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13.9.14

श्वेता बसु शिकार है या शिकारी?-ब्रज की दुनिया

13 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले दिनों मकड़ी,इकबाल जैसी प्रसिद्ध फिल्मों की हिरोइन श्वेता बसु को वेश्यावृत्ति करते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया। तभी से बॉलीवुड में इस बात पर एकतरफा बहस छिड़ी हुई है कि श्वेता बसु ने जो कुछ भी किया है क्या वह सब भारत में और भारतीय लड़की के लिए करना सही है? यह बहस इसलिए एकतरफा है क्योंकि अभी तक किसी भी हिन्दी फिल्म या टेलीवीजन शख्सियत ने यह नहीं कहा कि श्वेता ने गलत किया बल्कि साक्षी तंवर और दीपिका पादुकोण ने उल्टे श्वेता को ही सही ठहराया है और कहा है कि उसके सामने और रास्ता ही क्या था?
मित्रों,तो क्या सचमुच श्वेता के सामने जिस्म बेचने के अलावा धनार्जन का और कोई रास्ता नहीं बचा था? क्या फिल्मी हीरोइनों के सामने हमेशा दो ही विकल्प होते हैं कि या तो वह फिल्मों में काम करे या फिर वेश्यावृत्ति करे? मैं नहीं मानता कि यह सच है। कोई भी अभिनेत्री अन्य महिलाओं की तरह ही बहुत सारे अन्य काम भी कर सकती हैं। अभिनय के लिए टीवी की विशाल दुनिया है तो वहीं फैशन,मॉडलिंग,ब्यूटी पार्लर,बूटिक,भोजनालय,रेस्टोरेंट,शिक्षण आदि बहुत सारे ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें अभिनेत्रियाँ हाथ आजमा सकती हैं और ईज्जत के साथ पैसे कमा सकती हैं। लेकिन यहाँ कठोर संघर्ष करना पड़ेगा और एटीएम मशीन की तरह झटपट हाथों में पैसा नहीं आएगा।
मित्रों,हमारी युवा पीढ़ी के साथ सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि उनके पास धैर्य नहीं है। वे चाहते हैं कि पलक झपकते ही उनका बैंक अकाउंट पैसों से लबालब भर जाए। जबकि ऐसा कहानियों में तो संभव है लेकिन हकीकत में नहीं। मैंने वर्षों पहले अमेरिकन पॉप स्टार मैडोना जो हमारी कई हिन्दी फिल्म अभिनेत्रियों की घोषित आदर्श हैं का इंटरव्यू कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब न्यूयार्क आने के बाद उनके पास पैसे नहीं थे तब उसने नौकरी नहीं खोजी थी बल्कि वासना के सौदागर को खोजा था और अपनी अस्मत बेचकर गुजारा किया था।
मित्रों,ऐसा यूरोप और अमेरिका की महिलाओं के लिए तो सही हो सकता है लेकिन भारत की स्त्रियों से हम ऐसी अपेक्षा नहीं रख सकते। बल्कि भारत की संस्कृति तो स्त्रियों से यह अपेक्षा रखती है कि उसे चाहे कितने भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े अपनी ईज्जत और अपने सम्मान को बचाए। मैडोना और सनी लियोन श्वेता बसु,साक्षी तंवर या दीपिका पादुकोण जैसी विदेशी मानसिकतावाली महिलाओं के लिए तो उनका आदर्श हो सकती हैं लेकिन भारत की एक आम औरत के लिए नहीं। हरगिज नहीं।। भारत में प्राचीन काल से ही कौमार्य की अंतर्राष्ट्रीय नीलामी करने की परंपरा नहीं रही है बल्कि जान देकर भी उसकी रक्षा करने वाली पद्मिनियों के जौहर की प्रथा रही है और यही भारतीयता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)