एक दिन मेरे आराध्य देव मेरे सपने में आए और कहने लगे - वत्स! तुम कैसे हो ?
पहले तो मैं चौंका, फिर ज़रा संभला और बोला - आप कौन हैं? इतनी रात को कैसे? कोई विशेष काम है क्या?
उन्होंने कहा - आज मुझे नींद नहीं आ रही थी, तो सोचा थोडा तफरीह हो जाए. सोचा किस "मूर्ख" को इतनी रात को जगाऊँ? सब के सब "बेवकूफ" गहरी नींद में सो रहे होंगे, बस! मेरी लिस्ट में सबसे अव्वल दर्जे के मूर्ख तुम ही हो, तो चला आया तुम्हारे पास, कुछ बात करनी है तुमसे, कहो तुम्हारे पास टाइम है क्या?
मैंने कहा - पहले तो ये बताइए कि आप मुझे "मूर्ख" (वो भी अव्वल दर्जे का) क्यों कह रहे हैं, मैंने क्या मूर्खता कर दी है प्रभु?
उन्होंने कहा - यार देखो मेरा सिंपल सा फंडा है. दुनिया मे ऐसे बहुत से लोग हैं जो मुझसे रोज़-रोज़ अनगिनत शिकायत करते हैं. कोई कहता है मैं बहुत परेशान हूँ, कोई अपने दुःख गिनाता है, कोई भी मुझे ऐसा नहीं दिखता जो कहे प्रभु आप आगे जाओ, मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं तो बेहद खुश हूँ...
एक तू ही दिखा "मूर्ख" जिसने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा, कभी कोई शिकायत नहीं कि तूने... मैंने जब भी तुझे देखा, खुश ही पाया, इसीलिए मेरी लिस्ट में तू सबसे बड़ा "मूर्ख" बन गया... और यही वज़ह थी कि इतनी रात को मैं तेरे सपने में आ पहुंचा...
उन्होंने कहा - चलो कुछ बातें करते हैं...
मैं अवाक होकर उनकी बातें सुन रहा था और सोच रहा था कि आज दिन में मैंने ऐसा कौन सा बेहतर काम कर दिया है जिससे मैं ऐसा सपना देख रहा हूँ कि स्वयं मेरे आराध्य ही मेरे सपनों में आए हुए हैं...
मैं ये सोच ही रहा था कि अचानक उन्होंने जम्हाई लेनी शुरू कर दी... मैंने पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं... उन्होंने उत्तर दिया अरे "मूर्ख" मुझे नींद आ रही है, चल उठ, अब मुझे सोने दे...
मैंने आश्चर्य से कहा कि आप तो भगवान् हैं, आपको भला नींद कैसे आ सकती है...
वो जोर से हँसे और बोले - "मूर्ख", तू बहुत बड़ा "मूर्ख" है, मेरे यहाँ, तेरे पास आने का प्रयोजन तू अभी तक नहीं समझ नहीं पाया... मैंने तुझसे बातें करने को कहा और तू है कि इस सोच में पड़ा है कि तूने दिन भर में ऐसा कौन सा बेहतर काम किया है कि मैं यहाँ आ पहुंचा... तू बोर कर रहा है यार, इसलिए मुझे नींद आने लगी...
अरे पागल! तुझे मुझसे बात करना चाहिए, तू खुशकिस्मत है कि मैं खुद तेरे सामने बैठकर तुझसे बात कर रहा हूँ, मैं ऐसे हर किसी से बात नहीं करता... तू मुझे अच्छा लगता है इसलिए ही तो मैं तेरे पास आया हूँ, अगर मैं सच में तेरे सामने आता तो तू घोर आश्चर्य के मारे बेहोश हो जाता, इसलिए मैं तेरे सपनों में आया हूँ...
चल शुरू हो जा और बता कि तुझे क्या चाहिए?
मैंने कहा - प्रभु! मुझे सिर्फ ये चाहिए कि सबसे पहले तो मुझे एक उचित कारण बताइए कि आपने मेरे पास आना ही ठीक क्यों समझा?
उन्होंने कहा कि मैं ऐसे हर किसी के पास नहीं जा सकता क्योंकि कोई मेरी क़दर नहीं करता, कोई मुझसे बात करना तक पसंद नहीं करता... सब मुझे केवल दुःख में ही याद करते हैं... और खुशियों में किसी को मेरी खबर ही नहीं होती... सब मुझे भूल जाते हैं... एक तू ही है जो मुझे हर पल याद करता है... यही नहीं तुने मुझे अपने "बटुए" और अपनी "लोकेट" में भी जगह दे रखी है... वैसे ये बटुए और लोकेट वाला काम कई लोग करते हैं, मगर वो महज़ उनका शौक होता है... लेकिन मैं जानता हूँ कि तू ये सब शौक या दिखावे के लिए नहीं बल्कि खुद की श्रृद्धा के चलते करता है... अब मुझे तो बस लोगों की आस्था से मतलब है... इसीलिए मैं तेरे पास आया... और मेरा तेरे पास आना सार्थक भी हुआ। तूने मेरा सम्मान किया और मुझे "प्रभु" कहकर भी बुलाया, मैंने तुझे "मूर्ख" कहा फिर भी तूने कुछ नहीं कहा बल्कि तूने बड़े आदर से पूछा की मैं तुझे "मूर्ख" क्यों कहा रहा हूँ?
अब तू समझ गया न, कि मैंने तुझे ही क्यों चुना?
अब लोगों के मन में मेरे लिए जगह नहीं बची बेटे, वो मुझे भूल चुके हैं, उनका सारा का सारा ध्यान मात्र "लक्ष्मी" की ओर है, वो पूरी तरह से व्यावसायिक हो चुके हैं, तभी तो अब मेरा और मेरे नाम का ता व्यवसाय करने लगे हैं... पर मुझे ख़ुशी है कि तुझ जैसे चंद लोग अभी दुनिया में हैं, तुम जैसे "मूर्खों" के बल पर ही मैं "उचक" रहा हूँ...
तेरा भला हो गौतम...
उन्होंने इतना कहा और चल दिए...
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27.12.09
सपने में भगवान्...
Posted by
रामकृष्ण गौतम
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comments
15.5.09
जहर बोने वाले इन ई-मेलों से सावधान रहिए
उपरोक्त आर्टिकल मुझे एक संपादक दोस्त ने भेजा। पढ़ता गया तो लगा कि आर्टिकल है मजेदार लेकिन सोचा कि यह किस अखबार में छपा है और किस संस्था ने शोध किया है, यह जाना जाए, यह जानकारी इस आर्टिकल में कहीं नहीं मिली। मैंने जब गूगल पर उपरोक्त आर्टिकल की हेडिंग डालकर सर्च किया तो जो नतीजे आए, उसे पढ़ने के बाद पूरा माजरा समझ में आया। एक अमेरिकन इंटरटेनमेंट टैबलायड वीकली वर्ल्ड न्यूज के गासिप सेक्शन में इस तरह के आर्टिकल पब्लिश किए जाते रहे हैं और याहू इस टैबलायड के कंटेंट को आनलाइन पब्लिश करता है। बस, किसी ने इस आर्टिकल को सच्ची खबर बताकर मेल के जरिए प्रचारित करना शुरू किया और देखते ही देखते यह आर्टिकल सुपरहिट मेल कंटेंट में शुमार किया जाने लगा है।
काम में कमजोर लोगों को समझदारों के लिए जान का खतरा बताना आधुनिक कारपोरेट प्रबंधन और माडर्न प्रोफेशनलिज्म की खतरनाक सोच है। यह सोच न सिर्फ मनुष्यता विरोधी है बल्कि किसी अच्छे समाज की संरचना के बुनियादी आधार को भी नष्ट करती है। अंतहीन होड़, अंतहीन काम, अंतहीन मेहनत.....इन पैमानों पर अगर कोई किसी कंपनी के लिए अच्छा हो तो अच्छा, और जो इन पैमानों के हिसाब से फिट न बैठे तो बुरा? फिर तो इन पैमानों पर गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह सभी फिट नहीं बैठते क्योंकि ये किसी कंपनी में काम नहीं करते थे।
आज सूचनाओं का दौर है लेकिन जहरीली सूचनाएं किस तरह हमारे आपके भोले भाले दिमाग को बददिमाग में बदल देती हैं, पता ही नहीं चलता।
उपरोक्त आर्टिकल की सच्चाई जानने के लिए इस पर क्लिक करें.....फाल्स
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