हम अपनी कमी क्यों छुपाते हैं इसलिए नहीं कि हम कमजोर है इसलिए कि हम दूसरों की नजर में सदैव अच्छे बने रहें। कइ बार तो हम सब कुछ जानते हुए भी इतना अंजान बन जाते है कि मानो जैसे कुछ मालूम ही न हो। ऐसी प्रवृति वाले अपने अंदर खुद छांककर देखे कि वे कितने सही और कितने गलत हैं। हम अपनी गलतियों को इतनी आसानी से छिपाजाते है कि सामने वाले को इसकी भनक नहीं लग पाती है। अब अगर काम के दौरान ही गलतियां हो जाएं तो उसे स्वीकारने से पहले ही हम बचने का रास्ता ढूढ लेते हैं। कितनी बार अपनी गलतियों पर जबरदसती परदा डाल देते हैं। कयोंकि सामने वाले कि नजर में हमें अपनी गलतियों के कारणा लज्जित न होना पड़े। आजकल के युवाओं में इस तरह की प्रवृति ज्यादा बढ़ रही है। वे अनुभनहीन होते हुए भी इतने कंफीडेंस से काम करते हैं कि मानो काफी बड़े जानकार हों। हालांकि उनके कार्यों की समीक्षा उनके सीनियर्स कर लेते हैं कि वे कितने पानी में हैं और चाहकर भी कुछ नहीं बोलते हैं। इस बारे में यह मानना है कि हमें अपनी छोटी छोटी गलितयों को इगनोर न करके उस पर सुधार करना चाहिए।
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