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23.1.11

भ्रष्टाचार पर कांग्रेस-भाजपा की थू-थू मैं-मैं-ब्रज की दुनिया

तेरा मेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मेरा तेरा.रोज-रोज की थू थू (तू तू) मैं मैं.आज १२५ वर्ष की बूढी-सठियाई कांग्रेस और ३० वर्षीया यौवना भाजपा आपस में भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का खेल खेलने में लगी हैं.इन दोनों ही दलों का मानना है कि भ्रष्टाचार करने पर सिर्फ उनका ही जन्मसिद्ध अधिकार है.मेरे लोग जब भ्रष्टाचरण करें तो ठीक है लेकिन जब तुम्हारे लोग करें तो गलत.दोनों ही पक्ष यानी यू.पी.ए. और एन.डी.ए. लगातार फ़ैल रहे भ्रष्टाचार रूपी विषवृक्ष की जड़ों पर काठ की तलवार से प्रहार कर स्वयं के भ्रष्टाचार-विरोधी होने का खूब दिखावा कर रहे हैं.आजकल इन दोनों गठबन्धनों का रणक्षेत्र बना हुआ है कर्नाटक.वैसे भी इतिहास गवाह है कि कांग्रेस विरोधी दलों की सरकारों को दर्जनों बार धारा ३५६ का दुरुपयोग करके पहले भी अपदस्थ कर चुकी है.इस बार मामला थोड़ा अलग है.इस बार वह जिस सरकार को गिराना चाह रही है उस पर पहले से ही भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप हैं.लेकिन जिस कांग्रेस की केंद्र सरकार स्वयं भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबी हुई है वह किस नैतिक बल के बूते पर एक राज्य सरकार को इसी तरह के आरोप लगाकर हटा सकती है?अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टोलरेंस या पूर्ण असहनीयता का मार्ग अपनाना ही है तो इसमें भेदभाव के कहाँ स्थान बनता और बचता है?केंद्र यह तो नहीं कह सकती कि जैसा कि उसके कई मंत्री कह भी रहे हैं कि उनके नेताओं व मंत्रियों द्वारा बरते गए भ्रष्टाचरण से देश की जनता को हानि के बजाए लाभ ही हुआ है और चूँकि विपक्षी नेताओं के भ्रष्टाचरण से देश और जनता को सिर्फ हानि हुई है इसलिए उसके पक्ष के आरोपितों को साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरीके से बचाया जाना चाहिए.वहीँ विपक्षी आरोपित नेताओं पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.
                          दूसरी तरफ युवा पार्टी भाजपा भी भ्रष्टाचार में लिप्त अपने नेताओं का किसी भी तर्क-कुतर्क के सहारे बचाव नहीं कर सकती.यदि कलमाड़ी व राजा का भ्रष्टाचार बुरा है तो फ़िर येदुरप्पा का भ्रष्टाचार कैसे अच्छा हो गया?भाजपा को उनसे भी इस्तीफा ले लेना चाहिए था तभी उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कथित निर्णायक युद्ध में गंभीर योद्धा माना जाता और तब लोग भी राष्ट्रीय स्तर पर उससे भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करते.अब आज की तारीख में कर्नाटक में जो राजनीतिक स्थिति है उस पर हँसा भी जा सकता है और रोया भी जा सकता है.हमने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक साधु एक बच्चे से गुड़ का अतिसेवन त्यागने के लिए कहने से पूर्व खुद गुड़ खाना बंद कर देता है.आज बिडम्बना यह है कि प्रत्येक राजनीतिक दल दूसरे पक्ष पर गुड़ खाने के आरोप तो लगा रहा है परन्तु खुद गुड़ खाने से परहेज करने को कतई तैयार नहीं है.कर्नाटक में राजनीतिक फायदा चाहे जिसका भी हो यू.पी.ए. का या फ़िर एन.डी.ए. का लेकिन इतना तो निश्चित है कि बंद और तोड़फोड़ से घाटा सिर्फ और सिर्फ देश को हो रहा है,भारतवर्ष को हो रहा है.