वीरता पुरस्कार का सच
उत्तर प्रदेश की पुलिसतो अपने कारनामो के वजह से हमेशा चर्चा में रहती है और किसी भी कारनामे का पूरा श्रेय पुलिस को ही दिया जाता है पर इस बार उत्तर प्रदेश में शाशन और पुलिस का एक अटूट गठबंधन देखने को मिला
अगर कही भी पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई भी कमी मीडिया या जनता द्वारा जाहिर की जाती है तो शाशन उसपर तुरंत अपनी प्रक्रिया शुरू कर देता है और आरोपी पुलिस या किसी भी अधिकारी को तुरंत दण्डित करता है पर इस गणतंत्र दिवश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने चहेते अधिकारियो को एक नया सन्देश दे डाला की वो चाहे कुछ भी करे पर अगर सरकार के पक्ष में वो कम करते रहेंगे तो उनका कोई कुछ भी नहीं बिगड़ पायेगा ऐसे समर्थवान बहुत से अधिकारी उत्तर प्रदेश में तैनात है जिनको समय समय पर सम्मानित किया जाता रहा है ऐसे ही उत्तर प्रदेश सरकार के एक समर्थवान मुलाजिम है कानपूर के भूतपूर्व डीआई जी प्रेमप्रकाश जो अपनी कार्यप्रणाली के बारे में काफी चर्चित रहे है सायद इनके बारे आप लोग पूरी तरह से नहीं जानते है मै आपको बता दू की इस २६ जनवरी को इन्हें प्रदेश सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार दिया दिया गया है
इनकी सबसे पहली वीरता ये रही की कानपूर पहुचते ही इन्होने सबसे पहले मीडिया वालो को लाठियों से पिटवाया
अपनी इस वीरता से भी ये काफी चर्चित रहे दूसरी वीरता की कानपूर की चर्चित दिव्या हत्याकांड में इनके ऊपर अपराधियों को बचने का खुला आरोप है और अपनी इस वीरता की वजह से ये अभी भी सी बीआई की जाच के घेरे में है एक तरफ जहा इन्हें राष्ट्रपति द्वारा वीरता का पदक दिया जा रहा था वाही दूसरी तरफ दिव्या की माँ ये देखकर फूट फूट के रो रही थी और कानपूर की सडको पर अखिल भारती उद्योग व्यापार मंडल के लोगो द्वारा इन महाशय का पुतला जलाया जा रहा था और राष्ट्रपति मेडल वापस लेने की मांग की जा रही थी
पर कोई क्या कर सकता है लोग चाहे कुछ भी कहे जनता चाहे लाख हो हल्ला मचाये पर इन्हें तो अपनी इन वीरताओ के लिए राट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार दे ही दिया गया ...........
आगे देखते है की ये आने वाले समय में और कौन कौन से पुरस्कारों से इन्हें नवाजा जाता है और कौन सी इनकी नयी वीरताए हमें देखने को मिलती है
मनीष कुमार पाण्डेय
Showing posts with label वीरता पुरस्कार का सच. Show all posts
Showing posts with label वीरता पुरस्कार का सच. Show all posts
28.1.11
Posted by
MANISH PANDEY LUCKNOW
0
comments
Labels: वीरता पुरस्कार का सच
Subscribe to:
Comments (Atom)
