हास्य-ग़ज़ल
कवियों में मलखान हुए संयोजकजी
रसिकों के रसखान हुए संयोजकजी
इतनी तंबाकू-कत्थे से की यारी
खुद चूने का पान हुए संयोजकजी
चुनचुनकर सब फ्लाप कवि, एक टीम रची
खुद उसके कप्तान हुए संयोजकजी
मंचखोर तुक्कड़ कवियों के टापू में
मनचाहे वरदान हुए संयोजकजी
भरते सुबहो-शाम जिन्हें मिलकर चमचे
ऐसे कच्चे कान हुए संयोजकजी
मरियल कवि को मिला लिफाफा मोटा-सा
मंद-मंद मुस्कान हुए संयोजकजी
पाल-पोसकर बड़े किये चेले-चांटे
गुरगों के भगवान हुए संयोजकजी
पशुमेला क्या लालकिला तक चर डाला
भैया बड़े महान हुए संयोजकजी
फसल बचाएं मठाधीश की चिड़ियों से
देखो स्वयं मचान हुए संयोजकजी
नीरव से मुठभेड़ हुई जब करगिल में
पिटकर पाकिस्तान हुए संयोजकजी।
पं. सुरेश नीरव
मो.९८१०२४३९६६
23.6.08
खुद चूने का पान हुए संयोजकजी
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18.6.08
तो खफा हो बैठे।
हास्य-ग़ज़ल
उनकी कुर्सी को हिलाया तो खफा हो उठे
पिंड मुश्किल से छुड़ाया तो खफा हो बैठे
शेर जिनके वो सुनाते थे बताकर अपने
अस्ल शायर से मिलाया तो खफा हो बैठे
दिल के नुस्खों के बड़े चर्चे सुने थे हमने
चीरकर दिल जो दिखाया तो खफा हो बैठे
चाय हर रोज बनाकर पिलाते थे उन्हें
इक गिलास उनसे मंगाया तो खफा हो बैठे
माल उड़वाया महीनों जिन्हें ले ले के उधार
आज बिल उनको थमाया तो खफा हो बैठे
उमके जूड़े को हिमालय सा सजाकर हमने
फूल गोभी का लगाया तो खफा हो बैठे
आंखों-आंखों में चुराया था जिन्होंने हमको
घर से जब उनको उड़ाया तो खफा हो बैठे
घर में नीरव के निठल्लों का हुआ जब जमघट
दाल का पानी पिलाया तो खफा हो बैठे।
पं. सुरेश नीरव
९८१०२४३९६६
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