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17.9.09

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के शताब्दी वर्ष के अवसर पर - अस्मिता और आत्मकथा की चुनौतियां

लेखक के विजन का उसके सामयिक सरोकारों के साथ गहरा संबंध होता है। इन दिनों लेखक के बारे में जितनी भी बातें हो रही हैं वे लेखक के दार्शनिक सैध्दान्तिक नजरिए को दरकिनार करके हो रही हैं। लेखक के बारे में हम हल्के -फुलके ढ़ंग या चलताऊ ढ़ंग से सोचा जा रहा है। साहित्य और जीवन से जुड़े गंभीर सवालों से किनाराकशी चल रही है। आज हम लेखक के विजन की बातें नहीं कर रहे बल्कि हल्की-फुल्की चुटकियों के जरिए बहस कर रहे हैं। किसी भी लेखक को पढ़ने का सबसे सटीक प्रस्थान बिंदु है उसका विजन। विजन पर बातें करने का अर्थ है उसके दार्शनिक प्रकल्प में दाखिल होना। बगैर दार्शनिक प्रकल्प में दाखिल हुए किसी भी कवि की कविता या साहित्य को विश्लेषित करना संभव नहीं है।

सवाल उठता है रचना का लेखक कौन है ? अमूमन रचना व्यक्तिगत प्रयास के रूप में जानी जाती थी आज रचना का लेखक व्यक्ति नहीं है। बल्कि रचना सामूहिक सृजन की देन है। 'रश्मिरथी' में कर्ण कथा को विषयवस्तु के रूप में चुनकर लेखक ने सर्जक के नए आयाम का उद्धाटन किया है। यह महाभारत की कहानी है। महाभारत सामूहिक लेखन की देन है। इस अर्थ में दिनकर ने एकदम नयी समस्या की ओर ध्यान खींचा है आज के युग में लेखन व्यक्तिगत की बजाय सामूहिक अथवा सहयोगी होगा। कर्ण की कहानी हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं। कहानी पुरानी है ,काव्य प्रस्तुति नयी है। 'रश्मिरथी' में कर्ण का चित्रण टाइप पात्र के रूप में हुआ है। यह पात्र हमारे मन में रमा हुआ है। टाइप पात्र के बहाने कर्ण हमारे मन की तहों को खोलता है।

टाइप पात्र होने के कारण कर्ण ने 'अस्मिता' के अन्तर्विरोधों को अभिव्यक्त किया है। 'अस्मिता' में प्रतिस्पर्धा,उत्तेजना और त्रासदी भाव प्रमुख रूप से होता है। अस्मिता की धुरी है 'अन्याय'। अस्मिता विमर्श अन्याय के सवालों को केन्द्र में लाता है। अस्मिता अमूमन संवेदनात्मक उत्तेजना से ऊर्जा ग्रहण करती है। भाषा उसका सेतु है। अस्मिता विमर्श में उत्तेजक भाषा प्रमुख उपकरण है। यही वजह है कि 'रश्मिरथी' में वीरत्व व्यंजक भाषिक संरचना का इस्तेमाल किया गया है। अस्मिता की भाषा 'व्यक्तिगत आत्महीनता' को बार-बार व्यक्त करती है। कर्ण की भाषा में इसे सहज ही देखा जा सकता है।

'रश्मिरथी' के कुछ बुनियादी तत्व हैं जो उभरते हैं पहला है अस्मिता हमेशा प्रतिस्पर्धी और बहुरूपी होती है। दूसरा तत्व है भावुकता और सामाजिक तनाव। तीसरा , आत्महीनता। चौथा ,अस्मिता का सामयिक फ्रेमवर्क । पांचवा , अस्मिता की राजनीति। अस्मिता विमर्श का सत्ता विमर्श के साथ संबंध । छठा, अस्मिता विमर्श व्यक्तिवादी विमर्श है।

अस्मिता विमर्श का इन दिनों जो रूप देखने में आ रहा है उसके दो प्रमुख आयाम है पहला है 'अन्याय' और दूसरा है ' इच्छर्ापूत्ति'। सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में इन दो रूपों में अस्मिता का व्यापक उपभोग हो रहा है। अस्मिता विमर्श मूलत: उत्पादक होता है। सामाजिक शिरकत को बढ़ावा देता है। पात्र क्या चाहते हैं यही इसके आख्यान की धुरी है। लेखक ने 'रश्मिरथी' में व्यक्तिगत इच्छाओं को ऐतिहासिक- राजनीतिक संरचनाओं के फ्रेमवर्क में रखकर पेश किया है। पात्र क्या चाहते हैं ? यही प्रधान बिंदु है जिसके इर्दगिर्द सारा कथानक घूमता है।

कर्ण के बहाने लेखक यह रेखांकित करना चाहता है कि किसी भी पात्र की अस्मिता एक नहीं होती बल्कि उसके व्यक्तित्व में एकाधिक अस्मिताएं होती हैं, अस्मिता वस्तुत: मुखौटा है। जिन्हें पात्र या व्यक्ति धारण किए रहता है। दूसरा संदेश है अस्मिता कभी स्वाभाविक नहीं होती। वह सामाजिक निर्मिति है। अस्मिता की धुरी है मनुष्य और मानवता। मुखौटे खोखले होते हैं,मनुष्य सारवान है। कर्ण के जितने भी मुखौटे हैं वे अप्रासंगिक हैं कर्ण की मानवीयता महान् है।

अस्मिता का कोई न मित्र है न शत्रु । अस्मिता की सारी आपत्तियां 'अन्याय' के खिलाफ हैं। 'अन्याय' के खिलाफ जंग में सामाजिक लामबंदी का उपकरण है अस्मिता। सवाल यह है अंत में अस्मिता किस बिंदु पर पहुँचती है ? क्या पुन: लौटकर अस्मिता की ओर लौटते हैं अथवा मानवता की ओर पहुँचते हैं। कर्ण के बहाने लेखक ने अपने कार्यकत्तर्ाा भाव का परिचय दिया है। वह पाठकों को सक्रिय करना चाहता है। इसी अर्थ में 'रश्मिरथी' राजनीतिक कार्रवाई है। लेखक बताना चाहता है अस्मिता मूलत: राजनीतिक मंशा की देन है। अस्मिता पर राजनीति के बिना चर्चा संभव नहीं है। अस्मिता में निहित व्यक्तिगत और सामाजिक इच्छाओं को अभिव्यक्त किया है।

अस्मिता विमर्श का इतिहास से गहरा संबंध है। इतिहास में जाए बिना इसका चित्रण और विवेचन संभव नहीं है। साथ ही अस्मिता हमेशा विकल्प को व्यक्त करती है। 'रश्मिरथी' में भी अस्मिता के विकल्प की तलाश की गयी है। जाति के इतिहास और विकल्प को बड़ी ही सुंदरता के साथ प्रस्तुत किया है। कर्ण की पहचान का आधार है जाति संबंध। इसकी परिणति है कर्ण की अपमानभरी त्रासद जिंदगी। लेखक का मुख्य लक्ष्य है कर्ण,अर्जुन आदि पात्रों की अस्मिता की निरर्थकता को उद्धाटित करना। अस्मिता की पर्तों को खोलते-खोलते कर्ण को सामान्य मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करने में लेखक को सफलता मिली है।

कर्ण सभ्य है। स्त्री और मित्रता का सम्मान करता है। संवेदनशील और उदार है। कर्ण के मानवता, दानवीरता, उदारता, मित्रता, संवेदनशीलता आदि गुणों की आज भी महत्ता है। कर्ण के अनुभव अन्य पात्रों के अनुभवों से भिन्ना हैं। पात्रों में अनुभवों की भिन्नाता स्वाभाविक चीज है। अस्वाभाविक है इस भिन्नाता को छिपाना। जाति,धर्म,वैभव आदि को लेकर कर्ण की भिन्ना राय है। वह परंपरागत सामाजिकता का निषेध करता है। वह अस्मिता संघर्ष के जरिए एक ओर अपनी पहचान बदलता है दूसरी ओर अपनी आर्थिक अवस्था का अतिक्रमण करता है। कर्ण क्रमश:अवैध संतान ,सूतपुत्र,वीर,राजा, कौरव सेनापति बना। कर्ण स्वनिर्मित ,आत्मनिर्भर या सेल्फमेड है।

कर्ण मर्द है। वीरता पर गर्वित है। पुरूषार्थ उसकी संपदा है। पुरूषार्थ के बल पर भाग्य पर विजय हासिल करता है। पुरूष पात्र पुरूषार्थ जरिए भाग्य को पछाड़ते हैं। इसके विपरीत दिनकर ने कुंती के बहाने औरत की नियति का चित्रण किया है। स्त्री का अपने भवितव्य पर नियंत्रण नहीं होता फलत: वह अपनी कहानी सेंसर करती है। वीरता के कारण कर्ण भाषा ,संस्कृति और जाति की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। कर्ण के पक्षधर और विरोधी दोनों में उसकी वीरता निर्विवाद है। वह कौरवों को एकजुट रखने में सफल रहता है। वीरता के कारण कर्ण को महाभारत के अद्वितीय चरित्रों की कोटि में रखा जाता है। दुर्योधन का पांडवों के साथ युध्द का फैसला बहुत कुछ कण्र्ा के ऊपर ही निर्भर था। महाभारत को अर्थपूर्ण बनाने में कर्ण की निर्णायक भूमिका है। कर्ण की सृष्टि के बिना महाभारत लिखा ही नहीं जाता। महाभारत में वीरों के वैभव का जो विराट रूप सामने आता है उसकी धुरी है कर्ण। कर्ण महाभारत के कथानक को बांधने वाला महत्वपूर्ण ,निर्णायक और विवादास्पद पात्र है। महाभारत में दो पात्र हैं जो अस्मिता विमर्श के स्रोत हैं पहला ,द्रौपदी और दूसरा कर्ण। दोनों ही पितृसत्ता के लिए चुनौती हैं।

कर्ण पितृसत्ता को चुनौती देता है। पितृसत्ता के सांस्थानिक रूप जाति व्यवस्था की अमानवीयता को उद्धाटित करता है। दलित,राजा,मर्द,वीर आदि सब रूपों का अतिक्रमण करते हुए 'मित्रता' 'आत्मनिर्भरता' और 'प्रेम' के प्रतीक रूप में सामने आता है। किसी को कर्ण का जाति विमर्श अपील करता है,किसी को वीरता, उदारता,मित्रता और वचनबध्दता अपील करती है। कर्ण उन वर्गों और सामाजिक समूहों को प्रभावित करते हैं जो अपना रूपान्तरण करना चाहते हैं। जो प्रतिवादी भावना के साथ सामाजिक विकास करना चाहते हैं। कर्ण की सबसे ज्यादा अपील वंचितों और दलितों में है। सबसे ज्यादा अपील उनमें है जो वर्ग अपनी पहचान अथवा अस्मिता की तलाश में हैं। अस्मिता के प्रचलित मानकों का कर्ण अनुकरण नहीं करता। अस्मिता मानकों में निहित खोखलेपन को सामने लाता है।

जाति,लिंग,नस्ल,त्वचा,धर्म आदि पर आधारित अस्मिता की सीमित भूमिका होती है। अस्मिता का मूलाधार है मानवता। मनुष्य ही प्रधान अस्मिता है। बाकी इसके मुखौटे हैं। कर्ण का संघर्ष मुखौटों के खिलाफ है। वह मुखौटे उतार फेंकता है। अस्मिता के मुखौटों में कर्ण का दम घुटता है। अस्मिता के मुखौटों को नष्ट करने के साथ कर्ण का उदारमना मानवीय मन सामने आता है। कर्ण की खूबी है दूसरों के प्रति त्याग भावना। 'रश्मिरथी' में जिस युध्द का वर्णन है यह मूलत: अस्मिता युध्द है। यह अस्मिता संघर्ष में निहित आत्मघाती भावबोध की भी अभिव्यक्ति है। अस्मिता आमतौर पर स्वयं को नष्ट करती है। वह 'स्व' को नष्ट करती है।

'रश्मिरथी' कर्ण की आत्मकथा है। आत्मकथा में आत्म-स्वीकृति,आत्म-उद्धाटन और शिरकत का तत्व रहता है। आत्मकथा में वे चीजें बतायी जाती हैं जिन्हें लोग नहीं जानते। जो जानते हैं उसे आत्मकथा में नहीं चाहते। आत्मकथा के छह मूल तत्व हैं। इन तत्वों के आधार पर 'रश्मिरथी' का समग्र ताना-बाना टिका है।

आत्मकथा का पहला तत्व है व्यक्तिगत अस्मिता और निर्वैयक्तिकता। कर्ण की कहानी व्यक्तिगत है, प्रस्तुति निर्वैयक्तिक है। कर्ण की निर्वैयक्तिक छवि निर्मित करने में भाषा प्रमुख कारक है। भाषा के जरिए कर्ण के प्रति ज्ञान में इजाफा होता है। रश्मिरथी' में कविता और कहानी दोनों के मिश्रित प्रयोग मिलते हैं। कर्ण की कथा और कविता मिलकर अस्मिता का बोध निर्मित करती है। अस्मिता एक नहीं अनेकरूपा है। सर्जनात्मक संभावनाओं से भरी है। कर्ण की आत्मनिष्ठ छवि के सामाजिक आयाम पर जोर देने में लेखक को सफलता मिली है। दूसरी महत्वपूर्ण यह है कि अस्मिता का शरीर के साथ गहरा संबंध है। कर्ण के कवच-कुंडल और कर्ण के शरीर का अंत ,'रश्मिरथी' को उत्तर आधुनिक अस्मिता विमर्श में ले जाता है। टेरी इगिलटन के अनुसार 'उत्तर आधुनिक व्यक्ति की अस्मिता के साथ उसका शरीर अन्तर्ग्रथित है।'

आत्मकथा का दूसरा तत्व है उपस्थिति,वर्तमान और प्रस्तुति। रोलां बार्थ के शब्दों में आत्मकथा को उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से व्यक्त होना चाहिए। 'रश्मिरथी' में कर्ण की आत्मकथा विभिन्ना चरित्रों के माध्यम से सामने आती है। आत्मकथा लिखते समय चिर-परिचित क्षेत्र हमेशा परेशान करते हैं। चिर-परिचित वातावरण समस्या पैदा करता है। चिर-परिचित यथार्थ है भारत की जाति समस्या। जाति समस्या लेखक को परेशान और उत्तेजित दोनों ही करती है। जातिप्रथा को करीब से जानने के कारण लेखक को इसके बारे में सटीक वर्णन ,विवरण और ब्यौरे तैयार करने में मदद मिली है। लेखक को जातिप्रथा की अनेक 'दरारें' नजर आती हैं। आत्मकथा में 'दरारों' की केन्द्रीय भूमिका होती है। 'दरारें' पुराने व्यक्तित्व की जगह नए व्यक्तित्व को सामने लाने का काम करती हैं। कर्ण की जाति पीड़ा जितनी बार व्यक्त हुई है उतनी ही बार कर्ण का नया रूप सामने आया है। पुराना कर्ण बदला है। लेखक कहीं पर भी कण्र्ा के पुराने रूप को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता। हमेशा नए रूप को सामने लाता है। कर्ण पुराने रूप के साथ सामंजस्य बिठाने की बजाय 'दरारों' और 'अंतरालों' के बीच में से नए रूप में सामने आता है। रोलां बार्थ ने आत्मकथा के बारे में लिखा है आत्मकथा में आप स्वयं को नहीं देखते बल्कि इमेज को देखते हैं। अपनी आंखों को नहीं देखते। आत्मकथा लेखन हमेशा विचलनभरा होता है। विचलन के ऊबड़ खाबड़ पैरामीटर सर्किल बनाते हैं। इन रास्तों से गुजरने के बाद एक ही संदेश संप्रेषित होता है कि जिंदगी अर्थपूर्ण है। आत्मकथा का केन्द्र बिंदु कौन सा है ? यह खोजने की जरूरत है।

आत्मकथा में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। आस्था के साथ लिखी आत्मकथा इमेज बनाती है। आत्मकथा में चित्रण के लिए चित्रण नहीं होता बल्कि प्रस्तुति पर जोर रहता है। आत्मकथा चिर-परिचित यथार्थ की प्रस्तुति होती है। प्रस्तुति में अंतराल ज्यादा साफ नजर आते हैं। क्योंकि आत्मकथा में समग्रता के तत्व का पालन नहीं होता।

आत्मकथा में न्यूनतम अनुकरण, उद्धाटन ,विवरण और आख्यान होता है। आत्मकथा में नामों का जिक्र और नामों के साथ जुड़े अनुभवों का वर्णन होता है। फलत: आत्मकथा के दायरे में अनेक मील के पत्थर और पैरामीटर होते है। आत्मकथा के रूप में यदि 'रश्मिरथी' को देखा जाए तो पाएंगे कि वहां भाषा ही आत्मकथा है। भाषा का संसार ही है जिसके कारण यह कृति अपील करती है। भाषा के माध्यम से ही कर्ण की विभिन्ना पर्तों को लेखक ने खोला है।

आत्मकथा में भाषा बहुत बड़ा आधार है। आत्मकथा की भाषा में प्रस्तुति 'मैं' के अंत की घोषणा है। ''मैं'' संकेत मात्र होकर रह जाता है। भाषा सामूहिक प्रयासों से बनती है। आत्मकथा के 'मैं' का राजनीतिक - दार्शनिक चीजों में लोप हो जाता है। भाषाविज्ञान में लोप हो जाता है। आत्मकथा में '' मैं'' हमेशा घुला मिला होता है। आत्मकथा में जैसे 'तुम','वह','हम' होते हैं वैसे ही 'मैं' भी होता है। आत्मकथा में सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों एक हो जाते हैं। वक्ता और विषय एक हो जाते हैं।

आत्मकथा का तीसरा प्रमुख तत्व है सुसंगत अनुभूति। दिनकर ने कर्ण के चरित्र को सामने लाकर पात्र के जीवन के तथ्यों को सीधे बगैर किसी लाग-लपेट के पेश किया है। आत्मकथा में तथ्यों को बगैर चासनी के पेश किया है। बगैर किसी कृत्रिमता के पेश किया है। तथ्यों को अकृत्रिम भाव से पेश करना आत्मकथा का उत्तर आधुनिक फिनोमिना है। उत्तर आधुनिक आत्मकथा में अनिश्चितता,विचलन आदि को सहज ही देख सकते हैं। इसमें भाषा और विमर्श प्रभावशाली होते हैं।

साहित्य में सत्य नहीं 'फिक्शन' होता है। साहित्य सत्य नहीं गल्प है। सत्य का आख्यान कभी गल्प के बिना नहीं बनता। 'रश्मिरथी' गल्प है। आत्मकथा में जीवन सुंदर और साफसुथरा दिखता है वास्तव में वैसा नहीं होता। बल्कि बेहद जटिल और उलझनों से भरा होता है। आत्मकथा में जीवन का जो पैटर्न और संतुलन नजर आता है वह जीवन में नहीं होता। आत्मकथा हमेशा उन अनुभवों का प्रतिवाद करती है जो हमारे इर्द-गिर्द होते हैं। अनुभवों के जरिए जीवन के सवाल उठाए जाते हैं। उन चीजों को शक्ल प्रदान की जाती है जिनकी कोई पहचान नहीं है। जो शक्लविहीन हैं। संवेदनात्मक तौर पर जिन्हें हम महसूस नहीं करते उन चीजों को अभिव्यक्त करने की कोशिश की जाती है।

उपन्यास,कविता ,कहानी आदि सर्जनात्मक विधारूप में जब आत्मकथा लिखी जाती है तो उसमें कल्पनाशीलता की बड़ी भूमिका होती है। कहानी,आत्मकथा,काव्य,सैध्दान्तिकी,वादविवाद आदि सबको 'इच्छा' में शरण लेनी होती है। अनुभव,संवेदना और शिक्षा को रूपान्तरित करने के लिए कल्पना का सहारा लिया जाता है। कल्पना में तयशुदा सीमाओं का अतिक्रमण होता है। आत्मकथा में संस्मरण के दाखिल होते ही कहानी तेजी से बदलती है। कर्ण के साथ कुंती और कृष्ण की मुलाकात कहानी को बुनियादी तौर पर बदल देती है। राजसभा में जब कर्ण के पिता और जाति का नाम पूछा जाता है तो कहानी में बदलाव आता है। कहानी शैली भी बदल जाती है। संस्मरणों के जरिए कहानी में आए बदलाव इस बात का संकेत हैं लेखक सांस्कृतिक बाधाओं अथवा सांस्कृतिक टेबुओं का अतिक्रमण करना चाहता है।

कहानी की सीधे और प्रामाणिक प्रस्तुति का अर्थ है संबंधित व्यक्ति ने अपनी निजी अनुभूति को विकसित कर लिया है। निजी अनुभूति के आधार पर सांस्कृतिक संदेहों का अतिक्रमण करता है। दिनकर ने 'रश्मिरथी' में जातिप्रथा संबंधी निजी अनुभूतियों के आधार पर कर्ण के जीवन में व्याप्त 'अन्याय' को उद्धाटित किया है। इसके ही आधार पर विमर्श की संरचनाओं और कर्ण की अस्मिता का निर्माण किया है। कहने का तात्पर्य यह कि अनुभूति,विमर्श संरचनाएं और अस्मिता के अन्तस्संबंध के आधार पर ही हमारी समझ,व्याख्या,प्रतिक्रिया,विचार आदि बनते हैं। समाज प्रदत्त विमर्श शैली और फ्रेम द्वारा अस्मिता निर्मित होती है और यह उसकी सीमा भी है।

दूसरी ओर लेखक कुछ चीजों को विमर्श में शामिल नहीं करता। उन पर पाबंदी लगाता है। आत्मकथा में सुचिंतित और सुनियोजित भाव से विमर्शों को चुनौती दी जाती है। फलत: आत्मकथा जोखिमभरा लेखन है। आत्मकथा में लेखक जो जोखिम उठाता है उसमें वह आंतरिक सांस्कृतिक कोड का उद्धाटन करता है। ये सांस्कृतिक कोड जीवनानुभवों को देखने में मदद करते हैं। 'रश्मिरथी' की विषयवस्तु महाकाव्य की कहानी है। उसे काव्य 'पाठ' के रूप में रूपान्तरित करके नए किस्म के विधा विमर्श को प्रस्तुत किया है।

दिनकर ने 'रश्मिरथी' में कर्ण की कहानी को व्यापक जाति विमर्श के कैनवास पर रखा है। सामाजिक भेद के व्यापक फलक पर कर्ण के चरित्र का विकास करने के कारण ही हमें पता चलता है कि जाति को लोग कैसे देख रहे हैं और किस तरह देखना चाहिए। साथ ही यह भी सीखने की जरूरत है कि आत्मकथा में निजी अनुभूतियों को कैसे व्यक्त करें। दिनकर ने बताया है कि कर्ण कैसा था, कर्ण की मूल समस्या क्या है, कर्ण से जुड़ा मूल विमर्श या विवाद क्या है, उसे किस तरह देखें। कर्ण के कथानक के सबक क्या हैं और इस समूचे कथानक का हमारे सांस्कृतिक मानकों और सामाजिक कोड्स से क्या संबंध है और इनको कैसे बदलें ?

'रश्मिरथी' के प्रसंग में कहानी और अनुभव के अन्तस्संबंध के बारे में भी सवाल उठता है। कहानी में चीजें तय होती हैं। शक्ल,रूपरेखा और सीमा तय है। जबकि अनुभव अचानक व्यक्त होता है और दिख रही चीजों और तदनुरूप अनुभवों में घुलमिल जाता है। कहानी को हमेशा सरल ,विस्तृत विवरणों और भावनाओं के ज्वार से मुक्त होना चाहिए। कहानी में पैटर्न,प्लाट और अर्थ होता है। फलत: हम कहानी में प्रासंगिक अर्थ खोजते हैं। प्रासंगिक अर्थ के बिना कहानी लिखना संभव नहीं है। प्रत्येक कहानी में रूपान्तरण होता है। प्रत्येक कहानी परिवर्तन और विनिमय करती है। चयन और चुनाव करती है। आत्मकथा में अतीत का सृजन नहीं होता बल्कि आत्म या स्वानुभूतियों का सृजन होता है। अतीत के अनुभवों को नए तरीके से व्यक्त किया जाता है।

आत्मकथा का चौथा तत्व है संप्रेषण और सामूहिकता। लेखक का स्व किसी शून्य में निवास नहीं करता। आत्मकथा लिखते समय अन्य को तबाह करना, अन्य के नजरिए को तबाह करना लक्ष्य नहीं होता। जैसाकि इन दिनों अनेक लेखिकाओं की आत्मकथा में देखने को मिलता है। आत्मकथा का लक्ष्य अन्य को तबाह करके अपना स्थान बनाना नहीं है। विद्वतापूर्ण लेखन में अन्य के प्रति ज्यादा मानवीयता और सम्मान का भाव होता है। मैंने अनेक लेखकों की रचनाएं पढ़ी हैं उनसे असहमत भी रहा हूँ। किंतु उनसे एक बात जरूर सीखी है कि हमें दूसरों की बात सम्मान के साथ सुननी चाहिए। लेखन सिर्फ संप्रेषण नहीं है बल्कि सामूहिकता का एक रूप भी है। यही वह जगह है जहां आप अन्य लेखकों को अपने पास पाते हैं। किसी भी लेखक के लेखन को खारिज करने के भाव से नहीं पढ़ा जाना चाहिए बल्कि स्वीकारने और गहरी जिज्ञासा के साथ पढ़ा जाना चाहिए। जिससे संवाद किया जा सके। लेखन कभी भी स्वयं के लिए नहीं होता अन्य के लिए होता है। दूसरों के लिए होता है। इसी अर्थ में लेखन सामूहिकता बोध पैदा करता है। सामूहिकता को अभिव्यक्त करता है। लेखन कहने के लिए 'स्व' से आरंभ होता है किंतु 'स्व' के लिए नहीं होता। सबके लिए होता है।

आत्मकथा को 'आत्म' या 'निज' को हीन या महान बनाने या सहानुभूति जुटाने के औजार के तौर पर नहीं लिखा जाता। आत्मकथा आत्माभिव्यंजना की खोज है। यह उनके साथ संवाद है जो अन्य की बात सुनने के लिए सहमत हैं । प्रतिक्रिया व्यक्त करने को तैयार हैं। अपनी आत्मकथा खोज रहे हैं।

आत्म को व्यक्त करते समय व्यक्ति 'स्व' में कैद नहीं रहता। बल्कि अपने अलगाव और अज्ञान को दूर करने में आत्म की मदद लेता है। आत्मकथा का मकसद आत्म सत्य को बताना नहीं है। उसका मकसद है आत्मसत्य का खंडन करना। आत्म की बंद गलियों के बाहर आना और उन तमाम चीजों का खंडन करना जिनसे आत्म भिन्ना नजर आता है।

प्रत्येक कहानी में जाति गुण होते हैं। इनके बिना कहानी लिखी नहीं जाती। अथवा शुध्द कहानी जैसी कोई चीज नहीं होती। कहानी हमेशा अर्थ से संचालित होती है। अर्थ के बिना कहानी नहीं होती। अर्थहीन कहानी महज घटनाक्रम है। कहानी में चार चीजें प्रमुख हैं: पहला है ,कहानीपन। दूसरा, कैसे व्यक्त करते हैं। तीसरा ,क्या शिक्षा देते हैं। चौथा कैसे आनंद प्राप्त करते हैं। ये चीजें अलग भी हो सकती हैं और किसी कहानी में एक साथ भी हो सकती हैं। कहानी में ऐसे बिंदु भी आते हैं जहां तथ्य और अनुभूति का मिलन होता है। आत्मकथा निश्चित रूप से व्यक्ति का आख्यान है,यह पेशेवर आत्मस्वीकृति है। यह मनुष्य की आत्मस्वीकृति है जो कि हमेशा संप्रेषण और सामूहिकता की प्रक्रियाओं में रहता है।

आत्मकथा का पांचवां तत्व है छवि,काल्पनिक छवि और कल्पना। वाल्टर वूगीमैन के अनुसार '' वैध ज्ञान की पध्दति कल्पना का अंत है।'' कहानी में शब्द,भाषा और भाषण चेतना निर्मित करते हैं। यथार्थ परिभाषित करते हैं। कल्पना के जरिए रूढिबध्दता से अपने को मुक्त करते हैं। अन्य किस्म का व्यक्तित्व निर्मित करते हैं। कल्पना के जरिए ही सामाजिक-साहित्यिक रूढियों को खारिज करने में मदद मिलती है। मनुष्य का रूपान्तरण होता है। यह रूपान्तरण सामंजस्य बिठाकर नहीं होता। कर्ण क्या है और कर्ण की क्या छवि बन रही है इसकी प्रस्तुति के दौरान दिनकर ने कर्ण को कहीं से भी रूढिबध्द रूप में चित्रित नहीं किया है। कर्ण को चित्रित करते हुए पूर्ण स्वतंत्रता और कल्पना का इस्तेमाल किया है। स्वतंत्रता और कल्पना के प्रयोग के कारण ही आत्मकथा ऊर्जा से भरी होती है। पढ़ने वालों के मन में ऊर्जा का संचार करती है। साहस और आस्था के साथ जोखिम उठाने की प्रेरणा देती है।

आत्मकथा का छठा तत्व है विमर्श,उद्धाटन और समापन। आत्मकथा में आत्म को उद्धाटित करने के लिए साहस की जरूरत होती है। अनेक लेखकों में साहस का अभाव होता है। आत्मविश्वास और साहस के बिना आत्मकथा लिखना संभव नहीं है। जो लेखन में जोखिम उठाते हैं और अपनी बात कहते हैं। वे अपना बोझ हलका करते हैं साथ ही समाज को भी खुली हवा में सांस लेने का मौका देते हैं।

आत्म के बहाने लेखक लंबे समय से बंद कमरों को खोलता है। आत्मकथा में उद्धाटित करते समय लेखक डरता है, डरता है कि कहीं पकड़ा न जाऊँ ? अन्य के सामने नंगे खड़े होने का डर रहता है। यह शर्म और डर कहां से आता है ? असल में जो बौनेपन के शिकार होते हैं वे शर्माते हैं, डरते हैं। औसत बुध्दि के लेखक शर्माते और डरते हैं। इनमें से ज्यादातर रूढियों में जीते और तयशुदा मार्ग पर चलते हैं। 'क्लीचे' में जीते और बातें करते हैं।

मजेदार बात यह है आत्मकथा में आत्म को बताना तो बहुत दूर की बात है लोग कहां जा रहे हैं यह तक साफतौर पर नहीं बताते। वे सामान्य सी चीज को बताने में डरते हैं, शरमाते हैं। उन्हें डर लगता है यदि अपनी बात बता देंगे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। अमूमन हमें न बताने की आदत है। छिपाने की आदत है। छिपाना हमारी प्रकृत्ति है। जो छिपाया जा रहा है वह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही वह भी महत्वपूर्ण है जो बताया जा रहा है। आत्मकथा को लिखने का मकसद होता है बंद अनुभूतियों को खोलना। छिपे हुए को सामने लाना। आत्मकथा के वातावरण को विभिन्ना परिप्रेक्ष्य में देखना । निष्कर्ष निकालने से बचना । निष्कर्ष आत्मकथा को बंदगली में ले जाते हैं।

आत्मकथा का मार्ग खुला होता है उसे निष्कर्ष के बहाने बंद करना आत्मकथा विधा के मानकों की अवहेलना है। लेखन को इस बात से आंकना चाहिए कि आप कितना भूलते हैं और कितना क्षमा करते हैं। लेखन में अनुभवों की संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता। कहानी में कुछ चुनते हैं और कुछ छिपाते हैं। क्या बताएं और क्या छिपाएं ? इसका फैसला कैसे करें ? किसी भी चीज को बताने के लिए कहानी का होना बेहद जरूरी है कहानी के बिना कुछ भी कहना संभव नहीं है। यही वजह है दिनकर भी जब कर्ण पर लिखने गए तो उन्हें कहानी में कहने की कोशिश की है। दिनकर ने लिखा है ''कथाकाव्य का आनंन्द खेतों में देशी पध्दति से जई उपजाने के आनन्द के समान है ; यानी इस पध्दति से जई के दाने तो मिलते ही हैं, कुछ घास और भूसा भी हाथ आता है ,कुछ लहलहाती हुई हरियाली देखने का भी सुख प्राप्त होता है और हल चलाने में जो मेहनत करनी पड़ती है ,उससे कुछ तन्दुरूस्ती भी बनती है।''

16.9.09

लेखक अब डर गए हैं: चन्‍द्रबली सिंह

हाल ही में कोटा से प्रकाशि‍त पत्रि‍का 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' का नया अंक देखने को मि‍ला। इस अंक में हिंदी के सबसे बडे लेखक और आलोचक चन्‍द्रबली सिंह का एक शानदार साक्षात्‍कार छपा है। चन्‍द्रबली सिंह का व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृतित्‍व हिंदी लेखकों से छि‍पा नहीं है। वे हिंदी के शि‍खरपुरूष स्‍व.रामवि‍लास शर्मा से लेकर जीवि‍त शि‍खर पुरूष नामवर सिंह के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी की वैज्ञानि‍क आलोचना के नि‍र्माण में उनका बहुमूल्‍य योगदान रहा है। उनकी‍ मेधा के सामने रामवि‍लास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सभी नतमस्‍तक होते रहे हैं। चन्‍द्रबली जी हिंदी के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी के लेखक जब भी गंभीर संकट में फंसे हैं उनके पास गए हैं और उनके द्वारा दि‍शा नि‍र्देश पाते रहे हैं। चन्‍द्रबली सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ तक सभी में शि‍खर नेतृत्‍व का हि‍स्‍सा रहे हैं। पि‍छले पैंसठ साल से भी ज्‍यादा समय से प्रगति‍शील आलोचना को दि‍शा देते रहे हैं। इन दि‍नों चन्‍द्रबली सिंह अस्‍वस्‍थ हैं और बनारस में अपने घर पर ही बि‍स्‍तर पर पडे आराम कर रहे हैं। 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' के संपादक 'शि‍वराम' ने उनका साक्षात्‍कार प्रकाशि‍त करके हिंदी की बडी सेवा की है। स्‍वयं शि‍वराम भी राजस्‍थान में सबसे ज्‍यादा सक्रि‍य परि‍वर्तनकामी लोकतांत्रि‍क नजरि‍ए के लेखक हैं।

अपने साक्षात्‍कार में चन्‍द्रबली सिंह ने जो कहा है वह हिंदी के लेखक संगठनों की उदासीनता और बेगानेपन के खि‍लाफ तल्‍ख टि‍प्‍पणी है। चन्‍द्रबली जी ने लेखक संगठनों के बारे में कहा है '' लेखक संगठन जो काम कर रहे हैं,बहुत संतोषजनक तो नहीं है,उनका अस्‍ति‍त्‍व औपचारि‍क हो गया है। '' हिंदी लेखक संगठनों के बारे में यह टि‍प्‍पणी ऐसे समय में आयी है जब हिंदी के लेखक सबसे ज्‍यादा असहाय महसूस कर रहे हैं। लेखक संगठनों की नि‍ष्‍क्रि‍यता, वि‍चारधारात्‍मक उदासीनता और स्‍थानीय गुटबंदि‍यां चरमोत्‍कर्ष पर हैं। अब लेखक संगठन प्रतीकात्‍मक रूप में काम कर रहे हैं। लेखक संगठन प्रतीक क्‍यों बनकर रह गए हैं ? औपचारि‍क संगठन बनकर क्‍यों रह गए हैं ,उनके अंदर कोई वैचारि‍क और सर्जनात्‍मक सरगर्मी नजर क्‍यों नहीं आती ?

हिन्‍दी में तीन बडे लेखक संगठन हैं,प्रगति‍शील लेखक संगठन,जनवादी लेखक संगठन,जनवादी सांस्‍कृति‍क मोर्चा। इनके अलावा और अनेक स्‍थानीय स्‍तर के लेखक संगठन हैं। लेकि‍न तीन बडे संगठनों में कि‍सी भी कि‍स्‍म का समन्‍वय नहीं है। इन संगठनों की कार्यप्रणली में इनके साथ जुडे राजनीति‍क दलों की राजनीति‍क संकीर्णताएं घुस आयी हैं। इस प्रसंग में चन्‍द्रबली सिंह ने कहा '' कुछ को ऑर्डि‍नेशन राजनीति‍क तौर पर हुआ है,पर उनकी राजनीति‍ से जुड़े जो सांस्‍कृति‍क संगठन हैं उनमें कोई समन्‍वय नहीं हुआ है। जहॉं तक कि‍ साहि‍त्‍यि‍क मतभेदों का सवाल है वह तो हर बौद्धि‍क संगठन में होना चाहि‍ए।... लेखकों का संगठन राजनैति‍क संगठन की तर्ज पर नहीं चल सकता।'' आगे बड़ी ही प्रासंगि‍क दि‍क्‍कत की ओर ध्‍यान खींचते हुए चन्‍द्रबली जी ने कहा '' राजनैति‍क पार्टी में तो डेमोक्रेटि‍क सेन्‍ट्रलि‍ज्‍म के नाम पर जो तय हो गया,वह हो गया। पर लेखक संगठनों में तो यह नहीं हो सकता कि‍ फतवा दे दें कि‍ जो ऊपर तय हो गया तो हो गया। दि‍क्‍कत तो है। सम्‍प्रति‍ कोई ऐसी संस्‍था नहीं है कि‍ समन्‍वय की ओर बढ़ सके। हम तो यह महसूस करते हैं कि‍ इन संगठनों में जो नेतृत्‍व है वह नेतृत्‍व भी जो वि‍चार-वि‍मर्श करना चाहि‍ए,वह नहीं करता है।पार्टी को इतनी फुर्सत नहीं है कि‍ इन समस्‍याओं की ओर ध्‍यान दें।

चन्‍द्रबली सिंह ने एक रहस्‍योद्घाटन कि‍या है कि‍ लेखक संगठनों की समन्‍वय समि‍ति‍ बने यह प्रस्‍ताव नामवर सिंह ने दि‍या था ,चन्‍द्रबली जी भी उससे संभवत: सहमत थे। लेकि‍न पता नहीं क्‍यों यह प्रस्‍ताव अमल में अभी तक नहीं आ पाया है। चन्‍द्रबलीजी ने कहा है, '' मैंने समन्‍वय समि‍ति‍ का,नामवर ने जो प्रस्‍ताव रखा था कि‍ यदि‍ एक न हों तो समन्‍वय समि‍ति‍ हो जाए।पार्टियॉं जो हैं उनमें तो समन्‍वय समि‍ति‍ बनी ही है‍। पर लेखक संगठन व्‍यवहार में यह स्‍वीकार नहीं करते हैं कि‍ वे पार्टियों से जुडे हैं। समन्‍वय की प्रक्रि‍या शुरू करने के लि‍ए जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा तब तक यह सम्‍भव नहीं है। बि‍ना दबाव के यह हो नहीं पाएगा।''

पुराने जमाने और आज के जमाने के लेखक संगठनों की बहसों की तुलना करते हुए चन्‍द्रबली जी ने कहा '' ऐसा लगता नहीं है कि‍ जैसी पहले मोर्चाबंदी हुई थी एक जमाने में,वैसी अब होती हो। वैसी अब दि‍खाई नहीं देती।वैसा वैचारि‍क संघर्ष दि‍खाई नहीं देता। गड्ड-मड्ड की स्‍थि‍ति‍ है। खास तौर से जो पत्र- पत्रि‍काएँ नि‍कलती हैं उनमें उस तरह की स्‍पष्‍टता और मोर्चाबंदी नजर नहीं आती। कभी -कभी ऐसा लगता है कि‍ लेखक मंच पर भी व्‍यक्‍ति‍यों के साथ आता है। उसके सारे गुण और दोष इन संगठनों में वह ग्रहण करता है। लीडरशि‍प के नाम पर लेखकों में एक सैक्‍टेरि‍यन दृष्‍टि‍कोण पनपता है।पतनशील प्रवृत्‍ति‍यों से कोई संघर्ष नहीं है। ये प्रवृत्‍ति‍यॉं मौजूद रहती हैं।'' चन्‍द्रबली सिंह ने एक बडी ही मार्के की बात कही है। '' मैं तो यहाँ जलेस से कहता हूँ‍ ,जि‍समें ज्‍यादातर कवि‍ ही हैं। वे कवि‍ता सुना जाते हैं। उनसे कहता हूँ कि‍ अपनी कवि‍ताऍं,जनता के बीच में जाओ,उन्‍हें सुनाओ।फि‍र देखो क्‍या प्रति‍क्रि‍या होती है। जनता समझती है या नहीं।पाब्‍लो नेरूदा जैसा कवि‍ जनता के बीच जाकर कवि‍ता सुनाता था। जनता को उसकी कवि‍ताऍं याद हैं। जनता को जि‍तना मूर्ख हम समझते हैं वह उतनी मूर्ख नहीं है। यदि‍ वह तुलसी और कबीर को समझ सकती है तो तुम्‍हें भी तो समझ सकती है।बशर्ते उसकी भाषा में भावों को व्‍यक्‍त कि‍या जाए।'' समीक्षा के वर्तमान मठाधीश प्रगति‍शील लेखकों की उपेक्षा करते हैं। इस पर चन्‍द्रबली जी ने कहा '' कहते तो हैं अपने को प्रगति‍शील और जनवादी पर कहीं न कहीं कलावादि‍यों का प्रभाव उन पर है। आज के शीर्षस्‍थ जो आलोचक हैं,नामवरसिंह ,उनके जो प्रति‍मान हैं,वे सारे प्रति‍मान लेते हैं,वि‍जयनारायण देव साही से।'' चन्‍द्रबली जी ने बडी ही मार्के की एक अन्‍य बात कही है '' लेखक अब डर गए हैं।'' लेखकों में यह डर कहां से आया ? प्रगति‍शील लेखकों का वैचारि‍क जुझारूपन कहॉं गायब हो गया,आज वे अपने सपनों और वि‍चारों के लि‍ए तल्‍खी के साथ लि‍खते क्‍यों नहीं हैं ? लेखक अपने वि‍चारों के प्रति‍ जब तक जुझारू नहीं होगा तब तक स्‍थि‍ति‍ बदलने वाली नहीं है। लेखकों को अपना डर त्‍यागना होगा,अपने लेखन और व्‍यक्‍ति‍त्‍व को नि‍हि‍तस्‍वार्थों के दायरे के बाहर लाकर वैचारि‍क संघर्ष करना होगा। बुद्धि‍जीवि‍यों को दलीय वि‍चारधारा के फ्रेम के बाहर नि‍कलकर मानवाधि‍कार के परि‍प्रेक्ष्‍य में अपने वि‍चारधारात्‍मक सवालों को नए सि‍रे से खोलना होगा। हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में एक तरु डर है तो दूसरी औ व्‍यवहारवाद भी गहरी जडें जमाए बैठा है। हम अपने लेखन से कि‍सी को नाराज नहीं करना चाहते। लेखक के नाते हमें यह याद रखना होगा, कि‍ लेखक का काम दि‍ल बहलाना नपहीं है। लेखन की दि‍ल बहलाने वाली भूमि‍का में अगर हमारा लेखन चला जाता है तो जाने-अनजाने दरबारी सभ्‍यता और संस्‍कृति‍ का गुलाम बनकर रह जाएगा। दि‍ल बहलाने वाले साहि‍त्‍य में जीवन की गंध,दुख,दर्द और प्रति‍वाद के स्‍वर व्‍यक्‍त नहीं होते। दि‍ल बहलाने का काम लेखक का नहीं है। दि‍ल बहलाने के लि‍ए खि‍लौने बाजार में मि‍लते हैं। हम बाजार जाएं अपने लि‍ए दि‍ल बहलाने का सामान खरीद लाएं और घर बैठे आनंद लें। लेखक का काम आम लोगों को बेचैन करना और स्‍वयं भी बेचैन रहना,अपना डर नि‍कालना साथ समाज का भी डर नि‍कालना। लेखक कि‍सी एक का नहीं होता वह सबका होता है कठोरता,नि‍र्भीकता और ममता से भरा होता है।

((जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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15.9.09

हरीश भादानी की कवि‍ता का लोकतान्‍त्रि‍क संसार

कविता की वर्चुअल समीक्षा के लिहाज से हरीश भादानी आदर्श कवि हैं। वर्चुअलिटी के जितने भी लक्षण हैं वे उनकी कविता में अनायास चले आए हैं। कवि कब अनायास वर्चुअल पैराडाइम में चला गया इसके बारे में कवि ने संभवत: कभी सोचा ही नहीं। कुछ लोग सुचिंतितभाव से वर्चुअल हो रहे हैं और कुछ हैं जिन्हें मालूम नहीं है कि उनकी सर्जनात्मकता को वर्चुअल रियलिटी ने घेर लिया है। वर्चुअल उपकरणों के जरिए कविता की कभी आलोचना भी नहीं लिखी गयी। ऐसे में वर्चुअल रियलिटी के परिप्रेक्ष्य में कविता पढ़ना, वह भी प्रिंट कविता पढ़ना बेतुकी बात लग सकती है। किंतु मौजूदा पाठ वस्तुत: वर्चुअल समीक्षा प्रयोग है।

वर्चुअल रियलिटी हमारे घर में घुस आयी है। इसने हमारे समूचे जीवन-जगत को घेर लिया है। इसके बावजूद हिन्दी के समीक्षक वर्चुअल रियलिटी के परिप्रेक्ष्य और वर्चुअल तकनीक के प्रभाव को साहित्य के साथ जोड़कर नहीं देख रहे हैं। वर्चुअल रियलिटी को आप जानें अथवा न जानें यह आपको प्रभावित करेगी। हरीशजी की कविता में वर्चुअल रियलिटी ने गंभीर प्रभाव छोड़े हैं। इनकी गंभीरता के साथ पड़ताल की जानी चाहिए।

हरीश भादानी को हिन्दी साहित्य जगत में व्यापक प्रसिध्दि प्राप्त है। कवि,कार्यकर्त्ता और मिलनसार सामाजिक के रूप में उन्हें सभी जानते हैं। हरीशजी का रचना संसार प्रकृति से लेकर राजनीति तक, निजी से लेकर सार्वजनिक तक फैला हुआ है। इसके बावजूद हिन्दी आलोचना ने हरीशभादानी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उन कवियों पर कम ध्यान दिया गया है जो दिल्ली के अकादमिक सर्किल से जुड़े नहीं हैं। हरीशजी की उपेक्षा का प्रधान कारण है हिन्दी की आलोचना का सीमित दायरे में विचरण। जनवादी गीतकारों पर कभी विस्तार के साथ हिन्दी आलोचना ने विचार नहीं किया। उन कवियों की आलोचना ने उपेक्षा की है जिनका हिन्दीभाषी क्षेत्र की किसी न किसी बोली या भाषा में भी लेखन है। इस मामले में अपवाद हैं नागार्जुन।

हरीशजी की कविता में इमेजों का जखीरा है। कवि का प्रधान लक्ष्य है इमेजों के जरिए अभिव्यक्त करना। किसी न किसी बहाने इमेजों को सामने लाना। मसलन् उनके संकलनों के नाम ही देखें तो वहां पर भी इमेजों को ही केन्द्र में रखा गया है। मेरे सामने एक संकलन है ''रोटी नाम सत है'', इस संकलन में कविताओं के शीर्षक इमेजों को अभिव्यक्त करते हैं। जैसे- हल्ला बोल,बंद, रोटी नाम सत है,राजा दरजी, राजा बोलता है,हरावल, दिल्ली में, दुकान कफन की। इसी तरह अन्य काव्य संकलनों ( मैं यहां 'सड़कबासी राम' और 'रोटी नाम सत है' नामक संकलनों को केद्र में रखकर ही अपनी समीक्षा रख रहा हूँ) में भी लेखक ने इमेजों को उकेरने में अपनी सारी सर्जनात्मक ऊर्जा खर्च की है।

लेखक ने इमेजों के जरिए ही अभिव्यक्ति का रास्ता क्यों चुना ? इमेजों में व्यक्त करने का प्रधान कारण है लेखक का सामयिक संदर्भ। लेखक का सामयिक संदर्भ इलैक्ट्रिोनिक मीडिया से निर्मित हो रहा है। इलैक्ट्रोनिक मीडियाजनित वातावरण इमेजों का वातावरण है। हम इमेजों में बातें करते हैं, इमेजों को देखते हैं। इमेजों में ही जीते भी हैं। कवि के नाते हरीशजी की चेतना पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया का गहरा असर है। इसके कारण उन्होंने अभिव्यक्ति के लिए इमेजों का ज्यादा इस्तेमाल किया है।

हरीशजी की कविता में दो महत्वपूर्ण चीजें हैं ये हैं 'इमेज' और 'काल' इनमें संतुलन का काम किया है लय,भाषा और गीत ने। इसके अलावा जिस चीज का लेखक ने व्यापक इस्तेमाल किया है वह है 'बॉडी' अथवा शरीर। उनकी कविता में शरीर किसी न किसी रूप में दाखिल होता है। लेखक चाहे मिथक पर बातें करे या आम आदमी पर, निजी भावों को व्यक्त करे अथवा राजनीतिक भावों को व्यक्त करे सबमें 'शरीर' का चित्रण जरूर मिलता है। विचार करने की चीज है कि लेखक में 'बॉडी' के प्रति आग्रह क्यों है ?

हरीशजी की कविता सीधे इमेज निर्माण से शुरू होती है। कविता पढ़ते हुए सीधे इमेज से मुठभेड़ होती है। इमेज के साथ शरीर से भी गुजरना पढ़ता है। कविता में व्यक्त शरीर सामान्य शरीर नहीं है। बल्कि कोडिफाइड शरीर है। इसका अपना 'कोड' है यदि आप उस 'कोड' को खोलना जानते हैं तो इसका अर्थ खुलेगा वरना सतह पर एब्सर्ड लगेगा। इमेज,शरीर के चित्रण तक कविता थमती नहीं है बल्कि कविता अपने सुनिश्चित अर्थ के दायरे के परे जाकर एकाधिक अर्थों को व्यंजित करती है।

मसलन् ''सड़कबासी राम' का अर्थ कविता में निहित 'कोड' को खोलने के बाद ही निकलता है। आप अपने सामयिक जगत के परे जाकर कई अर्थ पाते हैं। हम लोगों की आदत है कविता में सुनिश्चित अर्थ खोजने की। हरीशजी की कविता सुनिश्चित अर्थ के भावबोध को नष्ट करती है। कविता को खोलते ही नया संदर्भ और नया अर्थ दिखाई देता है। एक कविता में एकाधिक अर्थ रहते हैं। कविता साधारण बात,साधारण खबर अथवा साधारण वस्तु से शुरू होती है और फिर बड़ी अवधारणा की ओर चली जाती है। साधारण से शुरू होने वाली कविता का परिभाषा में रूपान्तरण उनकी कविता का बुनियादी गुण है। इमेज बनाने के क्रम में चिरपरिचित शरीर, ब्यौरे, छोटे-छोटे विवरण आदि के जरिए विषयवस्तु को उठाना और फिर उसे भाषायी कोडिंग के जरिए परिभाषा की ऊँचाईयों तक ले जाना यही है कविता प्रक्रिया।

हरीशजी की कविता अर्थ की सबसे निचली सतह से शुरू होती है और तुरंत ही कविता अन्य अर्थ को संप्रेषित करने के लिए अथवा 'अन्य' के साथ संवाद बनाने के लिए उच्च धरातल पर चली जाती है। 'अन्य' से तुरंत संपर्क और विनिमय करती है। कविता में जो इमेज दिखाई देती हैं वे किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं बल्कि सौंदर्यबोधीय विभ्रम (इल्युजन) पैदा करती हैं। भाषा इन विभ्रमों को निर्मित करने का उपकरण है। कवि शुरू करता है इमेज निर्माण से ,भाषा से उसे सघन बनाता है और अंत में इमेज गायब हो जाती है। कविता अंत में अपनी इमेज से मुक्त हो जाती है। फलत: कविता में किसी का भी रूपायन टिक नहीं पाता। कविता में प्रतिनिधि विशेष को अभिव्यक्ति नहीं मिलती। भाषायी शिल्प के जरिए जिस इमेज को गढ़ते हैं अंत में वह गायब हो जाती है।यथार्थ जगत से परे चले जाती है। यथार्थ जगत के संदर्भ से शुरू हुई कविता यथार्थ जगत से भिन्न जगत में चली जाती है।

हरीशजी की कविता में खाली स्पेस नहीं होता। शून्य नहीं होता, ऐसी स्थिति नहीं होती कि आप अपनी इच्छा से चाहें तो कुछ भी भर लें। इमेज को सघन बनाने के लिए भाषा के शिल्प के जरिए हरीशजी बारबार खाली स्पेस को भरते हैं, चुप्पी के क्षेत्रों को खोलते हैं। फलत: कविता अनेकार्थी हो जाती है। जिस इल्युजन को वे कविता में पैदा करते हैं फिर उसी को नष्ट करते हैं। इस अर्थ में कविता को निष्पन्न बनाते है। पूरा बनाते हैं। इमेजों के जगत में 'काल' के साथ प्रवेश करते हैं। इमेज के बदलते ही 'काल' में परिवर्तन नजर आता है। कविता में व्यक्त इमेजों का 'अन्य' की 'काफी दूर' की भूमिकाओं से संबंध है। वे अपने कार्य व्यापार को 'अन्य' के 'दूर वाले' संसार में ले जाकर समाप्त करते हैं। 'अन्य' के 'दूर वाले' संसार तक जाने के लिए मिथकीय मध्यस्थों अथवा भाषायी सेतुओं का इस्तेमाल करते हैं।

हरीशजी की कविता इस अर्थ में वर्चुअल परिप्रेक्ष्य से अलग है कि उसमें 'मनुष्य का बहिष्कार' नहीं है। वर्चुअल रियलिटी 'मनुष्य के बहिष्कार' पर टिकी है। जबकि हरीशजी की कविता में मनुष्य के अदृश्य संसार का लेखाजोखा है। अदृश्यों को दृश्य बनाने की कविता में कोशिश है। अदृश्य को दृश्य बनाने के चक्कर में लेखक वर्तमान से लेकर अतीत तक की यात्रा करता है। किसी चीज को भविष्य में ले जाना है तो अतीत में जाए बगैर भविष्य में नहीं जा सकते। मनुष्य को भविष्य में ले जाने के लिए मनुष्य के अतीत में जाना जरूरी है। यही वजह है कि प्रत्येक कविता में लेखक अतीत में लौटता है, मिथकीय चरित्रों में लौटता है, पुरानी भाषा में लौटता है, पुराने भावबोध में लौटता है और फिर वर्तमान में चला आता है। वर्तमान के सवालों पर चित्रण करते हुए अतीत में लौटना और फिर वर्तमान और भविष्य की ओर चले जाना ही वह काव्य प्रक्रिया है जो हरीशजी को मुक्तिबोध ,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल से भिन्न बनाती है।

वर्चुअल रियलिटी अन्तर्विरोधों से दूर ले जाती है। गैर-अन्तर्विरोधी यथार्थ को पेश करना उसका प्रधान लक्ष्य है। आज वर्चुअल यथार्थ का लक्ष्य है आनंद देना। वास्तव जिंदगी से पलायन में मदद करना। यथार्थ के रूपायन में जिम्मेदारी के भावबोध की कोई जगह नहीं है। कविता में अन्तर्विरोधों से बचना संभव नहीं है। कविता बगैर अन्तर्विरोध के लिखी नहीं जा सकती।

हरीशजी की कविता में भी अन्तर्विरोध हैं ,वे अन्तर्विरोधों को सघन बनाते हुए खोलते हैं ,अन्त में अन्तर्विरोध गायब हो जाते हैं। अन्तर्विरोध की जगह 'अन्य' चीज आ जाती है। कविता में अर्थ का विभ्रम पैदा होता है। अर्थ का विभ्रम कविता में अर्थ को अंतहीन बना देता है। अर्थ का अंतहीन सिलसिला तर्कों के अम्बार ले जाता है।

इन कविताओं में संस्कृतियों के अर्थ क्रमश: धराशायी होते नजर आते हैं। यथार्थ की संस्कृति और संस्कृति की सूचनाएं ध्वस्त नजर आती हैं। इस प्रक्रिया का गहरा संबंध कविता की संरचना में निहित है। कविता की संरचना कुछ इस तरह की है कि उसमें इन सबका अतिवाद नजर आता है। कवि अपनी कविता के जरिए मिथक,इमेज,भाषायी कोड, अन्य के साथ संवाद अथवा विनिमय आदि के जरिए सभी किस्म के नियमों को तोड़ता है। कविता में कृत्रिम वातावरण बनाता है। जो सतह पर स्वाभाविक लगता है। यह स्वाभाविक नहीं है ये लेखक के मानसिक 'कोड' हैं। लेखक चीजों के बारे में इन्हीं कोड के जरिए सोचता है। ये ही कोड उसकी कल्पनाशीलता को व्यक्त करते हैं। ये कोड काफी जटिल और उलझनभरे हैं। इनके जरिए लेखक अनेक चीजों के बारे में कहना चाहता है।

हरीशजी के लेखन पर विचार करते हुए यह सवाल भी उठता है कि आखिरकार लेखक किसके लिए लिख रहा है ? कुछ लोग यह सोचते हैं कि हरीशजी राजस्थानी लेखक है। कुछ यह भी मानते हैं कि वह हिन्दी के लेखक हैं। इस क्रम में बुनियादी सवाल यही उठता है कि लेखक किसके लिए लिखता है ? इस सवाल के उत्तार के पीछे आलोचकों की अपनी-अपनी राजनीति काम करती है। व्याख्या की राजनीति काम करती है। यह सच है कि जिस युग में हम रह रहे हैं उसमें अन्तर्विरोधी अनुभूतियों में जी रहे हैं। अन्तर्विरोधी परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। हरीशजी जिस दौर में लिख रहे हैं उसे परवर्ती पूंजीवाद के युग के नाम से जानते हैं। परवर्ती पूंजीवाद के सांस्कृतिक संदर्भ में ही उनके लेखन को देखा जाना चाहिए। उनकी समस्त गतिविधियों को परवर्ती पूंजीवाद के सांस्कृतिक संदर्भ में ही खोलकर पढ़ा जाना चाहिए।

हरीशजी की कविता 'फैंटेसी' को व्यक्त करती है। सामान्यत: 'फैंटेसी' की प्रतिगामी भूमिका होती है वह यथार्थ का अतिक्रमण करती है। इसमें मस्तिष्क की उड़ानों को देखा जा सकता है। फ्रायड की मानें तो फैंटेसी ही जो हमें राष्ट्र और जातीयता के बोध में ले जाती है। लेखक के लिए सामाजिक तौर पर जो जगत प्रासंगिक और सहज लगता है उसमें ही वह कल्पना की उड़ान भरता है। फैंटेसी इस युग का सबसे कीमती लक्षण है। फैंटेसी के आधार पर ही अस्मिता, सभ्यता,धर्म,संस्कृति,जगत आदि के बारे में लेखक अपना नजरिया व्यक्त करता है। फैंटेसी के आधार पर ही अपनी राजस्थानी-हिन्दी अस्मिता को व्यक्त करता है। अस्मिता के सवालों पर अपनी राय व्यक्त करता है। 'सड़कबासी राम'' ऐसी कविता है। इस क्रम में वे जहां एक ओर 'अस्मिता की राजनीति' करते हैं वहीं दूसरी ओर यथार्थ के साथ भी जुड़ने की कोशिश करते हैं। यथार्थ के साथ अपना निजी,नजदीकी, नरम रिश्ता भी बनाते हैं। ये चीजें अनायास उनकी अस्मिता का हिस्सा भी बन जाती हैं। साथ ही प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच में अपनी पक्षधरता को भी व्यक्त करते हैं।

हरीशजी ने 'सड़कबासी राम' कविता में लिखा है -

'' न तेरा था कभी

न तेरा है कहीं

रास्तों -दर -रास्तों पर

पांव के छापे लगाते ओ अहेरी

खोलकर

मन के किवाड़े ,सुन!

सुन कि सपने की

किसी संभावना तक में नहीं

तेरा अयोध्या धाम

सड़कबासी राम! ''

इसके बाद कविता सीधे फैंटेसी की दुनिया में चली जाती है। फैंटेसी के जरिए सभ्यता,संस्कृति,यथार्थ और राजनीतिक अवस्था का चित्रण पेश करते हैं। इस कविता के जरिए लेखक राष्ट्रवाद को भी चुनौती देता है। वह अनेक संदर्भों में यात्रा करता हुआ फैंटेसीमय अभिव्यक्ति का रास्ता चुनता है। परवर्ती पूंजीवाद की सांस्कृतिक अवस्था और नागरिकों की मनोदशा का बड़ा ही सुंदर वर्णन ''जड़ भरत हम''(सड़कबासी राम संकलन में) में देख सकते हैं। कायदे से 'सड़कबासी राम', 'जड़ भरत हम' और 'बित्ताा-भर भविष्य' इन तीन कविताओं को एक साथ पढ़ना चाहिए। ये तीनों कविताएं हरीशजी की कविता में फैंटेसी के स्थायी प्रयोगों के लिहाज से बेहतरीन बन पड़ी हैं। इनमें काव्यात्मकता,मनोदशा,ऐतिहासिकता और जनता के ऊपर उसके प्रभाव के बारे में विस्तार के साथ बताया गया है। ये कविताएं लेखक की अपनी अस्मिता के कैनवास को भी सामने लाती हैं। लेखक कैसे अस्मिता के पुराने दायरे में प्रवेश करते हुए उसके परे चला जाता है। किस तरह आधुनिक सरोकारों में जीता है। 'बित्ताा-भर भविष्य' में लेखक ने सही लिखा है ''

''गूंगा जंगल भर

जो रह गया है हमारा राज;''

हरीशजी की कविताओं में राजस्थानी ,हिन्दी,संस्कृत भाषा के प्रयोग समान रूप में मिलते हैं, इसके अलावा मजदूरों,चरवाहों के बीच के भाषायी प्रयोग भी मिलते हैं। कविता की लय के लिए लेखक नए-पुराने प्रयोगों के बीच भेद करके नहीं चलता बल्कि जहां जैसा उचित लगता है वहां पर वैसा ही प्रयोग करता है। इस प्रसंग में कविता के हित प्रमुख नजर आते हैं। बाकी हित पीछे टूट जाते हैं। कविता में रूप के स्तर पर पुराने-नए प्रयोगों के प्रति किसी पूर्वाग्रह के बिना लिखना और उसे अभिव्यक्ति का सहज उपकरण बनाकर विकसित करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कार्य है।

हरीशजी के यहां कविता के दो मॉडल नजर आते हैं। पहला मॉडल है जिसमें गीत और संगीत का सम्मिश्रण नजर आता है। इसे गीतात्मक कविता भी कह सकते हैं। दूसरा काव्य मॉडल है जिसमें भाषण,संवेदनाएं अथवा आत्मगत तत्वों की भरमार है। ये दोनों मॉडल एक ही तरीके से नहीं पढ़े जा सकते। हरीशजी की कविता में इतिहास और यथार्थ के बीच अन्तर्क्रियाएं चलती रहती हैं। कविता में इतिहास और यथार्थ का इस तरह का सम्मिश्रित प्रयोग विलक्षण चीज है।

इतिहास और कविता के बीच में संबंध बनाते हुए हरीशजी इतिहास और साहित्य दोनों को सूचनासम्पन्न करते हैं। इतिहास और कविता के बीच में संबंध बनाने के साथ जिस चीज को निर्मित करते हैं वह है सामयिक यथार्थ। इतिहास में जाते हुए हरीशजी इतिहास नहीं बनाते बल्कि कविता रचते हैं। इतिहास और कविता के बीच में सेतु का काम करता है ' रेहटोरिक' और 'भाषा' ,इन दोनों का व्यापक इस्तेमाल करते हैं।

'रेहटोरिक' और 'भाषा' ये दोनों पहचान देते हैं, इनकी हमारी परंपरा में जड़ें हैं। जबकि आलोचना की कोई पहचान नहीं है। उसकी कोई शक्ल नहीं होती। कविता और इतिहास के बीच संबंध बनाते हुए रचनाकार साझा संस्कृति,साझा संबंधों और साझा सरोकारों के साथ साझा भूमिका पर जोर देता है। इस काम में ''रेहटोरिक' और 'भाषा' सबसे कारगर उपकरण हैं। हमने रचना में लेखक के व्यक्तिगत तत्वों की खोज पर ज्यादा ध्यान दिया है। साझा तत्वों की खोज को छोड़ दिया है। कविता और इतिहास का अन्तस्संबंध साझा संस्कृति,साझा अनुभूति और साझा सरोकारों को व्यक्त करता है। हरीशजी के यहां लेखक का व्यक्तिगत नजरिया महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि वह गौण है।

हमारी मुश्किल यह है कि हम हरीशजी पर बातें करते हुए व्यक्तिगत नजरिए पर ही जोर देते हैं। यदि व्यक्तिगत नजरिए पर जोर देंगे तो कविता और इतिहास को अंशकालिक बना देंगे। कविता और इतिहास अंशकालिक नहीं हैं। बल्कि कालिक हैं। इसके कारण इनके कुछ तत्व आलोचना में भी चले आए हैं। हरीशजी की कविता में बार-बार राजस्थानी का आना,उपनिषदों के पात्रों, मिथकीय पात्रों का आना, मिथकीय स्थानों का आना, उन भौगोलिक स्थानों और परिस्थितियों का आना जिनमें रचना रमण करती है। एक ही वाक्य में कहें रचना में भूगोल का आना बहुत ही सुखद फिनोमिना है। इससे एक चीज यह पता चलती है कि लेखक को भूगोल का अच्छा ज्ञान है। यह भौगोलिक जागरूकता का प्रदर्शन है। चीजों की भौगोलिक अर्थों के साथ अभिव्यक्त है। आधुनिकाल में अकेले अन्तोनियो ग्राम्शी ही अकेला ऐसा विचारक था जिसके पास भौगोलिक जागरूकता थी और जिसने भौगोलिक जागरूकता का रूपायन करके बीसवीं शताब्दी में आलोचना की सबसे बड़ी सेवा की थी। हरीशजी की भौगोलिक जागरूकता साहित्य,संस्कृति,स्त्री,राष्ट्र आदि को समझने में मदद करती है।

सवाल उठता है लेखक लिखना क्यों चाहता है ? वह किन दबावों में लिखता है ? लेखक इसलिए नहीं लिखता कि उसमें अभिव्यक्ति की छटपटाहट होती है ,बल्कि वह लिखना इसलिए चाहता है क्योंकि यथार्थ को उसे लिपिबध्द करना है। यथार्थ को शब्दबध्द करना है। आधुनिककाल की सबसे बड़ी दुर्घटना है यथार्थ का निरंतर लेखक की पकड़ के बाहर चले जाना, कलाओं से यथार्थ का निरंतर बढ़ता हुआ अलगाव। यथार्थ को पाना, लिपिबध्द करना,भविष्य के लिए सुरक्षित रखना, यथार्थ का इतिहास निर्मित करना और अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ही लेखक लिखता है।

आधुनिक काल में खासकर आजादी के बाद तेजी से रचनाकारों का यथार्थ से अलगाव बढ़ा है। पहले यह अलगाव प्रत्यक्ष था। एक बड़ा खेमा था जो अलगाव के चित्रण में काफी शक्ति खर्च कर चुका है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो प्रयोगवाद से लेकर अकविता के दौर तक मिलते हैं इस दौर के लेखक को अलगाव के संदर्भ में व्यक्ति के सवालों को उठाने में मजा आता था। अलगाव और व्यक्ति के अन्तस्संबंधों पर ही उसने अपनी कलात्मक ऊर्जा खर्च की और श्रेष्ठत्व को स्थापित किया। अलगाव और यथार्थ के अन्तस्संबंध पर अज्ञेय और मुक्तिबोध ने भिन्न नजरिए से विचार किया। मुक्तिबोध ने इस क्रम में अलगाव को पूंजीवाद की आलोचना के साथ पेश किया जबकि अज्ञेय ने अलगाव को स्वायत्ता बनाकर,पूंजीवाद से अलग करके पेश किया। अज्ञेय के यहां अलगाव में जीने, अलगाव की यथास्थितियों के सुंदर चित्र हैं। अलगाव में मानवीय द्वंद्व के चेतन और अवचेतन के स्वायत्ता चित्र हैं। ये ऐसे चित्र हैं। जिनमें भाषा का शिल्प अपने चरमोत्कर्ष पर है। कहानी कहने की कला अपने चरम पर है। कलात्मक अभिव्यक्ति का चरम मुक्तिबोध और अज्ञेय में अंतत: अपने चरम पर पहुँचकर निष्पन्न रूप अख्तियार कर लेता है।

हिन्दी के साहित्यकारों में यथार्थ के चित्रण की एक परंपरा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,त्रिलोचन में मिलती है। इन लेखकों के यहां अलगाव मुद्दा नहीं है, बल्कि यथार्थ केन्द्रीय मुद्दा है। यथार्थ का इन तीनों लेखकों में प्रबल आग्रह है। जबकि अज्ञेय और मुक्तिबोध में अलगाव के प्रति आग्रह है। बुनियादी तौर यही दो धाराएं हैं जो हिन्दी के सर्जनात्मक परिदृश्य को ज्यादा प्रभावित किए हुए हैं। इन दोनों में एक साम्य है ,ये दोनों धाराएं अपने -अपने तरीके से एक चीज को बार-बार व्यक्त करती हैं कि साहित्य का चरित्र बदल रहा है। साहित्य का संदर्भ और साहित्य की उत्पादन प्रक्रिया बदल रही है। इस समूचे सर्जनात्मक संदर्भ में साहित्य की अवधारणा ,साहित्य की भूमिका, साहित्यकार की भूमिका बदली है।

यथार्थ और अलगाव में वर्गीकृत इन दोनों धाराओं में दूसरी साझा चीज है लोकतंत्र की अवहेलना अथवा लोकतंत्र के प्रति अस्वीकार का भाव। जबकि सच यही है कि लोकतंत्र के बिना किसी भी चीज का मूल्यांकन संभव नहीं है। लोकतंत्र एक ठोस वास्तविकता है। लोकतंत्र के अभाव में यथार्थ और अलगाव किसी को भी विश्लेषित करना संभव नहीं है। लोकतंत्र की आलोचना तब ही सार्थक शक्ल अख्तियार ग्रहण करती है जब आप उसमें शिरकत करें। लोकतंत्र को अस्वीकार करके,पलायन करके,उसके प्रति घृणाभाव पैदा करके किसी भी किस्म की दीर्घकालिक विमर्श तैयार करना संभव नहीं है। लोकतंत्र को निरर्थकताबोध और गुस्से के आधार पर समझना संभव नहीं है।

लोकतंत्र में आलोचना और बहिष्कार ,अलगाव और लगाव,यथार्थ और अयथार्थ, गुस्सा और अनालोचनात्मकता आदि के लिए पर्याप्त जगह है। लोकतंत्र में स्त्री के गर्भाशय की तरह लोच है। आप चाहें क्रांतिकारी हों या प्रतिक्रांतिकारी हों, सभी के लिए लोकतंत्र में जगह है। लोकतंत्र की शक्ति ही यही है कि इसमें सबके लिए जगह है। लोकतंत्र कभी पलायन और अनालोचनात्मकता से समृध्द नहीं होता बल्कि आलोचनात्मक नजरिए से अपने को समृध्द करता है। हरीश भादानी की कविता मूलत: लोकतंत्र की आलोचना में लिखी कविता है इसमें लोकतंत्र का अस्वीकार नहीं है बल्कि लोकतंत्र के अन्तर्विरोधों पर अंगुली रखी गयी है।

लोकतंत्र में आप जितने भी आयामों से चित्रण करेंगे लोकतंत्र उन्हें जगह देता है। अलगाव और यथार्थ की परंपरा को लोकतंत्र की कसौटी पर कसने की जरूरत है। लोकतंत्र की कसौटी पर कसने की बजाय हमने समाजवाद के परिप्रेक्ष्य में ही यथार्थ और अलगाव की साहित्यधारा को परखा है। समाजवाद की कसौटी पर लोकतांत्रिक देश के साहित्य को परखना सही नहीं होगा। भारत का सर्जनात्मक कसौटी का पैमाना लोकतंत्र है।

लोकतंत्र को शिरकत और लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया के जरिए ही समृध्द कर सकते हैं। पलायन,अस्वीकार,धिक्कार के विमर्श में लोकतांत्रिकीकरण के लिए कोई जगह नहीं है। अत: जब लेखक लोकतंत्र के अन्तर्विरोधों को पेश करता है तो मूलत: लोकतंत्रविरोधी रूझानों की आलोचना करता है। यह कर्ाश् हरीशजी ने रूढिबध्दता से मुक्त होकर किया है। कहीं-कहीं रूमानी भाव भी व्यक्त हुआ है। किंतु समग्रता में लोकतंत्र के प्रति वे रूमानियत से पेश नहीं आते। बल्कि मजदूरवर्ग के प्रति रूमानियत ज्यादा है। अनालोचनात्मक भाव ज्यादा है।

जिन रचनाकारों ने लोकतंत्र की तीखी आलोचना पेश की है उनका सबसे बड़ा योगदान है 'पावर' के केन्द्र में सत्ताा की जगह 'साधारण मनुष्य' को प्रतिष्ठित करना। 'साधारण जनता' की सर्जनात्मक और उत्पादक शक्ति को स्थापित करना। इसका मूल लक्ष्य है उस धारणा को खंडित करना जो यह मानती है कि राजसत्ताा ही सर्वोपरि है।

हरीशजी किसी किस्म की हायरार्की को नहीं मानते। हायरार्की को अस्वीकार करते हुए वैकल्पिक संबंधों को रूपायित करते हैं। जनता के अधिकारों को लेकर आलोचनात्मक संवाद करते हैं, हस्तक्षेप करते हैं। इसके कारण पूंजी और श्रम के संबंधों की बदली हुई प्रक्रियाओं की ओर ध्यान खींचते हैं। वे यह भी ध्यान खींचते हैं कि सत्ताा की आर्थिक नीतियां और गतिविधियां किस तरह प्रभावित कर रही हैं। सत्ताा की गतिविधियों को चित्रित करने का प्रधान कारण है राजनीति को सत्ताा से पृथक् करना।

हरीशजी ने लोकतंत्र की तीखी आलोचना पेश की है उनकी आलोचना का प्रधान लक्ष्य है सत्ताा और जनसंघर्षों के बीच के अन्तर्विरोधों को उभारना। यह रेखांकित करना कि किस तरह ये अन्तर्विरोध लगातार गहरे हो रहे हैं। साथ ही सत्ता के खिलाफ संघर्ष का बिंदु किस तरह लगातार स्थानान्तरित हो रहा है। सत्ता के साथ वर्तमान के अन्तर्विरोधों को चित्रित करते हुए यह भी बताना चाहते हैं कि सत्ताा कैसे वर्तमान को प्रभावित कर रही है।

लोकतंत्र की आलोचना के पैराडाइम का मूलाधार है नागरिक समाज। हिन्दी के रचनाकार बार-बार इसी नागरिक समाज की ओर ही लौटते हैं। कहीं कहीं इस नागरिक समाज पर समाजवाद का मुखौटा भी लगा है। नागरिक समाज के परिप्रेक्ष्य में आलोचना पेश करने के नाते हिन्दी कविता में खासकर बहुलता,सम्मिश्रण और कृत्रिमता का तत्व चला आया है। लेखक ने वस्तुकरण के संदर्भ को अस्वीकार करते हुए जनता के यथार्थ को चित्रितकिया है। हरीशजी विचारधारा के वस्तुकरण्ा को भी अस्वीकार करते हैं और विचारधारा को आम आदमी के संबंधों के रूप में ही चित्रित करते हैं। मनुष्यों के यथार्थ संबंधों को चित्रित करते हुए व्यक्ति और सत्ताा के संबंधों की मौजूदा व्यवस्था के वैकल्पिक रूपों को चित्रित करते हैं। विकल्पों की खोज के चक्कर में अतीत और मिथकों में लौटते हैं। मिथक और अतीत में लौटना मूलत: विकल्प की तलाश है इसे अतीतजीवी नहीं मानना चाहिए। इसके जरिए व्यक्ति को सत्ताा के साथ नाभिनालबध्द करने की मानसिकता को चुनौती देते हैं। व्यक्ति और सत्ताा के संबंध को विच्छेद करते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप करते हैं।

व्यक्ति और सत्ताा का संबंध शिखर की राजनीति पर जोर देता है। जबकि लोकतांत्रिक आलोचना पेश करने वाले रचनाकार इसके विपरीत जमीनी राजनीति पर जोर देते हैं। शिखर की राजनीति पूंजी की राजनीति है जमीनी राजनीति पूंजी के वर्चस्व के निषेध की राजनीति है। जीवन से लेकर प्रकृति तक सभी क्षेत्रों में इस परिप्रेक्ष्य का हरीशजी ने विस्तार किया है। मूल्यों के सामाजिक पक्ष का चित्रण करते हुए मूल्यों के संकट की ओर ध्यान खींचा है।

हरीशजी बताते हैं कि किस तरह वर्ग,परिवार,राजनीतिक दल,नेता,एकल परिवार,पगारजीवी श्रमिक और किसान किस तरह संकटग्रस्त हैं। यही वह बिंदु है जहां पर मिशेल फूको के बायोपावर की अवधारणा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उपरोक्त क्षेत्रों में संकट के समाधान के परम्परागत तरीके बेमानी हो जाते हैं। आम जीवन को अनुशासित करने में सत्ताा असमर्थ होती है। परंपरागत तरीके से आम जीवन को नियंत्रित करना संभव नहीं होता। परंपरागत तरीके से संकट को नियंत्रित करने अथवा समाधान करने का अंतिम प्रयास था जून 1975 में लगाया आंतरिक आपात्काल जो बुरी तरह असफल साबित हुआ। आंतरिक आपात्काल हटाए जाने बाद सामाजिक नियंत्रण के नए तरीके इजाद किए गए। नियंत्रण के नए विज्ञान का आरंभ हुआ। पहले संकट के समाधान की बात सोची जाती थी। किंतु आपात्काल हटने के बाद संकट के रूप में चीजों को देखना सत्ताा ने बंद कर दिया। सत्ताा और साहित्यिक विपक्ष दोनों ने ही यह स्वीकार कर लिया कि लोकतंत्र के बिना कुछ भी संभव नहीं है। पहले लोकतंत्र बेमानी था। अब लोकतंत्र ही एकमात्र विकल्प था। अब लोकतंत्र के संकट को संकट न कहकर बीमारी कहा जाने लगा और बीमारी को रोकने के लिए पहले से तयशुदा दवाएं सुझायी जाने लगी।

राज्य पहले की तुलना में ज्यादा चौकन्ना और नजरदारी करने लगा। इससे नियंत्रण के तरीके और बारीक और पैने होने लगे। नागार्जुन ने जिस तरह प्रत्येक राजनीतिदल और विभिन्न दलों के नेताओं,विभिन्न वर्ग के लोगों के आपराधिक चरित्र का उद्धाटन किया है उससे एक ही संदेश निकलता है कि अब समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपराध का वाहक बन गया है। अब जीवन स्वयं को ही हजम कर रहा है। जनता पर नजरदारी का लक्ष्य अपराधों को रोकना नहीं है ,अपराध के प्रमाण जुगाड़ करना नहीं है, बल्कि नजरदारी का लक्ष्य है बाधित करना। स्वीकृति को बाधित करना ,रोकना। आत्मसात करने के लिए मजबूर करना, स्वत: ही शोषण के लिए तैयार करना,सत्ताा के प्रति जिम्मेदारियों की वैधता को अंदर बिठाना। ठीक यही अनुभूति संस्थानों में पैदाकरना। परंपरागत नियंत्रण में ढिलाई आ जाती है जिसके कारण घेटो, शरणार्थी शिविर,विस्थापन,स्थानान्तरण (माइग्रेशन) कानूनहीनता, आदि का तेजी से विस्तार होता है।

पहले नारा था ''जियो और जीने दो'' अब नया नारा है ''जीने दो , जहां तक मौत न हो जाए।'' इसी नारे के आधार पर सत्ताा के सारे प्रयास व्यक्ति के शरीर नियंत्रण के उपायों पर केन्द्रित हैं। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के अंदर और बाहर औपनिवेशिकता ने कब्जा जमा लिया है। यह औपनिवेशिकता कभी किसी बहाने कभी किसी बहाने अपना विस्तार करती रही है। यही वह बिंदु है जहां पर उदार या लिबरल स्वायत्ताता की धारणा हमारे बीच में दाखिल होती है और हम प्राइवेट और सार्वजनिक को नए सिरे से परिभाषित करते हैं। यही वह बिंदु है जहां पर व्यक्ति ने सार्वजनिक को अपने बाहर माना। राजनीति को बाहरी जगत का हिस्सा माना। यह वह जगह है जहां व्यक्तिगत के एक्शन या भूमिका अन्य के सामने खुले होते हैं। और अन्य से स्वीकृति हासिल करने की कोशिश करते हैं। अंत में प्राइवेट और सार्वजनिक का भी भेद खत्म हो जाता है। शरीर को नए सिरे नियंत्रित करने के नए-नए उपाय आने लगे हैं और शरीर को मुक्ति के प्रयासों से मुक्ति दे दी गयी है। इसका प्रत्युत्तार हरीशजी अपने तरीके से खोजते हैं और बार-बार शरीर के ब्यौरे-विवरण और उनकी स्वायत्ता सत्ताा को उभारते हैं। हरीशजी अपनी कविताओं में चित्रण का काम जिस तरह करते हैं उससे लगता है कि आप कोई तमाशा देख रहे हों। यह तमाशा अथवा नजारे वाले तत्व बेहद मुश्किल तत्व है। इसका टेलीविजन नजारे के साथ गहरा संबंध है।

गुई देवोर्द के शब्दों में '' नजारा सभी किस्म की सामूहिकता के रूपों को खत्म कर देता है। सामाजिक भूमिका का व्यक्तिकरण और उसका पृथक स्वचालितीकरण और पृथक वीडियो स्क्रीन ने नए किस्म की मास सामाजिकता को आरोपित किया है। इसने नए किस्म की भूमिका और विचारों की एकरूपता को पैदा किया है।''

अब मैं एक अन्य पहलू की ओर आना चाहता हूँ, यह पहलू है वेदों की ओर हरीशभादानी के आकर्षण का। वेदों की ओर जिस समय हरीशजी लौटे संयोग की बात है उसी समय रामविलास शर्मा भी लौटे। सवाल यह है कि ये दोनों वेदों की ओर क्यों लौटे ? वेद एक रंगत और एक वर्ण और एक विचारधारा की किताब नहीं है। वेद किसी एक व्यक्ति की रचना भी नहीं हैं। इन्हें सैंकड़ों वर्षों के अंतराल में अनेक लोगों ने रचा। वेद मनुष्य की क्रांतिकारी स्वतंत्रता और भाईचारे का आईना हैं। वेद मनुष्य के क्रमश: मानवीय विकास और मुक्ति का दस्तावेज हैं। वेदों में आदर्शों, समर्पण, और शक्तिशाली के प्रति समर्पण का भाव है। वेदों में मनुष्य की पूर्ण स्वतंत्रता का भाव निहित है। यही वजह है वेद बार-बार याद आते हैं और मनुष्य के जीवन में दाखिल होते हैं, कभी संस्कार के रूप में कभी पूजा के मत्रों के रूप में कभी अन्य रूपों में। वेदों के पास जाने का अर्थ यह भी है कि आप अपनी यथार्थ के प्रति पैनी नजर विकसित करना चाहते हैं। साथ ही शक्ति के प्रति पलायनवादी रूझान भी पैदा करते हैं। वेदों के पास जाने का अर्थ यह भी है कि हम इतिहास के पास नहीं जाना चाहते। इतिहास से पलायन करते हैं।

वेदों के पास जाने का अर्थ यह भी है कि व्यक्ति को उसकी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर देखना। यह रेखांकित करना कि व्यक्ति की जड़ें उसके यथार्थ सामाजिक जीवन में होती हैं। वेदों के पास जाने का एक अन्य कारण यह भी बताना है कि शब्द,अवधारणा और उनके अर्थ जीवनानुभवों से बने हैं। इनमें आए परिवर्तन इस बात का संकेत है कि व्यक्ति बदला है। उसके अनुभव बदले हैं। यह बदलाव दुतरफा है ,इसे विकास और ह्रास दोनों ही दिशाओं में देख सकते हैं।

कोई भी अवधारणा स्थायित्व और परिवर्तन दोनों को ही अपने अंदर समेटे होती है। यह जीवंत मनुष्य के अनुभव का प्रतीक भी है। प्रत्येक अवधारणा की अपनी उम्र होती है। यदि अवधारणा का अपने अनुभव से अलगाव नहीं हुआ है तो आप उसे सहज ही समझ सकते हैं। किंतु जब किसी अवधारणा का अपने जीवंत अनुभव से अलगाव हो जाता है तो वह अपने यथार्थ से पृथक हो जाती है। इसके बाद अवधारणा सिर्फ व्यक्ति के दिमाग में सज्जित चीज बनकर रह जाती है।

वेदों का इतिहास मंत्रों का इतिहास नहीं है। बल्कि विचारधारा का इतिहास है। यह विचारों के निर्माता वास्तव लोगों का इतिहास है। वेद फिक्शन नहीं है। बल्कि ईश्वर के बारे में ठोस भौतिक आधार पर निर्मित धारणाओं का समुद्र है। जीवन-जगत के तमाम प्रपंचों का आदिम दस्तावेज हैं। आरंभ में मनुष्य के पास अनुभव थे और कालान्तर में इन्हीं अनुभवों को अमूर्त धारणाओं में वेदों में लिपिबध्द किया गया। वेद मूलत: अनुभव और विचार का अवधारण्ाात्मक रूप हैं। वेदों में जिन अवधारणाओं को बताया गया है वे जीवनानुभवों को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पातीं। फलत: विचारधारा में रूपान्तरण के लिए मजबूर हैं। अवधारणा और संकेत की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें आप आसानी से अपनी बात कह सकते हैं किंतु इन दोनों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इनका अन्य पृथक्कृत चीजों के लिए भी आसानी से इस्तेमाल हो सकता है।

वेदों में अलगाव और आदर्शीकरण का फिनोमिना भी अन्तर्निहित है। जिसके कारण वेद पूरी तरह व्यवस्थित और निष्पन्न नजर आते हैं। वेदों का व्यवस्थित और निष्पन्न रूप विचारों की सुनिश्चितता की ओर ले जाता है। मुश्किल यह है कि मनुष्य के विचार कभी अंतिम नहीं होते। विचारों में अपडेटिंग चलती रहती है। फलत: विचारों में क्षेपक भी मिलते हैं। पुरानी रचनाओं में क्षेपक भी मिलते हैं। वेदों में जाने का प्रधान कारण है व्यवस्थित संसार की खोज करना। पूंजीवादी अराजकता,आदर्शहीनता और अलगाव से दूर शांत,आदर्श जीवन के विकल्पों की खोज। वेद तब ही याद आते हैं जब प्रचलित विकल्पों से ऊर्जा नहीं मिलती,प्रेरणा नहीं मिलती। वेदों में अजस्र ऊर्जा है ऐसी ऊर्जा है जो नए किस्म के विकल्पों की सृष्टि करती है।

(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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