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16.9.09

स्‍वर्ग में गरीबी


गरीबी और भुखमरी वि‍श्‍वबैंक और अमरीकी कारपोरेट घरानों का सबसे प्रि‍य वि‍षय है। यह वि‍षय जि‍तना त्रासद है उतना ही उपेक्षा का शि‍कार भी है। वि‍श्‍वबैंक की सन् 2008 में जारी एक रि‍पोर्ट के अनुसार सारी दुनि‍या में सन् 2005 में 350 करोड़ से ज्‍यादा जनसंख्‍या ढाई डालर प्रति‍दि‍न के आधार पर गुजारा कर रही थी। इनमें भी 44 प्रति‍शत लोग मात्र सवा डालर प्रति‍दि‍न के आधार पर ही गुजारा कर रहे थे। अब इतनी बड़ी जनसंख्‍या के पास जब खाने के ही लाले पड़े हैं तो ऐसे में फोन,मोबाइल,घर,दवा,चि‍कि‍त्‍सा आदि‍ की बातें तो स्‍वर्ग की कल्‍पना नजर आती हैं। सारी दुनि‍या में प्रति‍दि‍न भूख से तीस हजार लोग मर जाते हैं। इनमें पांच साल से कम उम्र के 85 प्रति‍शत बच्‍चे कुपोषण ,भूख और इलाज होने लायक बीमारि‍यों के कारण ही मर जाते हैं।गैर जरूरी कारणों से मरने वालों की संख्‍या वि‍गत चालीस सालों में 30लाख का आंकड़ा पार कर गयी है। इन मरने वालों में वे लोग ज्‍यादा हैं जो अभागे स्‍थानों में पैदा हुए हैं।

अभागे और भाग्‍यवानों के बीच में बंटे हुए इस संसार में संपत्‍ति‍ भी बंटी हुई है। डेवि‍ड रूथकॉफ ने 'सुपरक्‍लास' नामक कि‍ताब में लि‍खा है कि‍ दुनि‍या के सर्वोच्‍च दस प्रति‍शत वयस्‍कों के पास सारी दुनि‍या की 84 प्रति‍शत दौलत है। जबकि‍ सबसे नीचे के लोगों के पास एक प्रति‍शत दौलत है। इन दस प्रति‍शत दौलतमंदों में एक हजार बि‍लि‍नि‍यर हैं। अमीरी और गरीबी के बीच का यह आंकडा क्‍या सि‍र्फ भाग्‍य का खेल है ?चांस की बात है ?पूर्वजन्‍म के पुण्‍य का फल है ?अथवा कुछ और है ?

सारी दुनि‍या में कि‍सान सबसे ज्‍यादा खाद्य पैदा करता है। वह इतना पैदा करता है कि‍ सारी दुनि‍या का आसानी से पेट भरा जा सके,इसके बावजूद अगर लोग भूख और गरीबी के शि‍कार हैं तो यह भाग्‍य और भगवान का खेल तो कम से कम नहीं हो सकता। सन् 2007 में सारी दुनि‍या में कि‍सानों ने 2.3 बि‍लि‍यन टन गेंहूँ पैदा कि‍या जो सन् 2006 की पैदावार से चार प्रति‍शत ज्‍यादा था। इसके बावजूद भूखों की तादाद करोडों में पहुँच गयी है।

अब एक नया नारा कारपोरेट जगत में चल नि‍कला है कि‍ 'भूखा रखो अमीर बनो'। अमीरों की अमीरी भाग्‍य का खेल नहीं है बल्‍कि‍ अमीरों की संवेदनहीनता और लालसा का खेल है। वे लोग आम आदमी को भूख से मारकर अमीर बन रहे हैं। अमीरी के इस नुस्‍खे में 'हल्‍दी लगे न फि‍टकरी रंग चोखो ही चोखो' की कहावत चरि‍तार्थ हो रही है। ऊपर से चैनलों में बाबा रामदेव से लेकर श्रीश्री रवि‍शंकर तक सभी परलोक, भगवान,भाग्‍य का उपदेश देते रहते हैं। इन लोगों को कभी यह तथ्‍य समझ में नहीं आता कि‍ गरीबी और भुखमरी का कारण भाग्‍य और भगवान नहीं है। यह सवाल पैदा होता है कि‍ कभी ये बाबा ,संत और महंत गरीबी और भुखमरी के लि‍ए अमीरों पर आग बरसाते क्‍यों नजर नहीं आते ? वस्‍तुओं की जमाखोरी से पैदा होने वाले बेशुमार धन को कारपोरेट घराने सट्टाबाजार में लगाते हैं और एक के सौ बनाते हैं। अमीरों के लि‍ए अकाल,सूखा और भुखमरी चिंता की चीज नहीं हैं बल्‍कि‍ उनके लि‍ए आनंद, उल्‍लास और मुनाफे की खबर है।

अब हम जरा अमीरों के स्‍वर्ग अमरीका की ओर नजर डालें कि‍ वहां क्‍या हो रहा है। गरीबी,भुखमरी और बेकारी के प्रति‍ कारपोरेट मीडि‍या का क्‍या रवैयया है ? अमरीका की गरीबी और तबाही का सबसे ज्‍यादा आख्‍यान वेबसाइट पर उपलब्‍ध है। चमकीले चैनलों और कारपोरेट प्रेस में अमरीकी तबाही का आख्‍यान एकसि‍रे से गायब है। अमेरि‍का के स्‍वयंसेवी संगठनों की वेबसाइटें गरीबी और तबाही के आख्‍यान से भरी हैं।

अक्‍टूबर 2008 में गरीबों के बारे में जारी एक रि‍पोर्ट बताती है कि‍ अमेरि‍का में 28 प्रति‍शत से ज्‍यादा परि‍वार ऐसे हैं जि‍नके दोनों या एक अभि‍भावक काम करते हैं और गरीबी में जीने के लि‍ए अभि‍शप्‍त हैं। सन् 2004 से 2006 के बीच के श्रम वि‍भाग और जनसंख्‍या वि‍भाग से प्राप्‍त आंकड़े बताते हैं कि‍ 9.6 मि‍लि‍यन परि‍वार ऐसे हैं जो सबसे कम आमदनी वाली 'अति‍गरीब' की केटेगरी में रखे जा सकते हैं। ये वे लोग हैं जो आधि‍कारि‍क स्‍तर पर गरीबी की जो परि‍भाषा है उससे 200 प्रति‍शत कम कमाते हैं। सन् 2002 में तकरीबन 2.1 मि‍लि‍यन बच्‍चे 'अति‍गरीब' की केटेगरी में आते थे जि‍नकी संख्‍या सन् 2006 में बढकर आठ लाख का आंकड़ा पार कर गयी है। सन् 2006 में 29 मि‍लि‍यन रोजगार 'अति‍गरीब' केटेगरी में आते थे, इन लोगों को सरकार द्वारा घोषि‍त वेतनमान से भी कम वेतन दि‍या जाता था। इन 'अति‍गरीब' मजदूरों की संख्‍या बढकर पांच मि‍लि‍यन का आंकडा पार कर गयी है। सन् 2002 से 2006 के बीच में अमरीका में परि‍वारों की आमदनी में असमानता तेजी से बढ़ी है। सन् 2006 में सर्वोच्‍च 20 प्रति‍शत अमरीकी परि‍वारों की आमदनी सबसे नि‍चले स्‍तर पर जीने वाले परि‍वार की आमदनी से 9.2 गुना ज्‍यादा दर्ज की गई।

सन् 2008 के आंकड़े बताते हैं कि‍ अमेरि‍का में 13.2 प्रति‍शत जनसंख्‍या गरीबी में जी रही है। अमेरि‍का में गरीबी का यह वि‍गत 11 सालों का सर्वोच्‍च आंकड़ा है। इनमें अफ्रीकन अमेरि‍की आबादी में गरीबों की तादाद दुगुना हो गयी है तकरीबन24.7 प्रति‍शत आंकी गयी है। मंदी के कारण तकरीबन 31 प्रति‍शत अमेरि‍कि‍यों में गरीबी ने अपने पैर पसारे हैं। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि‍ सन् 2008 में 39.8 मि‍लि‍यन लोग अभावपूर्ण अवस्‍था में जी रहे थे।सन् 1960 के बाद का अभावग्रस्‍त लोगों का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है।सन् 1999-2008 के दौरान प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍ अमेरि‍की आय में अभूतपूर्व गि‍रावट आई है। यह स्‍थि‍ति‍ तब है जब कि‍ युद्ध के बहाने सैन्‍य उद्योग को चंगा करने की कोशि‍श की गई और इसके बावजूद आम जनता की जीवनदशा में गि‍रावट को रोका नहीं जा सका।

आर्थि‍क मंदी आने के बाद से अमेरि‍का की सामाजि‍क असमानता और भी बढी है। आज प्रति‍ आठ में से एक व्‍यक्‍ति‍ को गरीबी ने तबाह कर रखा है। तकरीबन 25 लाख लोग सालाना कारखानाबंदी,छंटनी आदि‍ कारणों से लोग अति‍गरीबी की केटेगरी में ठेले जा रहे हैं। ये आंकड़े 1998 के गरीबी के स्‍तर से तुलना करके जारी कि‍ए गए हैं।

अश्वेत परिवारों की तुलना में श्वेत परिवारों के पास नौ गुना ज्यादा संपदा है। इसी तरह अश्वेत युवाओं की तुलना में श्वेत युवाओं के पास सात गुना ज्यादा संपदा है। अमरीका में गरीबों में खासकर अफ्रीकी-अमरीकी नागरिकों में बीमारियों ने अपने घर बसा लिए हैं। अमरीका के 75 फीसदी टीवी के शिकार अश्वेत हैं। स्वयं ओबामा के राज्य इलीनोसिस में एचआईवी-एड्स के अधिकांश मरीज अश्वेत हैं। दस में से तीन काले और लातिनी लोग गरीबी में गुजारा कर रहे हैं। इसी तरह गरीब अश्वेत बच्चों की तादाद श्वेत बच्चों की तुलना में तीन गुना ज्यादा है।

अमरीका के आंकड़े बताते हैं कि सन् 2007 में बच्चों में भुखमरी 50 फीसद बढ़ी है। अमरीका में सन् 2007 में 691,000 बच्चे भुखमरी के शिकार थे। यह संख्या विगत वर्ष की तुलना में पचास फीसदी ज्यादा है। प्रति आठ अमरीकियों में एक अमरीकी अपना पेट मुश्किल से भर पाता है। तकरीबन 36.2 मिलियन लोग इस वर्ष भूख से लड़ रहे थे। यानी उन्हें किसी एक समय बिना खाए रहना पड़ रहा है। सन् 2007 में भयानक भूख से पीड़ितों की संख्या 11.9 मिलियन थी। यानी सन् 2000 की तुलना में भूखे लोगों की संख्या में 49 फीसद का इजाफा हुआ है।

सन् 2008 की आर्थिक मंदी के बाद भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या और भी ज्यादा होने की संभावना है। चार लोगों के परिवार की आय 21,027 डालर के नीचे है तो उसे गरीब परिवार की केटेगरी में रखा जाता है। इतनी कम आय के लोगों को खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है। खाद्य असुरक्षितों की संख्या बढ़कर 37.7 फीसद हो गयी है। इनमें अफ्रीकी-अमेरिकी परिवारों में 22.2 फीसद परिवार खाद्य असुरक्षा के शिकार हैं। 20.1 फीसदी हिसपेनिक परिवार, एकल महिला अभिभावक 30.2 फीसद परिवार और एकल पुरूष अभिभावक परिवारों की संख्या 18 फीसद है। यानी एकल अभिभावक परिवार ज्यादा गरीब हैं।

अमरीका के दक्षिणी राज्यों में ज्यादा खाद्य असुरक्षा है। इनमें मिसीसिपी (17.4 फीसद),न्यू मैक्सिको ( 15 फीसद) ,टेक्सास ( 14.8 फीसद) और अरकन्सास ( 14.4 फीसद) में सबसे ज्यादा गरीबी है। खाद्य असुरक्षा सिर्फ शहर के अंदरूनी इलाकों अथवा महानगरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों और कम आबादी के इलाकों में भी खाद्य असुरक्षा ने पांव पसार दिए हैं। कम आबादी वाले अलास्का और लोवा में विगत नौ सालों से भयानक खाद्य असुरक्षा चल रही है। उल्लेखनीय है कि अमरीका में खाने पर ही लोग सबसे ज्यादा खर्च करते हैं। नए संकट ने सभी को खाने के बजट में कमी करने को मजबूर किया है।

13.9.09

अमरीका का राजनीति‍क सच

अमरीका की कारपोरेट राजनीति की धुरी है 'कारपोरेट जनतंत्र' (अमरीकी लोकतंत्र को जनता का जनतंत्र समझने की भूल नहीं करनी चहिए) ,अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद। अमरीका की राजनीति में कोई भी दल सत्ता में आए उसे अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम के तहत ही अपना राजनीतिक कार्यक्रम घोषित करना होता है। ओबामा भी इसी दायरे में परिक्रमा कर रहे हैं। अनेक मामलों में ओबामा और उनके सहयोगी अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के कट्टर समर्थक हैं। इस तथ्य की पुष्टि ओबामा के द्वारा जो नयी प्रशासनिक टीम बनायी जा रही है उसमें शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक समझ और भूमिकाओं के अब तक के रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से समझी जा सकती है।

दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय मीडिया अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम से बंधा है। यही वजह है कि अंधराष्ट्रवादी और यहूदीवादी कट्टरपंथियों के विचारों को इसबार के चुनावों में व्यापक कवरेज मिला है। बहुराष्ट्रीय मीडिया नीति है अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद को तार्किक ,'जेनुइन' और 'स्वाभाविक' विचार के रूप में पेश करो। यही फिनोमिना हमारे देश में स्थानीय मीडिया ने भी आत्मसात कर लिया है। अंधराष्ट्रवादी, कट्टरपंथी और कंजरवेटिव राजनीतिक शक्तियों का कवरेज प्रतिदिन बढ़ रहा है। उन्हें लोकतंत्र का संरक्षक और जनता का हितैषी बताया जा रहा है।

'नाइन इलेवन ' की घटना के बाद अमरीकी राजनीति ज्यादा आक्रामक और अधिनायकवादी रूझानों की ओर बढ़ी है। राष्ट्रीय संप्रभुता को अस्वीकार करने की भावना और भी ज्यादा बलवती हुई है। 'राजनीतिक आक्रामकता' और 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का बाजार की आक्रामक रणनीति के साथ गहरा संबंध है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में टेलीविजन ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है। टेलीविजन के विस्तार के साथ 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का विस्तार हुआ है। साथ ही 'शो बिजनेस' संस्कृति ने समूचे परिदृश्य को घेर लिया है।

'शो बिजनेस' संस्कृति साधारण आदमी की सोचने की क्षमताओं का अपहरण कर लेती है। वह ऐसा वातावरण बनाती है कि व्यक्ति को दमन-उत्पीडन में मजा आने लगता है। सब समय अपने कर्म और कुकर्म की वैधता तलाशते रहते हैं। स्वयं के हाथों अपनी पीठ ठोंकते हैं। स्वयं को शाबाशी देते हैं। आज किसी भी चीज पर पाबंदी की जरूरत नहीं है। मसलन् टीवी परेशान कर रहा है अथवा इंटरनेट परेशान कर रहा है तो पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है। बल्कि इनके जरिए जो सूचनाएं संप्रेषित की जा रही हैं वे ठंडी हैं, सक्रिय नहीं करतीं और थोथा ज्ञानबोध पैदा करती हैं। ये हमारे अज्ञानबोध अथवा चीजों को छिपाने में मदद करती हैं। पहले हम सूचनाओं के जरिए उद्धाटत करते थे इनदिनों सूचना के जरिए छिपाने का काम करते हैं। फलत: सत्य अप्रासंगिक हो जाता है। आज मनुष्य के जीवन में असंख्य समस्याएं हैं,पीड़ाएं हैं,असंख्य विचलन हैं,असंख्य किस्म के दबाव हैं इसके कारण हम विनाश और तबाही से भी प्रेम करने लगे है। हमें तबाही से भिन्ना वातावरण नजर ही नहीं आता। हम मीडिया में अपने ही विनाश का आनंद लेते रहते हैं। अपने ही विनाश पर तालियां बजाते रहते हैं। विनाश की खबर अब परेशान नहीं करती बल्कि दर्प,विजय और आनंद के साथ दाखिल होती है।

'शो बिजनेस' का ही कमाल है कि आज सबसे ज्यादा क्लासिक बिक रहे हैं,देखे जा रहे हैं,विचारवान साहित्य भी बिक रहा है किंतु इस समूची प्रक्रिया में ज्ञान का प्रबंधन कर लिया गया है। आलोचनात्मक विश्लेषण का प्रबंधन कर लिया गया है। हमें बताने वाले ज्ञानी लोग मीडिया पर अहर्निश बैठे रहते हैं कि क्या सही और क्या गलत है और इसके बावजूद हमें सही और गलत में अंतर करने में असुविधा हो रही है। पहले हम तथ्य और विचारों को व्यवस्थित करके ,वर्गीकृत करके पढ़ते थे, जिनके लिए ये विचार हुआ करते थे वह जनता भी इस कार्य में सक्षम होती थी आज किंतु यह स्थिति एकसिरे से बदल गयी है।

टेलीविजन युग में चीजों,वस्तुओं और विचारों की रोचक प्रस्तुति की बजाय प्रत्येक चीज को मनोरंजक रूप दे दिया गया है। टेलीविजन संस्कृति के जरिए आप स्वयं को जान सकते हैं। टीवी की प्रत्येक स्टोरी का यह अर्थ नहीं है कि उसका सामाजिक प्रभाव होगा ही। टीवी प्रस्तुतियों का लक्ष्य होता है दर्शक को आगे की स्टोरियों के प्रति आकर्षित करना, उसके इंतजार में बिठाए रखना। किताब और अन्य माध्यमों की यह विशेषता है कि वे अपनी शैली और अंतर्वस्तु की निरंतरता को बनाए रखती हैं किंतु टेलीविजन में ऐसा कुछ भी नहीं है। टीवी को निरंतर देखने के कारण हम टीवी विच्छिन्नाता के आदी हो जाते हैं। टेलीविजन ज्ञानमीमांसात्मक तौर पर यह धारणा पैदा करता है कि हम टीवी में जो कुछ भी देखते हैं वह अतिरंजित होता है। अतिरंजित प्रस्तुति के कारण उसकी प्रस्तुतियों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।

टेलीविजन विमर्श के सैध्दान्तिक चरित्र को निर्मित करने में सुरियलिस्ट अथवा अति-यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य हमारी मदद कर सकता है। नील पोस्टमैन ने '' एम्युजिंग अवरसेल्व्स टु डेथ: पब्लिक डिसकोर्स इन दि एज ऑफ शो बिजनेस'' (पेंगुइन बुक्स,1985) में लिखा है टेलीविजन खबरें मूलत: संचार विरोधी सैध्दान्तिकी के ढांचे में सजाकर पेश की जाती हैं। इनका लक्ष्य होता है तर्क,विवेक, क्रम और अन्तर्विरोध की विदायी।

राबर्ट मेकनील के अनुसार टेलीविजन खबरों में प्रत्येक चीज संक्षिप्त रहती है। जिससे किसी के ध्यान पर दबाव न पड़े, बल्कि दर्शक सहजभाव से वैविध्य,विविष्टता,एक्शन और मूवमेंट को ग्रहण करता रहे। दर्शक किसी अवधारणा ,चरित्र और समस्या पर चंद सैकिण्ड से ज्यादा ध्यान न दे। खबर को 'खाने के कौर' की तरह होना चाहिए,उसमें जटिलताएं न हों, नॉनसेंस अपरिहार्य है, इस गुण के कारण संदेश सहज होता है।

टीवी में दृश्य प्रस्तुतियों को विचारों का विकल्प बनाकर पेश किया जाता है। एंकर की बकबक अराजकता है। अमरीकी लोग व्यापक मनोरंजन करते हैं और पश्चिमी जगत के सबसे कम सूचना सम्पन्ना नागरिक माने जाते हैं। वे प्रत्येक विषय पर अपनी राय भी रखते हैं। उनकी राय को राय न कहकर भावनाएं कहना ज्यादा सटीक होगा। वे किसी विषय पर राय नहीं अपनी भावनाओं की अभिव्यक्त करते हैं। ये भावनाएं प्रति सप्ताह बदलती रहती हैं। राय प्रति सप्ताह नहीं बदलती। राय टिकाऊ होती है भावनाएं अस्थिर होती हैं। अमरीकी नागरिकों की इन बदलती भावनाओं को हम बदलते हुए विभिन्ना किस्म की रायशुमारी में निरंतर देखते हैं। रायशुमारी की राय इसलिए बदलती रहती है क्योंकि प्रति सप्ताह तथ्य बदलते रहते हैं। इस प्रक्रिया में टेलीविजन यह विभ्रम पैदा करता है कि वह सूचना दे रहा है और सूचनाप्राणी तैयार कर रहा है। टेलीविजन के द्वारा दी गयी तथाकथित सूचना 'कुसूचना' (डिसइन्फोर्मेशन) होती है। 'कुसूचना' का अर्थ असत्य सूचना नहीं है बल्कि इसका अर्थ दिग्भ्रमित करने वाली सूचना है। गलत सूचना, अप्रासंगिक सूचना, सतही सूचना,ऐसी सूचना जो जानकारी का विभ्रम पैदा करे। बल्कि वह जो जानता है उससे भी दूर ले जाए । ज्ञान से परे ले जाए । ज्ञान से विच्छिन्न कर दे।

आज खबर को मनोरंजन के पैकेज में तैयार किया जाता है। फलत: टीवी खबर मनोरंजन तो करती है सूचना नहीं देती। जनता को प्रामाणिक सूचनाओं से वंचित करती है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि सुसंगत सूचना सम्पन्ना का अर्थ क्या होता है। अज्ञानता को हमेशा दुरूस्त किया जा सकता है। किंतु अज्ञानता को ज्ञान के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। वाल्टर लिपमैन ने लिखा है '' आजादी का कोई अर्थ नहीं यदि समुदाय के पास झूठ को खोज निकालने के उपकरण ही न हों।'' प्रशिक्षित प्रेस एक तरह से झूठ के उद्धाटन का काम करता है। टेलीविजन की सारी मुश्किलें यहीं पर छिपी हैं। असत्य की चादर को उघाड़ने का काम वह नहीं कर पाता। टीवी इमेजों का लक्ष्य दर्शक अथवा उपभोक्ता के अंदर अपील पैदा करना लक्ष्य होता है सत्य को पेश करना लक्ष्य नहीं होता। टीवी में विवेक और विज्ञापन में अंतर करना मुश्किल हो गया है। विवेक और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल हो गया है।