हिंदुस्तान में जब से छोटे छोटे दलों के हाथ में सत्ता में मोल तोल करने की जुगत आई है तब से देश पीछे हो गया । सरकार चलने वाला दल इन प्राइवेट कम्पनी की भांति चलने वाले दलों के दल दल में फंस जाता है। वह देश हित की बजाय सरकार बचाने के जुगाड़ में लगा रहता है। हर दल को समर्थन के बदले में कुछ ना कुछ नही बहुत कुछ चाहिए। ऐसा १९८९ से चल रहा है। पहले यह कम था अब ज्यादा। अगर यही हाल रहा तो देश की कीमत पर समर्थन का सिलसिला चलता रहेगा। मगर थोड़ा सा परिवर्तन हो तो कुछ बेहतर हो सकता है। बस इसके लिए बीजेपी-कांग्रेस को तैयार होना होगा। करना कुछ भी नहीं। अब लोकसभा चुनाव में इन दोनों में से जो सबसे अधिक सीट ले वह सरकार बनाये और दूसरी पार्टी उसको समर्थन दे। कांग्रेस को सीट अधिक मिले तो वह सरकार बनाये और बीजेपी उसको पाँच साल तक बाहर से समर्थन दे। बीजेपी को अधिक सीट मिले तो सरकार बीजेपी की कांग्रेस के समर्थन से पाँच साल चले. इस प्रयोग से छोटे छोटे दलों को बारगेनिंग करने का मौका नहीं मिलेगा। बेशक यह अटपटा सा है, किंतु प्रयोग करके देखने में हर्ज ही क्या है। इस से रोज की किच किच तो नही हुआ करेगी। वरना तो ये प्राइवेट कम्पनियाँ समर्थन के बदले इतना कुछ मांगने लगेंगी कि जिसको चुकाना देश के लिए भी सम्भव नहीं होगा। वैज्ञानिकों ने भी कई प्रयोग किए तब कहीं जाकर कोई एक प्रयोग सफल होकर आविष्कार के रूप में सामने आया। जो प्रयोग यहाँ बताया गया है उस से किसी का कोई नुकसान तो है ही नहीं। बस अपना अपना अहम् त्यागना होगा।
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21.3.09
कांग्रेस-बीजेपी करें प्रयोग
Posted by
गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर
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