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7.10.08

धार्मिक ठेकेदारों की एक और दास्ताँ.

कल दिल्ली से प्रकाशित टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़ रहा था, लीड में हीं धर्म के नाम पर मानवता को कलंकित करने की रपट पढ़ी और पढ़ते पढ़ते जेहन में बस एक ही खयालात की अभी कुछ दिनों से भड़ास पर संडास करते ऐसे ही लोग है जिस से मानवता तार तार हो रही है।
ख़बर के मुताबिक,
धर्म परिवर्तित लोगों के साथ जबरिया कर के उन्हें वापस हिंदू धर्म में आने को कहा गया और एसा ना करने पर मार डालने की धमकी भी। कंधमाल में घटित इस घटना पर नजर डालें तो आतंकी हिन्दुओं का समूह नौगाम नमक गाव में आ कर लोगों को जबरिया ईसाई से हिंदू धर्म परिवर्तन के लिए धमकाते हैं और एसा ना करने पर जान से मारने की धमकी, गरचे बहुत से लोग यहाँ से विस्थापित हो चुके हैं ।
महीने भर पुरानी घटना है प्रिगदा में ४०० लोगों के समूह ने लूटपाट , घर जलना और आतंक का जोर मचाया था। आतंकियों ने ग्रामीणों को जबरिया गाय का गोबर और मूत्र पीने पर मजबूर किया और घसीटते हुए बगल के मन्दिर में ले गए जहाँ धमकाते हुए बालों का मुंडन कर हिंदू बनाने के कार्य को अंजाम दिया। धमकी ऐसी की हिंदू बनो या मरने के लिए तैयार हो जाओ।
जबकि धर्म का उन्माद फैलाने वाला कोई भी संगठन इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नही हुआ।
इनके वापस पुनर्वास पर प्रशाशन की चुप्पी भी रहस्यमयी है। ख़बर कोविस्तार से जानने के लिए टाईम्स ऑफ़ इंडिया का सोमवार का संस्करण पढ़ें।

कलंकित मानवता, जिम्मेदार कौनउपद्रवी या पुरा हिंदू समाज ?

6.6.08

सच को आत्मसात करने से मराठियों का इनकार.......



उपद्रव, हिंसा, तोड़फोड़, गैर भारतीय का पर्याय बना महाराष्ट्र।


लोकसत्ता के सम्पादक कुमार केतकर एक बार फ़िर गवाह बने मराठी हिंसक प्रवृति के। केतकर का कुसूर सिर्फ़ इतना था की उन्होंने महाराष्ट्र विधान सभा द्वारा पारित शिवाजी के पुतले सम्बन्धी विषय पर सरकार की खिंचाई कर दी। एक निर्भीक इमानदार पत्रकार ने सच कहा और असभ्यता का पर्याय बना महाराष्ट्र इसे आत्मसात नही कर सका। ये कहानी बार बार दुहराई जा रही है मगर राजनीति पर परवान चढा यह प्रदेश राज्य से लेकर केन्द्र तक सिर्फ़ मुंह ताकने का सिला बन कर रह गया है.

जिस प्रान्त के अर्थव्यवस्था से लेकर जीवनधारा तक पर गैर मराठियों का अधिपत्य है, और नाकाबिलियत ऐसी की स्थापत्य समाज में योगदान शुन्य, विचारधारा का मोहताज ऐसा की सिर्फ़ और सिर्फ़ शिवाजी की दुहाई। मगर शिवा जी का एक ढर्रा अभी भी बरकरार....... हिंसक, और उपद्रव का आलम यानी की महाराष्ट्र।

चाहे गैर मराठी विरोध हो, या अपने अस्तित्व की लड़ाई, या फ़िर शिवाजी...... सभी में होड़। मगर ये होड़ किसका ??? मराठी लोगों के लिए .........महाराष्ट्र के लिए.......विकाश के लिए.......या फ़िर अपने स्वार्थ के लिए। आश्चर्य की थैले के सभी एक जैसे ही चट्टे बट्टे। तो फ़िर प्रश्न की क्या मराठी मानुष इन से अनजान हैं... या फ़िर वह इस स्पर्धा वाले दौर में नाकाबिल कि स्पर्धा के बजाये उपद्रव इन्हें सबसे आसान तरीका लगता है। उत्तर जो भी हो मगर हिन्दुस्तान की इस सरजमीं पर महाराष्ट्र निसंदेह पहले मराठी का ही है फ़िर बाहरियों का, मगर प्रतियोगिता में अपनी उपयोगिता साबित करना इनके लिए चुनौती।

फ़ोटो :-
1) लोकसत्ता के सम्पादक कुमार केतकर
2) केतकर के आवास के बाहर

फ़ोटो साभार:- The Hindu, Josh18.com