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16.8.14

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं 

वे गाँव के बुजुर्ग थे शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाते हैं। आज की
वर्तमान टेक्नोलॉजी की बिलकुल जानकारी नहीं रखते हैं। उनके पास बैठा मैं
बतिया रहा था। बातों ही बातों में मैने उनसे पूछा -बाबा,क्या आपको अब तक
जी हुयी जिंदगी से संतुष्टि है ?
बाबा बोले -बेटे ,हर मनुष्य भूलों का पुतला है। मैनें भी एक भूल की जिसका
पछतावा है ?
मैनें पूछा-क्या वह बात मुझे बता सकते हैं ?
बाबा बोले -क्यों नहीं,वह बात बताने से मेरा मन भी पश्चाताप करके हल्का हो
जायेगा और कोई उससे सीख भी लेगा।
थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ याद करते हुए कहना शुरू किया -बेटा ,जब मैं दौ
साल का था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था तब मेरे पिता जवान थे
उन्होंने मुझे खड़ा होना सिखाया और जब मैं लड़खड़ाते हुए डग भरना सीखता
था तो उनके मजबूत हाथ मेरी पीठ की तरफ सुरक्षा कवच बन कर तैयार
रहते थे। उनके कारण मैं दौड़ना सीख गया। वो मुझे जब भी मन्दिर ले जाते
थे तब मैं भगवान के दर्शन नहीं कर पता था तब वे अपने कन्धे पर बैठा कर
दर्शन करवा देते थे। जब मैं उनके साथ मेले में जाता था कुछ कदम चल कर
भीड़ देख घबरा जाता था तो वे बिना झिझक के मुझे पुरे मेले में कंधे पर या
गोदी में सवारी कराते थे। मेरे पिता कभी कभार कमीज पहनते थे ,प्राय :
बनियान ही पहनते थे कारण उनके पास आमदनी कम थी मगर मेरे लिए
३-४ कमीज हर साल लाते थे। जब मैं किशोर आयु का हुआ तो उनका प्रयास
रहता था कि मैं अच्छा पढ़ लिख जाऊँ मगर मैं पढता नहीं था केवल स्कुल
जाने का ढोंग रचता था,मेरी असफलता के समय वो मेरा हौसला बढ़ाते और
पढ़ने को प्रोत्साहित करते मगर मैं उन्हें धोखा दे देता। मेरी स्कुल बंद हो
गयी और मैं उनके साथ खेत पर जाने लगा। कुछ साल बाद मेरी शादी कर
दी ,उस समय उन्होंने जितनी पूँजी जमा की थी सब मेरी शादी में खर्च कर दी।

कुछ साल बाद मेरे बच्चे हो गए और मेरे पिता बूढ़े हो गये। अब वो खेत का
काम नहीं कर पाते थे तब मुझे लगता कि सारा काम का भार मुझ पर डाल
अब ये आराम फ़रमाते हैं। उन्हें बैठे देख बहुत बार मैं उन्हें झिड़क देता वो
मेरी कठोरता से उदास हो जाते और कभी कभी शुन्य में ताकने लगते। मेरी
पत्नी को वे अप्रिय लगते थे क्योंकि वे दिन भर खाँसते रहते या उसके गैर-
बर्ताव पर चिल्ला उठते। पत्नी जब उनकी शिकायत मुझसे करती तो मैं उन्हें
खूब भली बुरी सुनाता  .... कहते हुये बुजुर्ग का गला भराने लगा। बूढी आँखों
में आँसू आ गए थे। मैं उनकी ओर ताक रहा था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद
वो बोले -कुछ साल बाद मेर पिता को आँखों से दिखना बंद हो गया ,मुझे
लगा अब आफत गले पड़ गयी है। उनको पाखाने लेकर जाना ,नहलाना
जैसे काम बढ़ गए थे। मेरी पत्नी उनके मरने की राह देखने लगी। उन्हें
दौ समय खाना भी रुखा सुखा दिया जाने लगा मगर वो कभी शिकायत नहीं
करते थे। कुछ महीने बीमार रह कर वो स्वर्ग सिधार गए उस समय मैं
50 साल का हो चूका था। मुझे उनकी मौत पर बहुत कम अफ़सोस और मन
में सुकून ज्यादा था। अब मैं अपनी गृहस्थी में लग गया। मेरे बच्चे पढ़ लिख
गए थे और देखते ही देखते मेरे बाल सफेद हो गए ,हाथ पैर जबाब देने लगे
अब मेरे साथ भी वही होने लगा जो मेने अपने पिता के साथ किया था।
एकाद बार बच्चो और बहु से अच्छा व्यवहार करने को कहा तो लड़के ने जबाब
दिया -आपने कौनसा सेवा का काम अपने बाप के लिए किया। बस तब से
मुझे पछतावा होता है कि काश!मेने माँ -बाप की सेवा और इज्जत की होती
मगर…… अब समय चला गया हाथ से।     

14.1.13

दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!


दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

 एक दिन बाद ही दिवाली है ,आज वृद्धाश्रम में बूढ़े चेहरों पर ख़ुशी है,अपने घर को देखने
की उत्कंठा है। कुछ वृद्ध माताओं ने अपनी गठरियाँ भी तैयार कर ली है।साल भर में जिस
भी दान दाता ने उपयोगी चीज दान की थी उसको उन्होंने साल भर तक सहेज के रखा था,
आज वे सब सामान गठरियों में बाँध लिए हैं।कुछ अच्छी साड़ियाँ बहु के काम आ सकती
है कुछ गृह उपयोगी सामान घर में काम आयेंगे,अपने घर को देखने की तमन्ना ......कितने
ख़्वाब पले हैं बूढ़े मन में ................

            जिस घर को अपनी मेहनत से बसाया था,खुद अभावों में जी कर बच्चो को पाला
पोसा,योग्य बनाया ताकि बच्चे अभावों में नहीं जीये।उनकी मेहनत रंग लायी और पुत्र
योग्य बन गए,सरकारी नौकरी लग गयी।माँ -बाप खुश हो गए की अब उनके संघर्ष के
दिन खत्म हो चुके हैं ,पुत्र काम पर लग गया है ,शीघ्र शादी तय कर देंगे ,घर में काम
करने के लिए बहु आ जायेगी ,बेटे का घर बस जाएगा और उनका बुढापा सँवर जाएगा।

        बेटे के लिए रिश्ता भी अच्छा आया ,लडकी पढ़ी-लिखी थी और स्कुल में अध्यापिका
थी।बेटे की स्वीकृति के बाद शादी तय कर दी।शादी के एक सप्ताह के बाद ही समय ने
करवट बदलनी शुरू कर दी।बहु सुबह स्कुल चली जाती और बेटा दफ्तर ,उनके लिए
खाने पीने की जबाबदारी बुढ़ी माँ पर।दिन गुजरते गये और एक दिन बुढा चल बसा,अब
बुढिया अकेली रह गयी।काम भी घर का ठीक से कर नही पा रही थी।बेटे और बहु की
दिनचर्या माँ की खराब सेहत के कारण बिगड़ने लगी। बहु और बेटे ने उपाय निकाला
और माँ  से कहा- माँ ,आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है और हम दोनों आपको समय
भी नहीं दे पा रहे हैं।

 माँ ने कहा -आप लोगो ने सही कहा है।मेरा ख्याल है बेटे ,कि अब बहु को नौकरी छोड़
घर सम्भाल लेना चाहिए ताकि मेरी सेवा भी कर लेगी और घर भी संभाल लेगी।

बेटे ने कहा- माँ ,ऐसा संभव नहीं है,इसकी कमाई से घर चल जाता है और मेरी कमाई से
बचत हो जाती है।इसके घर बैठ जाने से मेरी बचत खर्च हो जायेगी इसलिए हमने सोचा
है कि आपके रहने का प्रबन्ध शहर के वृद्धाश्रम में कर देवे,वहां खाने-पीने का मामूली
चार्ज है जो हम भर देंगे।आप वहां आराम से रहेंगी।

   माँ ने अनमने मन से घर छोड़ा और नए घर में पहुँच गई।अब बेटा साल में एक बार
दिवाली के एक दिन पहले आता है और दिवाली के दुसरे दिन माँ को फिर से वृद्धाश्रम
छोड़ देता है।काफी सालों से ऐसा चल रहा है।

        माँ साल में एक दिन अपना घर देख कर खुश हो जाती है और जब बेटा उसे दिवाली
के दुसरे दिन वापिस छोड़ने आता है तो अश्रु भरे नेत्र से इतना जरुर पूछ लेती है -अगली
बार भी दिवाली पर मुझे एक दिन के लिए लेने आओगे ना पुत्र !

          घटना पूर्ण रूप से सत्य है,नाम और स्थान की जानकारी की जरूरत नही लग
रही थी ,मगर एक प्रश्न मन में उठता रहता है-क्या वर्तमान युग में पुत्र  के कर्तव्य इतने
असंवेदनशील ही बन जायेंगे,आखिर ये आपाधापी हमें कहाँ ले जायेगी ......!!!            

14.12.12

ये कैसा फर्ज


ये कैसा फर्ज 

माँ -बाप के प्रति श्रद्धा मेरे देश में कम होना मन को ठेस पहुँचाता है।पुत्र की कामना के
लिए भगवान् की चोखट पर मन्नत मांगने वाले माँ -बाप जब पुत्र पा जाते हैं और उसमे
अपने सुखद बुढ़ापे के सपने देखते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है।बच्चों के लिए अपनी
हर सुविधा को न्योछावर कर जब वे बूढ़े हो जाते हैं। यदि  उनका जवान बेटा उनके सपनों
को निर्ममता से तहस -नहस कर देता है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी ,इस बात
को महसूस करने के लिए  एक छोटा सा वृत्तांत दे रहा हूँ जो सत्य है-

               बात करीब दस साल पुरानी है।मेरे एक परिचित मुलत: राजस्थान के रहने
वाले हैं।उनके पिताजी ने इकलोते बेटे के लिए जीवन भर पुरुषार्थ कर पाई-पाई जोड़ी
और बेटे को सुरत में कपड़े की थोक व्यापार की दूकान करवा दी। बाप के द्वारा मिले
धन से बेटा सुरत में सेट हो गया और अपने व्यापार को काफी फैला लिया।

              एक दिन मैं उनकी दूकान पर बैठा था तब उनके गाँव से उनके पिताजी की
चिट्ठी आई।उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और मुझे बताया कि उनके पिताजी की तबियत ठीक
नहीं है और उन्हें मिलने के लिए गाँव बुलाया है।

            मेने कहा-आपको गाँव पड़ेगा ,क्योंकि आप उनके इकलोते बेटे हैं?

उन्होंने कहा- बात तुम्हारी सही है परन्तु इस समय सीजन चल रही है।शादी ब्याह का
समय है।इस समय कपड़े में काफी बिक्री रहेगी और गाँव चला गया तो 15-20दिन लग
सकते हैं ऐसे में उन्हें संभावित बिक्री से होने वाले फायदे से वंचित रहना पडेगा।

मेने कहा- लेकिन आपके पास कोई विकल्प भी नहीं हैं ?

वो बोले- एक विकल्प है ,मैं उन्हें 20000/- का ड्राफ्ट भेज देता हूँ,शायद उनके पास पैसे
नहीं होंगे इसीलिए बुला रहे होंगे।पैसे मिल जाने से वे अपना इलाज करा लेंगे।

  बात यहीं पर हम दोनों के बीच उस दिन आई गई हो गयी और अगले दिन उन्होंने
20000/- का बैंक ड्राफ्ट बना कर गाँव भेज दिया।

       8-10के बाद उनके पास गाँव से रजिस्टर्ड पोस्ट से एक लिफाफा आया जो उनके
पिताजी ने भेजा था उन्होंने उस पत्र को पढ़ा और मुझसे कहा- मेरे पिताजी एकदम
बचकाना हरकत कर रहे हैं।मैने उनको 20000/-भेजे, उन्होंने वापिस लौटा दिए हैं।

मेने पूछा- ......वापिस क्यों लौटा दिए ?कुछ लिखा होगा ?

वो बोले- हाँ ,लिखा है ....और उन्होंने वह पत्र मुझे दे दिया। मेने उस पत्र को पढ़ा।
उसमे लिखा " बेटे,तुम्हारा जबाब मिला और साथ में ड्राफ्ट भी।मेने अपनी तबियत
अस्वस्थ थी इसलिए तुझे गाँव आने का लिखा था।तूने जो रूपये भेजे हैं वो तो मेरे ही
दिए हुए थे उसका कोई तकाजा मेने नहीं किया इसलिए ये रूपये वापिस भेज रहा हूँ।
मेने तो अपने बेटे को बुलाया था जो इस अवस्था में मुझे सहारा दे सकता था लेकिन
पैसे कमाने की चिंता मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर है तेरे लिए,यह जानकार मुझे दु:ख हुआ।
तुम वहां सुखी रहो ,मेरी चिंता मत करना।मैं जैसे तैसे अपनी गाडी चला लूंगा।

    मेने वह पत्र अपने परिचित मित्र को वापिस दे दिया।कुछ दिनों बाद मालुम चला
कि मेरे परिचित व्यापारी के पिता का देहांत गाँव में हो चूका है और उनका इकलोता
बेटा  सुरत से सपरिवार अंतिम संस्कार के लिए गया है।

     यह घटना मुझे झकजोर गयी थी।मेरे भारत की यह तस्वीर कैसे बन गयी क्योंकि
मेरी संस्कृति सिखाती है-मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: ....कहाँ खो गयी वो भावनाएँ ......