आदरणीय विनीत कुमारजी, लेख न छपने पर और वाजिब जवाब न मिलने पर आपका गुस्सा जायज है। अगर पत्रकारिता की आज की दुनिया के ही जीव हैं आप तो तो मेरे ख्याल यह आप को भी बखूबी पता होगा कि हर अखबार में वही छपता है जो उसके नियामक चाहते हैं न कि लिखनेवाले। भड़ासी भाई दुकान जरूर जनता के लिए खुली है मगर दुकानदार जो बेचना चाहेगा वहीं बिकेगा। खरीदार की मर्जी तब देखी जाती है जब उसमें व्यावसायिक हित शामिल हो। बहरहाल मैं आपको कोई नसीहत नहीं देना चाहता मगर अपील जरूर है कि वहीं लिखें जहां छपने की संभावना हो। वैसे इसी तरह एक शिकायत एक ब्लागर भाई ने नई दुनिया के संदर्भ में की थी मगर आप की तरह भड़ककर नहीं। उन्होंने सिर्फ यह कहा था कि पता नहीं उन्हें अब क्यों नहीं छापते नईदुनिया वाले।
जनसत्ता बाजार में वैसा बिकाऊ माल नहीं रहा तो इसका मतलब यह नहीं कि इतना तुच्छ हो गया है कि आप उसपर हंस सकें। जनसत्ता का होने के नाते मुझे आपकी यह उपहास वाली टिप्पणी उसी तरह नागवार लगी जैसे न छपने और जनसत्ता के दो टूक जवाब से आपको लगी। अगर कोई आपको नहीं छापता तो इसमें लड़ने वाली बात क्या है। हर किसी के अपने दायरे हैं। जनसत्ता मेरी नजर में कल भी अच्छा अखबार था और आज भी है।
एक शिकायत यशवंतजी से भी है। आपने दुबारा भड़ास शुरू करने पर कहा था कि हम अपने ही तंत्र या व्यवस्था पर टिप्पणी करने से परहेज रखेंगे। इसकी vajaha भी साफ है कि जल में रहकर मगर से बैर कितना जायज होगा। अब उसके बाद से यह मामला आया है जिसपर भड़ास निकालने के लिए शब्दबाण का सार्वजनिक इस्तेमाल सीधे भड़ास ब्लाग पर किया गया। जबकि डा. रूपेश को आप ही समझा चुके हैं कि ङम किस हद तक आग उगलें। जनसत्ता में रहते हुए रिस्क लेकर इस मुद्दे पर भड़ास इस लिए निकाल रहा हूं क्यों मुझे लगता है कि फिर से भड़ास किसी व्यर्थ के बहस में न उलझ जाए। हमारे कहने, बोलने, लिखने को मान्यता हासिल रहे इसके लिए जरूरी है कि कुछ मानदंडों के दायरे में भड़ास को रखा जाए। मंच को सार्वजनिक आपने बनाया है और उसी अधिकार से भड़ासी होने के नाते आपसे यह उम्मीद है कि भड़ास को सिर्फ अपनी अमर्यादित खीझ उतारने का मंच बनने से आप रोकेंगे।
नहीं भूलना चाहिए कि हम बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवी के नाराज होने का तरीका भी ऐसा होना चाहिए कि उससे भी लोगों को सीख मिले। कुछ अधिक मुखर हो जाने के लिए भड़ासी भाइयों से क्षमा चाहूंगा मगर कामना यही है कि भड़ास एक मर्यादित मंच बना रहे। कोई नहीं छापकर आपको विचलित नहीं कर सकता। इस आग को सीने में दबाके रखिए , इसके पीछे हमारा कारवां भी है।
जय भड़ास
डा.मान्धाता सिंह
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30.1.08
कमीने तो हर डाल पर बैठे हैं गालिब........
Posted by
Dr Mandhata Singh
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