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27.3.11

सुविधा और दुविधा के बीच झूलता भारतीय जनमानस-ब्रज की दुनिया

fukusima
मित्रों,इस ग्लोब पर निवास करनेवाले किसी भी इन्सान ने कभी ख्वाबों-ख्यालों में भी नहीं सोंचा था कि पूरी दुनिया के लिए वैज्ञानिक व तकनीकी विकास का उदाहरण माना जानेवाला जापान प्रकृति के एक हल्के-से झटके को भी सहन नहीं कर पाएगा और इस कदर हिल जाएगा.दिनकर ने पिछली शताब्दी में ही मानव को विज्ञान की खतरनाक प्रकृति के प्रति सचेत करते हुए कहा था कि रे मानव सावधान!यह विज्ञान नहीं तलवार!लेकिन तब पूरा विश्व पश्चिमी विकास के मॉडल के प्रति सम्मोहन की अवस्था में था.
मित्रों,हम जानते हैं कि पश्चिम का मानना है कि मानव और प्रकृति में लगातार संघर्ष चलता रहता है.विकास के प्रथम चरण में प्रकृति मानव पर हावी थी जबकि विकास के द्वितीय चरण में मानव प्रकृति पर भारी है.पश्चिम के अनुसार मानव का अंतिम लक्ष्य प्रकृति पर विजय पाना है और जीवन को प्राकृतिक विनाश की कीमत पर भी अधिक-से-अधिक सुविधापूर्ण बनाना है.इसलिए पश्चिम ने तरह-तरह की मशीनें बनाईं जिनमें से कईयों का प्रकृति पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा है.
मित्रों,पश्चिमी दर्शन के विपरीत भारतीय दर्शन प्रकृति पर विजय के बजाये प्रकृति की पूजा का समर्थक रहा है.वह यह नहीं कहता कि छत पर चढ़ जाने के बाद सीढ़ी को ही तोड़ देना चाहिए.बल्कि वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए विकास का हिमायती रहा है.यहाँ तक कि आधुनिक विश्व के महानतम नेता गाँधी का भी यही मानना था.लेकिन नेहरू पर पश्चिम का प्रभाव इतना ज्यादा था कि एडम स्मिथ के विचार गाँधी के विचारों पर भारी पड़ गए.नेहरू को आधुनिक कल-कारखाने और नहरें मंदिर की तरह पवित्र लगते थे.उनका मानना था कि अमेरिका आदि विकसित देशों की तरह अर्थव्यवस्था की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था में भी सेवा और उद्योग क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगातार बढती जानी चाहिए और कृषि की हिस्सेदारी में तदनुसार कमी आनी चाहिए.वैसे नेहरू के समय कृषि उतनी उपेक्षित भी नहीं रही जैसी आज है.नेहरु पश्चिमी व्यवस्था पर इस कदर फ़िदा थे कि उन्होंने देश के प्रशासनिक ढांचे को भी पश्चिमी मॉडल पर भी बने रहने दिया.नेहरु युग में और नेहरु के बाद जीवन-शैली और पश्चिमी विज्ञान जो विशुद्ध रूप से भौतिकवाद पर आधारित था का जमकर अन्धानुकरण किया गया.गाँधी की तस्वीर को तो खूब अपनाया गया लेकिन गांधीवाद जो प्रकृति के साथ विकास पर आधारित था को कूड़ेदान में डाल दिया गया.
मित्रों,परिणाम हमारे सामने है.कभी अध्यात्म में विश्वगुरु रहा भारत आज दुनिया के भ्रष्टतम देशों में गिना जाता है.नेहरु द्वारा स्थापित आधुनिक मंदिर कल-कारखाने भ्रष्टाचार और चीन द्वारा उत्पन्न प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाने के कारण घाटा उगलनेवाली मशीनरी बनकर रह गए हैं और नेहरु युग में खोदी गयी ज्यादातर नहरों में पानी आते देखे कई पीढियां बीत चुकी हैं.धुआँ उगलती मशीनों ने पर्यावरण के संतुलन को ही डगमग कर दिया है.ऐसे में जबकि नदियाँ ही सूखने लगी हैं तो नहरों में पानी कहाँ से आए?पश्चिम की देन अंधभौतिकवाद का जो भी कुपरिणाम संभव है वह हम भारत में कहीं भी और किसी भी क्षेत्र में देख सकते हैं.सर्वत्र नैतिक-स्खलन का दौरे-दौरा है.कृषि बेदम है और सेवा क्षेत्र में विकास तो हो रहा है लेकिन वह विकास रोजगारविहीन विकास है.देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र अव्यवस्था और भ्रष्टाचार व्याप्त है.देश के एक चौथाई हिस्से पर खुले तौर पर भारतीय संविधान का नहीं चीन से आयातित हिंसक विचारधारा का शासन है.
मित्रों,प्रत्येक वर्ष भारत सरकार गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक बन चुकी बिजली के उत्पादन में वृद्धि के लिए लक्ष्य निर्धारित करती है और व्यवस्था की कमी के चलते उसे प्राप्त नहीं कर पाती है.ऐसा माना जा रहा है कि भारत में इस समय कम-से-कम १०-१५% बिजली की कमी है.आदर्श स्थिति तो यह होती कि सौर,पवन और ज्वारभाटीय ऊर्जा द्वारा इस कमी को पाटा जाता.लेकिन भारत सरकार और आदर्श शब्द तो जैसे जानी दुश्मन हैं.भारत सरकार को तो पश्चिमी तरीके से ऊर्जा चाहिए.भले ही ऐसा करने से पर्यावरण को स्थायी और अपूरणीय नुकसान ही क्यों न हो.भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से कभी इतनी बिजली नहीं मिलेगी जिससे परमाणु ऊर्जा भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में मुख्य हिस्सेदार बन सके.तब भी लगभग ९०% बिजली तापीय और अन्य परंपरागत और अपरम्परागत ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करना होगा.
मित्रों,विकास के पश्चिमी रास्ते पर चलकर जापान आज विनाशक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है और सारी दुनिया बर्बाद होते जापान को मूकदर्शक बनी देख रही है.यह सही है कि जो जापान १८६८ में मेजी पुनर्स्थापना से पहले तीर-धनुष के युग में था वही जापान मात्र ८-१० सालों में ही पश्चिम की नक़ल करके विकसित देशों की श्रेणी में आ गया और पश्चिमी साम्राज्यवादियों के साथ बराबरी के साथ बात करने लगा.जापान ने न केवल विज्ञान और तकनीक के मोर्चे पर पश्चिम की नक़ल की बल्कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के मामले में भी जमकर अन्धानुकरण किया जिसका परिणाम हुआ नागासाकी और हिरोशिमा.यह घोर आश्चर्य की बात है कि जो जापान परमाणु-हथियारों की विभीषिका का एकमात्र भोक्ता था उसने कैसे खतरनाक परमाणु ऊर्जा पर विश्वास कर लिया जबकि उसे यह भलीभांति पता था और है कि किसी भी प्राकृतिक या मानवीय भूल से उत्पन्न होनेवाली आपदा के समय परमाणु-रिएक्टर परम विनाशकारी और अनियंत्रित परमाणु-बम में बदल जाता है.
मित्रों,कुछ पश्चिमवादी भारतीय जिनमें हमारे प्रधानमंत्री भी शामिल है यह तर्क दे रहे हैं कि अब ऎसी तकनीकें उपलब्ध हैं जिससे कि किसी भी संभावित परमाणु-दुर्घटना पर पूर्णतः नियंत्रण संभव है.मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या भारत या दुनिया का कोई भी दूसरा देश तकनीक के मामले में जापान से आगे है?फिर नए परमाणु-रिएक्टर बिठाने की जिद क्यों?भारत की जनसंख्या भी काफी ज्यादा है इसलिए भी यहाँ मौतें ज्यादा होगी और जहाँ तक व्यवस्था का प्रश्न है तो इस मामले में दुनिया के कुछ ही देश ऐसे हैं भारत की स्थिति जिनके मुकाबले अच्छी है.मान लिया कि हम कानून बना देंगे और दिशा-निर्देश भी जारी कर देंगे.साथ ही यह नियम भी बना देंगे कि समय-समय पर रिएक्टरों की स्थिति की जाँच की जाएगी.लेकिन उन्हें लागू कौन कराएगा?हमारे भ्रष्ट नेता और अफसर ही न.फिर क्या गारंटी है कि हमारे नेता और अफसर चंद गाँधी-छाप कागज के टुकड़ों के लालच में नहीं आयेंगे और दूसरा-तीसरा भोपाल नहीं होगा?
मित्रों,कुल मिलाकर इस समय पूरे भारत में परमाणु-ऊर्जा को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.बहुसंख्यक लोगों का मानना है कि भारत को इस पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए और जो धन परमाणु-ऊर्जा के उत्पादन पर खर्च किया जाना है उसे नवीकरणीय ऊर्जा के निर्माण पर खर्च किया जाए.अगर जनमानस में आशंकाएं हैं तो उन्हें बेवजह भी नहीं कहा जा सकता.हमारी सरकार की विश्वसनीयता खुद ही अनगिनत प्रश्नों के घेरे में है.ऐसे में अगर वह सुरक्षा की गारंटी देती भी है तो जनता उस पर बिलकुल ही विश्वास नहीं करेगी.लेकिन यहाँ प्रश्न सिर्फ दो-चार या दस-बीस परमाणु बिजलीघरों का ही नहीं है;यहाँ सवाल है विकास,प्रशासन और जीवन-शैली के अहम् क्षेत्रों में पश्चिम की नक़ल करने का भी.सवाल यह है कि हम इन क्षेत्रों में अपना भारतीय मॉडल विकसित करेंगे या पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए एक दिन जापान की तरह बर्बाद हो जाएँगे.हमारे पूर्वजों ने जो संस्कृति अपनाई थी उसी के बल पर हम आज भी गर्व के साथ माथा ऊंचा करके यह कह पा रहे हैं कि कुछ बात है हस्ती मिटती नहीं हमारी,सदियों रहा दुश्मन दौरे-जहाँ हमारा.इस समय हम दोराहे पर खड़े हैं.एक रास्ता प्राकृतिक विनाश का है और धरती पर मानव जीवन के अंत की ओर जाता है.वहीँ दूसरा रास्ता सर्वे भवन्तु सुखिनः का है और माँ वसुंधरा की,प्रकृति की रक्षा करते हुए विकास करने का है.कौन-सा रास्ता बेहतर है यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है.