिर वे यह दावा किसके दम पर कर रहे हैं ? ठीक है कि वे एक ऐसे परिवार के दामाद हैं, जहां राजनीति की नर्सरी से लेकर पूरा बगीचा, देश में तैयार होता आ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कुछ भी कह जाएं, जिसे कोई भी नहीं पचा पाए। कोई भी सुलझे हुए राजनीतिज्ञ भी ऐसे बयान देने के पहले सौ बार सोचेगा, क्योंकि देश के मतदाताओं ने कई अवसरों पर इस तरह दावा करने वाले राजनेताओं को किस तरह सबक सिखाया है, यह किसी से छुपी नहीं है। 15 वीं लोकसभा चुनाव में जनता ऐसे कई दंभी नेताओं अपनी वोट की ताकत से मजा चखा चुके हैं। इसके इतर, बड़ी शाख का दावा करने वाले नेता भी अपनी वैतारणी पार लगाने एड़ी-चोंटी चुनाव में एक कर देते हैं, बावजूद कई बार उन दावे के मुगालते, उन नेताओं को मुंह की खानी पड़ती है। लंबे अंतराल तक सत्ता के मद में चूर रहकर, जनता के हितों को दरकिनार कर काम करने वाले नेताओं को यही जनता अपने मताधिकार से मजा चखा चुकी हंै, जब मंजे हुए राजनीतिज्ञों को आम जनता के मन में क्या है ? और वे किसके पक्ष में रहेंगे, उन पहुंचे हुए नेताओं को पता नहीं चलता तो फिर कहा जा सकता है कि राॅबर्ट वाड्रा, किस आधार पर ऐसा दावा कर, इतरा रहे हैं। देखा जाए तो राॅबर्ट वाड्रा का कोई राजनीतिक शाख नहीं है, वह केवल देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद हैं और कांग्रेस के युवराज माने जाने वाले राहुल गांधी के बहनोई तथा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी के पति हैं। राजनीतिक रूप से इस परिवार के अधिकांश लोगों ने राजनीति में कदम रखकर एक कीर्तिमान स्थापित किए हंै। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. गांधी के सूचना क्रांति लाने के प्रयास को भला देश का कोई नागरिक कैसे भूल सकता है। साथ ही उस पल को कौन गंवाना चाहेगा, जब कोई देश के प्रधानमंत्री जैसे पद पर विराजित होने वाला हो, किन्तु श्रीमती सोनिया गांधी ने इस ओहदे को ठुकरा कर दुनिया के सामने एक नई मिसाल कायम किया है। इसके अलावा कई राज्यों में दम तोड़ रही कांग्रेस तथा इस पार्टी की युवा शक्ति को संजीवनी देने वाले राहुल गांधी के राजनीतिक हस्तक्षेप को कैसे कोई ठुकरा सकता है। जब से राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा है, उसके बाद से कांग्रेस में नई जान आ गई है। राजनीतिक क्षेत्र के अन्य पार्टियां, राहुल गांधी के विकल्प तैयार करने में फिलहाल इन बीते सालों में अक्षम ही साबित हुई हैं। यह तो इस परिवार की राजनीतिक दखल की एक बानगी भर हो सकती है। उस दावे से जुड़े बातों को लेकर राजनीतिक इतिहास खंगालें तो पता चलता है कि कई बड़े नेता भी इसी तरह के दावे करते रहे हैं और वे अपने दावे पर मात भी खाते रहे हैं। राॅबर्ट वाड्रा यह कहते हैं कि वे कहीं भी जीत सकते हैं, तो उन नेताओं का क्या कहें, जो किसी पार्टी की कमान तो देश भर में संभालते हैं, लेकिन चुनावी परीक्षा में खुद को कमजोर पाते हैं, क्योंकि कई मर्तबा यह देखने में आ चुका है, जब कई बड़े नेता दो-दो चुनावी क्षेत्रों से चुनाव लड़ते रहे हैं। जब उन्हें जीत का गुमान होता है तो फिर वे क्यों दो सीटों से चुनावी मैदान पर उतरते हैं ? जाहिर सी बात है कि उन्हें भी हार का डर सताता है और वे जानते हैं कि चुनावी रण में पस्त हुए तो कहीं के नहीं रहेंगे। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी जब चुनाव हारे हों और इस फेहरिस्त में पूर्व प्रधानमं.त्री अटलबिहारी वाजपेयी का भी नाम हो तो राॅबर्ट वाड्रा जैसे राजनीति में आने वाले नए-नवेले व्यक्ति को यह बात तो सोचना ही चाहिए, जब जनता ने इन्हें नकार दिया तो फिर उनका क्या। यहां दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ने की एक लंबी फेहरिस्त हो सकती हैं, इनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, राजद के लालू यादव जैसे कई शख्सियतों के नाम हैं। जब इन नेताओं को अपनी जीत की चिंता है तो फिर इनके मुकाबले राॅबर्ट वाड्रा की ऐसी कोई राजनीति काबिलियत एक कौड़ी की भी नहीं है। इन बातों को उन्हें आत्मसात करने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि जब वे जनता के सामने आएं और चुनाव लड़ें और उन्हें हार का सामना करें तो यहां राॅबर्ट वाड्रा की किरकिरी कम होगी, वहीं इससे यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी तथा उनके परिवार और कांग्रेस की शाख दांव पर लग जाएगी। ऐसे में उन्हें इन बचकाने दावों से बचना चाहिए। यह बताना महत्वपूर्ण है कि राजनीति में अपनी जीत तय करने और खुद की शाख बनाने के लिए केवल किसी बड़े परिवार का होना ही जरूरी नहीं हैं, इसके लिए जनता से जुड़ाव होना मायने रखता है, लेकिन अब तक की स्थिति को देखें तो राजनीति हस्तक्षेप के मामले में राॅबर्ट वाड्रा दूर-दूर तक नहीं ठहरते। इतना जरूर है कि राॅबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गांधी, निश्चित ही समय-समय पर राजनीतिक मंचों तथा चुनाव प्रचार में भाग लेती रही हैं और इस तरह उनका एक अनुभव नजर आता है। राहुल गांधी ने जब पिछले साल लोकसभा चुनाव लड़ा तो प्रियंका गांधी का ही हस्तक्षेप रहा, क्योंकि राहुल गांधी तो देश भर में प्रचार करने चले जाते थे और अमेठी की कमान प्रियंका के हाथ में होती थी। फिलहाल इस बयान पर इतना ही कहा जा सकता है कि कहीं से भी चुनाव में जीत लेना, चुटकी का खेल नहीं है। इसके लिए बड़े दांव-पेंच की जरूरत होती है और सबसे बड़ी बात होती है, तो वह है, जनता के हितों के लिए कार्य करना, लेकिन राबर्ट वाड्रा तो एक बिजनेशमेन हैं। ऐसे में वे जनता के दर्द को एक बिजनेशमेन की तरह तो महसूस नहीं कर सकते, इसके लिए निश्चित ही उन्हें उन अंतिम छोर के लोगों का दिल जीतना होगा और उनके उत्थान के लिए कार्य करना होगा, जिनके सिर पर हाथ रखने की दुहाई देकर कांग्रेस सत्ता में काबिज हुई है।

छत्तीसगढ़ की काशी खरौद

छत्तीसगढ़, धार्मिक नगरी और पर्यटन की दृष्टि से एक समृद्धषाली राज्य है। अधिकांष इलाके वन क्षेत्रों से आच्छादित हैं और पहाड़ों के मनोरम दृष्य भी है। साथ ही प्रदेष में अनेक ऐसे धार्मिक स्थान है, जहां लोगों की आस्था उमड़ती है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल लक्ष्मणेष्वर धाम खरौद है, जिसे छत्तीसगढ़ की काषी के नाम से भी जाना जता है। अपनी पुरातात्विक महत्ता के कारण पुराविदों और इतिहासविदों के अध्ययन का यह नगरी हमेषा से ही केन्द्र रहा है। खरौद की एक पुरातात्विक और धार्मिक विरासत है, जिसे अब मंदिरों में बनी कलाकृति और षिलालेखों से जाना जा सकता है। पुरातन धरोहरों को समेटे मंदिरों की दीवारों व षिलालेखों पर कई ऐसे ष्लोक हैं, जिससे रामायणकालीन समय की याद ताजा हो जाती है।

जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी और बिलासपुर रेलवे जंक्षन से 65 किमी दूर बसे इस धार्मिक नगरी खरौद की पहचान तालाबों की नगरी के रूप में भी होती है। लक्ष्मणेष्वर की नगरी में 126 तालाब हैं, जिससे छत्तीसगढ़ी में बुजुर्गों द्वारा छह आगर छह कोरी कहा जाता है। खरौद में यह देखने में आता है कि जिस ओर नजरें घुमाएं, उस ओर तालाब जरूर दिखता है। साथ ही इन तालाबों के किनारे मंदिर बना हुआ दिखता है। खरौद के नामकरण को खरदूषण राजा से भी जोड़ा जाता है, वैसे पुराविद, खरौद में षैव परंपरा होने की बात कहते हैं। बदलते समय के साथ और मंदिरों का जीर्णोद्धार नहीं होने से कई मंदिर जहां खंडित हो गए हैं तो कई तालाब भी अब इतिहास बन चुके हैं। फिर भी खरौद में पुरातात्विक धरोहरों के कई अजूबे पहचान कायम है, जिसे देखने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। खरौद में महाषिवरात्रि पर लगने वाला सबसे बड़ा मेला पूरे छत्तीसगढ़ में विख्यात है और इस दिन लक्ष्मणेष्वर धाम में भक्तों का रेला उमड़ता है। मंदिर का पट सुबह 4 बजे खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और भगवान के दर्षन का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है।

खरौद वैसे अनेक मंदिरों का केन्द्र है और सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग विरासत है। नगर में स्थित भगवान लक्ष्मणेष्वर का मंदिर की महिमा अपार है और इसकी कई खासियतें हैं। 12 वीं षताब्दी में बना यह मंदिर लगभग 110 फीट चैड़ा भू-भाग में स्थित है और 30 फीट का गोलाई लिए हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में स्थापित लक्ष लिंग जमीन से करीब 48 फीट उपर स्थित है। इस लक्ष लिंग में एक लाख छिद्र होना माने जाते हैं और श्रद्धालु, श्रद्धाभाव से यहां एक लाख चावल चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। लक्षलिंग में हमेषा जल भरा रहता है और खराब भी नहीं होता, जबकि यह लक्षलिंग जमीन तल से अत्यधिक उपर है। माना जाता है कि लक्षलिंग में जो जल चढ़ाया जाता है, वह मंदिर के पिछले हिस्से में स्थित कुण्ड में चला जाता है। जिससे कुण्ड कभी सूखता नहीं है। भक्तों में आस्था है कि भगवान षिव के दर्षन मात्र से क्षय रोग दूर हो जाता है। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के चारों ओर बड़ी दीवार बनी हुई और मंदिर के भीतर बड़ी जगह बनाई गई है, जिससे वृहदाकार निर्माण की बात पुराविद कहते हैं। मंदिर के बाहर एक कुआं स्थित है, जहां सिक्के डाले जाने की परंपरा है, यह कहा जाता है कि सिक्के के दीवार से नहीं टकराने पर षुभ होता है। भक्तों में यह भी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, वह पूरी होती है। इसी के चलते खरौद में महापर्व महाषिवरात्रि के अलावा सावन महीने में हर सोमवार और तेरस पर भक्तों की भीड़ देखने लायक रहती है। इन अवसरों पर दूसरे प्रदेषों से भी दर्षनार्थी भगवान लक्ष्मणेष्वर के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के अलावा खरौद में प्राचीन ईंदल देव और षबरी माता का मंदिर भी है। ईंदलदेव का मंदिर ईंट से बना है और जानकार इसे 6 वीं षताब्दी में बने होने की बात कहते हैं। ईंदलदेव मंदिर को जिले का सबसे पुरातन मंदिर माना जाता है, जिसकी दीवारों पर अनोखी कलाकृति बनाई गई है। ईंट के बने होने के कारण इतिहासविदों द्वारा हमेषा यहां षोध कार्य किया जाता है और विदेषों से भी लोग पहुंचकर यहां से जानकारी लेते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जाने से मंदिर में किसी तरह निर्माण करने पर रोक है। ईंदलदेव मंदिर की जीर्ण होने की स्थिति में कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने जीर्णोद्धार कराया था, इससे मंदिर को लोहे के राड से बांधा गया था। इस मंदिर की खासियत यह भी है कि इसका मुख्य द्वार पीछे की ओर और द्वार पर मां गंगे की तस्वीर उकेरी गई है। ईंदलदेव मंदिर में कई अनेक खूबियां हैं, जिसके चलते यह मंदिर पर्यटकों और पुराविदों को अपनी ओर वर्षों से आकर्षित करता आ रहा है।

षबरी मंदिर की अपनी एक पुरातात्विक पहचान अब भी कायम है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीष्वर की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान षिव और पार्वती की तस्वीर उकेरी गई है, जो पर्यटकों का केन्द्र बिन्दु होता है। षबरी मंदिर के कुछ हिस्से फर्षी पत्थर से बने हैं तो उपरी हिस्सा ईट से बनाया गया है। ईंट से बने होने के कारण इस मंदिर को भी देखने इतिहासविद और पुराविद पहुंचते हैं। षबरी मंदिर के षिलालेख में भी कई पुरातन ष्लोक लिखे गए हैं, जिससे खरौद नगरी के पुरातन गुणगान का पता चलता है और इन मंदिरों के दर्षनार्थ श्रद्धालु पहुंचते हैं। फिलहाल खरौद को छत्तीसगढ़ षासन द्वारा दर्षनीय स्थल घोषित किया गया है, लेकिन जो विकास इस नगरी का होना चाहिए, वह नहीं हो सका है। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सामुदायिक भवन जैसी अन्य सुविधाओं की जरूरत है, मगर अब तक ऐसी कोई पहल नहीं की गई है। साथ ही नगर पंचायत द्वारा भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया है। पुरातत्व विभाग के अधीन सभी मंदिरों के होने से निर्माण नहीं कराए जा पा रहे हैं, जबकि मंदिर में हर वर्ष चढ़ावे से लाखों रूपये की आय होती है। इस आय का अब तक कोई हिसाब नहीं रखा गया है और मंदिर की पूजा-अर्चना कार्य में लगे पुजारी ही इन राषियों को आपस में बांट लेते हैं। वैसे यहां ट्रस्ट बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है, किन्त यह पहल भी अधूरी है।

Netlog update: 1 new message from Netlog_en

Hi rajendra,


You receive this mail because you're a Netlog member.
Your Netlog account: http://en.netlog.com/ab8oct_bhadaas


1 new message in your inbox

3 unread notifications



Status

Did you know that you can check if your instant messenger friends also have a profile? Invite them now or add them as friends and you'll get credits for free!

You don't have a profile picture yet. Add a profile picture!

Upload a picture

Write a blog

Shout for your friends



What are your friends doing?

ab8oct Abhishek Prasad and Himanshu Pandey are now friends
ab8oct Abhishek Prasad celebrates his birthday today!
View your complete friends log...


Top brands

mtv mtv
ipod ipod
nike nike
starbucks starbucks
dolce_gabbana dolce_gabbana
More brands...


Friends of your friends

mailtomahfooz

Mahfooz Ali add as a friend

via 1 friend: Abhishek Prasad
peeyushprasad

peeyush prasad add as a friend

via 1 friend: Abhishek Prasad
prasadpeeyush

peeyush prasad add as a friend

via 1 friend: Abhishek Prasad
astrologersushilkumaar

Astrologer Sushil Kumaaar Singh add as a friend

via 1 friend: Abhishek Prasad
astrologersushilkumaaar

Astrologer Sushil Kumaaar Singh add as a friend

via 1 friend: Abhishek Prasad
Discover more friends...


Popular videos

Enrique Iglesias - Ring my bells on Netlog

Viewed 37 254 times

Miracle Beer

Viewed 22 500 times

ooopppsss!!!

Viewed 21 426 times

kiss,love

Viewed 21 306 times

More videos...

the Netlog Team



You no longer want to receive these updates by e-mail? Change your settings.
Download the Netlog Browser and earn 20 credits!

Netlog NV/SA. E. Braunplein 18. B-9000 Gent. Belgium BE0859635972. abuse-en@netlog.com

28.10.10

परदेस में खिलती परंपरा......!

आप भी देखिये दूर देश में अपने देश में की मनोहारी झलक........

I've just joined dataentrywork.net & came across this great way of earning extra income from data entry jobs & referring friends. The best part is, it's all free. I thought you might be interested in it!. check it out yourself

I've just joined dataentrywork.net & came across this great way of earning extra income from data entry jobs & referring friends. The best part is, it's all free. I thought you might be interested in it!. check it out yourself

भड़ास blog: हल्ला गुल्ला...: होमियोपैथी बीमार का इलाज करती है, बीमारी का नहीं।

भड़ास blog: हल्ला गुल्ला...: होमियोपैथी बीमार का इलाज करती है, बीमारी का नहीं।

हल्ला गुल्ला...: होमियोपैथी बीमार का इलाज करती है, बीमारी का नहीं।

हल्ला गुल्ला...: होमियोपैथी बीमार का इलाज करती है, बीमारी का नहीं।

''अपनी माटी'' वेब मंच:-अक्टूबर अंक

नमस्कार
अपनी माटी वेब मंच पर और भी बहुत कुछ पढ़ने लायक
लिंक साझा कर रहे हैं.
--
सादर,

माणिक;संस्कृतिकर्मी
17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
Cell:-09460711896,http://apnimaati.com


संस्मरण :बहुत याद आयेंगे रामकैलास




[http://apnimaati.com]
रामकैलास जी के बारे में यह निर्णय कर पाना कठिन है कि वह व्यक्ति बड़े थे या गायक। दुर्लभ सामंजस्य था। किसी व्यक्ति के लिये ऊँचाई प्राप्त करना आज के बुद्धिजीवी, नगरीया शिक्षा  के बगैर किस सहजता से संभव है, रामकैलास जी इसी बात के प्रतीक थे।
सर्वप्रथम मैंने रामकैलास जी को 'बीट ऑफ इण्डिया' द्वारा प्रकाशित  विडियो  'कलर्स ऑफ अर्थ' में देखा था। गा रहे थे 'कवन रंग मुँगवा, कवन रंग मोतिया, कवन रंग ननदी तोहरे बिरना'। इस गाने को हमने रोशन  के संगीत निर्देशन  में सुमन कल्याणपुर के स्वर में सुन रखा था। परन्तु चेहरे का भाव और स्वर जिस प्रकार भाव प्रकट कर रहे थे, पहले अनुभव नहीं हुआ था। पं0 ओंकारनाथ ठाकुर याद आ गये, जो श्रोताओं का कहते थे चेहरे पर देखने के लिये। ठाकुर जी की बातें समझ में आने लगी थीं।
कई वर्षों बाद जब उनसे पहली बार साक्षात्कार हुआ तो फिर उन्होंने अनुरोध पर यह गाना सुनाया। इन बार इस गाने का अर्थ भी साथ-साथ समझा रहे थे। और वह मधुर स्वर, एक नई बात हो रही थी।स्नेह टपकता था उनके व्यक्तित्व से। मैंने उन्हें अपने सहयोगियों को फटकार लगते भी सुना है, वह भी स्नेह भरा। उनकी बोली भोजपुरी तो मीठी है ही।
एक बार अखबार के लिये उनसे बात कर रहा था। बिरहा को बिरहा क्यों कहते हैं, समझा रहे थे। उनका कहना था, चूँकि बात लौटकर विरह पर आ ही जाती है, इसलिये बिरहा कहते हैं। कई उदाहरण दिये, कहा जब कृष्ण गोपियों को छोड़ द्वारका चले गये तो विरह हुआ। जब रोपनी गाते हुये महिलायें धान का बिरवा उखाड़ती हैं तो उस बिरवे का जमीन से अलग होना विरह है। ऊपर धूप में शरीर जल रहा है, विरह है। नीचे पानी में पाँव गल रहा है, वो विरह है, और झुककर धान रोपते-रोपते कमर टूटी जा रही है, वह भी विरह है।
फिर कहा, जब पति शादी के बाद पत्नी को मायके छोड़ आता है, विरह है। जब गौने के बाद अपने घर पर छोड़ परदेस कमाने जाता है, विरह है। सैनिक जब सीमा पर लड़ाई लड़ने जाता है, नायिका के लिये विरह है, और अगर शहीद हो गया, तो जीवन भर विरह है। और मेरी आँखों में आँसू आ गये थे।
सितम्बर 2009 की बात है। बरसात का मौसम था पर सूखा पड़ा था। गाने से पहले कहने लगें, इस साल तो बरसात नहीं हुई, तो क्या कजरी गायेंगे? उत्तर में कहा, देखिये कैसी कजरी गायेंगे। ननद भौजाई का संवाद है। ननद पूछती है, तुम्हारा नईहर किधर है? भौजी जवाब देती है, पूरब तरफ। और ये बताओ कि बदरा किधर से आते हैं? जवाब देती है, पूरब से। ननद कहती है तब तो ये तुम्हारे नईहर से ही आते हैं। भौजाई कहती है, हाँ ये हमारे भईया हैं और पुर्वा हमारी बहन है। वही ठेलती है तो भईया इधर आते हैं। तो फिर अपने भईया से कहो, इधर बरसें, सूखा पड़ा है। और भौजी गाती है ''हमरे नइहर से धुमड़ धुमड़ आवैं बदरा।'' कार्यक्रम के अन्त में 'आज प्रभुजी के पावऽ दर्शनवाँ कि हम नाच गइलीं' गाते हुये खूब नाचे थे। श्रोता बच्चे उत्साह से उछलने लगे थे।
आठ सितम्बर को बिहार के सिवान में कार्यक्रम था। यही जानकर मैंने आठ की सुबह फोन  किया, उनके पौत्र ने फोन उठाया और पता चला तीन सितम्बर को हृदय धात के बहाने महाप्रमाण कर गये। अन्तिम कार्यक्रम एक सितम्बर को पुणे में स्पिकमैके के लिये किया। डी0 पी0 एस0 पुणे की अन्विता भारती ने बताया, वे कह रहे थे, बच्चों के बीच गाकर मुझे लगता है मोक्ष मिल गया।
(ये संस्मरण स्पिक मैके मुज़फ्फरपुर के सक्रीय कार्यकर्ता यशवंत पाराशर ने लिखा है उनसे  yashwantparashar@gmail.com ,Kids Camp International School,Chakkar Road, Muzaffarpur - 842001,Phone: 9204655700 पर संपर्क कर सकते हैं.)

अपनी माटी वेब मंच पर और भी बहुत कुछ पढ़ने लायक
लिंक साझा कर रहे हैं.



--
सादर,

माणिक;संस्कृतिकर्मी
17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
Cell:-09460711896,http://apnimaati.com