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25.7.10

पतन की ओर अग्रसर भारतीय कृषि-ब्रज की दुनिया

कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन से सम्बंधित है.मानव सभ्यता के इतिहास में कृषि की खोज को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसे नवपाषाणकालीन क्रांति भी कहा जाता है.यह कृषि ही थी जो पूरी दुनिया में विभिन्न सभ्यताओं के जन्म लेने का कारण बनी.यह शुरू से ही पशुपालन से कुछ इस तरह जुड़ी रही है कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक भी कहा जा सकता है.कृषि ने ही घनी आबादी वाली बस्तियों और स्तरीकृत समाज को संभव बनाया.कृषि योग्य भूमि पर फसलों को उगाना और चरागाहों में पशुओं को चराना कृषि के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं.कृषि के विभिन्न रूपों की पहचान करना और उत्पादन में मात्रात्मक वृद्धि शुरुआत से ही किसानों के बीच विचार के प्रमुख मुद्दे रहे हैं.२००७ में दुनिया के लगभग एक-तिहाई श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे.हालांकि औद्योगिकीकरण के प्रारंभ के बाद से ही कृषि का अर्थव्यवस्था में कम होता गया है और २००३ में दुनिया के इतिहास में पहली बार रोजगार उपलब्धता की दृष्टि से सेवा क्षेत्र ने कृषि को पीछे छोड़ दिया.इसके बावजूद यह दुनिया के एक-तिहाई श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराता है हालांकि सकल विश्व उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी घटकर ५ प्रतिशत से भी कम रह गई है.भारत पर कब्ज़ा करने के बाद से ही अंग्रेजों ने भारतीय कृषि का उपयोग अपने लाभ के लिए करना शुरू कर दिया.अब भारतीय किसान अपनी मर्जी से खेतों में फसलें नहीं लगा सकते थे और उन्हें उसी चीज की खेती करनी पड़ती थी जिसका व्यापार कर अंग्रेज अच्छा मुनाफा कमा सकें.इतना ही नहीं अंग्रेजों की गलत आर्थिक नीति के चलते भारी पैमाने पर शहरों से गांवों की तरफ लोगों का पलायन होने से कृषि पर बोझ भी बढ़ गया.ऊपर से अंग्रेजों ने किसानों पर इतना लगान लाद दिया कि किसान कर्ज के दुष्चक्र में फंसकर रह गए थे.आजादी से पहले तक खेती पशु और मानव श्रम की सहायता से की जाती थी.तब कृषि कार्य सालोंभर चलते रहते थे.खेती के साथ पशुपालन अनिवार्य शर्त थी.पशुओं के लिए चारा खेती से ही निकल आता था.पशु सिर्फ खेतों को तैयार करने और समान ढोने में ही मदद नहीं करते थे बल्कि दूध भी देते थे जो काफी पौष्टिक होता था.इतना ही नहीं उनके द्वारा त्यागे गए मल-मूत्र उच्च कोटि के प्राकृतिक खाद का काम करते थे और मिट्टी की सेहत बनाये रखते थे.भारत की आज़ादी अपने साथ विभाजन का दर्द भी लेकर आई.बंटवारे में मुख्य खाद्य क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चले गए जिससे भारत में खाद्य संकट उत्पन्न हो गया.इसलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद निर्वाचित सरकार ने कृषि के विकास के लिए प्रयास शुरू कर दिए.सरकार की नीयत अच्छी थी लेकिन नीतियाँ गलत थीं.पूरे देश में जैसे-तैसे नहरें बनाई गई जिनमें से अधिकतर कुछ ही सालों बाद बेकार हो गईं.ठेकेदार जरूर मालामाल हो गए.पश्चिमी उत्तर प्रदेश,पंजाब-हरियाणा और राजस्थान के कुछ किसानों को विशेष सुविधाएँ और सहायता देकर हरित क्रांति की योजना बनाई गई.जिससे इस क्षेत्र के किसान अमीर हो गए जबकि देश के बांकी भागों में किसानों की हालत दिन-ब-दिन ख़राब होती गई.देश के बांकी भागों में भी हालांकि कृषि का यंत्रीकरण हुआ लेकिन ठीक वैसे ही जबरन जैसे अंग्रेजों के समय व्यवसायीकरण हुआ था.पशुपालन और कृषि की पारस्परिकता समाप्त हो गई और खेतों में रासायनिक खाद डाले जाने लगे.साथ ही कीटनाशकों के प्रयोग को भी वैज्ञानिक कृषि के नाम पर बढ़ावा दिया गया.सरकार ने सिंचाई के परंपरागत साधनों की उपेक्षा की और जगह-जगह नलकूप गाड़े जाने लगे.इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले पचास-साठ सालों में सारे तालाब और कुँए रख-रखाव के अभाव में भर गए.ज्यादातर नहरें गाद भर जाने के कारण बहुत जल्दी बेकार हो गईं.खाद के अनियंत्रित उपयोग ने मिट्टी की सेहत बिगाड़ कर रख दी.कीटनाशकों ने भूमिगत जल को जहरीला किया ही नलकूपों द्वारा इनके एकतरफा दोहन ने भूमिगल जल के स्तर को खतरनाक बिंदु तक पहुंचा दिया.दूसरी ओर सरकार ने भी ९० के दशक से सब्सिडी में कटौती करनी शुरू कर दी.कुल मिलाकर आज भारतीय कृषि संकट में है.कृषि अब घाटे का सौदा है.किसान खेती करना नहीं चाहते लेकिन खेती करना उनकी मजबूरी है.सरकार की गलत नीतियों के कारण देश के स.घ.उ. में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी मात्र १५.७ फीसदी रह गई है जबकि आज भी देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या खेती पर निर्भर है.किसानों की माली हालात इतनी ख़राब हो चुकी है कि हर दिन कई किसान आत्महत्या कर रहे हैं.पिछले कई सालों से कृषि उत्पादन लगभग स्थिर है जबकि हर साल देश की जनसंख्या में लगभग २ करोड़ नए लोग जुड़ जाते हैं.प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक इन्द्र देवता के आह्वान में लगे हैं.पिछले ६३ सालों में चलाई गई खरबों की लागत से चलाई गईं लगभग सारी सिचाई योजनायें बेकार साबित हो रही हैं.दूसरी ओर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में टनों अनाज सड़ गए हैं और किसी की जिम्मेदारी तय करने में सरकार विफल साबित हो रही है.सरकार द्वारा बिना सोंचे-समझे नरेगा योजना चलाने के कारण कृषि के लिए मजदूरों की कृत्रिम कमी पैदा हो रही है जिसका दुष्प्रभाव अब भारतीय कृषि पर दिखने भी लगा है.फिलहाल कृषि उत्पादन में कमी आने से महंगाई आठवें आसमान पर है और सरकार किंकर्त्तव्यविमूढ़ बनी हुई है.यहाँ तक कि उसके पास कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोई योजना तक नहीं है.ऐसे में किसानों की हालत निश्चित रूप से और भी बिगड़ने वाली है और उनका जीवन और भी कठिन होने जा रहा है.