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17.9.09

प्रायोजि‍त लोकतंत्र का प्रहसन

अफगानि‍स्‍तान में पश्‍चि‍मी लोकतंत्र का प्रहसन चल रहा है। हाल ही में वहां पर राष्‍ट्रपति‍ पद के लि‍ए चुनाव हुए हैं और यह कहा जा रहा है कि‍ यह लोकतंत्र की जीत है। पहली बात यह कि‍ अफगानि‍स्‍तान में लोकतंत्र नहीं नाटो का सेनातंत्र है। नाटो लोकतंत्र पश्‍चि‍म का नया फि‍नोमि‍ना है। सैन्‍य मौजूदगी और अफगानी जनता की संप्रभुता को रौंदते हुए राष्‍ट्रपति‍ चुनाव सम्‍पन्‍न हुए हैं। यहां पर पक्ष-वि‍पक्ष दोनों का ही फैसला पेंटागन और सीआईए के नीति‍ नि‍र्धारकों ने कि‍या था। इस चुनाव को जनतंत्र कहना और अफगानि‍स्‍तान प्रशासन को संप्रभु सुशासन का नाम देना सही नहीं होगा।

20 अगस्‍त 2009 को राष्‍ट्रपति‍ के पद के लि‍ए मतदान हुआ और अभी तक ( 16 सि‍तम्‍बर 2009) प रि‍णाम नहीं आए हैं। वि‍देशी पर्यवेक्षकों से भरा नि‍गरानी कमीशन 2,740 शि‍कायतों की जांच कर रहा है। उन तमाम मतदान केन्‍द्रों पर दोबारा मतगणना के आदेश दि‍ए गए हैं जहां पर राष्‍ट्रपति‍ करजई को शत-प्रति‍शत मत मि‍ले हैं। उल्‍लेखनीय है कि‍ जि‍न मतदान केन्‍द्रों पर 600 से ज्‍यादा वोट पड़े हैं उन सभी मतदान केन्‍द्रों पर करजई को शत-प्रति‍शत वोट मि‍ले हैं।

8 सि‍तम्‍बर को 92 प्रति‍शत वोटों की गि‍नती के बाद जारी प्राथमि‍क परि‍णामों में करजई को 54 प्रति‍शत,मुख्‍य वि‍पक्षी उम्‍मीदवार अब्‍दुल्‍ला अब्‍दुल्‍ला को 28.1 प्रति‍शत वोट मि‍ले हैं। 'डेमोक्रेटि‍क इंस्‍टीटयूशन एंड ह्यूमन राइटस' संगठन का कहना है कि‍ गणना कि‍ए गए मतों में से कुल 1,253,806 वोट जाली पाए गए हैं। यानी 23 प्रति‍शत जाली मत ड़ाले गए हैं। यदि‍ जाली मतों को करजई के मतों में से नि‍काल दि‍या जाए तो उन्‍हें मात्र 47.48 प्रति‍शत मत ही प्राप्‍त हुए हैं। जो उन्‍हें वि‍जयी घोषि‍त करने के लि‍ए पर्याप्‍त नहीं हैं। वि‍जयी घोषि‍त करने के लि‍ए 50 प्रति‍शत से ज्‍यादा मत प्राप्‍त करना जरूरी है। मजेदार तथ्‍य यह है कि‍ तकरीबन चार मि‍लि‍यन मतदाताओं ने वोट ड़ाले हैं इनमें मात्र 17 मि‍लि‍यन रजि‍स्‍टर्ड मतदाता हैं। सवाल यह है कि‍ गैर रजि‍स्‍टर्ड मतदाताओं ने वोट कैसे डाले ? यह सीधे चुनावी धांधली है।

अमेरि‍का ने अफगानि‍स्‍तान में लोकतंत्र का जो नाटक कि‍या है वैसा नाटक वह और भी अनेक देशों में कर चुका है। इसमें पक्ष और वि‍पक्ष कौन होगा,क्‍या मसले होंगे,कौन वोट देगा और कौन जीतेगा इत्‍यादि‍ फैसले मतदान के पहले ही सीआईए के द्वारा ले लि‍ए जाते हैं और मतदान के परि‍णामों के बहाने उनकी घोषणा कर दी जाती है। अफगानि‍स्‍तान और इराक में अमेरि‍का और उसके सहयोगी राष्‍ट्रों की सेना का कब्‍जा बुनि‍यादी तौर पर अवैध है,यह इन दोनों देशों की संप्रभुता का हनन है। अफगानि‍स्‍तान की गद्दी पर बैठने वाला कोई हो वह अमेरि‍का की कठपुतली की तरह काम करने के लि‍ए मजबूर है। लैटि‍न अमेरि‍का के देशों में कठपुतलि‍यों को नचाने का अमेरि‍का को गाढ़ा तजुर्बा है। लैटि‍न अमेरि‍का में ही सेना और भाड़े के सैनि‍कों बलबूते पर लोकतंत्र का नाटक भी वर्षों चला है। अफगानि‍स्‍तान में लैटि‍न अमेरि‍का का प्रयोग ही दोहराया जा रहा है।

अफगानि‍स्‍तान में नाटो की सेनाओं के रहते हुए अफगानी तालि‍बानों के हमले बढे हैं। वि‍भि‍न्‍न इलाकों में उनकी हमलावर कार्रवाईयों में तेजी आयी है। अफगानि‍स्‍तान में नाटो की सेनाओं की संख्‍या बढी है,भाड़े के सैनि‍कों की संख्‍या में बढोतरी हुई है।अफगानि‍स्‍तान का सन् 2007-08 की मानव वि‍कास रि‍पोर्ट में शामि‍ल 178 देशों में से 174वां स्‍थान है। यह दशा तब है जब अफगानि‍स्‍तान पर नाटो के कब्‍जे को आठ साल हो चुके हैं।

वि‍भि‍न्‍न बहुराष्‍ट्रीय जनमाध्‍यमों के पत्रकार अपनी खबरों में अफगानि‍स्‍तान के चुनाव की प्रक्रि‍या पर ही लि‍खते रहे जबकि‍ अफगानि‍स्‍तान में समस्‍या चुनावी प्रक्रि‍या की नहीं उसकी संप्रभुता की है। अफगानि‍स्‍तान जब तक नाटो सेनाओं के कब्‍जे में है कि‍सी भी कि‍स्‍म के चुनाव का कोई अर्थ नहीं है चाहे वह अंतर्राष्‍ट्रीय पर्यवेक्षकों की नि‍गरानी हो अथवा कि‍सी अन्‍य की नि‍गरानी में हो। चुनाव की महत्‍ता तब है जब अफगानि‍स्‍तान वि‍देशी सेनाओं की कैद से मुक्‍त हो जाए। उसके बाद वहां की जनता तय करे कि‍ शासनप्रणाली कैसी हो।

अफगानि‍स्‍तान की आंतरि‍क जनसंख्‍या संरचना में 42 फीसदी पख्‍तून जनजाति‍ के लोग हैं। लेकि‍न इनका शासन में कोई खास दखल नहीं है। बल्‍कि‍ शासन की मशीनरी जैसे पुलि‍स,सेना,गुप्‍तचर सेवा आदि‍ प्रशासनि‍क हल्‍कों में ताजि‍क जाति‍ का ही वर्चस्‍व है। ताजि‍क जाति‍ अल्‍पसंख्‍यक हैं। मोहम्‍मद करजई का प्रशासन ताजि‍कों पर पूरी तरह नि‍र्भर है। अभी तक तालि‍बान का अफगानि‍स्‍तान में प्रभाव बने रहने का बड़ा कारण पख्‍तून जनजाति‍ में तालि‍बान का बने रहना। पख्‍तूनों में तालि‍बानों की पकड़ अभी भी बरकरार है। करजई प्रशासन ने वि‍गत पांच सालों में पख्‍तूनों का दि‍ल जीतने के लि‍ए कोई भी प्रभावशाली कदम नहीं उठाया और इस उपेक्षा को तालि‍बान ने अपनी राजनीति‍क पूंजी में तब्‍दील कि‍या है।

20 अगस्‍त 2009 को हुए राष्‍ट्रपति‍ चुनाव में व्‍यापक धांधली के आरोप लगाए गए हैं। राष्‍ट्रपति‍ करजई के खि‍लाफ आधा दर्जन उम्‍मीदवार खड़े हुए थे इनमें भू.पू. वि‍देशीमंत्री अब्‍दुल्‍ला अब्‍दुल्‍ला प्रमुख प्रति‍द्वंद्वी थे और इन सभी वि‍पक्षी उम्‍मीदवारों ने चुनाव में व्‍यापक पैमाने पर धांधली का आरोप लगाया है। कि‍स माहौल में चुनाव हुआ है इसका आदर्श उदाहरण है दक्षि‍णी अफगानि‍स्‍तान के दो प्रांत कंधहार और हि‍लमंद । इन दोनों प्रान्‍तों में नाटो सेना और गुरि‍ल्‍लाओं के बीच घमासान युद्ध चल रहा था और उसी दौरान मतदान भी चल रहा था। युद्ध के दौरान लोग घर से नहीं नि‍कल पाए थे।वि‍भि‍न्‍न पर्यवेक्षकों और मीडि‍या वालों ने भी रि‍पोर्ट कि‍या कि‍ मतदान पांच प्रति‍शत से भी कम हुआ है। लेकि‍न राष्‍ट्रपति‍ करजई ने घोषणा की कि‍ इन दोनों राज्‍यों में 40 प्रति‍शत लोगों ने मतदान कि‍या। स्‍वतंत्र में मीडि‍या में धांधली की व्‍यापक खबरें प्रकाशि‍त हुईं इसके बावजूद ओबामा प्रशासन ने मतदान में व्‍यापकस्‍तर पर जनता की शि‍रकत का दावा कि‍या है। व्‍यापक धांधली की शि‍कायतों को अमेरि‍की प्रशासन के द्वारा लोकतंत्र के दर्द की संज्ञा दी गयी।अफगानि‍स्‍तान में धांधली के वीडि‍यो प्रमाण दि‍खाए जाने के बावजूद अमेरि‍की प्रशासन ने अफगानि‍स्‍तान के चुनाव को नि‍ष्‍पक्ष कहा है। इसके वि‍परीत ईरान में 12 जून 2009 को सम्‍पन्‍न हुए चुनाव के बारे में मतदान खत्‍म होते ही बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या और ओबामा प्रशासन ने हंगामा आरंभ कर दि‍या और कहा कि‍ ईरान के चुनावों में व्‍यापक पैमाने पर धांधली हुई है। मतदान खत्‍म होने के पहले ही ईरान के राष्‍ट्रपति‍ अहमदि‍नि‍जात के वि‍रोधी उम्‍मीदवार मीर हुसैन मासवी ने,जि‍से अमेरि‍का समर्थन और पैसा दोनों हासि‍ल था,उसने अपने को वि‍जयी घोषि‍त भी कर दि‍या था। अमेरि‍का से यह सवाल कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ अफगानि‍स्‍तान और ईरान के लि‍ए दो तरह पैमाने क्‍यों अपनाए गए ? अफगानि‍स्‍तान के लि‍ए अमेरि‍का के द्वारा नि‍युक्‍त वि‍शेषदूत हॉलब्रुक ने कहा कि‍ अफगानि‍स्‍तान में यदि‍ 10 प्रति‍शत मतों की गि‍नती न कि‍ए जाने को कोई धांधली नहीं माना जाए। इसके वि‍परीत ईरान में चुनाव मतपत्रों की गणना शुरू होने के पहले ही अमेरि‍की प्रशासन ने ईरान के चुनावों में धांधली का हल्‍ला शुरू कर दि‍या। आखि‍रकार अफगानि‍स्‍तान और ईरान को लेकर दो तरह के दृष्‍टि‍कोण का अमेरि‍की प्रशासन ने परि‍चय क्‍यों दि‍या ?

ईरान और अफगानि‍स्‍तान के चुनाव में दूसरी महत्‍वपूर्ण समानता यह है कि‍ ईरान के राष्‍ट्रपति‍ के समर्थकों ने मतों की गि‍नती शुरू होने के कुछ ही घंटे बाद दो-ति‍हाई मतों से जीत की घोषणा कर दी। अमरीकी मीडि‍या ने ईरान में चुनावी धांधली का इसे सबसे बड़ा प्रमाण माना और वि‍देशी माध्‍यमों में यह प्रचार आरंभ हो गया कि‍ वोटों की गि‍नती खत्‍म होने के पहले ही ईरान के राष्‍ट्रपति‍ को दो-ति‍हाई मतों से ईरानी प्रशासन ने वि‍जयी कैसे घोषि‍त कर दि‍या । मीडि‍या के अनुसार यह सीधे धांधली है। मजेदार बात यह है कि‍ ईरान के राष्‍ट्रपति‍ पद के अमेरि‍का समर्थित वि‍पक्षी उम्‍मीदवार ने मतदान के खत्‍म होने के पहले ही अपने को वि‍जयी घोषि‍त कर दि‍या था। इसी तरह अफगानि‍स्‍तान में करजई प्रशासन में वि‍त्‍तमंत्री हजरत उमर जखीलवाल ने मतदान खत्‍म होने के तीन दि‍न बाद ही 23 अगस्‍त को ही प्रेस को वि‍स्‍तार के साथ बता दि‍या कि‍ करजई जीत गए हैं। उन्‍हें 68 प्रति‍शत वोट मि‍ले हैं,साथ ही उन्‍होंने मीडि‍या को सटीक वोटों का वि‍स्‍तार के साथ ब्‍यौरा भी दे दि‍या। उन्‍होंने कहा कि‍ करजई को तकरीबन तीन मि‍लि‍यन वोट यानी 68 प्रति‍शत वोट मि‍ले हैं। जबकि‍ अब्‍दुल्‍ला अब्‍दुल्‍ला को 1.5 मि‍लि‍यन वोट मि‍ले हैं। अन्‍य उम्‍मीदवारों को पांच फीसद से भी कम वोट मि‍ले हैं। समूचे चुनाव में पांच मि‍लि‍यन वोट पड़े थे। हजरत उमर साहब ने जि‍स समय मीडि‍या को ये जीत के आंकड़े जारी कि‍ए उस समय तक साढ़े चार लाख वोटों की गि‍नती होनी बाकी थी। समस्‍या यह है कि‍ गि‍नती खत्‍म होने के पहले ही ईरान के राष्‍ट्रपति‍ के चुनाव परि‍णाम की घोषणा को बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या ने चुनावी धांधली करार दि‍या लेकि‍न अफगानि‍स्‍तान के वि‍त्‍तमंत्री की गि‍नती खत्‍म होने के पहले करजई की जीत की घोषणा को चुनावी धांधली नहीं माना। अफगानि‍स्‍तान में छह हजार मतदान केन्‍द्र बनाए गए जि‍नमें से मात्र 500 मतदान केन्‍द्रों के मतों की गणना के आधार पर ही करजई को नि‍र्वाचि‍त घोषि‍त कर दि‍या गया।इन सब तथ्‍यों की ओर से अमेरि‍की बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या आंखें बंद कि‍ए रहा। इसी को कहते हैं कारपोरेट मीडि‍या की अमेरि‍की हि‍तों की पक्षधरता। अमेरि‍की कारपोरेट मीडि‍या का अमरीका की वि‍देशनीति‍ से नाभि‍नालबद्ध संबंध है। यह तथ्‍य भी इससे पुष्‍ट होता है।

सभ्‍य देश का झूठा राष्‍ट्रपति‍

अमेरि‍का के राष्‍ट्रपति‍ बराक ओबामा ने हाल ही में स्‍वास्‍थ्‍य और चि‍कि‍त्‍सा की अमेरि‍का में स्‍थि‍ति‍ को लेकर हाल ही में अपने देश की सीनेट में जब बयान दि‍या तब उस बयान को लेकर सीनेटरों ने ओबामा को झूठा तक करार दे दि‍या। यह मामला थमा ही नहीं था कि‍ भू.पू.राष्‍ट्रपति‍ जि‍मी कार्टर ने आग में घी डालने वाला बयान दे डाला कि‍ ओबामा के खि‍लाफ जो लोग हल्‍ला मचा रहे हैं वे ओबामा के प्रति‍ रंगेभेदीय घृणा व्‍यक्‍त कर रहे हैं। कार्टर साहब के बयान में सच का लेशमात्र भी अंश नहीं है । सच यह है कि‍ राष्‍ट्रपति‍ ओबामा ने सीनेट में असत्‍य कहा था। ओबामा ने अपनी 40 मि‍नट के भाषण की शुरूआत ही इस वाक्‍य से की थी 'एक चि‍न्‍ता की खबर है', ' यह पता चला है कि‍ 65 साल की उम्र के तकरीबन आधे से ज्‍यादा अमरीकी आगामी 10 सालों अपनी स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी खो देंगे।'' और '' एक-ति‍हाई से ज्‍यादा लोगों के पास एक वर्ष से भी ज्‍यादा समय तक कोई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी नहीं होगी।'' सीनेटरों ने चीखकर ओबामा के बयान का प्रति‍वाद कि‍या और कहा कि‍ राष्‍ट्रपति‍ झूठ बोल रहे हैं। तथ्‍य ओबामा के बयान की पुष्‍टि‍ नहीं करते।

मि‍शिंगन वि‍श्‍ववि‍द्यालय के द्वारा सन्1997- 2006 के बीच 17 हजार लोगों में सर्वे कि‍या गया। उससे यह तथ्‍य सामने आया है कि‍ उपरोक्‍त दशक के दौरान 47.7 प्रति‍शत लोगों ने अपनी स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी खो दी। इसी अवधि‍ में 36 फीसद ऐसे भी लोग थे जि‍नके पास एक वर्ष तक कोई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी नहीं थी। असल में ओबामा ने इस सर्वे के आंकड़ों का दुरूपयोग कि‍या है और कहा कि‍ ऐसा भवि‍ष्‍य में हो सकता है। जबकि‍ यह सर्वे भवि‍ष्‍य के बारे में नहीं था अतीत के बारे में था। मजेदार बात यह है कि‍ इस तर्क वि‍तर्क का काले गोरे से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद भू.पू.जि‍मी कार्टर जैसे दि‍ग्‍गज नेता ने इस बहस को रंगभेदीय रंग दे दि‍या। जि‍मी कार्टर जो कह रहे हैं उसमें सत्‍य यही है कि‍ अमेरि‍का में अभी भी रंगभेद है। रंगभेदीय उत्‍पीडन अभी भी जारी है। लेकि‍न ओबामा के खि‍लाफ हाल ही में जि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं आई हैं उनमें ज्‍यादातर नस्‍लभेदीय नहीं हैं। मजेदार बात यह है जि‍स दि‍न जि‍मी कार्टर ने अपना बयान दि‍या उसी दि‍न स्‍कूली बच्‍चों की एक बस में बच्‍चों के बीच मारपीट हो गयी और उसे एक नस्‍लभेदीय नजरि‍ए से प्रेस में हवा दे दी गयी। प्रेस में छपे बयान में कहा गया कि‍ बस में सफर करने वाले गोरे बच्‍चे अब काले बच्‍चों के हाथों सुरक्षि‍त नहीं हैं।

सच यह है कि‍ ओबामा को गोरे-काले सभी रंगत के लोगों से व्‍यापक जनमर्थन मि‍ला था,इसके बावजूद उनकी जीत को सुनि‍श्‍चि‍त बनाने में श्‍वेत फंडामेंटलि‍स्‍टों और ईसाई फंडामेंटलि‍स्‍टों की भी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी।

जि‍मी कार्टर का बयान ओबामा को पुन: अस्‍मि‍ता की राजनीति‍ के वि‍वाद में ले जा सकता है, इससे अमेरि‍का में अस्‍मि‍ता की बहस फि‍र से जोर पकड़ सकती है।

'अस्मिता के सम्मोहन' के साँचे में सजाकर जब चीजें पेश की जाती हैं तो आप आलोचनात्मक नजरिए से मूल्यांकन करने में असमर्थ होते हैं। 'अस्मिता सम्मोहन' की राजनीति में आकर्षण और सम्मोहन दोनों है। इसके आधार पर विरोधियों को सम्मोहित करते हैं। छलते हैं। निरूत्तर करते हैं। यह खोखला सम्मोहन है। वह विरोधी को 'सम्मोहन' के नियमों के अनुसार खेलने के लिए मजबूर करता है। 'सम्मोहन' में वही देखते हैं जो दिखाया जाता है।

मीडिया प्रचार में ओबामा अश्वेत है, अश्वेत का अमरीका में जीतना सारी दुनिया में अश्वेतों या दलितों या वंचितों को प्रेरणा देता है। ओबामा अश्वेत है इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। अश्वेत होने के नाते वह युवाओं और राजनीति का आदर्श प्रेरक के रूप में उभर कर आए थे । लेकि‍न औबामा जि‍स वि‍चारधारा और राजनीति‍ का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करते हैं वह श्‍वेतों की राजनीति‍ है। ओबामा अमरीका की अश्वेत राजनीतिक परंपरा का हिस्सा नहीं है, वे कारपोरेट राजनीति के प्रतिनिधि हैं। कारपोरेट राजनीति के बिना ओबामा की कोई हैसियत नहीं है। ओबामा को लोग राष्‍ट्रपति‍ के रूप में जानते हैं न कि अश्वेत नेता के रूप में। अश्वेत असंतोष को ओबामा ने राजनीतिक पूंजी में तब्दील किया है। जिस तरह अन्य रिपब्लिकन नेता अश्वेत राजनीति के फल भोगते रहे हैं उसी तरह ओबामा भी फल भोग रहे हैं।

राजनीति सत्ता का खेल है । व्यक्ति जब एकबार सत्ता के खेल में शामिल हो जाता है तो उसकी श्वेत,अश्वेत,हिन्दू,मुसलमान, दलित,नारी आदि की पहचान गायब हो जाती है। राजनीति की अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक प्रक्रियाएं होती हैं जिसमें सिर्फ एक ही पहचान बचती है वह है राजनेता की और एक ही खेल होता है सत्ता का खेल। बाकी सब नाटक है।

राजनेता की पहचान व्यक्ति की समस्त अस्मिताओं को हजम कर जाती है। राजनेता कभी भी सत्ता के खेल के बाहर नहीं होता। श्वेत,अश्वेत,नारी,दलित आदि रूप सामाजिक जीवन में असर दिखाते हैं। व्यक्ति जब राजनीति करने लगता है तो वह सामाजिक पैराडाइम के बाहर चला जाता है। राजनीति उसका मूल पैराडाइम होता है। राजनीति पावर का क्षेत्र है अस्मिता का नहीं।

आंबेडकर दलित थे किंतु अंतत राजनीति का हिस्सा बने। राजनीति के पावरगेम का हिस्सा बने। दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकी कांग्रेस अश्वेतों का दल है,एक से बढ़कर एक अश्वेत क्रांतिकारी नेता इस दल ने पैदा किए हैं किंतु अंतत: अफ्रीकी कांग्रेस को राजनीति करनी है तो पावरगेम का हिस्सा बनना होगा और अश्वेत भावबोध को त्यागना होगा। आज अफ्रीकी कांग्रेस सत्ता की राजनीति कर रही है उसके कार्यकलापों का अस्मिता के कार्यकलापों के साथ प्रतीकात्मक संबंध है , निर्णायक संबंध पावरगेम के साथ है। श्रीमती इंदिरागांधी स्त्री थीं किंतु राजनीति के पावरगेम का हिस्सा थीं। यही दशा मायावती,ममता बनर्जी, जयललिता आदि नेत्रियों की है। सत्ता की राजनीति की चौपड़ में जब अस्मिता शामिल हो जाती है तो अस्मिता नहीं रहती बल्कि राजनीतिक पावरगेम में रूपान्तरित हो जाती है।

ओबामा अब काले नहीं हैं,डेमोक्रेट भी नहीं हैं। अमरीकी राजनीति के पावरगेम के नायक हैं। पावरगेम, नायक के द्वारा नहीं पावरगेम के मदारियों के द्वारा संचालित होता है। पावर वह है जो व्यक्ति पर प्रभुत्व स्थापित करता है। पावर के सामने व्यक्ति को समर्पण करना जरूरी है। पावर के सामने व्यक्ति का समर्पण ही राजनीति की धुरी है।

राजनीति के पावरगेम में शामिल होने के बाद व्यक्ति एक ऑब्जेक्ट बनकर रह जाता है। पावरगेम का अपना अनुशासन है। वह व्यक्ति के सामान्य कार्यव्यापार को इस तरह निर्देशित करता है जिससे सबको स्वाभाविक लगे। वह राजनीति के एथिक्स,व्यवहार आदि सीखता है। व्यक्ति आज्ञाकारी और ज्यादा उपयोगी हो जाता है। ओबामा ने कारपोरेट हि‍तों और अमरीका की प्रचलि‍त नव्‍य उदार नीति‍यों के सामने समर्पण कि‍या है और वे वही सब काम कर रहे हैं जो वि‍गत राष्‍ट्रपति‍ बुश कर रहे थे। इसका ही यह दुष्‍परि‍णाम है कि‍ अमेरि‍का में ओबामा की जनप्रि‍यता में तेजी से गि‍रावट आयी है।

13.9.09

अमरीका का राजनीति‍क सच

अमरीका की कारपोरेट राजनीति की धुरी है 'कारपोरेट जनतंत्र' (अमरीकी लोकतंत्र को जनता का जनतंत्र समझने की भूल नहीं करनी चहिए) ,अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद। अमरीका की राजनीति में कोई भी दल सत्ता में आए उसे अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम के तहत ही अपना राजनीतिक कार्यक्रम घोषित करना होता है। ओबामा भी इसी दायरे में परिक्रमा कर रहे हैं। अनेक मामलों में ओबामा और उनके सहयोगी अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के कट्टर समर्थक हैं। इस तथ्य की पुष्टि ओबामा के द्वारा जो नयी प्रशासनिक टीम बनायी जा रही है उसमें शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक समझ और भूमिकाओं के अब तक के रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से समझी जा सकती है।

दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय मीडिया अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम से बंधा है। यही वजह है कि अंधराष्ट्रवादी और यहूदीवादी कट्टरपंथियों के विचारों को इसबार के चुनावों में व्यापक कवरेज मिला है। बहुराष्ट्रीय मीडिया नीति है अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद को तार्किक ,'जेनुइन' और 'स्वाभाविक' विचार के रूप में पेश करो। यही फिनोमिना हमारे देश में स्थानीय मीडिया ने भी आत्मसात कर लिया है। अंधराष्ट्रवादी, कट्टरपंथी और कंजरवेटिव राजनीतिक शक्तियों का कवरेज प्रतिदिन बढ़ रहा है। उन्हें लोकतंत्र का संरक्षक और जनता का हितैषी बताया जा रहा है।

'नाइन इलेवन ' की घटना के बाद अमरीकी राजनीति ज्यादा आक्रामक और अधिनायकवादी रूझानों की ओर बढ़ी है। राष्ट्रीय संप्रभुता को अस्वीकार करने की भावना और भी ज्यादा बलवती हुई है। 'राजनीतिक आक्रामकता' और 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का बाजार की आक्रामक रणनीति के साथ गहरा संबंध है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में टेलीविजन ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है। टेलीविजन के विस्तार के साथ 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का विस्तार हुआ है। साथ ही 'शो बिजनेस' संस्कृति ने समूचे परिदृश्य को घेर लिया है।

'शो बिजनेस' संस्कृति साधारण आदमी की सोचने की क्षमताओं का अपहरण कर लेती है। वह ऐसा वातावरण बनाती है कि व्यक्ति को दमन-उत्पीडन में मजा आने लगता है। सब समय अपने कर्म और कुकर्म की वैधता तलाशते रहते हैं। स्वयं के हाथों अपनी पीठ ठोंकते हैं। स्वयं को शाबाशी देते हैं। आज किसी भी चीज पर पाबंदी की जरूरत नहीं है। मसलन् टीवी परेशान कर रहा है अथवा इंटरनेट परेशान कर रहा है तो पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है। बल्कि इनके जरिए जो सूचनाएं संप्रेषित की जा रही हैं वे ठंडी हैं, सक्रिय नहीं करतीं और थोथा ज्ञानबोध पैदा करती हैं। ये हमारे अज्ञानबोध अथवा चीजों को छिपाने में मदद करती हैं। पहले हम सूचनाओं के जरिए उद्धाटत करते थे इनदिनों सूचना के जरिए छिपाने का काम करते हैं। फलत: सत्य अप्रासंगिक हो जाता है। आज मनुष्य के जीवन में असंख्य समस्याएं हैं,पीड़ाएं हैं,असंख्य विचलन हैं,असंख्य किस्म के दबाव हैं इसके कारण हम विनाश और तबाही से भी प्रेम करने लगे है। हमें तबाही से भिन्ना वातावरण नजर ही नहीं आता। हम मीडिया में अपने ही विनाश का आनंद लेते रहते हैं। अपने ही विनाश पर तालियां बजाते रहते हैं। विनाश की खबर अब परेशान नहीं करती बल्कि दर्प,विजय और आनंद के साथ दाखिल होती है।

'शो बिजनेस' का ही कमाल है कि आज सबसे ज्यादा क्लासिक बिक रहे हैं,देखे जा रहे हैं,विचारवान साहित्य भी बिक रहा है किंतु इस समूची प्रक्रिया में ज्ञान का प्रबंधन कर लिया गया है। आलोचनात्मक विश्लेषण का प्रबंधन कर लिया गया है। हमें बताने वाले ज्ञानी लोग मीडिया पर अहर्निश बैठे रहते हैं कि क्या सही और क्या गलत है और इसके बावजूद हमें सही और गलत में अंतर करने में असुविधा हो रही है। पहले हम तथ्य और विचारों को व्यवस्थित करके ,वर्गीकृत करके पढ़ते थे, जिनके लिए ये विचार हुआ करते थे वह जनता भी इस कार्य में सक्षम होती थी आज किंतु यह स्थिति एकसिरे से बदल गयी है।

टेलीविजन युग में चीजों,वस्तुओं और विचारों की रोचक प्रस्तुति की बजाय प्रत्येक चीज को मनोरंजक रूप दे दिया गया है। टेलीविजन संस्कृति के जरिए आप स्वयं को जान सकते हैं। टीवी की प्रत्येक स्टोरी का यह अर्थ नहीं है कि उसका सामाजिक प्रभाव होगा ही। टीवी प्रस्तुतियों का लक्ष्य होता है दर्शक को आगे की स्टोरियों के प्रति आकर्षित करना, उसके इंतजार में बिठाए रखना। किताब और अन्य माध्यमों की यह विशेषता है कि वे अपनी शैली और अंतर्वस्तु की निरंतरता को बनाए रखती हैं किंतु टेलीविजन में ऐसा कुछ भी नहीं है। टीवी को निरंतर देखने के कारण हम टीवी विच्छिन्नाता के आदी हो जाते हैं। टेलीविजन ज्ञानमीमांसात्मक तौर पर यह धारणा पैदा करता है कि हम टीवी में जो कुछ भी देखते हैं वह अतिरंजित होता है। अतिरंजित प्रस्तुति के कारण उसकी प्रस्तुतियों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।

टेलीविजन विमर्श के सैध्दान्तिक चरित्र को निर्मित करने में सुरियलिस्ट अथवा अति-यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य हमारी मदद कर सकता है। नील पोस्टमैन ने '' एम्युजिंग अवरसेल्व्स टु डेथ: पब्लिक डिसकोर्स इन दि एज ऑफ शो बिजनेस'' (पेंगुइन बुक्स,1985) में लिखा है टेलीविजन खबरें मूलत: संचार विरोधी सैध्दान्तिकी के ढांचे में सजाकर पेश की जाती हैं। इनका लक्ष्य होता है तर्क,विवेक, क्रम और अन्तर्विरोध की विदायी।

राबर्ट मेकनील के अनुसार टेलीविजन खबरों में प्रत्येक चीज संक्षिप्त रहती है। जिससे किसी के ध्यान पर दबाव न पड़े, बल्कि दर्शक सहजभाव से वैविध्य,विविष्टता,एक्शन और मूवमेंट को ग्रहण करता रहे। दर्शक किसी अवधारणा ,चरित्र और समस्या पर चंद सैकिण्ड से ज्यादा ध्यान न दे। खबर को 'खाने के कौर' की तरह होना चाहिए,उसमें जटिलताएं न हों, नॉनसेंस अपरिहार्य है, इस गुण के कारण संदेश सहज होता है।

टीवी में दृश्य प्रस्तुतियों को विचारों का विकल्प बनाकर पेश किया जाता है। एंकर की बकबक अराजकता है। अमरीकी लोग व्यापक मनोरंजन करते हैं और पश्चिमी जगत के सबसे कम सूचना सम्पन्ना नागरिक माने जाते हैं। वे प्रत्येक विषय पर अपनी राय भी रखते हैं। उनकी राय को राय न कहकर भावनाएं कहना ज्यादा सटीक होगा। वे किसी विषय पर राय नहीं अपनी भावनाओं की अभिव्यक्त करते हैं। ये भावनाएं प्रति सप्ताह बदलती रहती हैं। राय प्रति सप्ताह नहीं बदलती। राय टिकाऊ होती है भावनाएं अस्थिर होती हैं। अमरीकी नागरिकों की इन बदलती भावनाओं को हम बदलते हुए विभिन्ना किस्म की रायशुमारी में निरंतर देखते हैं। रायशुमारी की राय इसलिए बदलती रहती है क्योंकि प्रति सप्ताह तथ्य बदलते रहते हैं। इस प्रक्रिया में टेलीविजन यह विभ्रम पैदा करता है कि वह सूचना दे रहा है और सूचनाप्राणी तैयार कर रहा है। टेलीविजन के द्वारा दी गयी तथाकथित सूचना 'कुसूचना' (डिसइन्फोर्मेशन) होती है। 'कुसूचना' का अर्थ असत्य सूचना नहीं है बल्कि इसका अर्थ दिग्भ्रमित करने वाली सूचना है। गलत सूचना, अप्रासंगिक सूचना, सतही सूचना,ऐसी सूचना जो जानकारी का विभ्रम पैदा करे। बल्कि वह जो जानता है उससे भी दूर ले जाए । ज्ञान से परे ले जाए । ज्ञान से विच्छिन्न कर दे।

आज खबर को मनोरंजन के पैकेज में तैयार किया जाता है। फलत: टीवी खबर मनोरंजन तो करती है सूचना नहीं देती। जनता को प्रामाणिक सूचनाओं से वंचित करती है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि सुसंगत सूचना सम्पन्ना का अर्थ क्या होता है। अज्ञानता को हमेशा दुरूस्त किया जा सकता है। किंतु अज्ञानता को ज्ञान के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। वाल्टर लिपमैन ने लिखा है '' आजादी का कोई अर्थ नहीं यदि समुदाय के पास झूठ को खोज निकालने के उपकरण ही न हों।'' प्रशिक्षित प्रेस एक तरह से झूठ के उद्धाटन का काम करता है। टेलीविजन की सारी मुश्किलें यहीं पर छिपी हैं। असत्य की चादर को उघाड़ने का काम वह नहीं कर पाता। टीवी इमेजों का लक्ष्य दर्शक अथवा उपभोक्ता के अंदर अपील पैदा करना लक्ष्य होता है सत्य को पेश करना लक्ष्य नहीं होता। टीवी में विवेक और विज्ञापन में अंतर करना मुश्किल हो गया है। विवेक और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल हो गया है।