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7.4.10

लहूलुहान छत्तीसगढ़


एक हजार नक्सली... पुरानी रणनीति... और 76 जवान बने शिकार। हमले की निंदा हुई... बैठक हुई... बयानबाजी हुई.. बयान आया चूक हो गई। इन सबके बीच सबने कुछ न कुछ जरूर कहा... लेकिन बयानों से क्या हमारे वीर वापस लौट आएंगे। केंद्र और राज्य सरकार क्या जबाव देगी उन मांओं को जिनके घर का चिराग बुझ गया... क्या जवाब देगी उन बहनों को जिनकी राखियां कलाइयों को तरसेगी... विधवाओं की सूनी मांग चीख-चीख कर सवाल करेगी... बच्चों की मायूस निगाहें कई खामोश सवालात करेगी?  सवाल सिर्फ सरकार से नहीं उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से भी किया जाएगा जो नक्सलियों के पैरवीकार हैं। महज एक दिन पहले ही देश के गृहमंत्री ने दावा किया था कि 2-3 साल में नक्सलियों का नामोंनिशां तक मिटा देंगे... और बस एक दिन बाद ही ये बयान देना पड़ा कि “सॉरी, कहीं न कहीं चूक हुई है।” चूक किसी की भी हो लेकिन कब तक चलेगा ये सब ? सरकार बैठक, समीक्षा और महज बयानबाजी कर अपनी जिम्मेवारियों से नहीं बच सकती। आखिर क्या वजह है कि नक्सली इतनी बड़ी संख्या में योजनाबद्ध तरिके से चक्रव्यूह रचते हैं और जवान उसमें आसानी से फंस जाते हैं। सरकार की खूफियां एंजेसियों और सुरक्षा व्यवस्था में जुटे लोगों को आईपीएल और सानिया-शोएब की शादी से शायद फुर्सत न मिल रही हो, तभी तो एक हजार नक्सली नाक के नीचे देश की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देकर बच जाते हैं और नेताओं को शहीदों के शव पर  सियासत का एक और सुनहरा मौका मिल जाता है। कई दशक बीत गए, नक्सली लगातार वारदात करते रहे और संसद के गलियारों तक पहुंचने वाले लोग अपनी-अपनी रोटियां सेकते रहे। चीन और पाकिस्तान से लोहा लेने का दावा करने वाली सरकार मुट्ठी भर नक्सलियों के आगे घुटने टेक देती है... ऐसे में हम अपनी सुरक्षा को लेकर कितनी उम्मीद रख सकते हैं। तमाम संसाधनों के होते हुए भी नक्सलियों के फन को नहीं कुचलना सरकार की लाचारी को बता रही है... या तो सरकार इस मुद्दे पर संजीदा नहीं है या फिर वो इस मुद्दे को खत्म नहीं होने देना चाहती ताकि इसी बहाने वो सियासत करते रहें। लेकिन सवाल उन जिंदगियों का है जो ‘लाल जंग’ की भेंट चढ़ गए... सवाल उन परिवारों का है जो शहीदों के भरोसे थे और सवाल आपकी-हमारी हिफाजत का है... कई सुलगते सवाल मन को सुलगा रहे हैं... लेकिन जवाब कुछ नहीं मिल रहा? दिल अब भी ये मानने को तैयार नहीं है कि हमने 76 जवानों को खो दिया है... छत्तीसगढ़ लहूलुहान हो गया है और हमारा मन भी।

3.11.08

पुरस्कारों का ज़खीरा, सोयी मीडिया सोया सरकार.

क्या कभी इतने शील्ड एक साथ देखे हैं?

मैडल ही मैडल, पदक ही पदक, शील्ड ही शील्ड। ये नजारा और कहीं नही विलासपुर में सर्दियों में आयोजित होने वाली ग्रामीण सांस्कृतिक महोत्सव का है। अपने आप में अनूठा ये ग्रामीण सांस्कृतिक पर्व पुरे देश के लिए प्रेरणा है। मगर नही है ये प्रेरणा क्यौंकी दुनिया से अनजान जो है, जब मैं बिलासपुर पहुँचा तो इस पर्व में सम्मिलित होने का मौका मिला और देख कर हैरान रह गया की हमारी सांस्कृतिक धनाड्यता और नजरों में नही, ना ही मीडिया की नजर और ना ही स्थानीय सरकार की। सैकडो गावं यहाँ सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हैं, और प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कार के हक़दार होते हैं, संग ही मेला के बहाने तमाम गाव आपस में मिलते हैं और अपनी संस्कृति के साथ समस्याओं पर चर्चा कर उसका निदान भी निकालते हैं।
क्या इस संस्कृति को पुरे देश में प्रसारित नही होना चाहिए ? मगर जब स्थानीय सरकार ही उदासीन हो, मीडिया के मुलाजिम लाला जी के लिए पत्रकारिता कर रहे हों वहां हमारी सभ्यता की विशेषताओं को किसने देखा है, स्थानीय सरकार की अपनी ढोल है जो उसकी पोल भी खोलती है और मीडिया का राज ठाकरे से लेकर क्रिकेटर पर चर्चा के अतिरिक्त समय कहाँ जो हमारे जड़ में जाए।
ब्लॉग समुगाय के लिए सिर्फ़ जानकारी भर क्यूंकि ब्लोगिंग भी पन्ने पर उड़लती चंद बूंद स्याही से ज्यादा जो नही दिख रही।