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28.2.18

चहार दीवारी के बाहर

*लघुकथा: चाहरदिवारी के बाहर...*

चल उठ निकम्मी... न घर का काम करती है, न चूल्हा चौका...निकलजा यहाँ से वर्ना ससुराल जाएगी तो ताने हमें मिलेंगे...
यह कहते हुए रिया की दादी ने तपाक से एक तमाचा रिया के गाल पर जड़ दिया....
यह होने के करिब 15 मिनट बाद ही गाँव के मुखि़या के साथ गाँव वाले रिया का सम्मान करने घर पहुँचे और रिया की दादी से कहने लगे...
दादी ,
हमारी छोरी गाँव के छोरों से भी आगे है... गाँव में शौचालय बनवाने की जिद्द के कारण आज कोई खुले में शौच नहीं जावे है... और हमारे गाँव को सरकार की तरफ से सम्मान भी मिला है...
तो हम जे सम्मान तो रिया बिटियाँ को ही देवेंगे...
असली हकदार तो रिया बिटियाँ ही है.....

दादी के मुँह से मानों स्वर ही गायब हो गए थे... दादी और रिया चुपचाप एक दूसरे को देखकर बस रो रहे थे.....
आखिर चूल्हे चौके के बाहर भी है आधी आबादी की दुनिया....

डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'
हिन्दीग्राम, इंदौर

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