लोकतंत्र में
बार बार
हर बार
यही हो रहा है सिद्ध,
खरगोश, मेमने
चुनाव जीतते ही
बन जाते हैं
चील,कौव्वे और गिद्ध,
चुनाव के समय
डरे,सहमे जो
खरगोश,मेमने
जन जन के सामने
मिमियाते हैं,
चुनाव जीतने के बाद
चील,कौव्वे,गिद्ध में
तब्दील हो
देश और जनता को
नोच नोच कर खाते हैं,
लोकतंत्र की विडम्बना देखो,
यही चील,कौव्वे,गिद्ध
अपने इस रूप में
जनसेवक कहलाते हैं।
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6.3.09
खरगोश,मेमना,चील,कौव्वा और गिद्ध
Posted by
गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर
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Labels: कौव्वा और गिद्ध, खरगोश, चील, मेमना
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