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7.11.09

और तीन की टिकट नहीं रही.....


उमेश पंत
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दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका दिल्ली में मजदूरी कर रहे लोगों का है। वो लोग जिनके गन्दे से कपड़ों से जब बदबू आ रही होती है तो कुछ नाकें अपना मुंह सिकोड़ लेती हैं। जिनको बस का कन्डक्टर हिकारत भरी नजरों से देख आगे बढ़ जाने का डांटता हुआ सा आदेश दे देता है। और जो पांच की जगह तीन रुपये की टिकट में अपना काम चला रहे होते हैं क्योंकि ऐसा करके वो अपने किसी छोटे से बच्चे की किताबों या कपड़ों की संख्या में थोड़ा इजाफा कर लेने के सपने देख रहे होते हैं। पर शीला आंटी की सरकार ने बसों का किराया बढ़ाकर तीन रुपये के टिकट की मौत की घोश्णा कर दी। और इस तरह के कई मजदूरों की रोजी रोटी का एक बड़ा हिस्सा छीन लिया। कई किताबों कई कपड़ों के सपने जमीदोज हो गये। और ये इसलिये हुआ कि शीला आंटी की सरकार चाहती है कि कौमनवेल्थ खेलों में हमारी बसें चकाचक दिखें। उन्होंने घोषणा की है कि हर बस पर बीस हजार रुपल्ली का खर्चा किया जायेगा। उसे सजाने सवारने के खातिर। बस में सफर करने वाला वो मजदूर सकते में है। उसे कुछ कहते नहीं बन रहा। उसकी कमाई उसका मेहनताना जस का तस है। टिकट बढ़ गया। उसे रोज जाना आना है अपनी फैक्टी, अपने आफिस, अपनी जेल में। वह कैसे आ जा पायेगा शीला आंटी की सरकार की फिक्र से ये बात परे है। केवल किराये ही बढ़ाये होते तो बात और थी होलाकि तब भी जायज नहीं थी, पर जुल्म की इन्तहां और भी है। टिकट की दूरी की मियाद भी कम कर दी गई है। माने ये कि अब तीन किलोमीटर पर पांच रुपये की टिकट देनी होगी। जबकि पहले चार किलोमीटर पर तीन की टिकट थी। पिचहत्तर रुपये के स्टूडेन्ट पास को सीधे चार सौ रुपये पर पहुंचा दिया है। खैर डीटीसी तो इस फैसले से अपनी खूब कमाई कर ही लेगी। बावजूद इसके कि आम मजदूर वर्ग जिसकी कमाई महीने के कुछ हजारों में है उसके महीने का आने जाने का खर्च हजारों में पहुच जायेगा और इन कुछ हजारों में से कुछ और कट जायेंगे, कुछ कपड़े लत्ते, कुछ किताबें, खाने की कुछ चीजें भी। क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है सिवाय पैदल चलने के। जो दिल्ली जैसे दूरियों वाले शहर में नामुमकिन है।
इस लेख को पढ़कर कोई सोच सकता है कि कैसी पांच दस रुपयों की टुच्ची अदनी सी बात पर बहस खड़ी की जा रही है पर ये दिल्ली के उस तबके की दिल्ली सरकार को आह है जिसके लिये ये टुच्ची सी बात बड़ी अहमियत रखती है। वो वर्ग सचमुच परेशान है। आप बस में सफर कीजिये तो आप आह भरे उन शब्दों को सुन पाएंगे। ब्लू लाईन कन्डक्टर्स जैसे अचानक से मालिकाना अन्दाज में आ गये हैं। ये वर्ग चैंकता हुआ कहता है क्या बात कर रहे हो हम तो हमेशा पांच रुपये देते थे दस कहां से हो गया। कन्डक्टर बड़े रौब में आकर कह देता है चल भई उतर ले और दिल्ली सरकार से पूछ के आ। उपर से और्डर हैं। कुछ उतर ही जाते हैं और कुछ मरे मन से दस का नोट कन्डक्टर की तरफ बढ़ा देते हैं। ये उपर से और्डर होने की कहानी होने का एन्टी क्लाईमेक्स हमारे देश में अक्सर दुखान्त ही होता है। पर तीन के टिकट की ये मौत आजकल निम्न वर्गीय चेहरे की सिकन में बसों से चढ़ते उतरते देखने को मिल रही है। उनकी फुसफुसाहट में छुपी मजबूरियों को सुनने वाला यहां कोई नहीं है। उन्हें कहने का हक किसी ने दिया नहीं है। कहने को ये शहर दिल्ली है सियासत का केन्द्र पर इस दिल्ली में सियासत किस चालाकी से निम्नवर्ग का गला गला घैंाटे जा रही है तीन के टिकट की मौत इसकी बानगी है। शीला आंटी या उनके नीतिकारों तक ये बात पहुचनी ही चाहिये कि पीएसयू का दस प्रतिशत सो कौल्ड आम आदमी को दे देने के फैसले से आम आदमी को खुश करने की गलतफहमी में न रहें। क्योंकि आम आदमी का स्तर इस देश में अभी और नीचे है जो फलाईओवरों के नीचे या यमुना किनारे बनी झुग्गियों में रह रहा है। जहां तक भले ही लालबत्ती की गाड़ियों से झांकने पर नजर ना जाती हो पर चुनावों में वोट वहां से भी आते हैं। वो अनाम सा रहने वाला आम आदमी जो दिल्ली की काया पलटने में गजब की भूमिका निभा रहा है उसके लिये तीन के टिकट की मौत बड़ी खबर है बावजूद इसके कि उस खबर की इतनी औकात नहीं है कि वो ब्रेकिंग न्यूज बन सके।

16.3.09

ये शहर इस मौत का जिम्मेदार है

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ये तस्वीर दिल्ली की संवेदनहीनता को बयान करती है।


ये बताती है कि दिल्ली के दिलवाले लोगों के बीच इस सड़कछाप वर्ग की देखरेख करने वाला कोई भी नहीं है। आज सुबह नौ बजे के करीब किसी काम से गुरुद्वारा बंग्ला साहिब के पास जाना हुआ तो वहां फुटपाथ पर लगभग बारह साल यह का बच्चा इस हालत में दिखाई दिया। बच्चे को इस हालत में देखने के बाद का लगभग एक घंटा भारी विडंबनाबोध में गुजरा। बच्चे की इस हालत के बारे में पास ही खड़े एक ट्रेफिक कर्मचारी से पूछने पर मालूम हुआ कि यह बच्चा कई दिनों से यहां बीमार हालत में पड़ा थ। लेकिन किसी ने इसकी सुध नहीं ली। उस एक घंटे में जब में वहां मौजूद था तो लोगों की संवेदनहीनता और अकर्मण्यता की हद देखने का मिली। लोग आतेए बच्चे की इस हालत को देखते और गुजर जाते। मेरे तीन बार पुलिस चैकी के चक्कर लगाने और दो बार 011 पर बात करने के बाद दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन बच्चे के पास पहुंची। लेकिन मैं जानता था कि देर हो चुकी थी। बच्चे की जान जा चुकी थी।


काष कि पिछले दो तीन दिनों में इस सड़क से गुजरने वाले हजारों लोगों ने इतनी जहमत उठाई होती कि कम से कम पुलिस को ही इसकी खबर दे दी होती तो शायद यह जान बचाई जा सकती थी। सड़क पर कुत्तों से बदतर जिन्दगी जी रहे ऐसे मासूमों के नाम पर पैसा कमा रहे गैरसरकारी संगठन न जाने ऐसे मौको पर कहां गायब हो जाते हैं। ऐसे मौकों पर न जाने हमारी पुलिस कहां की भाड़ झोक रही होती है और न जाने हमारी खुद के भीतर की दया कहां मर जाती है। समझ से परे है। जल्दबाजी के इस शाहर में हमारे अंदर का इन्सान शायद इतना मर चुका है की हमें इस तरह के मासूमों को सड़क पर मरते देखकर भी दया नहीं आती। हमारी आंखें इस मंजर को देख सहम नहीं जाती। ऐसे में न जाने किस मुंह से हम खुद को इन्सान कह पाते हैं। कम से कम मेरी समझ से तो यह बात परे है।

23.2.09

जय हो जय हो जय हो

उमेश पंतwww.naisoch.blogspot.com
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आजा आजा जिन्द सामियाने के तले। और इसके बाद जय हो। आस्कर सेरेमनी में अभी जब इस संगीत के सामियाने में ए आर रहमान पुरस्कार ले रहें हैं तो दिल गर्व से गदगद हो रहा है। हांलाकि ए आर रहमान पहले गोल्डन ग्लोब और उसके बाद बाफटा में कमाल दिखा चुकी थी। लेकिन आस्कर आंखिर आस्कर है। ये हर भारतीय के लिए गर्व की बात है कि भारत के संगीत को इस बार विश्व में अलग पहचान मिली है। इसे एक विडंबना जरुर कहा जा सकता है कि जिस विषय पर यह फिल्म बनी है उस विषय का अस्तित्व हमारे यहां कायम है। और उस विषय पर फिल्म किसी विदेशी ने बनायी। हांलाकि इस बात को लेकर बहस भी की गई कि फिल्म भारत की गलत छवि को दिखा रही है। लेकिन सच्चाई को कितना ही छुपा लिया वा छुपती नहीं। और जो सच है। वो है। पर अभी सबसे बढ़ा सच ये है कि स्लमडौग मिलिनियर ने भारत की जय पूरे विश्व में करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

गुलजार जैसे शब्दों के बाजीगर को देर से ही सही उसका स्थान मिला। और रसूल कुटटी को भी बेस्ट साउन्ड एडिटिंग का पुरस्कार मिला। दरअसल किसी कलाकार को जब उचित सम्मान मिलता है तो उसके अन्दर की खुशी में एक आध्यात्मिक सा सुख होता है। रहमान या कुटी जब स्टेज पर पुरस्कार ले रहे थे तो यह सुख साफ झलक रहा था। आस्कर जैसे फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े सम्मान का हकदार तो रहमान और गुलजार हमें बना ही चुके हैं लेकिन बइ सवाल उस सच्चाई को स्वीकारने का भी है जो फिल्म की रगों में समाई हुई है। वो गरीबी वो फरेब सब कुछ सच है। डैनी बोएल ने उसे देखा है और उसे सिनेमा के पर्दे पर उतारा है और अब हम उसे देखें और उसके लिए कुछ करें तो यह सम्मान सार्थक हो पायेगा। एक फिल्म के रुप में झंडे गाड़ चुकी इस फिल्म के बहाने हम सोचें कि
मखमल के परदे के पीछे
फूलों के उस पार।
ज्यों का त्यों है बसा आज भी
मरघट का संसार।


इस गौरवशाली मौके पर ये पंक्तियां आपको निराश कर सकती हैं। आपकी उत्सवधर्मिता को ठेस पहुंचा सकती हैं। पर यहां आग्रह यही है कि खुशियां मनायें पर न भूलें कि खुशियां मनाने की वजह सात अवार्ड धड़ाधड़ दिला सकती है लेकिन एक देश को इन सच्चाइयों को स्वीकारे बगैर आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। फिलवक्त भारतीय संगीत और संगीतकारों की जय हो कहने से मुझे कोई नही रोक सकता।

6.2.09

यमुना किनारे विचरने के बहाने


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उमेश पंत
नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो नदी होती है और इस वजह के इर्द-गिर्द कई और वजहें जान बूझकर वहां के रवासियों और राहगीरों द्वारा बुन ली जाती हैं। ये वजहें उस नदी की अहमियत के सबूतों में शुमार हो जाती हैं। लेकिन कोई नदी तभी अच्छी लगती है जब वह अविरल बही चली जाये, उसकी सतहों के इर्द गिर्द स्वच्छ और निर्मल होने की महक महका करे, और वहां एक अजीब सी शान्ति, एक अजीब सा सुख आने जाने वालों को मिला करे। अब तक हमेशा यही लगता आया था कि न यमुना ऐसी नदियों में है, न दिल्ली यमुना के होने से मिले उपरोक्त सुखों से परिपूर्ण है। यानी यह कि यमुना का यहां दिल्ली में है तो पर दिल्ली से और दिल्ली वालों से अलहदा है। पूरी तरह उपेक्षित सी एक कोने में पड़ी हुई। जैसे बनारस की विधवांएं। न यमुना ने दिल्ली को कोई संस्कुति ही दी है, न दिल्ली वालों ने यमुना के इर्द गिर्द खुद कोई संस्कुति बुनने की जरुरत ही समझी। परिणाम जो होना था वही हुआ। यमुना एक नाले में दब्दील होती रही। सूखती रही और दिल्लीवालों ने भी उसे किसी कूड़ेदान से बेहतर न समझा।
आईटीओ के पास यमुना का जो किनारा है वहां एक सूखे दिन में जाना हुआ तो पैर पर पहनी खुली काली चप्पलें मटमैली हुए बिना नहीं रह सकी और पैर मिटटी में पसीने के मिल जाने से काले हो गये। पर भीगे नहीं। नदी के किनारे जाने के बावजूद बिना भीगे- भिगाये पैरों का लौट आना बड़ी विडम्बना जरुर थी। पर वजह जाहिर थी कि इतने गंदे पानी में न पैर भिगाने का जी हुआ न ही माहौल में घुली बदबू ने ज्यादा देर वहां ठहरने ही दिया। वहां चहल पहल के नाम पर कुछ बच्चे मिले जो पास ही से गुजरती रोड में बहती हुई कारों में मौजूद आस्थावान लोगों की आस्था को उनके द्वारा दी गई मूर्तियों, घड़ों और चंद सिक्कों जैसी चीजों के रुप में इस नदी में उड़ेल आते हैं। बहाने से ये बच्चे इन चंद सिक्कों के हकदार बन जाते हैं। ये बच्चे स्कूल नही जाते और नदी के कूड़े को बीन अपने भविश्य के आईने से दूर चले जाते हैं। वैसे भी इस नदी में वो कुव्वत कहां है कि यह किसी को आईना दिखा भी सके। या कहें कि लोगों ने इस कुव्वत होने की कोई गंजाईश ही नही छोड़ी। वैसे और जगह होती तो नदी में अपना प्रतिबिम्ब देखना भी कम रोचक नहीं होता। पर यहां आकर इस रोचक अनुभव से गुजर पाना कतई असम्भव सा लगा।
अक्षरधाम के पास भी यमुना के कुछ अवशेश बांकी हैं। यहां यमुना का यह छोटा सा अहाता सुबह सुबह कालेज जाते हुए रोज दिखाई दे जाता है। इन दिनों रोलज इसे देखने की गरज से बस के दरवाजे पर खड़ा रहता हूं। सुबह जब धूप होती है तो सूरज की कई किरणें इसमें सितारों जैसा कुछ बिखेर रही होती हैं और कुछ पक्षी बार बार इस अहाते में उडत्ते-तैरते दिखाई देते हैं। इन पक्षियों के उड़ते वक्त नदी की सतह को ठीक छोड़ते समय, इनके शरीर से पानी को बिखरते हुए देखना मुझे एक अलग आनन्द देता है। दूसरी ओर अक्षरधाम की दिशा में जो छोर है वहां एक नर्सरी है। और इस नर्सरी के बीच में युमुना को बचाये जाने के लिए यमुना सत्याग्रह का बैनर लगा एक तम्बू न जाने कब से लगा हुआ है। सुना है मैग्सेसे अवार्डी राजेन्द्र जी यहीं से अपने आन्दोलन को प्रतीकात्मक रुप से चलाते हैं। लेकिन यह समझ से परे है इस जगह पर इस सत्याग्रह को कैसे कोई नोटिस ले पाता है। हांलाकि पास ही बन रहे खेलगांव की ईमारतों की मंजिलों को कम करने के पीछे इन लोगों के आन्दोलन की भूमिका जरुर रही है।
खैर यमुना खूबसूरत कतई नही रह गई है। मेरी इस धारणा को तोड़ने में पिछला हफता बड़ा अहम रहा है। पिछले शुक्रवार को कालिन्दी कुंज के पास बने पक्षी विहार में जाना हुआ। दरअसल अन्दर जाना भी एक संयोग था। मैं बाहर से ही नदी में मौजूद एक नाव की तस्वीर लेने पे तुला था कि तभी वहां एक गार्ड आया और मुझे टोका कि मैं क्या कर रहा हूं। हांलाकि यह अजीब सा दुराग्रह ही था कि एक कैमरा पकड़ा हुआ आदमी जो नदी में मौजूद नाव को फोकस कर ही चुका हो उससे पूछा जाय कि वह कर क्या रहा है। खैर उस गार्ड ने बताया कि मैं पहले 30 रुपये का टिकट खरीदूं और फिर अन्दर जाकर जीभर फोटोग्राफी करु। मैने टिकट खरीदा और अन्दर जाकर वह हुआ जो दिन बनने के लिए काफी था। वास्तव में यमुना अब भी निहायत खूबसूरत है। उतनी ही तिनी किसी निर्जन गांव के इर्द गिर्द बह रही नदी हो सकती है। लगभग चार किलोमीटर का इस अहाते को अगर आप बिना थके केवल यमुना को निहारते, वहां मौजूद पक्षियों से ईश्या करते हुए पैदल पार कर लें तो यह एक नितान्त दार्शनिक अनुभव से कम नही है। कम से कम मेरे लिये तो यह सच रहा।

इतनी सुन्दर यमुना और उसकी दार्शनिकता को जिन्दा रखना जितना जरुरी है उतना ही विडम्बनापूर्ण है उसे गन्दे नाले में तब्दील होते देखते रहना।