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8.2.11

कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं.

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।

12.4.09

साहित्य समाचारों की बेकदरी का आलम

आजकल शायद जयपुर ही क्या लगभग सभी शहरों में साहित्य सम्बन्धी समाचारों के साथ बहुत ही बुरा सलूक किया जाता है। इसका अनुमान या अंदाज़ तब लगता है जब आप ख़ुद आयोजक हों या किसी कार्यक्रम में शामिल रहे हों। मैंने एकाधिक बार इस बाबत 'भडास' में लिखा तो हमारे पत्रकार मित्र इस कदर बुरा मान गए किअब तो उन्होंने मेरे द्बारा दिए गए समाचार ही छापना बंद कर दिया है। बहरहाल नौ अप्रेल को हमने प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस को 'साहित्य दिवस समारोह' के रूप में मनाया। सब अखबारों को और मीडिया के मित्रों को फेक्स, ईमेल, एस एम् एस, निमंत्रण पत्रऔर बाकायदा चिट्ठी लिखकर सूचित किया और कवरेज़ के लिए आग्रह किया। कुछ अखबारों ने कार्यक्रम की पूर्व सूचना छपी, कुछ ने नही छापी।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। अखबारों के प्रतिनिधि, टेलीविजन चैनलों के लोग कवरेज़ के लिए आए। एक अख़बार जिसका दफ्तर कार्यक्रम स्थल के ठीक सामने था (अब भी वहीं है), वहाँ जिस रिपोर्टर की ड्यूटी लगाई गई, वो बार बार फोन किए जा रहा था कि सर ख़बर भिजवा दीजिये। मुझे गुस्सा आया कि यार दो कदम चलकर ख़बर लेने नही आ सकता, किसी चवन्नी छाप टीवी कलाकार से मिलने मीलों दौडे चले जायेंगे। खैर, प्रोग्राम का दूसरा सत्र शुरू होने पहले मैंने पहले सत्र कीख़बर बना ली थी और दूसरे सत्र की शुरुवात होने के बाद उसकी रूपरेखा के आधार पर उसे भी ख़बर में शामिल कर लिया था। कार्यक्रम समाप्त होने से पहले सब अखबारों को और मीडिया को ख़बर फेक्स से भेज दी गई थी। एक अखबार से फोन आया किफेक्स नही मिला, तो उन्हें फोन पर ख़बर लिखाई गई।

दूसरे दिन उस अख़बार में ख़बर नही थी, जिसका दफ्तर कार्यक्रम स्थल के ठीक सामने था। एक अखबार में छपी ख़बर में उन लोगों का नाम था जो कार्यक्रम में आए ही नही (वो हिन्दी का सबसे बड़ा अख़बार है)। एक अख़बार में, जिन्होंने फोन पर ख़बर लिखी थी, ख़बर में वो लिखा जो हुआ ही नही।
एक हादसा आज हुआ, दो बड़े अखबारों ने विष्णु प्रभाकर के निधन पर जारी हमारी शोक संवेदना भी नही छापी।
सवाल यह है, कि हिन्दी के अखबार हिन्दी साहित्य से सम्बंधित समाचारों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं। आपको अगर 'प्रेमचंद गाँधी' या किसी लेखक विशेष से दिक्कत है तो उसे अपने अखबार में मत लिखने दो, लेकिन समाचार छापने में क्या दिक्कत है भाई। हम अंग्रेज़ी अख़बार से तो अपेक्षा नहीं कर सकते कि वो हमारी खबरें ठीक से छापेंगे, कम से कम हिन्दी के अखबारों से तो इतनी उम्मीद कर ही सकते हैं?