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2.9.10

इंटरनेट पर हिन्दी वालों में भाषायी विभ्रम

      समझ में नहीं आता कहां से बात शुरू करूँ,शर्म भी आती है और गुस्सा भी आ रहा है। वे चाहते हैं संवाद करना लेकिन जानते ही नहीं हैं कि क्या कर रहे हैं,वे मेरे दोस्त हैं। बुद्धिमान और विद्वान दोस्त हैं। वे तकनीक सक्षम हैं । किसी न किसी हुनर में विशेषज्ञ हैं। उनके पास अभिव्यक्ति के लिए अनगिनत विषय हैं।

    वे हिन्दी जानते हैं । हिन्दी अधिकांश की आजीविका है। वे कम्प्यूटर भी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि गूगल में अनुवाद की व्यवस्था है। इसके बाबजूद वे इंटरनेट पर हिन्दी फॉण्ट में नहीं लिखते अपनी अभिव्यक्ति को अंग्रेजी में हिन्दी के जरिए व्यक्त करते हैं। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? लेकिन मैं विनम्रता के साथ हिन्दी भाषी इंटरनेट यूजरों से अपील करना चाहता हूँ कि वे नेट पर हिन्दी में लिखें। इससे नेट पर हिन्दी समृद्ध होगी।
    नेट पर हिन्दीभाषी जितनी बड़ी मात्रा में रमण कर रहे हैं और वर्चुअल घुमक्कड़ी करते हुए फेसबुक और अन्य रूपों में अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं यह आनंद की चीज है। मैं साफतौर पर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी का अंग्रेजी के जरिए उपयोग उनके लिए तो शोभा देता है जो हिन्दी लिखने में असमर्थ हैं। लेकिन जो हिन्दी लिखने में समर्थ हैं उन्हें हिन्दी फॉण्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
     यूनीकोड फॉण्ट की खूबी है वह यूजर को अंधभाषाभाषी नहीं बनाता। आप ज्योंही यूनीकोड में गए आपको भाषायी फंडामेंटलिज्म से मुक्ति मिल जाती है। हिन्दी के बुद्धिजीवी, फिल्म अभिनेता-अभिनेत्री,साहित्यकार और पत्रकार नेट पर हिन्दी में ही लिखें तो इससे हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय ताकत बढ़ेगी।
    अंग्रेजी में हिन्दी लिखने वाले नेट यूजर यह क्यों सोचते कि उन्हें जो हिन्दी में नहीं पढ़ सकता वह गूगल से अनुवाद कर लेगा। आप ईमेल हिन्दी में लिखें,फेसबुक पर हिन्दी में लिखें,ब्लॉग पर हिन्दी में लिखें।
    यूनीकोड फॉण्ट लोकतांत्रिक है। यह सहिष्णु बनाता है। मित्र बनाता है। दूरियां कम करता है। संपर्क-संबंध को सहज बनाता है। इस फॉण्ट के इस्तेमाल का अर्थ है कि आप अपनी अभिव्यक्ति को विश्व भाषा संसार के हवाले कर रहे हैं। यूनीकोड फॉण्ट मित्र फॉण्ट है आप कृपया इसका इस्तेमाल करके तो देखें आपकी अभिव्यक्ति की दुनिया बदल जाएगी।
     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा को तकनीक के सहारे नहीं बचा सकते। कुछ लोग सोचते हैं कि भाषा को गूगल के अनुवाद के सहारे हम बचा लेंगे तो वे गलत सोचते हैं। भाषा को सीखकर और लिखकर ही बचा सकते हैं। भाषा अनुवाद की चीज नहीं है। अनुवाद से भाषा नहीं बचती।
    मुझे यह खतरा महसूस हो रहा है कि हिन्दी का नेट यूजर यदि हिन्दी में लिखना नहीं सीखता या उसका व्यवहार नहीं करता तो एक समय के बाद हिन्दी को पढ़ाने वाले भी नहीं मिलेंगे। हिन्दी हमारी भाषा है और यह गर्व की बात है कि हम हिन्दी में लिखते हैं। हमारी अंग्रेजियत हिन्दी के प्रयोग से कम नहीं हो जाती। अंग्रेजियत में जीने वाले लोग अंग्रेजी में लिखें लेकिन कृपा करके हिन्दी को अंग्रेजी में न लिखें। यह भाषा का अपमान है। उसकी अक्षमता की तरफ इशारा है। नेट पर हिन्दी तब तक अक्षम थी जब तक हिन्दी का यूनीकोड फॉण्ट नहीं था लेकिन आज ऐसा नहीं है। यूजर जब अपनी स्वाभाविक भाषा,परिवेश की भाषा का प्रयोग भ्रष्ट ढ़ंग से करता है तो अपने भाषायी विभ्रम को प्रस्तुत करता है। अंग्रेजी में हिन्दी लिखना भाषायी विभ्रम है। भाषायी विभ्रम निजी अस्मिता की मौत है। हम गंभीरता से सोचें कि हम भाषायी विभ्रम के सहारे क्यों मरना चाहते हैं ?      










7.7.10

इंटरनेट की स्वतंत्रता खतरे में

         जिस तरह से कमरा बंद करके अमेरिका का फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन हरकतें कर रहा है उससे यही लग रहा है कि इंटरनेट की आजादी अब ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने बंद कमरे में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय दूरसंचार और केबल कंपनियों वेरीजॉन,एटी एंड टी, कॉमकास्ट, और गूगल के साथ हाल ही में लंबी बैठक की है।
    इंटरनेट की स्वाधीनता के पक्षधरों का मानना है कि ये कंपनियां फेडरल कमीशन पर दबाब पैदा कर रही हैं। जिससे इंटरनेट की स्वतंत्रता में कटौती की जाए। इंटरनेट को अमेरिका के कारपोरेट घराने हथियाने में लगे हैं। उनकी नई रणनीति यह है कि इंटरनेट की तटस्थता और स्वतंत्रता के पर कतर दिए जाएं।
     वे इंटरनेट का स्वामित्व हासिल करके इंटरनेट की अंतर्वस्तु को मेनीपुलेट करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि इंटरनेट कंटेंट को यूजर पैसा भुगतान करके हासिल करे। जो अपनी बेवसाइट का भुगतान ठीक से करें उनकी बेवसाइट तेज चलेगी। जो भुगतान नहीं करते उनकी बेवसाइट धीमी चलेगी। अथवा बंद कर दी जाएगी।
   उल्लेखनीय है इंटरनेट मनुष्य की अभिव्यक्ति की आजादी का अब तक का श्रेष्ठतम माध्यम है। उसकी पहुँच और निष्पक्षता पर हमें नाज है।किसी भी कारण से इंटरनेट की तटस्थता और आजादी को बाधित किया जाता है तो यह सारी मानव जाति की महान क्षति होगी।
     बहुराष्ट्रीय फोन,केबल और मीडिया कंपनियां नहीं चाहतीं कि इंटरनेट की स्वतंत्रता बनी रहे। वे चाहते हैं कि प्रत्येक यूजर भुगतान करके इंटरनेट अभिव्यक्ति का आनंद ले। हम सबको कारपोरेट घरानों की इंटरनेट को हथियाने की साजिशों का विरोध करना चाहिए।
     फेडरल कमीशन और अमेरिकी कांग्रेस के जिम्मेदार सदस्यों को प्रभावित करने के लिए लॉबी करने वाले दलाल सक्रिय हो गए हैं। सन् 2010 के पहले तीन महीनों में लॉबी करने वालों पर कारपोरेट घरानों ने 20 मिलियन डॉलर खर्च किया है। लॉबी करने वाले दलालों के सत्ता के गलियारों में अनेक से सीधे कनेक्शन हैं। सन लाइट फाउंडेशन ने खबर दी है कि 72 प्रतिशत दलालों को एटी एंड टी ,वेरीजॉन, कॉमकास्ट,टाइम वारनर केबल, नेशनल केबल एंड कम्युनिकेशन एसोसिएशन और यू.एस. टेलीकॉम एसोसिएशन ने भाड़े पर रखा हुआ है। इन कंपनियों के दलाल के रूप में 18 भू,पू. कानून निर्माता, हाउस और सीनेट कमेटियों के भू.पू. कर्मचारी काम कर रहे हैं।
    हम चाहते हैं कि इंटरनेट का कारपोरेट घरानों के हाथों स्वामित्व जाने से रोका जाना चाहिए। यदि इंटरनेट स्वतंत्रता का हनन होता है या क्षति होती है तो यह सारी दुनिया के नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा नुकसान होगा आओ हम विरोध करें और इंटरनेट स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखें।    
      


24.9.09

तकनीक के तंत्र में जनतंत्र

आज वि‍देश राज्‍यमंत्री शशि‍ थरूर की टि‍प्‍पणी चर्चा में है। ऐसा क्‍यों है कि‍ एक मंत्री का साधारण आदमी से बात करना भी नीति‍गत समझ माना जाए,क्‍या एक मंत्री को अपनी नि‍जी बातचीत का हक नहीं है, क्‍या तकनीक हमारे बोलने के हक को छीन लेती है,क्‍या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सही टि‍प्‍पणी की, इस सभी सवालों के जबाव इस तथ्‍य पर नि‍र्भर करते हैं कि‍ आपकी संचार तकनीक की क्‍या समझ है।

संचार तकनीक समानतापंथी होती है। सबको शि‍रकत का समान अवसर देती है। इसका इस्‍तेमाल करते समय चि‍न्‍ति‍त या परेशान होने की जरूरत नहीं है। तकनीक को भय की भाषा में नहीं समझा जा सकता। अब तक संचार तकनीक के मानव सभ्‍यता ने जो खेल देखे हैं वे यही संदेश देते हैं कि‍ तकनीक से बडा समानतावादी कोई नहीं है। संचार तकनीक उन सबकी मदद करती है जो इसमें शि‍रकत करते हैं,चाहे उनकी वि‍चारधारा कुछ भी हो, वे कि‍सी भी धर्म के मानने वाले हों। कि‍सी भी जाति‍ या नस्‍ल के हों। तकनीक सबकी होती है और सबकी मदद करती है। संचार तकनीक अपनी शि‍रकत वाली भूमि‍का के कारण लोकतंत्र का सबसे प्रभावशाली अस्‍त्र भी है।

संचार तकनीक की सर्वोत्‍तम कृति‍ है इंटरनेट। इंटरनेट के आने के बाद तो तकनीक की शि‍रकत वाली भूमि‍का अपने चर्मोत्‍कर्ष पर दि‍खाई दे रही है। तकनीक तब ही लोकतांत्रि‍क भूमि‍का अदा करती है जब वह सहज रूप से आम लोगों की पहुँच के दायरे में हो। समाज में धीरे धीरे डि‍जि‍टल वि‍भाजन कम हो रहा है। डि‍जि‍टल संचार तकनीक आज साधारण आदमी के पास पहुँच रही है,हो सकता है अगले पांच-दस सालों में यह वि‍भाजन गुणात्‍मक रूप से कम हो जाए। क्‍योंकि‍ डि‍जि‍टल जगत में प्रवेश और शि‍रकत को वि‍भि‍न्‍न स्रोतों के जरि‍ए बढावा दि‍या जा रहा है।

हाल ही में 'माई स्‍पेस' बनाम 'फेसबुक' के बीच की बहस सामने आई है। सारी दुनि‍या में 'माईस्‍पेस' से 'फेसबुक' जाने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है। दो सप्‍ताह पहले 'कॉम स्‍कोर' ने अमरीका में 'माईस्‍पेस' और 'फेसबुक' के बारे में आए बदलावों के बारे में आंकड़े जारी कि‍ए हैं। इन आंकड़ों को देखकर यही लगता है कि‍ 'माई स्‍पेस' के अब दि‍न लद गए हैं और लोग तेजी से 'फेसबुक' में जा रहे हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि‍ 'माई स्‍पेस' के यूजरों के आंकडों में कोई बुनि‍यादी परि‍वर्तन नहीं आया है। फर्क सि‍र्फ इतना आया है कि‍ 'फेसबुक' में जाने वालों की संख्‍या में तेजी से इजाफा हुआ है जबकि‍ 'माईस्‍पेस' के यूजरों की तादाद जि‍तनी वि‍गत वर्ष थी वह आज भी ज्‍यों की त्‍यों बनी हुई है। अमरीका में 70 मि‍लि‍यन लोगों ने 'माईस्‍पेस' की यात्रा की। यह संख्‍या बहुत बड़ी है। आज यह भी माना जा रहा है कि‍ 'माई स्‍पेस' बंद गली है,कठमुल्‍लेपन का रास्‍ता है, घेटो है। इसकी तुलना में 'फेसबुक' खुला मार्ग है। यहां आप ज्‍यादा खुला संवाद करते हैं। आदान-प्रदान करते हैं। भारत में 'माईस्‍पेस' में ज्‍यादा रमण कर रहे हैं आम यूजर। जबकि‍ अमरीका में 'माईस्‍पेस' और 'फेसबुक' की तगडी प्रति‍स्‍पर्धा दि‍खाई दे रही है। तमाम कि‍स्‍म की सोशल साइटस 'माईस्‍पेस' में चल रही हैं जहां लोग मि‍ल रहे हैं, आदान प्रदान कर रहे हें। लेकि‍न 'फेसबुक' में बडे ग्रुप बन रहे हैं। भारत में बड़े ग्रुप अभी बनने शुरू नहीं हुए हैं। अभी हमारे यूजर 'माईस्‍पेस' में रमण कर रहे हैं,खासकर तरूणों का बड़ा तबका है जो रमण कर रहा है। 'माईस्‍पेस' में व्‍यक्‍ति‍गत संवाद ज्‍यादा हो रहा है। जबकि‍ 'फेसबुक' में व्‍यापक सामाजि‍क संवाद हो रहा है। अमेरि‍का में स्‍कूली बच्‍चों के पूरे के पूरे स्‍कूल 'फेसबुक' में जा रहे हैं एक ही कक्षा के वि‍द्यार्थी एक नि‍बंध की तरह तरह से व्‍याख्‍याएं कर रहे हैं, उनके सवालों के जबाव वि‍द्वान लोग दे रहे हैं। नि‍बंध की व्‍याख्‍या में वि‍द्वानों के गुटों का शामि‍ल होना, एक बृहत्‍तर वि‍मर्श को जन्‍म दे रहा है।

इंटरनेट की दुनि‍या में 'माईस्‍पेस' पहले आया बाद में 'फेसबुक' आया। जो लोग 'माईस्‍पेस' का इस्‍तेमाल कर रहे थे वे पूरी तरह बोर हो चुके थे ऐसे में 'फेसबुक' का पदार्पण हुआ तो चीजें दूसरी दि‍शा में आकर्षित करने लगीं। अपनी अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की सीमाओं को तोड़ने के लि‍ए लोग तेजी से 'फेसबुक' की ओर मुखाति‍ब हुए हैं। भारत में 'माईस्‍पेस' का युवा ज्‍यादा इस्‍तेमाल कर रहे हैं। न्‍यूनतम लोग हैं जो 'फेसबुक' में दाखि‍ल हुए हैं। तुलना करें तो पाएंगे 'माई स्‍पेस' खतरों के खि‍लाड़ियों का संसार है जबकि‍ 'फेसबुक' कल्‍पना का स्‍वर्ग है। वि‍देश राज्‍यमंत्री की टि‍वि‍टर में लि‍खी प्रति‍क्रि‍या उस खतरे के संसार की झलक मात्र है बाकी जो लोग उसमें रमण करते रहते हैं वे खूब आनंद भी लेते हैं और अनेक लोग हैं ,खासकर तरूणों को अनेक बार खतरों का भी सामना करना पड़ता है।

तरूणों द्वारा जि‍स भाषा का 'माईस्‍पेस' में इस्‍तेमाल कि‍या जा रहा है वह चौंकाने वाली है। इसके वि‍परीत 'फेसबुक' में भद्रता का साम्राज्‍य है। 'माईस्‍पेस' की समूची संस्‍कृति‍ को काले लोगों के प्रति‍वादी स्‍वरों ने घेर लि‍या है, वहां भाषा,संस्‍कृति‍,राजनीति‍,पापुलर कल्‍चर आदि‍ के क्षेत्र में भाषायी ताण्‍डव चल रहा है उसे देखकर पंडि‍तों की हवा नि‍कली हुई है। हिंदी के कई ब्‍लाग और वेबसाइट हैं जहां पर हिंदीप्रेमि‍यों की आक्रामक भाषा देखकर कि‍सी भी वि‍द्वान का मन खट्टा हो सकता है और कोई वि‍द्वान् यह सहज ही तय कर लेगा कि‍ अब मैं इंटरनेट पर संवाद करने नहीं जाऊँगा ।

पि‍छले दि‍नों नामवर सिंह,राजेन्‍द्र यादव और प्रभाष जोशी के लि‍खे को लेकर जो बहस चली है उसने भाषा के भदेस रूपों को इतने आक्रामक रूप में व्‍यक्‍त कि‍या है कि‍ पंडि‍तों के होश उड़े हुए हैं। कुछ लोग जो अपने ब्‍लाग पर लि‍खते थे वे डरकर लि‍खना बंद कर चुके हैं।यह बहुत ही अच्‍छा भाषि‍क अध्‍ययन होगा कि‍ कि‍स तरह की हिंदी नेट के वि‍भि‍न्‍न रूपों में इस्‍तेमाल की जा रही है। उसकी सामाजि‍क पृष्‍ठभूमि‍ क्‍या है। तरूणों की भाषा में अस्‍वीकार का स्‍वर प्रबल रहा है। इनमें ज्‍यादातर ऐसे भी हैं जो प्रवि‍लेज सामाजि‍क पृष्‍ठभूमि‍ से नहीं आए हैं और जीवन की कठि‍न जद्दोजहद करते रहे हैं। जाहि‍र है ऐसी पृष्‍ठभूमि‍ से आने वाले तरूणों की भाषा में आक्रोश,अवि‍श्‍वास और अनास्‍था के स्‍वर ज्‍यादा व्‍यक्‍त होंगे, इसकी तुलना में जो संपन्‍न है और प्रवि‍लेज अवस्‍था में हैं उनकी भाषा में शालीनता ज्‍यादा व्‍यक्‍त होती है। ‍सम्‍पन्‍न और वि‍पन्‍न के बीच की भाषा का यह अंतर इंटरनेट पर साफ दि‍खाई देता है। यह भाषि‍क अंतर 'माई स्‍पेस' के द्वारा सृजि‍त संस्‍कृति‍ का अभि‍न्‍न अंग है। इंटरनेट की वि‍भि‍न्‍न वेबसाइट को लेकर तरूणों में यह दुवि‍धा रहती है कि‍ उन पर जाएं या न जाएं। चाटरूम में जाएं या न जाएं,जाएं तो कि‍स भाषा में बात करें। 'माई स्‍पेस' में जाने वाले रमण करने वाले जानते हैं कि‍ 'जैसी चौखट होती है वैसे ही कि‍बाड़ फि‍ट होते हैं।' यूजर की जैसी अभि‍रूचि‍ है वह वैसे ही लोगों से बातें करता है,नेट पर मि‍लता है। अभि‍रूचि‍यों का संसार आपकी सामाजि‍क पृष्‍ठभूमि‍ से भी जुडा है,उम्र से भी जुडा है। फलत: सि‍र्फ अभि‍रूचि‍यां ही नहीं अन्‍य चीजें भी प्रकारान्‍तर से आपके संसार में दाखि‍ल हो जाती हैं।

इंटरनेट मौजूदा सामाजि‍क यथार्थ का आईना है । प्रचलि‍त सामाजि‍क गति‍शीलता की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ भी है। फलत: वह ऐसे वैवि‍ध्‍यमय यथार्थ को व्‍यक्‍त कर रहा है जि‍से पहले कभी देखा ही नहीं गया है। इंटरनेट के संसार में जाति‍ और नस्‍ल के भेद अब चौंकाते नहीं हैं। यहॉं पर जि‍न लोगों को हम बातें करते पाते हैं ,भावनात्‍मक आदान प्रदान करते पाते हैं,वे साक्षात रूप में कभी एक दूसरे से नहीं मि‍लेंगे। यानी जो भावनात्‍मक स्‍पेस में सहभागि‍ता नि‍भा रहा है वह सामाजि‍क अथवा कायि‍क स्‍पेस में सहभागि‍ता नहीं नि‍भा रहा होता है। कायि‍क स्‍पेस और भावनात्‍मक रूप में अलग बने रहते हैं।

'फेसबुक' में जाने वाले आमतौर पर अभि‍जन ही हैं,ये वे लोग हैं जो आम जनता के साथ ,वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के जनसमूहों के साथ संवाद करना चाहते हैं। कोई भी राजनेता जो सार्वजनि‍क जीवन में है और कम्‍प्‍यूटर तकनीक के प्रयोगों से वाकि‍फ है उसके लि‍ए 'फेसबुक' एक अच्‍छा माध्‍यम है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्‍वयं 'फेसबुक' में नहीं जाते किंतु उनके सहकर्मी मंत्री यदि‍ उसमें शामि‍ल होते हैं तो उन्‍हें कोई एतराज भी नहीं है। 'फेसबुक' का संवाद अनौपचारि‍क संवाद है। यह वैसा ही संवाद है जैसा अमूमन नेतागण अभी बैठक में मि‍लने वालों ,दोस्‍तों और परि‍चि‍तों में करते हैं, और उस दौरान वे अनेक ऐसी भी बातें करते हैं जि‍नका सार्वजनि‍क तौरपर कभी उद्घाटन करना संभव नहीं होता। ये 'ऑफ द रि‍कार्ड ' बातें होती हैं और इन पर कभी सार्वजनि‍क वि‍वाद नहीं होता। लेकि‍न 'फेसबुक' ने नि‍जी बैठकों में होने वाली अनौपचारि‍क चर्चाओं को सार्वजनि‍क कर दि‍या है। ये व्‍यक्‍ति‍गत संवाद की कोटि‍ में आती हैं। इनमें कि‍सी भी कि‍स्‍म की राजनीति‍,नीति‍, औपचारि‍कता खोजना बेवकूफी है। इसी चीज को मद्देनजर रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने वि‍देशराज्‍यमंत्री की तथाकथि‍त टि‍प्‍पणी पर कोई भी अनुशासनात्‍मक कार्रवाई करने से मना कर दि‍या। स्‍वयं वि‍देश राज्‍यमंत्री ने अपनी टि‍प्‍पणी के लि‍ए माफी मांग ली। लेकि‍न कांग्रेस जैसे तकनीकी ज्ञान संपन्‍न दल और उसके प्रवक्‍ता ने शशि‍थरूर की आलोचना करके अपनी राजनीति‍क और नेट तकनीक संबंधी अपरि‍वक्‍पता का ही परि‍चय दि‍या है।

भारतीय राजनेताओं की मुश्‍कि‍ल यह है कि वे आम जनता के साथ खुलकर संवाद नहीं करते,संचार क्रांति‍ अभी उनके दफ्तर में भी पूरी तरह घुस नहीं पायी है। वे अभी भी संचार के परंपरागत रूपों का ही इस्‍तेमाल करते हैं। ऐसे में इंटरनेट पर संवाद करने‍ वाले शशि‍ थरूर की संवादात्‍मक भूमि‍का को वे समझ ही नहीं पाएंगे।शशि‍ थरूर का लेखन जि‍न लोगों ने पढा है,उनके नीति‍गत नजरि‍ए को जो लोग जानते हैं वे सहज रूप में समझ सकते हैं कि‍ उनके अंदर गरीब जनता,पि‍छडी जनता अथवा गैर अभि‍जन समुदायों के प्रति‍ कि‍सी भी तरह का भेदभावपूर्ण नजरि‍या नहीं है।

कायदे से हमारे मंत्रि‍यों,सांसदों,वि‍धायकों को अनि‍वार्यत: नेट पर अपनी जनता के साथ अहर्निश संवाद,संपर्क और संप्रेषण की प्रक्रि‍या में रहना चाहि‍ए। इस कार्य के लि‍ए भारत की गरीब जनता उन्‍हें मुफ्त में संचार की तमाम सुवि‍धाएं देती है,जि‍समें फ्री फोन से लेकर सचि‍व रखने तक की सुवि‍धाएं शामि‍ल हैं। इसके बावजूद वे कभी रीयल टाइम में अपनी जनता के संपर्क और संवाद के दायरे में नहीं होते। कायदे से केन्‍द्र सरकार को राजनीति‍क पारदर्शि‍ता पैदा करने,राजनेता और जनता के बीच में संवाद और संपर्क को पुख्‍ता करने के लि‍ए सभी मंत्रि‍यों,सांसदों,वि‍धायकों आदि‍ के लि‍ए 'फेसबुक' में जाना और संवाद करना अनि‍वार्य कर देना चाहि‍ए। लोकतांत्रि‍क प्रणाली को इससे बल मि‍लेगा।

20.9.09

इंटरनेट ,जनान्दोलन और भारतीयता

इंटरनेट के प्रसार ने एकदम नए किस्म के सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक जन-जागरण की शुरूआत की है।ग्लोबल स्तर पर विचारों के आदान-प्रदान के साथ ग्लोबल स्तर के नए सामाजिक आंदोलनों के लिए जनता की शिरकत की अपार संभावनाओं को खोला है। ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ विश्वस्तर पर जनता और स्वैच्छिक संगठनों की लामबंदी को एकदम नई ऊँचाईयों पर पहुँचाया है।जनतंत्र के एकदम नए अध्याय की शुरूआत की है।

ग्लोबलाइजेशन वि‍रोधी,युध्द विरोधी,पर्यावरणवादी,स्त्रीवादी और जनतंत्रवादी संघर्षों के पक्ष में विश्वस्तर पर जनता और संगठनों को गोलबंद करने और जागृति पैदा करने में इंटरनेट सबसे आगे है। इंटरनेट उस अमूर्त्त जनता को जगाता है जिसे अभी तक देखा नहीं है।उन्हें एकजुट करता है जो हाशिए पर थे।सामाजिक,राजनीतिक,पर्यावरण,शांति आदि के सवालों पर साधारण जनता को अपने विचार व्यक्त करने और चेतना विकसित करने का मौका देता है।आम जनता को ज्वलंत सवालों पर विवादों में शामिल करता है।यह असल में डिजिटल नागरि‍कता है। यह राष्ट्र-राज्य के दायरे को तोड़ती है।

राष्ट्र-राज्य ने नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को सीमाबध्द किया।जबकि डिजिटल जनतंत्र इन सीमाओं को तोड़ता है।वह ग्लोबल नागरिकता,ग्लोबल अस्मिता,ग्लोबल राज्य,ग्लोबल प्रशासन और ग्लोबल ध्रुवीकरण और लामबंदी को संभव बनाता है।इस पहलू का आदर्श नमूना है पर्यावरणवादी ग्रीन मूवमेंट।

आज समस्त दुनिया गंभीर प्रशासनिक एवं राजनीतिक संकट से गुजर रही है। कामकाज,प्रशासन के पुराने तरीके और कानून पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए हैं।इस स्थिति का बहुराष्ट्रीय कंपनियां तेजी से लाभ उठा रही हैं।सरकारों को कमजोर बनाया जा रहा है।आंतरिक तनावों को हवा दी जा रही है।राष्ट्र-राज्य के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का संकट पैदा हो गया है।ऐसी अवस्था में इंटरनेट ने सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी की अनंत संभावनाओं को पैदा किया है।सोई हुई जनता की आशाओं को जागृत किया है।राष्ट्र-राज्य के अप्रासंगिक होने के क्रम में कम्युनिकेशन के क्षेत्र में गहरी अनास्था पैदा हुई।साधारण लोगों का विश्वास डिगा।किंतु इंटरनेट ने इस कमजोर स्थिति में प्रभावी हस्तक्षेप की संभावनाओं को पैदा करके हमें नए सिरे से संप्रेषित करने,अपने विचारों के आदान-प्रदान को प्रेरित किया है।पुस्तक और पढ़ने की आदत को संजीवनी दी है।जनतंत्र के संबंध में कमजोर पड़ती जा रही धारणा को खत्म किया है।

आज जितने भी नए आंदोलन उठकर सामने रहे हैं वे सब राष्ट्र-राज्य की सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं।आज ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक दल और स्वैच्छिक संगठन इंटरनेट और कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इंटरनेट के आने के बाद -मीडिया के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसारण की संभावनाएं बढ़ गई हैं।आज हमें स्थानीय रेडियो स्टेशनों के माध्यम से इंटरनेट पर उपलब्ध माध्यम सामग्री के ज्यादा से ज्यादा उपयोग की संभावनाओं पर सोचना होगा।

इंटरनेट पर काम करने के लिए साइबर पध्दतियों के बारे में हमें अपनी समझ साफ रखनी होगी।इंटरनेट के चार काम हैं। 1.अभिव्यक्त करना,2.संरक्षण करना,3.सूचना संकलन और 4.हस्तक्षेप करना।अभिव्यक्त करने के कामों में ई मेल,चाट,वेबसाइड अपलोडिंग,फाइल शेयरिंग।संरक्षण कार्यों में प्रमाणीकरण,फिल्टरिंग,इन्क्रिपटिंग, रीमेलिंग। सूचना संग्रह में वब ब्राउजिंग,वेब डाटा संकलन, हेकिंग पर नजर रखना,जासूसी।हस्तक्षेप करने के क्षेत्र में हासिल न करने देना,सेवा देने से इंकार,वेबसाइड को हटाना,विकृत कोड भेजना,डोमेन को कब्जे में लेना,तोड़फोड़ करना।

आज इंटरनेट ग्लोबल फिनोमिना है।जनतांत्रिक सोच,जनतांत्रिक प्रक्रिया और अधिकारबोध को पैदा करने और सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ाने में सबसे आगे है।यह भी संभव है कि इंटरनेट के जरिए जनता को गकया जाए।जातीय और जनजातीय सामाजिक समूहों में चेतना का विस्तार करने ,उनके अतीत का ज्ञान कराने का महत्वपूर्ण उपकरण है।ग्लोबलाइजेशन ने समुदाय और अस्मिता के सवालों को हमारे घरों तक पहुँचा दिया है।पहले ये दोनों राष्ट्र-राज्य के परिप्रेक्ष्य से बंधे थे।किंतु ग्लोबलाइजेशन के कारण राष्ट्र-राज्य अपनी सीमाओं को तोड़ने को मजबूर हुआ।आज वह ग्लोबल अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।आज उसे ग्लोबल अर्थव्यवस्था के विश्वासों पर खरा उतरना है।ग्लोबल अर्थव्यवस्था के रास्ते पर चलने के कारण पूंजी ,जनता की सीमापार यात्राएं,शरणार्थी सवस्या,देश की सीमा का अतिक्रमण आदि मसले प्रमुख हो उठे हैं।

दूसरी ओर ग्लोबल पूंजी अपने प्रतिस्पर्धीभाव में तेजी से इजाफा कर रही है।पुराने राष्ट्र-राज्य ने एक खास तरह के कामकाज का अंदाज,आदतें,संस्कार बनाया था।संचार और संप्रेषण के तौर-तरीके विकसित किए थे।किंतु नई परिस्थितियों ने इन सब क्षेत्रों में तब्दीलियां कर दी हैं।यही वजह है कि नई संचार तकनीकी के प्रति जगह-जगह प्रतिरोध भी व्यक्त हो रहा है।किंतु इस तरह के प्रतिरोध के ज्यादा समय तक टिके रहने की संभावनाएं नहीं है।समाज के उत्पादक वर्गों में बदलती हुई सच्चाईयों ने तेजी से असर छोड़ा है।आज मजदूरवर्ग तेजी से नई तकनीकी के अनुरूप अपने को ढ़ाल रहा है।नई तकनीकी के आने के कारण वह अपने पुराने परिवेश की यादों,पुराने राष्ट्र-राज्य के गौरवपूर्ण अतीत की स्मृतियों को नए जगत में किसी किसी रूप में संजोए रखना चाहता है।

आज बड़े पैमाने पर लोगों को अपने स्थान से बेदखल होकर जाना पड़ रहा है।जो लोग अपनी जमीन से उखड़ चुके हैं।हटाए जा चुके हैं।वे अपनी छोटी सी नई दुनिया में अतीत की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।यह नये युग के परिवर्तनों का आम लक्षण है।इसे अनेक उत्तर औपनिवेशिक लेखकों ने महिमा मंडित किया है।उनका मानना है कि नया अंतर्राष्ट्रीयतावाद भूगोल और जनसंख्या की रिहाइश में मूलगामी परिवर्तन पैदा कर रहा है।यह मूलत: उत्तर औपनिवेशिक माईग्रेशन है।इसमें अस्मिता के जो रूप निर्मित हो रहे हैं उन्हें आप राष्ट्र-राज्य के दायरे में बांध नहीं सकते।

आज भारतीय और भारतीयता के सवाल केन्द्र में गए हैं।एक तरफ उनकी समस्याएं हैं जो यहां रहते हैं।दूसरी तरफ उनकी समस्याएं हैं जो भारत के बाहर रहते हैं।एनआरआई हैं।उन्हें अपनी भारतीयता के बोध ने सताया हुआ है।अस्मिता की पहचान के इन दोनों रूपों के बीच संवाद,संघर्ष और विरेचन की प्रक्रिया एक साथ चल रही है।इससे यह भी पता चलता है कि अस्मिता कोई बनी-बनायी चीज नहीं है।बल्कि निरंतर निर्मित होनेवाली चीज है।यह बहुस्तरीय है।हमें यह भी देखना होगा कि भारत में एनआरआई का पूंजी निवेश,रूचि आदि‍ इंटरनेट और ग्लोबल अर्थव्यवस्था आने के बाद किस तरह बढ़े हैं।खासकर 1985-86 के बाद से इनके रूझान बदले हैं।इसमें इंटरनेट की बड़ी भूमिका है।उसने राष्ट्रवाद को नई अंतर्वस्तु दी है।पहले राष्ट्रवाद का झंड़ा उठाने वाले देसी लोग ही होते थे।आज राष्ट्रवाद का झंड़ा अप्रवासी भारतीयों ने उठाया हुआ है।उनके अंदर हिन्दुत्व की तेज लहर चल रही है।ज्यादातर आप्रवासियों का हिन्दुत्ववादी संगठनों से गहरा संबंध है।वे आज उनके सबसे बड़े वित्तीय समर्थक भी हैं।आप्रवासियों में राष्ट्रवाद की लहर ने भारतीय और भारतीयता के सवालों को केन्द्रीय स्थान दिला दिया है।सोनिया के देसी-विदेशी के विवाद में भारतीय और भारतीयता के सवाल छिपे हैं।

भारतीय और भारतीयता में भारतीयता पाखंड है।छद्म है।इसका कहीं अस्तित्व नहीं है।भारतीय का आधार है।जबकि भारतीयता परिस्थितियों पर निर्भर है।इसकी परिभाषाएं बदलती रही हैं। भारतीयता को विखंडित करके पढें तो शायद उसके अंदर छिपे खोखलेपन को समझ सकते हैं। भारतीयता की पहचान की उन्हें जरूरत है जो भारतीय नहीं हैं।जो भारतीयता की हिमायत में खड़े हैं वे शायद नहीं जानते कि अस्मिता के निर्माण के कुछ ऐतिहासिक और भौतिक आधार होते हैं।जबकि भारतीयता का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।इसके विपरीत भारतीय का ऐतिहासिक और भौतिक आधार है।इसे कानून और संविधान ने परिभाषित किया है।भारतीयता को इनमें से किसी ने भी परिभाषित नहीं किया।प्रवासी भारतीयों या 'एनआरआई' पदबंध में तात्पर्य उन लोगों से है जो अपनी इच्छा से देश छोड़कर चले गए अथवा बल प्रयोग के कारण देश छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुए।गुलाम बनाकर इन्हें भारत से बाहर ले जाया गया।किंतु किसी किसी रूप में देश से जुड़े रहे।

आज जो भारतीय विदेशों में हैं उनकी कई किस्म की पहचान है।वे अपने-अपने देश में अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान कर रहे हैं।इनमें कुछ लोग हैं जिन्हें अतीत याद आता है।भारतीय संस्कार याद आते हैं।कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें जाति संस्कार याद आते हैं।कुछ ऐसे हैं जो पश्चिमी संस्कृति में पूरी तरह रंग चुके हैं।इन्हें अपनी संस्कृति याद आती है और देश याद आता है।किंतु इनकी पहचान के इन सब रूपों को राष्ट्र अपने अंदर समाहित कर सकता है।वे जिस देश में रह रहे हैं वहां पर इन सब चीजों के लिए खूब जगह है।

ध्यान रहे अस्मिता भाषा से बनती है।आप्रवासी भारतीयों की मुश्किल यह है कि वे अपनी जातीयभाषा,जातीय संस्कारों से घृणा करते हैं या ये दोनों तत्व उनके लिए गैर-जरूरी हैं।आज भारतीयता के नाम पर अस्मिता की राजनीति का जो खेल चल रहा है।उसने जातीयभाषा के तौर पर हिन्दी के सामने विभाजन का खतरा पैदा कर दिया है।उत्तरांचल और झारखण्ड के गठन से इन राज्यों में हिन्दी की बजाय स्थानीय बोलियों को राज की भाषा बनाने की मांग तेजी से जोर पकड़ती जा रही है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीयता के नाम पर जो विदेशी पूंजी रही है वह यहां निवेश के लिए कम और मुनाफे और ज्यादा ब्याज दर के कारण ज्यादा रही है।इसका राष्ट्र प्रेम से कोई संबंध नहीं है।आप्रवासी भारतीयों के बारे में एक बात ध्यान में रखनी होगी।कि उनके लिए देश सिर्फ कल्पना की चीज है।वास्तविकता तो यह है कि वे जहां रह रहे हैं।वही उनका देश है।देश का संबंध रहने से है।देश का संबंध्र कल्पना से कम है।कल्पना का देश अवास्तविक होता है।कहानी-कविता-उपन्यास में अच्छा लगता है।किंतु वास्तव जीवन में काल्पनिक देश के प्रति प्रेम खोखला प्रेम है।आप्रवासी भारतीय किसी एक जातीय समूह के लोग नहीं हैं।बल्कि भिन्न जातीय समूहों के लोग हैं।इनकी जातीय संस्कृति,जातीय भाषा,जातीय संस्कार आदि सब कुछ अलग-अलग हैं।यह भिन्नता ही इनकी विशेषता है।भारतीयता के नाम पर इस भिन्नता को हम अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहते।बल्कि 'भिन्नता' ही आप्रवासी और भारतीय की धुरी है।भारतीयता इस भिन्नता को छिपाती है,अस्वीकार करती है,इसके लिए हिन्दुत्व की तर्कप्रणाली और विचारधारा का इस्तेमाल करती है।