
गुजारिश है उन पत्रकारों से जिनके लेख, पत्र तो बिकते ही है साथ में वो अपनी भी बोली लगा देते है |
उन्ही पत्रकारों को समर्पित ये पंक्ति
एक था भरोषा प्रेस पर निर्भीक थी पत्रकारिता ,
पर आज वह भी लोभ में है कह रही चाटुकारिता|
ऐ पत्रकारों !,स्वक्ष पत्रकारिता का मोल है ,
जो बंद आंखे ख़ोल दे वह पत्रिका अनमोल है,
है उसूलें पत्र-लेखन की उसे तू ध्यान कर,
उस पीट पत्रकारिता के दुष्प्रभाव से तनिक तो डर|
हम जानते है पत्र-लेखन एक कठिन कर्म है,
जो जड़ को चेतन में बदल दे पत्र का वो धरम है,
वैसा ही गुरुतर कर्म निष्ठां से करे वह लाल है ,
अन्यथा जो लोभ-लालच से करे वह दलाल है|
आज पत्रकारिता की जड़ समझ आती नहीं ,
पत्र में सच्ची सब बातें जगह तो पाती नहीं,
आज ही एक पत्रिका में धरम को देखा छिपा,
बालबा और बलात्कार को पाया प्रमुखता से छपा |
धन्य है वो प्रेस है वह धन्य पत्रकारिता,
है बढ़ावा मिल रहा जिससे यहाँ दुश्चरित्रता,
पत्र के मालिक बहले पत्रों से माला-माल है,
पर यहाँ की संस्कृति सच बिगड़ कर कंगाल है|
प्रदीप्त मिश्र(9334864231)
बेबाक लेखन की जहाँ उस वक़्त थी प्रतिबद्धता ,
एक था समय तलवार को झुकाती रही पत्रकारिता ,पर आज वह भी लोभ में है कह रही चाटुकारिता|
ऐ पत्रकारों !,स्वक्ष पत्रकारिता का मोल है ,
जो बंद आंखे ख़ोल दे वह पत्रिका अनमोल है,
है उसूलें पत्र-लेखन की उसे तू ध्यान कर,
उस पीट पत्रकारिता के दुष्प्रभाव से तनिक तो डर|
हम जानते है पत्र-लेखन एक कठिन कर्म है,
जो जड़ को चेतन में बदल दे पत्र का वो धरम है,
वैसा ही गुरुतर कर्म निष्ठां से करे वह लाल है ,
अन्यथा जो लोभ-लालच से करे वह दलाल है|
आज पत्रकारिता की जड़ समझ आती नहीं ,
पत्र में सच्ची सब बातें जगह तो पाती नहीं,
आज ही एक पत्रिका में धरम को देखा छिपा,
बालबा और बलात्कार को पाया प्रमुखता से छपा |
धन्य है वो प्रेस है वह धन्य पत्रकारिता,
है बढ़ावा मिल रहा जिससे यहाँ दुश्चरित्रता,
पत्र के मालिक बहले पत्रों से माला-माल है,
पर यहाँ की संस्कृति सच बिगड़ कर कंगाल है|
प्रदीप्त मिश्र(9334864231)
