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14.9.11

कहते है हिन्दूस्तानी है हम....

कहते है हिन्दूस्तानी है हम,
पर जुबान पे अंग्रेजों की भाषा बसती है,
देख के अपनी विलायती तेवर,
हिन्दी हम पर यूँ हँसती है।
क्या बचपन में पहला अक्षर,
माँ कहने में शर्माया था,
रोता था जब जब तू प्यारे,
लोरी ने चैन दिलाया था।

अब बढ़ी बुद्धि,अब बढ़ा ज्ञान,
हिन्दी को क्यों बदनाम किया,
जिसके साये में पल पल कर,
हम सब ने जग में नाम किया।

मीठी भाषा,प्यारी भाषा,
हिन्दी को बस आत्मसात करो,
अंग्रेजी भाषा है अपनी गुलामी,
उस भाषा में मत बात करो........।

"साहित्य प्रेमी संघ" की ओर से आप सभी हिन्दी प्रेमीयों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.....
www.sahityapremisangh.com

27.2.11

"साहित्य प्रेमी संघ"

साहित्य समाज का दर्पण होता है,जिसके माध्यम से एक सुव्यवस्थित और सुसंगठित समाज की कल्पना की जा सकती है।
इस दिशा में बस एक छोटा सा प्रयास है मेरा।"साहित्य प्रेमी संघ".....साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त ब्लाग...आप आये और योगदान करे.....आप इस ब्लाग से जुड़े और अपनी साहित्यीक पुष्पों से एक अदभूत खुशबु को फैलाते रहे...यही कामना है मेरी.....निचे दिये लिंक से आप इस ब्लाग पे आ सकते है....और योगदान करने के लिए अपना ई मेल मुझे भेजे...

*साहित्य प्रेमी संघ*

22.2.11

इंजीनियरस की परेशानी.........(सत्यम शिवम)


कहता हूँ मै इक ऐसी कहानी.
इंजीनीयरस की परेशानी,
इक इंजीनीयर की जुबानी।

कहने को तो कुछ दिन में अब,
मै भी इंजीनीयर कहलाऊँगा,
टेक्नोलाजी और साफटवेयरस के ही,
गीत सबको सुनाऊँगा,

पर दरद का ये किस्सा पुराना,
डिग्री के वास्ते खत्म हुई है मेरी जवानी।

आगे पढ़ने हेतु इस लिंक पर जाये...


20.2.11

कसम…..(सत्यम शिवम)

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।
हाथ में भविष्य तेरे,
मानवों के हित का।
 मुख पे है जो दिव्य आभा,
जगती से तेरे जीत का,
बढ़ता ही चल उन राहों में,
जो राह स्वर्ग तक जाती है,
रोक ना तु अब पग इक पल यहाँ,
जो बंधन तुझे मिटना सिखाती है।

खो जा उसमें तब मिलेगा मँजिल,
अपने सुख दुख तु वार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

जो झुक गया,जो रुक गया,
इंसान वो सच्चा नहीं।
जिस राह में बस फूल बिछा,
वो राह कभी अच्छा नहीं।

काँटों पे चल,अग्नि में जल,
होता है तो हो जाने दे अब,
अपने जीवन के अवसान का पल।

हार गया तन जीवन में तो क्या,
आत्मा को विजय का हार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

प्रलोभन राहों में है मगर,
तेरी इच्छा तो अनंत की है।
थक कर ना सोना है तुझे,
तेरे तन ने आज ये कसम ली है।

भयमुक्त निडर सा चलना है,
तुझे आसमान की राहों पे,
अब ना किसी से डरना है,
दर्द से या अपनों के आहों से।

भूल जा बीती सारी असफलता,
अपनों को भी तु विसार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

माँ की ममता की दुहाई,
पत्नी के सिंदूर का कसम।
बहना के निंदिया का वास्ता,
कभी ना ले तु दम में दम।

आक्रोश अपना संचित कर उर में,
क्रोध ज्वार को कर ले तु शांत,
प्रबल वेग चतुराई से अपने,
सब को दे दे तु क्षण में मात।

उपेक्षाओं,आलोचनाओं से ना घबराना,
पी जा जहर अपमान का,
जो तुझे संसार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

दीप्त दीप्त जीत से संलीप्त,
मग्न मग्न कर्मों में संलग्न,
अवसर ना कोई गवाना,
हर पल तु बस चलते जाना।

सुदूर हो या पास हो,
मन में तेरे विश्वास हो,
इक लगन हो बस जीत की,
वैराग्य जगत से प्रीत की।

टल जाएँगे बाधाएँ पल में,
हर विघ्न बाधा को संहार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।
  

17.2.11

मेरी भावनाएँ,कितनी निरर्थक…….(सत्यम शिवम)

कैसी है मेरी भावनाएँ,तुमने जानने कि कोशिश कि है कभी।बस कह दिया इक पल में निरर्थक है तुम्हारी भावनाएँ।बड़ा वक्त लगता है ह्रदय की सरिता में इक भावना के कमल खिलाने में।इंसान अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है,पर कैसे उसकी सार्थकता का दावा कर सकता है वो?वो खुद नहीं जानता कि उसकी भावनाएँ कौन सा रँग ले लेगी किस क्षण।

भावना मनुष्य के सद्विचारों का इक ऐसा उन्नत बीज होता है,जो इक सच्चे इंसान को जन्म देता है।भावों से भरा दिल हर किसी का नहीं होता।ये तो मिल जाता है,हजारो लाखों में किसी एक को।भावनाएँ ना सीखी जा सकती है,और ना दिखाई जा सकती है।ये तो उद्गार होता है,इक सच्चे इंसान के दिल का।छलकता है उसकी बातों से,महकता है उसके व्यक्तित्व में।

कहते है बिन भाव के आदमी शव होता है।बिन इंसानियत के एक उत्कृष्ट समाज,परिवार और राष्ट्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती।भावनाएँ ना तो हमें विरासत में मिलती है और ना सिखते है हम देख कर इसे।ये तो एक सच्चे इंसान में इंसानियत की पहली और आखिरी निशानी होती है।

जब भावनाओं का सागर उमरने लगता है और इंसान की आत्मा गोते  लगाने लगती है उसमें तो वही भावनाएँ दो बूँद बन कर हमारी आँखों से भी बह जाते है।खुशी के पल में प्रफुल्लित आँसू और दुख के क्षण में आह्लादित आँसू।आँसू एकमात्र वैसे संवेदना वाहक होते है,जो इंसान की भावनाओं का जीवंत रुप ले लेते है।ये एहसास सब ने किया होगा,आँखे जितना बरसती है मन हल्का होता जाता है।भावनाएँ पूर्ववत स्वरुप को धारण कर लेती है और मिलन विरह दोनों बस इक पल में दृष्टिगोचर होने लगता है।

आज के आधुनिक परिवेश में बस व्यवसायिक दृष्टि ही सफलता का आधार बन गया है,तो हमारी भावनाएँ कितनी निरर्थक है।भावनाओं की सार्थकता तो बस इक कलाकार जान सकता है,जो अपनी भावनाओं को ही संगीतबद्ध करता है,भावनाओं की ही लेखनी चलाता है,और उसे ही गुनगुना कर सफल होता है।

कैनवास पर जो आकृति इक चित्रकार बना देता है कल्पनाओं का आखिर वो क्या होता है,भावनाएँ ही तो होती है उस कलाकार की जो स्केच से कैनवास पर खुद खुद इक रुप में दिखने लगती है।भावनाएँ ही कला है,इक कलाकार का आजीवन मीत।

प्रेमी की भावनाएँ प्रेमिका के प्रतीक्षा की चँद घड़ियाँ ही बया कर देती है।कैसे इक युगल विरह वेदना को सहता है और कैसे दूर होकर भी बस भावनाओं के अनोखे तार से जुड़ा होता है।प्रेम भी इक भावना ही है,जो भावुक और हर्षित ह्रदय का परिचायक होता है।इक प्रकार का आकर्षण ही तो होता है प्रेम जिसमें सामने वाला हमें अतिसुंदर और प्यारा जान पड़ता है।अपना सर्वस्व न्योछावर कर के भी प्रेमी युगल क्यों समाज की कुंठित मानसिकता की बलि चढ़ जाते है।यह प्रेम के ही चरमोत्कर्ष की संवेदनात्मक भावनाओं को दर्शाता है।

निरर्थक नहीं है मेरी भावनाएँ जो तुमने समझा ही कहा कभी या यूँ कहे कोशिश ही ना कि समझने की।तुम्हारे इंतजार में पलक पावड़े बिछाएँ यूँ ही निहारता तेरी राह।आने पर तुम्हारे लिपट जाता तुमसे और फिर कुछ ना कहना और ना सुनना।जाने पर तुम्हारे फिर तुम्हारे आने का इंतजार करना और बस सोचना तेरे बारे में।क्यों लगता है इतना निरर्थक वो सब,जो कल तक तुम्हारे लिए मेरा प्यार था।वो मेरी भावनाएँ,क्यों लगती है तुम्हे निरर्थक अब?क्या मेरा प्रेम खत्म हो गया तुमसे आज,जो मेरी भावनाएँ इतनी निरर्थक लगती है अब तुम्हें............