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20.3.13

उपभोक्ता अदालतें भी करती हैं भेदभाव!

एक साधारण व्यक्ति की मौत की कीमत मात्र बावन हजार रुपये है, जबकि ब्रिटिश एयरवेज में यात्रा करने में सक्षम व्यक्ति का थैला गुम हो जाने के कारण थैला धारक हो हुई परेशानी की कीमत एक लाख रुपये। विलम्ब से खाना परोसने और तीन घण्टे विलम्ब से गन्तव्य पर पहुँचने की कीमत 70 हजार रुपये। इससे ये बात स्वत: ही प्रमाणित होती है कि उपभोक्ता अदालतें, उपभोक्ता कानून के अनुसार नहीं, बल्कि उपभोक्ता अदालत के समक्ष न्याय प्राप्ति हेतु उपस्थित होने वाले पीड़ित व्यक्ति की हैसियत देखकर फैसला सुनाती हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

उपभोक्ता अदालतों के फैसलों पर यदि गौर करें तो पायेंगे कि समाज के विभेदकारी ढॉंचे की भॉंति उपभोक्ता अदालतों द्वारा भी न्याय करते समय खुलकर लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है। जिसके बारे में ऐसी कोई नियंत्रक कानूनी या संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, जो निष्पक्षतापूर्वक स्वत: ही गौर करके या विभेदकारी निर्णयों का परीक्षण करके या शिकायत प्राप्त होने पर गलत या मनमाने निर्णय करने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ दण्डात्मक एवं सुधारात्मक कार्यवाही कर सके।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों दिल्ली की एक उपभोक्ता अदालत ने एक यात्री के सफर के दौरान सामान गुम हो जाने से ब्रिटिश एयरवेज को उसे एक लाख रुपया अदा करने का निर्देश दिया है। गुम होने वाला सामान भी मात्र एक थैला था, जिसमें कुछ जरूरी कागजात थे। जिसको उपभोक्ता अदालत ने इतनी गम्भीरता से लिया कि शिकायत कर्ता को एक लाख रुपये अदा करने का आदेश जारी कर दिया। जबकि इसके ठीक विपरीत भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा समय पर मुआवजा राशि अदा नहीं करने के कारण गुर्दा रोग पीड़ित पालिसी धारक की मृत्यु हो गयी। इस मामले में अररिया के जिला उपभोक्ता फोरम ने अपना फैसला सुनाते हुए मृतक की पत्नी को मात्र बावन हजार रुपया भुगतान करने का आदेश दिया है।

कुछ समय पूर्व एक निर्णय पढने को मिला जिसमें एक उच्च स्तरीय होटल में खाना परोसने में आधा घण्टा विलम्ब हो गया, जिसके कारण उपभोक्ता को जिस प्लेन से जाना था, वह उससे नहीं जा सका और उसे दूसरी प्लेन से जाना पड़ा जिसमें उसे कुछ अधिक राशि किराये के रूप में अदा करनी पड़ी और वह अपने गन्तव्य पर तीन घण्टे विलम्ब से पहुँच पाया। इस माललें उपभोक्ता अदालत ने उपभोक्ता को हुई परेशानी और विलम्ब के लिये होटल प्रबन्धन पर 70 हजार रुपये का हर्जाना लगाया और उपभोक्ता की ओर से प्लेन में भुगतान किया गया अतिरिक्त किराया अदा करने का आदेश भी दिया गया।

उपभोक्ता अदालतों के उपरोक्त फैसलों पर गौर करें तो हम पायेंगे कि पहले और तीसरे केस में उपभोक्ता की हैसियत इतनी है कि वह हवाई जहाज में यात्रा करने में सक्षम है, जबकि दूसरे मामले में उपभोक्ता की हालत ये है कि जीवन बीमा निगम की ओर से समय पर मुआवजा नहीं मिलने के कारण वह अपने उपचार के लिये अन्य वैकल्पिक साधनों से रुपयों की व्यवस्था नहीं कर सका और वह असमय मौत का शिकार हो गया।

ऐसे में एक साधारण व्यक्ति की मौत की कीमत मात्र बावन हजार रुपये है, जबकि ब्रिटिश एयरवेज में यात्रा करने में सक्षम व्यक्ति का थैला गुम हो जाने के कारण थैला धारक हो हुई परेशानी की कीमत एक लाख है। विलम्ब से खाना परोसने और तीन घण्टे विलम्ब से गन्तव्य पर पहुँचने की कीमत 70 हजार रुपये। इससे ये बात स्वत: ही प्रमाणित होती है कि उपभोक्ता अदालतें, उपभोक्ता कानून के अनुसार नहीं, बल्कि उपभोक्ता अदालत के समक्ष न्याय प्राप्ति हेतु उपस्थित होने वाले पीड़ित व्यक्ति की हैसियत देखकर फैसला सुनाती हैं। 

ऐसे विभेदकारी निर्णयों से आम लोगों को निजात दिलाने के लिये हमारी लोकतांत्रिक सरकारें कुछ भी नहीं कर रही हैं। जनप्रतिनिधियों को जनता के साथ होने वाले इस भेदभाव की कोई परवाह नहीं है। यहॉं तक कि इस प्रकार के मनमाने निर्णयों के बारे में पूरा-पूरा कानूनी ज्ञान रखने वाले अधिवक्ताओं को भी अपने मुवक्किलों के साथ हो रहे इस प्रकार के खुले विभेदकारी अन्याय की कोई परवाह नहीं है।

उपभोक्ता अधिकारों के लिये सेवारत संगठनों की ओर से भी इस बारे में कोई आन्दोलन या इस प्रकार का कार्यक्रम नहीं चलाया जाता है, जिससे लोगों को अपने साथ होने वाले विभेद और उपभोक्ता अदालतों की मनमानी का ज्ञान हो सके और इससे बचने का कोई रास्ता मिल सके। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 14 में मूल अधिकार के रूप में इस बात का उल्लेख होना कि ‘‘कानून के समक्ष सभी को समान समझा जायेगा और सभी को कानून का समान संरक्षण प्राप्त होगा।’’ कोई मायने नहीं रखता।-9828502666

10.3.11

सभी लोक सेवक कृपया याद रखें!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' / Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

जब एक लोक सेवक (जनता का नौकर), जनता के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह कानून द्वारा अधिरोपित ईमानदारी से, निष्ठा से और कानून में निर्धारित समय पर/में नहीं करता है तो उससे वह जनता के अधिकारों का हनन कर रहा होता है, जिससे लोक सेवक (जनता का नौकर) द्वारा विभागीय एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 406 तथा 409 आदि में वर्णित कानूनों का उल्लंघन होता है और कानून का उल्लंघन ही अपराध का निर्माण करते हैं, जिसके लिए कानून में सजा का प्रावधान है.

लोक सेवक (जनता का नौकर) कुर्सी के मद में अकेला ही मनमानी करता है, लेकिन सजा उसके पूरे परिवार को भुगतनी पड़ती है. पकडे जाने और सजा मिलने पर बच्चों का जीवन बर्बाद हो जाता है. ऐसे लोक सेवक (जनता
के
नौकर), जनता में असंतोष पैदा करने का कारण भी बनते हैं, ऐसे लोक सेवकों के कारण लोकप्रिय एवं लोकतान्त्रिक सरकारें बदनाम होती हैं.

29.11.10

संगठित जनता की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी!

"या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें।"

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।

अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।

अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?

यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना त्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।