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4.12.12

"रिश्वतखोरी" गुनाह या मजबूरी ?



देखो......सर मैंने कुछ नहीं किया!
रे भाई तो फिर क्या मैंने किया है, अब तो जो दंड बनता है वो तो तन्ने भरना ही पड़ेगा।

ऐसा क्यों सर जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मैं क्यों भरू सर ये दंड!!!
देख छोरे मैं तन्ने ना जाने दू तू चाहे तो अपने आपको बचा सकता है और इस दंड से भी बच सके है।।।

एक मन तो किया की वही छोड़ के अपनी गाडी घर को लौट आऊ पर घर वालो ने पूछा तो क्या जवाब दूंगा। क्या बोलूँगा की मैंने अपनी बाईक किसी ठुल्ले को थमा दी और चला आया। फिर सोचा की दोस्त की धौस जमा के देखू शायद मैं निकल पाऊ  इन सब झमेलों से।
सर, मैं एक कॉल कर सकता हु अपने भाई को ?
क्यों रे छोरे तेरा भाई कोई तोप  हैं क्या कही का, जा करले जो करना है अब तो तेरी गाड़ी जब्त होगी!!

क्या जब्त!!!
पर क्यूँ आप मेरा चालान तो बनाओ और मुझे कही और भी जाना है।

देख छोरे इब  तो तेरा कोई चालन ना कट सके है। चाहे तू जो करले, इब तो अपनी गद्दी थाने से छुडवा लियो और करले कॉल जिसे कर रहा था। उसने जबरन मुझसे चाभिया मांगी और मैंने उसे पकड़ा दी।

फिर क्या था वो ठुल्ला मेरी बाईक ले गया और ठाणे में जमा करवा दी। मैंने भी मन ही मन सोचा हुआ था कुछ भी हो जाए इसे घूस तो बिलकुल भी नहीं देनी। हम लोगो ने ही इसे इतना बढावा दिया है हमें ही इसे रोकना चाहिए। ऐसे ही कुछ अछे विचारो का जैसे सैलाब सा उमड़ आया मेरे मन में।

सोचा घर जाके सबको बोल दूंगा की मैंने ठुल्ले को घूस ना दे कर कितना अच्छा काम किया हैं। घर पंहुचा और माँ से बोला माँ मेरी मोटर साईकिल एक ठुल्ले ने जब्त कर ली क्योंकि मेरे पास बाईक के बीमा के कागजात नहीं थे। और उसके घूस मांगने पर मैंने उसे घूस ना देकर देखो समझ पे कितना बड़ा उपकार किया हैं।

माँ चीखते हुए......ये क्या किया अभी गाडी कहाँ हैं?
गाड़ी तो ठाने में बंद हैं।
तू पागल तो नहीं हैं तुझे क्या जरूरत थी उसे गाडी की चाभी दने की, दे देता उसे 50, 100 रुपये और मामला रफा दफा करता।
मैं थोडा रुवाब झाड़ते हुए क्या माँ आप भी ऐसा क्यों बोल रहे हो? आपको तो बल्कि मुझे शाबाशी और मेरा हौसला बढाना चाहिए. आपके लड़के ने गलत का साथ नहीं दिया बल्कि सही का साथ देते हुए इस रिश्वतखोरी के खिलाफ अपना पहला कदम बढाया हैं।

बेटा जी ये जो बाते तू बोल रहा हैं न आज के समय में सिर्फ फिल्मो में या सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती हैं क्यूंकि असल जीवन में ये तार्किक बाते नहीं काम आती।  और रही बात समाज में फैली बुराईयों से लड़ने की बात तो बेटा उसके लिए तो वो अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी बैठे ही हैं न, फिर तू क्यूँ इन्हें अपना काम करने से रोक रहा हैं?

क्या माँ आप भी और लोगो की तरह सिर्फ अपने बारे में सोच रहे हो मैंने तो सिर्फ रिश्वतखोरी की बात ही की थी आपने तो पता नहीं कहा अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे महान समाज सेवियों तक बात पंहुचा दी। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हु की समाज को शुधारने की शुरुवात तो सबसे पहले पहल तो हमें ही करनी पड़ेगी न। और रही बात बाईक की वो तो एक माफ़ी पत्र थाने में SHO के हस्ताक्षर करवा के जमा करवा देना हैं बस उसी दिन बाईक मुझे मिल जायेगी। बस इतना ही तो करना है और गलती तो मेरी ही थी न जो मैंने ध्यान नहीं दिया की बाईक का बिमा ख़त्म हुए सप्ताह बीत गया हैं। अब दूसरा बीमा भी बाईक लाते ही करवा लूँगा।

बेटा अभी तू इन थाने के चक्करों में नहीं पड़ा न, तो ऐसी बाते कर रहा हैं। चल देखते है तेरी बाईक कब छूटती हैं।
मन में मैं यही सोच रहा था की आखिर माँ ने ऐसा क्यूँ बोला। क्या इतना मुश्किल हैं इस समाज में अपने सभी दायित्वों के प्रति जागरूक होकर रहना?

सोचा की पहले पत्र  लिख लू बस फिर क्या पत्र  लिखते ही थाने पंहुचा और सीधे ही SHO साहब के कक्ष की और तेजी से चल पड़ा।  जाकर पता चला की साहब तो हैं ही नहीं वो अगले दो दिन के लिए किसी दुसरे राज्य में कोई सेमिनार में सिरकत करने हेतु गए हुए हैं। सोचा चलो कोई नहीं पत्र तो लिख ही लिया हैं दो दिन बाद फिर आ जाऊंगा और उनके हस्ताक्षर ले ही लूँगा और इसी बहाने थोडा पैदल चलने का मौका भी मिल जाएगा।

दो दिन बाद फिर से साहब के कक्ष की और गया तो पता चला साहब दौरे पर निकले हुए हैं। मैंने एक साहब से पूछा की कब तक आयेंगे तो पता चला की उनके घर पे कोई पारिवारिक त्यौहार हैं वो सीधे ही घर की और निकल जायेंगे। थोड़ी झल्लाहट हुई मन में पर उसे नकारता हुआ सोचा की चलो कोई नहीं जहा 2 दिन इन्तेजार किया वह 1 दिन और सही।

अगले दिन फिर मैं साहब के कक्ष की और बड़ा तस्सली हुई देखकर की साहब आज बैठे हुए हैं और वह आये कई लोगो के पत्रों पे पाने हस्ताक्षर करने में थोड़े व्यस्त हैं। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठ गया। करीबन डेढ़ घंटे बाद जब मेरी बारी आई तो वह गेट पर खड़े एक व्यक्ति ने जो की सादे लिबास में था, ने मुझे रोका और काम पूछा की क्यूँ मिलना चाहता हु मैं SHO  साहब से?

मैंने उसे बताया की मेरी बाईक बंद हैं और इसी सिलसिले में मैंने एक माफीनामा पत्र लिखा हैं और उसी पत्र पे साहब के हस्ताक्षर लेने हैं और इसे थाने में जमा करवा कर अपनी बाईक छुडानी हैं।

उस आदमी ने मेरी तरफ देखा और बोला की भाई मैं तुम्हारे इस पात्र पे साहब के हस्ताक्षर करवा सकता हु बशर्ते मैं उसे कुछ बक्शीश या ये कहूँ की वो अप्रत्यक्ष रूप से मुझसे रिश्वत की मांग कर रहा था। मन तो मेरा ऐसा किया की उसकी शिकायत साहब को जाकर अभी कर दू पर वो कम्बखत वही दरवाजे पे अड़ा खड़ा हुआ था और उन्ही को अन्दर जाने दे रहा था जो उसकी बात मानकर उसे बक्शीश/रिश्वत दे रहे थे।

मैंने सोचा क्यूँ न सीधे ही अन्दर घूस जाऊं और साहब को इसकी शिकायत लगा दू और अपने पत्र पे उनके हस्ताक्षर करवा लूँ।

मैंने उसे थोडा पीछे की और धकेलकर आगे बढकर सीधे ही साहब की मेज की और बड़ा और साहब को अपना पत्र देते हुए कहा सर इस माफीनामे पत्र पर आपके हस्ताक्षर की जरूरत हैं। कृपया करके आप इस पर हस्ताक्षर कर दे। वही पीछे से भागता हुआ उनका चमचा आया और साहब को बोला साहब ये छोरा जबरन अन्दर आया हैं। साहब मुझे घूर के थोड़े गुस्से वाले मुद्रा में निहारने लगे।

सर मैं पंक्ति में ही था और जब मेरा नंबर आया तो ये जनाब मुझे बक्शीश की मांग करने लगे और कहने लगे की बक्शीश दो और अपना काम आराम से करवा लो। सर मैं इस बक्शीश के बिलकुल खिलाप हूँ और इसका मैं पुरजोर विरोध करता हूँ। और तो और इसने ये मांग मुझसे ही नहीं अपितु सभी से की हैं और जो लोग इसकी मांग को पूरा कर रहे हैं वो ही आपके पास तक पहुच रहे हैं।

इतना ही बोला था की साहब ने पहले तो मुझे बड़े ही अजीब ढंग से देखा और दुसरे लोगो की तरफ भी और पूछा की क्या ये लड़का सच बोल रहा हैं?
सभी ने एक साथ ही बोला जी सर ये बिलकुल सही बोल रहा हैं और ये बंद हर किसी से बक्शीश ले कर ही आप तक पहुचने दे रहा हैं।

साहब ने उसे खूब डाटा  और कहा की आगे से उसने किसी से भी बक्शीश की मांग की तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।मैं मन ही मन खुश हो रहा था की चलो कुछ तो अच्छे लोग बचे हुए हैं जो आज भी जागरूक है अपने कर्तव्यो के प्रति। साहब ने मुझसे मेरा पत्र माँगा और थोडा उसमे कुछ पढने के बाद बोले की इस पर मैं अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकता क्योंकि इस पर टिकट नहीं लगी हैं पहले वो लगा के लाओ फिर मुझसे हस्ताक्षर करवाओ।

मैं ये सब सुनकर दंग रह गया और जल्द ही टिकट लगा कर दुबारा आया और साहब की डेस्क की और बड़ा और अपना पत्र साहब की और लपकाया। साहब ने सीधे ही बिना मेरी तरफ देखे ही कहा बेटा ऑफिस बंद होने का समय हो चला हैं, अब सोमवार को आना अपनी बाईक को छुडवाने। मैंने काफी विनम्रता से अपनी मजबूरी जाहिर की साहब के सामने की सर मैं एक स्टूडेंट हूँ और मुझे बहुत दूर-दूर अपनी पढाई के सिलसिले में जाना होता है। इसलिए कृपया करके आप इस माफ़ी पत्र पर अपने हस्तांतरण कर दे। पर साहब मेरी बाते अनसुनी करते हुए चलते बने। वो बंदा जिसकी शिकायत मैंने साहब से की थी वो बड़ी ही मंद मंद हसी लिए हुए मुझे घूर रहा था मानो कह रहा हो "और कर ले शिकायत अब तो तेरी बाईक कभी नहीं तुझे मिलने वाली"।

मेरे मन में काफी झल्लाहट हुई इतना सब कुछ करने के बाद भी काम नहीं हुआ क्या फायदा हुआ शायद मुझे उसे थोड़ी सी बक्शीश दे कर अपना काम करवा लेना चाहिए था। फिर निकल कर बाहर आने लगा तो वो बंदा  मुझे देख कर मुस्कुराया और बोला भाई मेरे साहब से माफ़ी मांग ले और मुझसे भी और फिर तेरा काम हो सकता है और फिर तेरी बाईक छूट जायेगी।

मैं मन ही मन मुझे आत्मग्लानी का अनुभव सा हुआ की क्यों मैंने बेकार में ही पंगे ले लिए। कहने के लिए ही भारत एक लोकतान्त्रिक देश रह गया हैं क्यूंकि यहाँ तो मैंने सिर्फ रिश्वतखोरी के विरोध में अपनी आवाज भर बुलंद की थी। यहाँ तो क़ानून के दो मामूली नुमाईन्दे ही उसे दबाने में एकजुट हो गए। अब मुझे समझ में आया की इतने दिनों से अरविन्द केजरीवाल साहब और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी द्वारा चलाये गए मुहीम को अभी तक मंजूरी क्यूँ नहीं मिली। इनकी लडाई तो पुरे भ्रष्ट सिस्टम से हैं। खैर मुझे एक आखरी फैसला लेना ही पड़ा की मुझे आगे क्या करना चाहिए अपनी बाईक छुड़ाने के लिए।


मैंने अपने अन्दर जागे हुए जिम्मेदार नागरिक को दबाते हुए उस बन्दे की बात मानी और उसे सॉरी बोला और बोला की भाई कृपया करके वो मेरा काम करवा दे और मैं साहब से माफ़ी भी मांग लूँगा। उसने मुझसे अपनी बक्शीश ली और कहा की कल सुबह सुबह वो साहब से मेरे बारे में जरूर बात करेगा और मेरा काम करवा देगा।

मैं घर पंहुचा और माँ को सब हाल सुनाया। माँ ने मेरी तरफ देखा और कहा बेटा मैंने तो तुझे पहले ही कहा था की इन समाज सेवा वाले चक्करों में न पड देखा आखिर में थक हार कर तुझे ही झुकना पड़ा। क्यूंकि तू एक आम आदमी है जिसे कोई भी औधे पर बैठे सरकारी अधिकारी के आगे झुकना ही पड़ता है। वरना अंत में परिणाम ऐसा ही निकलता हैं।

माँ आप शायद ठीक बोल रहे हो आगे से मैं भी इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनने में देरी नहीं करूँगा। कल ही जाकर अपनी बाईक छुडवाता  हूँ। बस इतना कहते ही अपने कमरे में जाते हुए मैं बस एक ही बात सोच रहा था की सभी लोग ऐसी परिस्थिति में आते होंगे और वो क्या करते होंगे? क्या वो भी झुकने को मजबूर हो जाते होंगे इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे।

खैर मैं अभी भी थोडा सा भ्रमित हूँ की "रिश्वतखोरी" एक गुनाह हैं या मजबूरी हैं? अब आप ही बताये? ये कहानी एक काल्पनिक कहानी है जिसकी प्रेणना मुझे एक मित्र के साथ हुई आप-बीती से मिली। अगर किसी व्यक्ति विशेष को मेरी किसी बात का बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी चाहूँगा।



via : Pawan Mall

19.7.11

वाह री, भारत सरकार, क्या खूब कहा


अभी हाल ही में मैंने किसी न्यूज चैनल में कुछ ऐसा देखा की मेरा आप सा खो गया मन ही मन खूब कोस रहा था भारतीय शासको को.
जो इस देश की हुकूमत पर अपना एकल स्वामित्व समझते हैं और इस देश को सोने का अंडे देने वाली मुर्गी की संज्ञा के रूप में देखते हैं.
उस न्यूज में कुछ किसी परिवार के बारे में बता रहे थे की कोई परिवार पिकनिक के लिए गया था और एक दे से नदी में पानी का स्तर बढ़ जाने की वजह से 5 लोगो के परिवार में से सिर्फ दो ही लोग जिन्दा बचाए गए. और सरकार का इसपे ये कहना था की "ऐसे हादसे साल में एक दो तो होते ही हैं".
अब मुद्दा ये था की सरकार जब इन लोगो की मदद नही कर सकी तो उन्हें ये बोलने का भी हक़ नहीं था की "ऐसे हादसे साल में एक दो तो होते ही हैं".
अब सरकार को ये नहीं पता की जिन हादसों को ये स्वाभाविक बता रही हैं उन हादसों में जिन-जिन लोगो की भी मृत्यु हुई हैं उन लोगों के भी चाँद वोट शामिल हैं जिन्होंने ये सोचकर उन्हें वोट किया होगा की सरकार हमारे बारे में जरूर सोचेगी. पर यहाँ तो नदी उलटी ही बह रही हैं उल्टा सरकार तो ऐसे तेवर दिखा रही हैं जैसे की हमपे अहसान कर रही हैं ........

अब आप ही बताये आखिर क्या बीती होगी उस परिवार के बचे हुए लोगो पर जिन्होंने अपनों के खोने का दुःख झेल रही हैं और साथ ही साथ ऐसे कटु वाक्य सुनने के बाद क्या बीती होगी उन बचे हुए लोगो पर..

वाह री, भारत सरकार, क्या खूब कहा 

15.9.10

ई-मेल सेंड करें, ब्लाग पर वही छपा मिलेगा

हालांकि ये सुविधा काफी दिनों से है, पर इसको आज ट्राई किया और जबर्दस्त रूप से प्रभावित हुआ. आप अपने ब्लाग की सेटिंग में जाकर ईमेल व मोबाइल वाले आप्शन में मेल से ब्लाग पोस्ट प्रकाशित करने के आप्शन में कोई सिक्रेट वर्ड या डिजिट भरें. उदाहरण के तौर पर वहां दिया गया होगा...
yashwantdelhi.Secretword@blogger.com
अब जो Secret word वाला स्थान है, वहां कोई गुप्त शब्द या अंक भरें व उसे याद रखें. मान लीजिए आपने वहां ram डाल दिया. फिर सेटिंग को सेव कर दिया. तो आपका मेल से पोस्ट प्रकाशित करने का पता हुआ.
yashwantdelhi.ram@blogger.com

उपरोक्त मेल आईडी पर मेल में जो कुछ लिखकर भेजेंग, वह आपके ब्लाग पर छपा मिलेगा. मेल के सब्जेक्ट में जो कुछ लिखेंगे, वह ब्लाग पोस्ट के शीर्षक के रूप में दिखेगा.

अगर आप यह सब जानते हों तो अच्छी बात. न जानते हों तो ट्राई करिए.
ज्ञान बांटने से बढ़ता है, छुपाने से घटता है, यह कहावत तो सुनी ही होगी आपने.
तो आप भी कोई नई चीज हम सभी को बताइए. आपकी पोस्ट का इंतजार रहेगा.
यशवंत

17.7.09

महलों में रहने वालों को झोपडिय़ां नहीं दिखतीं

-भुवेन्द्र त्यागी-
महानायक परेशान हैं। मुम्बई में उनके घर और दफ्तर में पानी घुस गया। उन्हें अपने सामान की चिंता हो गयी। अपने बेडरूम की छत से रिसते पानी को देखकर तो वे व्याकुल ही हो गए। उन्होंने अपनी यह व्यथा अपने ब्लॉग में बड़े दुखी मन से व्यक्त की -

'प्रतीक्षा जलमग्न हो गया है। बाहर भी सड़क पर कमर तक पानी जमा है और ऊपर थोड़ी ऊंचाई पर बने लॉन में भी पानी भर गया है। बारिश का पानी घर में घुसने का खतरा पैदा हो गया है। मैं जब अपने फर्नीचर और अन्य चीजों को ऊंचाई वाली जगह पर ले जाने की तैयारी कर रहा था, तभी सड़क का पानी पहली सीढ़ी तक पहुंच गया।
'पानी रिसेप्शन इलाके तक पहुंच गया तो कर्मचारी नंगे पैर अपनी पैंट ऊपर करके नालियों को साफ करने लगे, ताकि उनमें से होकर पानी बिना किसी बाधा के बह जाए, लेकिन पानी बहकर कहां जाता। सड़क पर तो पहले से ही कमर तक पानी भरा था, इसलिए वो सारा लौट कर आ गया।

'सब तरफ अव्यवस्था है। सब जगह समुद्र बना हुआ है। पास ही में स्थित कार्यालय जनक में कर्मचारी गेट से पेड़ पर चढऩे के लिए तैयार हैं। पानी अंदर घुस गया है और भूतल पर कोई काम नहीं किया जा सकता। जलसा में अपेक्षाकृत कम पानी भरा है। उसके सामने का रास्ता स्विमिंग पूल बना हुआ है, लेकिन बेसमेंट सूखा है। जलसा में छत पर कोलतार से सुरक्षा के बाद भी बेड रूम में पानी लीक कर रहा है। मैंने अपने कर्मचारियों को कहा है कि वे बारिश के पानी को बाल्टियों में जमा कर लें, ताकि अगर बिजली चली जाए और पंप न चलें तो पानी का उपयोग किया जा सके।'

बिग बी की परेशानी जायज है। मुम्बई की जालिम बरसात जब बरसती है तो हर तरफ पानी-पानी कर देती है। मुम्बईकरों की आंखों में पानी आ जाता है। जाहिर है, जब पानी बिग बी के घर में घुस गया, तो परेशान होने की बात ही थी। अपने सामान के खराब होने, दफ्तर में पानी घुसने और छत टपकने पर भला कौन विचलित नहीं हो जाएगा? मगर क्या महानायक ने मुम्बई के उन लाखों आम लोगों की कोई फिक्र की, जो उनकी फिल्में देखने के लिए थियेटरों में उमड़ पड़ते हैं? ये लोग बारिश के कारण रास्तों में अटक गए। घंटों अटके रहे। कुछ अपने दफ्तर नहीं पहुंच पाए। दफ्तर पहुंचे, तो घर नहीं पहुंच पाए। काफी लोग घरों में पानी भरने पर सिर पर सामान उठाये घंटों खड़े रहे। कुछ की जमापूंजी पानी में खराब हो गयी। कुल मिलाकर, पानी ने मुम्बईकरों की नाक में दम कर दिया। पर महानायक को सिर्फ अपनी परेशानी दिखी। काश, उन्होंने सिस्टम की विफलता पर भी कुछ कहा होता! काश अपने ब्लॉग से उन्होंने आम आदमी की परेशानी दूर करने के लिए आवाज उठायी होती!

पर वे ऐसा नहीं करेंगे। महलों में रहने वालों को झोपडिय़ां नहीं दिखतीं। हालांकि अपनी व्यथा लेकर बिग बी ब्लॉग पर फिर भी आते रहेंगे!

(भुवेन्द्र त्यागी नवभारत टाइम्स, मुम्बई में मुख्य उप संपादक हैं। यह लेख उनके ब्लॉग http://haalaanki.blogspot.com पर भी पढ़ा जा सकता है। उनसे संपर्क करने के लिए bhuvtyagi@yahoo.com का सहारा लिया जा सकता है।)

13.7.09

इसे आप तिरंगे का अपमान मानेंगे या नहीं?


14 जुलाई को फ्रांस में नेशनल डे परेड है। वहां रिहर्सल के दौरान फ्रांसीसी सेना के एक जवान ने भारतीय झंडे के एक कोने को अपने बूट के तले दबा रखा है। इसे क्या आप उचित मानेंगे या अनुचित? क्या यह भारती तिरंग का अपमान नहीं है? मुझे पहली नजर में यही लगता है कि यह गलत है। यह तस्वीर एक मशहूर एजेंसी ने जारी की है लेकिन इसे भारतीय मीडिया में स्थान नहीं मिला। आप क्यों सोचते हैं इस बारे में? हालांकि जिस जवान ने अपने बूट के तले तिरंगे के एक कोने को दबा रखा है, उसके चेहरे की मासूमियत देखकर समझ में आ रहा है कि उसने यह अनजाने में किया है। फिर भी, उसे इतना तो पता होना चाहिए कि किसी देश के झंडे को पैर के तले दबाना अपमान होता है।

10.7.09

पत्रकारों का स्टिंग करा रही है मायावती सरकार

डीएनए, लखनऊ में प्रथम पेज पर प्रकाशित रिपोर्ट

3.7.09

नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई, इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

समलैंगिकता नैतिकता से जादे कानूनी दांव-पेच के मसला बन के रह गइल बा...आज हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसला के बाद समलैंगिक समाज के लोग के खुशी के ठिकाना नइखे. मगर भारत जइसन पारंपरिक देश में समलैंगिकता पर असमंजस के स्थिति बा.. कोर्ट के कहनाम बा कि धारा 377 जनता के मौलिक अधिकार के हनन बा.. एह से दिल्ली हाईकोर्ट भारतीय दंड़ संहिता के धारा 377 के अपराध के श्रेणी से हटा दिहले बा... न्यायालय के कहनाम बा कि अगर आपसी रजामंदी से कवनो वयस्क पुरुष चाहे महिला आपस में संबंध बनावत बाड़न त ऊ धारा 377 के श्रेणी में ना आई.... कोर्ट के ई फैसला के बाद समलैंगिक लोग में खुशी के लहर दौड़ गइल बा... एगो लइका अपना बाबूजी के समझावत बा- --------------

इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई
हाई कोर्ट देले बाटे अइसन एगो फैसला
गे लोग के मन बढल लेस्बियन के हौसला
भइया संगे मूंछ वाली भउजी घरे आई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
खतम भइल धारा अब तीन सौ सतहत्तर
घूमतारे छूटा अब समलैंगिक सभत्तर
रीना अब बनि जइहें लीना के लुगाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
पछिमे से मिलल बाटे अइसन इंसपिरेशन
अच्छे भइल बढी ना अब ओतना पोपुलेशन
बोअत रहीं बिया बाकि फूल ना फुलाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
इ पछुआ बयार हवे रउरा ना बुझाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई,
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

रचनाकार : मनोज भावुक

(भोजपुरी साहित्य में पिछले एक दशक से जो सितारा चमक रहा है, उसका नाम है मनोज भावुक। मनोज ने भोजपुरी साहित्य के प्रचार-प्रसार का काम भारत के साथ-साथ यू॰के॰, अफ्रीका आदि के भी देशों में किया है। भारतीय भाषा परिषद ने मनोज भावुक को उनके गजल- संग्रह " तस्वीर जिंदगी के" के लिये सम्मानित किया है।भावुक फिल्म समीक्षक भी हैं और भोजपुरी सिनेमा के विखरे इतिहास को अपने लोकप्रिय शोध पत्र ''भोजपुरी सिनेमा के विकास -यात्रा" में समेटने की सफल कोशिश की है. भावुक इन दिनों "हमार टीवी" में प्रोग्रामिंग हेड हैं। उनके बारे में ज्यादा जानकारी www.manojbhawuk.com और www.manojbhawuk.wordpress.com पर जाकर पा सकते हैं। उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk का सहारा ले सकते हैं।)

15.6.09

चुनाव में खबरें बिकीं : प्रभाष जोशी

प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित खबर (पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)
आज, पटना में प्रकाशित खबर (पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)
राष्ट्रीय सहारा, पटना में प्रकाशित खबर (पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)

12.6.09

एक पत्रकार का सुसाइड नोट

एक पत्रकार पुलिस, नेता और अपराधियों से इतना तंग आ जाता है कि उसे शर्मिंदगी के मारे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ता है। युवा पत्रकार संवेदनशील था। उसकी चमड़ी मोटी नहीं थी। उसे दुनिया के दंद-फंद नहीं आते थे। वह तो केवल मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई और साहस जानता था। उसे इसका 'फल' मिला। झूठे मामलों में उसे पिटवाया गया। उसे प्रताड़ित किया गया। इस युवा पत्रकार के पिता भी पत्रकार हैं। बेटे को लगा कि इस लोकतंत्र में कहीं से कोई न्याय नहीं मिलने वाला है तो उसने न्याय पाने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया। मरने से पहले जो सुसाइड नोट लिखा, उसमें उसने दोषियों के नाम साफ-साफ लिख डाले थे। इस सुसाइड नोट पर क्लिक कर आप इसे बड़ा कर पूरा पढ़ सकते हैं।
क्या हम लोग वाकई अब उस असभ्यता की ओर बढ़ चले हैं जहां ईमानदारी, सच्चाई और साहस के साथ जीने का मतलब होता है हत्या या आत्महत्या? सोचने और फिर सड़क पर उतरने का वक्त है यह दोस्तों वरना हमारी पीढ़ियां हम लोगों को माफ नहीं करेंगी। वे कहेंगी कि तुम लोगों ने ऐसा समाज हमारे लिए छोड़ा जिसमें सच की कोई साख ही नहीं थी......।


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  1. उत्पीड़न से परेशान युवा पत्रकार ने जान दी
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राहुल, आप जैसे पत्रकारों से ही उम्मीद है....

क्या आप लोगों ने युवा पत्रकार राहुल का भड़ास ब्लाग पर लिखा हुआ पढ़ा? नहीं पढ़ा तो पढ़िए और राहुल को जरूर शाबासी दीजिए, इस सोच और साहस के लिए।
क्लिक करें- अगर नोट एक हजार के होते तो....

शुभकामनाओं के साथ
यशवंत

15.5.09

जयशंकर प्रसाद की कविता गाइए और जीतिए रु 2000 के नग़द इनाम

हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्दी में लिखने-पढ़ने वालों का प्रोत्साहन पिछले 29 महीनों से करने का प्रयास कर रहा है। हिन्दी को आवाज़ की दुनिया से जोड़ने की स्थाई शुरूआत 4 जुलाई 2008 को 'आवाज़' के माध्यम से हुई थी। हिन्द-युग्म के संचालक-संपादक शैलेश भारतवासी ने एक नई शुरूआत की सूचना दी- "आज हम पॉडकास्टिंग को प्रोत्साहित करने के लिए 'गीतकॉस्ट' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं। "


इसमें भाग लेने के लिए प्रतिभागियों को जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध देशगान 'अरुण ये मधुमय देश हमारा' को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके हिन्द-युग्म को भेजना होगा। गीत को केवल पढ़ना नहीं बल्कि गाकर भेजना होगा। हर प्रतिभागी इस गीत को अलग-अलग धुन में गाकर भेजे (कौन सी धुन हो, यह आपको खुद सोचना है)।


1) गीत को रिकॉर्ड करके भेजने की आखिरी तिथि 31 मई 2009 है। अपनी प्रविष्टि podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।
2) इसे समूह में भी गाया जा सकता है। यह प्रविष्टि उस समूह के नाम से स्वीकार की जायेगी।
3) इसे संगीतबद्ध करके भी भेजा जा सकता है।
4) श्रेष्ठ तीन प्रविष्टियों को आदित्य प्रकाश की ओर से क्रमशः रु 1000, रु 500 और रु 500 के नग़द इनाम दिये जायेंगे।
5) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को डलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम'कवितांजलि' में बजाया जायेगा। इस प्रविष्टि के गायक/गायिका से आदित्य प्रकाश (कार्यक्रम के संचालक) कार्यक्रम में सीधे बातचीत करेंगे, जिसे दुनिया में हर जगह सुना जा सकेगा।
6) अन्य 2 प्रविष्टियों को भी कवितांजलि में बजाया जायेगा।
7) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 'हिन्दी-भाषा की यात्रा-कथा' नामक वीडियो/डाक्यूमेंट्री में भी बेहतर रिकॉर्डिंग के साथ इस्तेमाल किया जायेगा।
8) श्रेष्ठ प्रविष्टि के चयन का कार्य आवाज़-टीम द्वारा किया जायेगा। अंतिम निर्णयकर्ता में आदित्य प्रकाश का नाम भी शामिल है।
9) हिन्द-युग्म का निर्णय अंतिम होगा और इसमें विवाद की कोई भी संभावना नहीं होगी।

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित देशगान

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

शैलेश ने आगे बताया- "हम समय-समय पर इस तरह का आयोजन करते रहेंगे। आप भी अपनी ओर से हिन्दी के स्तम्भ कवियों की कविताओं को सुरबद्ध करने के काम को प्रोत्साहित करना चाहते हों, अपनी ओर से इनाम देना चाहते हों, तो संपर्क करें।"

जहर बोने वाले इन ई-मेलों से सावधान रहिए


उपरोक्त आर्टिकल मुझे एक संपादक दोस्त ने भेजा। पढ़ता गया तो लगा कि आर्टिकल है मजेदार लेकिन सोचा कि यह किस अखबार में छपा है और किस संस्था ने शोध किया है, यह जाना जाए, यह जानकारी इस आर्टिकल में कहीं नहीं मिली। मैंने जब गूगल पर उपरोक्त आर्टिकल की हेडिंग डालकर सर्च किया तो जो नतीजे आए, उसे पढ़ने के बाद पूरा माजरा समझ में आया। एक अमेरिकन इंटरटेनमेंट टैबलायड वीकली वर्ल्ड न्यूज के गासिप सेक्शन में इस तरह के आर्टिकल पब्लिश किए जाते रहे हैं और याहू इस टैबलायड के कंटेंट को आनलाइन पब्लिश करता है। बस, किसी ने इस आर्टिकल को सच्ची खबर बताकर मेल के जरिए प्रचारित करना शुरू किया और देखते ही देखते यह आर्टिकल सुपरहिट मेल कंटेंट में शुमार किया जाने लगा है।

काम में कमजोर लोगों को समझदारों के लिए जान का खतरा बताना आधुनिक कारपोरेट प्रबंधन और माडर्न प्रोफेशनलिज्म की खतरनाक सोच है। यह सोच न सिर्फ मनुष्यता विरोधी है बल्कि किसी अच्छे समाज की संरचना के बुनियादी आधार को भी नष्ट करती है। अंतहीन होड़, अंतहीन काम, अंतहीन मेहनत.....इन पैमानों पर अगर कोई किसी कंपनी के लिए अच्छा हो तो अच्छा, और जो इन पैमानों के हिसाब से फिट न बैठे तो बुरा? फिर तो इन पैमानों पर गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह सभी फिट नहीं बैठते क्योंकि ये किसी कंपनी में काम नहीं करते थे।

आज सूचनाओं का दौर है लेकिन जहरीली सूचनाएं किस तरह हमारे आपके भोले भाले दिमाग को बददिमाग में बदल देती हैं, पता ही नहीं चलता।

उपरोक्त आर्टिकल की सच्चाई जानने के लिए इस पर क्लिक करें.....फाल्स


14.4.09

हिजड़े चाँद से नहीं गिरते

(बरेली के पत्रकार साथी रहमान भी ब्लागिंग में कूद पड़े हैं। उनके ब्लाग 'आजाद आवाज' पर दो पोस्टें हैं जिनमें से एक यहां प्रकाशित कर रहा हूं। उनके ब्लाग का पता है- www.azadawaz.blogspot.com, रहमान की ब्लागिंग की पारी का हम स्वागत करते हैं- यशवंत)
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बरेली में १२ अप्रैल को हिजड़ों पर एक नेशनल सेमिनार हुआ। यहां इसकी चर्चा कई वजहों से जरूरी है। एक तो ये कि ये सेमिनार कथित सभ्य समाज और हिजड़ों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए किया गया था। दूसरे इसे एक एजूकेशनल फाउंडेशन ने आयोजित किया था और संभवतः ये उत्तर प्रदेश का पहला अपनी तरह का आयोजन था। चर्चा इसलिए भी कि ये सेमिनार कुछ सवाल छोड़ गया, जिस पर बहस जरूरी है।सैयद शाह फरजंद अली एजूकेशनल एंड सोशल फाउंडेशन आफ इंडिया के इस आयोजन में जेएनयू के दर्शन शास्त्री प्रो. सत्यपाल गौतम, मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित डा. संदीप पांडेय, अमरीका से प्रकाशित उपन्यास नेवर ट्रस्ट अ गाड से चर्चा में रहे प्रो. एमआई सिद्दीकी, अंग्रेजी लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट शारदा दुबे, गोपाल कृष्ण जैसे लोग इसमें शामिल रहे। इसमें रुहेलखंड भर से तमाम हिजड़े भी जमा हुए थे, जिनका प्रतिनिधित्व उनकी गुरू मीनाक्षी ने किया। मीनाक्षी अंग्रेजी से एमए हैं और काफी संवेदनशील और जागरूक हैं।

कार्यक्रम के बीच में दर्शकों की तरफ से शुरू की गई बहस से मीनाक्षी उद्वलित हो उठीं और उन्होंने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसके बारे में उस वक्त तो कोई चर्चा नहीं हुई, लेकिन कार्यक्रम के बाद वक्ताओं के बीच ये जेरेबहस रहा। मीनाक्षी के वक्तव्य के दौरान एक दर्शक ने सवाल किया कि आप लोग खुद ही समाज से दूर रहते हो और जबरन अपनी संख्या बढ़ाते हो। इस मीनाक्षी जज्बाती हो उठीं। उन्होंने जवाब में समाज को उसका ही चेहरा दिखा दिया। कहा कि हिजड़े चांद से नहीं टपकते, न ही वह जंगल से आते हैं। इसी के साथ उन्होंने हया नाम की अपनी बेटी को मंच पर बुला लिया। कुछ देर बाद ही दर्शकों के बीच से एक पांच-छह साल की एक सुंदर सी दुबली-पतली सी बच्ची गुलाबी फ्राक पहने नजरें झुकाए खड़ी थी। उसके मंच पर आते ही सन्नाटा छा गया। मीनाक्षी ने कहना शुरू कियाः ये बच्ची भी आप ही के सभ्य समाज से आई है। छह साल पहले इसके मां-बाप मेरे पास आए थे और कहा कि मीनाक्षी तुम इसे अपना लो, नहीं तो हमारे पास इसे जहर का इंजेक्शन लगवाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मीनाक्षी ने ये कहकर हाल में सनसनी फैला दी कि ये बच्ची भी किन्नर है। उन्होंने बताया कि इसके मां-बाप पहले इसे अनाथालाय ले गए थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये किन्नर है तो उन्होंने इसे अपनाने से ही मना कर दिया।

उस वक्त को बात आई-गई हो गई, लेकिन इस सबके बीच एक बच्ची से उसकी सुकून और सम्मान भरी जिंदगी छीन ली गई। उसे सबके बीच में असमान्य होने का एहसास करा दिया गया था। रही-सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। उसने बच्ची की फोटो सहित इस पूरे वाकिये को फ्लैश कर दिया। उसका चेहरा भी ब्लर करने की जहमत नहीं उठाई गई। अब ये बच्ची न तो कथित सभ्य समाज में सामान्य जीवन जी सकेगी और स्कूल में भी सभी बच्चे उसे अलग तरीके से ट्रीट करेंगे और चिढ़ाएंगे। जाहिर है कि अब उसके पढ़-लिखकर सामान्य जीवन जीने की संभावना शून्य कर दी गई।

हमारा आपसे सवाल है कि इस मामले में बुद्धिजीवियों का क्या रुख होना चाहिए था?
मीडिया का क्या सावधानी बरतनी चाहिए थी?
अब वह बच्ची सामान्य जीवन कैसे जी सकेगी?
और आखिर में, हिजड़ों पर ये आयोजन फिजियो डा. एसई हुदा की सोच का नतीजा था। मरीजों से निकल कर थर्ड जेंडर के लिए ऐसे आयोजन का जोखिम उठाना सराहनीय है।

9.4.09

अरे ब्लागरों, थोड़ा बच्चा बन जाओ, जरा बाल सजग पर घूम आओ

कविता- बंदर
कटी दल पर बैठा बन्दर
ले कर केला और चुकंदर
लम्बी चोटी उसके सर पर
लम्बी पूंछ है उसके ऊपर
कभी - कभी वह घर के अन्दर
लेकर सिर पर एक कलेंडर
लेके बंदरिया अपने संग
करने लगा रंग में भंग
-सोनू
कुमार
अपना घर

कक्षा 7
पेंटिंग:- आदित्य कुमार
अपना घर
कक्षा 6

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आजकल जब लोग मैं मैं मैं मैं करते हुए लिखते पढ़ते पढ़ाते बतियाते गरियाते चले जा रहे हैं, ऐसे में कोई शख्स बच्चों की बात करे, उनकी कविताओं और पेंटिंग को प्रकाशित करे, वो भी एक डेडिकेटेड ब्लाग बनाकर तो उसकी भूरि भूरि तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन हम लोगों की आदत तो सनसनी पढ़ने पढ़ाने बतियाने और सुनाने की होती है। किसी ने किसी को गरिया दिया तो वो सब खूब पढ़ा जाएगा लेकिन कोई किसी दूसरे के हित में जी रहा है तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा। बाल सजग ब्लाग के महेश जी का मेल मिला कि उनके ब्लाग को भड़ास के कोने में दर्ज करें तो इस ब्लाग को खोला। मजा आ गया। क्या कविताएं हैं बच्चों की। कहानियां हैं। पेंटिंग हैं। प्लीज, आप लोग एक बार बाल सजग पर जाएं और महेश जी की हौसलाअफजाई जरूर करें, इतना शानदार ब्लाग बनाने और चलाने के लिए....।
उपरोक्त रचना बाल सजग से साभार ली गई है।
बाल सजग का पता है-
http://balsajag.blogspot.com
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आभार
यशवंत

1.4.09

कनाट प्लेस और कबूतर

इस रविवार कनाट प्लेस पर दोपहर से दर रात तक घूमता रहा। कई लोगों से मिलना-जुलना था और थोड़ी मस्ती भी करनी थी। साथ में था कैमरा। वोल्गा बार में एक बीयर गटकने के बाद जब बाहर निकला तो कबूतरों को दाना चुगते देखा। तुरंत कैमरा आन किया। दिल्ली-6 में मटकअली मसककली के दर्शन के बाद इन्हें जरा यहां भी देख लीजिए.....:)


आईआईएमसी एंट्रेस के लिए ‘सपोर्ट’

अमूमन माना जाता है कि कहीं से पढ़कर निकलने के बाद लोग उस संस्थान से एक तरह से कट जाते हैं। लेकिन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन (नई दिल्ली) से पासआउट कुछ युवाओं ने एक ऐसी पहल की है जिसे जड़ों से जुड़ना कह सकते हैं। आईआईएमसी के इन पूर्व छात्रों ने एक ग्रुप बनाया है जिसका नाम रखा गया है सपोर्टसपोर्ट वैसे लड़के-लड़कियों को गाइडेन्स देने का काम कर रहा है जो 19 मई 2009 को होने वाले आईआईएमसी की प्रवेश परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। ऐसे भी इन दिनों आईआईएमसी कैम्पस में फॉर्म खरीदने और जमा करने वाले लड़के-लड़कियों की भीड़ पहुंच रही है लेकिन इन लोगों में एंट्रेस एक्जाम को लेकर कई शंकाएं भी हैं। इसीलिए सपोर्ट द्वारा आईआईएमसी कैम्पस में ही ऑन-स्पॉट काउंसिलिंग भी की जा रही है। सपोर्ट से जुड़े आईआईएमसी के पूर्व छात्र दीपक का कहना है कि आईआईएमसी में आने के इच्छुक युवाओं में प्रवेश परीक्षा को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं जिन्हें दूर करने की एक कोशिश है सपोर्ट। उन्होंने बताया कि सपोर्ट अपने नाम के मुताबिक ही
आईआईएमसी में आने के इच्छुक युवाओं को सपोर्ट करने का एक फोरम है। आईआईएमसी कैम्पस के पास ही मुनिरका इलाके में सपोर्ट का सेंटर खोला गया है। इस सेंटर में हर रोज काउंसिलिंग और गाइडेन्स का काम जोर-शोर से किया जा रहा है। सपोर्ट के साथ अच्छी बात ये है कि काउंसिलिंग और गाइडेन्स का काम आईआईएमसी के पूर्व छात्र ही कर रहे हैं जो आज किसी ना किसी मीडिया संस्थान से जुड़े हुए भी हैं। दरअसल सपोर्ट का टैगलाइन ही है
Be IIMCian By IIMCians सपोर्ट ग्रुप आईआईएमसी प्रवेश परीक्षा की तर्ज पर मॉडल टेस्ट भी शुरू करने जा रहा है। सपोर्ट ग्रुप के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए 9968774665 और 9718121467 नंबर पर संपर्क किया जा सकता है या फिर
support4iimc@gmail.com पर मेल किया जा सकता है।

(मेल से भेजी गई सूचना)

28.3.09

प्रभात खबर के सभी संस्करणों में 'भड़ास4मीडिया' बना है बाटम

इसे मैं सबसे रोमांटिक फिल्मी गीत मानता हूं....



आज सुबह पान की दुकान पर यह गाना बजता मिला तो मेरठ के दिन याद आ गए। वहां रियाज हाशमी के सौजन्य से इस गाने को उनकी कार में पहली बार सुना था। इसे ढूंढा और यू ट्यूब पर मिल भी गया। लीजिए सुनिए।

23.3.09

हैं पक्के मेरे यार, मौलवी पंडित थानेदार, कि पैसा बोलता है...साबरी ब्रदर्स को सुनिए

साबरी ब्रदर्स को आपने सुना है या नहीं? नहीं सुना है तो इसे सुनिए, ....पैसा बोलता है.....अल्लाह....मजा आ जाएगा....



इस कव्वाली की कुछ लाइनें इस तरह हैं....


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संसार में बाजे ढोल, ये दुनिया मेरी तरह है गोल,
कि पैसा बोलता है....

हर शख्स है मेरे चक्कर में,
है मेरी जुरुरत घर घर में,
जिसे चाहूं वो खुशहाल बने,
जिसे ठुकरा दूं कंगाल बने,

ये शीशमहल ये शान, मेरे दम से पाए धनवान,
कि पैसा बोलता है

कहीं हत्या हूं कहीं रिश्वत हूं,
कहीं गुंडा टैक्स की सूरत हूं,
कहीं मस्जिद का मैं चंदा हूं,
कहीं ज्ञान का गोरखधंधा हूं,

हैं पक्के मेरे यार, मौलवी पंडित थानेदार,
कि पैसा बोलता है..

जब लीडर मैं बन जाता हूं,
चक्कर में कौम को लाता हूं,
फिर ऐसा जाल बिछाता हूं,
फिर मन की मुरादें पाता हूं,

मैं जिसपे लगा दूं नोट, न जाए बाहर उसका वोट
कि पैसा बोलता है....