देश के ह्रदयस्थल मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में है कूनो अभ्यारण। घने जंगल और पहाड़ों के बीच के गुजरती कूनो नदी अमेजन घाटी जैसा नजारा पैदा करती है। कभी यहा इलाका ग्वालियर स्टेट में आता था और पालपुर रियासत के अधीन था। यह इलाका वीरपुर तहसील के तहत आता है और यह सहरिया आदिवासी बाहुल्य है। आजादी से पहले यह इलाका सिधिंया और पापुलर राजाओं के लिए आखेट का प्रिय इलाका था। तब से लेकर आजादी के बहुत बाद तक इन आदिवासियों की ग्वालियर और पालपुर दोनों की रियासतों के उत्तराधिकारियों को लेकर श्रद्धा का भाव रहा। यह जंगल इन आदिवासियों के लिए सब कुछ है। राजाओं के शिकार के शौक के बाद भी इस इलाके में जंगल और जमीन बचे रहे। तमाम बाघ भी इस इलाके में थे। बाद में यह लुप्त हो गए। हाल ही के कुछ वर्षों में इसमें फिर बाघों को छोड़ा गया है और इस इलाके को अभ्यारण का मानक दिया गया है।इसी इलाके के आदिवासी इन दिनों बिना किसी मेधा पाटकर या बड़े नाम के अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई जंगल और जमीन बचाने की। इन आदिवासियों की लड़ाई मौजूदा सरकार से हो जो इन्हें जंगल से बेदखल कर चुकी है। अभ्यारण के बहाने आदिवासियों को उनके सदियों पुराने आवासों से बेदखल कर दिया गया है। सरकार ने यह काम बड़ी ही सफाई से किया है। आदिवासियों को पहले बेहतर जमीन और मुआवजा देने के बहाने जंगल से बाहर किया गया फिर उन्हें आवास के लिए मात्र 35 हजार रुपये और जमीन के नाम पर कुछ बीघा पथरीली जमीन दी गई। ऐसी जमीन जिस पर हल चलाना तो संभव है ही नहीं। अब यह आदिवासी इस ठगी से हतप्रभ हैं और उन्होंने अपने परंपरागत हथियार उठा लिए हैं। इस पर सरकार ने उनके मुकाबले पुलिस बल को उतार दिया है। कुछ महीने पहले ही इन आदिवासियों का पुलिस बल से टकराव हुआ। आदिवासियों ने पुलिस बल को लगभग घेर ही लिया। इसका बीडियो टेप मेरे पास है। जल्द ही सबके सामने लाया जाएगा।मगर सवाल यह है कि आदिवासी जीवन की यह जंग कम तक और कितनी लड़ पाएंगे। यह सवाल तब और मौजू है जब मी़डिया का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। मीडिया का इस तरफ ध्यान हो भी नहीं सकता। कारण यह इलाका इतने गहरे बीहड में है जहां जाने के लिए जिगर की जरूरत है जो कमोवेश अपने को तथाकथित धुरंधर कहने वाले कारपोरेट पत्रकार और सनसनी की दम पर नाम बटोरने वालों के पास तो नहीं हो सकता। दूसरे इन आदिवासियों के साथ मेधा पाटकर,अरूंधती राय जैसा नाम भी नहीं जुड़ा कि मीडिया टीआरपी बढ़ाने के लिए बावली हो जाए फिर आखिर इनके सवालों से कौन जूझेगा। कौन उन्हें पुशतैनी जमीन से बेदखल करने के अन्याय के खिलाफ लड़ी जा रही उनके हौंसले की लड़ाई में साथे देगा कौन....
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18.10.08
गुपचुप जारी है एक लड़ाई
Posted by
बीहड़
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