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4.12.12

"रिश्वतखोरी" गुनाह या मजबूरी ?



देखो......सर मैंने कुछ नहीं किया!
रे भाई तो फिर क्या मैंने किया है, अब तो जो दंड बनता है वो तो तन्ने भरना ही पड़ेगा।

ऐसा क्यों सर जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मैं क्यों भरू सर ये दंड!!!
देख छोरे मैं तन्ने ना जाने दू तू चाहे तो अपने आपको बचा सकता है और इस दंड से भी बच सके है।।।

एक मन तो किया की वही छोड़ के अपनी गाडी घर को लौट आऊ पर घर वालो ने पूछा तो क्या जवाब दूंगा। क्या बोलूँगा की मैंने अपनी बाईक किसी ठुल्ले को थमा दी और चला आया। फिर सोचा की दोस्त की धौस जमा के देखू शायद मैं निकल पाऊ  इन सब झमेलों से।
सर, मैं एक कॉल कर सकता हु अपने भाई को ?
क्यों रे छोरे तेरा भाई कोई तोप  हैं क्या कही का, जा करले जो करना है अब तो तेरी गाड़ी जब्त होगी!!

क्या जब्त!!!
पर क्यूँ आप मेरा चालान तो बनाओ और मुझे कही और भी जाना है।

देख छोरे इब  तो तेरा कोई चालन ना कट सके है। चाहे तू जो करले, इब तो अपनी गद्दी थाने से छुडवा लियो और करले कॉल जिसे कर रहा था। उसने जबरन मुझसे चाभिया मांगी और मैंने उसे पकड़ा दी।

फिर क्या था वो ठुल्ला मेरी बाईक ले गया और ठाणे में जमा करवा दी। मैंने भी मन ही मन सोचा हुआ था कुछ भी हो जाए इसे घूस तो बिलकुल भी नहीं देनी। हम लोगो ने ही इसे इतना बढावा दिया है हमें ही इसे रोकना चाहिए। ऐसे ही कुछ अछे विचारो का जैसे सैलाब सा उमड़ आया मेरे मन में।

सोचा घर जाके सबको बोल दूंगा की मैंने ठुल्ले को घूस ना दे कर कितना अच्छा काम किया हैं। घर पंहुचा और माँ से बोला माँ मेरी मोटर साईकिल एक ठुल्ले ने जब्त कर ली क्योंकि मेरे पास बाईक के बीमा के कागजात नहीं थे। और उसके घूस मांगने पर मैंने उसे घूस ना देकर देखो समझ पे कितना बड़ा उपकार किया हैं।

माँ चीखते हुए......ये क्या किया अभी गाडी कहाँ हैं?
गाड़ी तो ठाने में बंद हैं।
तू पागल तो नहीं हैं तुझे क्या जरूरत थी उसे गाडी की चाभी दने की, दे देता उसे 50, 100 रुपये और मामला रफा दफा करता।
मैं थोडा रुवाब झाड़ते हुए क्या माँ आप भी ऐसा क्यों बोल रहे हो? आपको तो बल्कि मुझे शाबाशी और मेरा हौसला बढाना चाहिए. आपके लड़के ने गलत का साथ नहीं दिया बल्कि सही का साथ देते हुए इस रिश्वतखोरी के खिलाफ अपना पहला कदम बढाया हैं।

बेटा जी ये जो बाते तू बोल रहा हैं न आज के समय में सिर्फ फिल्मो में या सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती हैं क्यूंकि असल जीवन में ये तार्किक बाते नहीं काम आती।  और रही बात समाज में फैली बुराईयों से लड़ने की बात तो बेटा उसके लिए तो वो अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी बैठे ही हैं न, फिर तू क्यूँ इन्हें अपना काम करने से रोक रहा हैं?

क्या माँ आप भी और लोगो की तरह सिर्फ अपने बारे में सोच रहे हो मैंने तो सिर्फ रिश्वतखोरी की बात ही की थी आपने तो पता नहीं कहा अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे महान समाज सेवियों तक बात पंहुचा दी। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हु की समाज को शुधारने की शुरुवात तो सबसे पहले पहल तो हमें ही करनी पड़ेगी न। और रही बात बाईक की वो तो एक माफ़ी पत्र थाने में SHO के हस्ताक्षर करवा के जमा करवा देना हैं बस उसी दिन बाईक मुझे मिल जायेगी। बस इतना ही तो करना है और गलती तो मेरी ही थी न जो मैंने ध्यान नहीं दिया की बाईक का बिमा ख़त्म हुए सप्ताह बीत गया हैं। अब दूसरा बीमा भी बाईक लाते ही करवा लूँगा।

बेटा अभी तू इन थाने के चक्करों में नहीं पड़ा न, तो ऐसी बाते कर रहा हैं। चल देखते है तेरी बाईक कब छूटती हैं।
मन में मैं यही सोच रहा था की आखिर माँ ने ऐसा क्यूँ बोला। क्या इतना मुश्किल हैं इस समाज में अपने सभी दायित्वों के प्रति जागरूक होकर रहना?

सोचा की पहले पत्र  लिख लू बस फिर क्या पत्र  लिखते ही थाने पंहुचा और सीधे ही SHO साहब के कक्ष की और तेजी से चल पड़ा।  जाकर पता चला की साहब तो हैं ही नहीं वो अगले दो दिन के लिए किसी दुसरे राज्य में कोई सेमिनार में सिरकत करने हेतु गए हुए हैं। सोचा चलो कोई नहीं पत्र तो लिख ही लिया हैं दो दिन बाद फिर आ जाऊंगा और उनके हस्ताक्षर ले ही लूँगा और इसी बहाने थोडा पैदल चलने का मौका भी मिल जाएगा।

दो दिन बाद फिर से साहब के कक्ष की और गया तो पता चला साहब दौरे पर निकले हुए हैं। मैंने एक साहब से पूछा की कब तक आयेंगे तो पता चला की उनके घर पे कोई पारिवारिक त्यौहार हैं वो सीधे ही घर की और निकल जायेंगे। थोड़ी झल्लाहट हुई मन में पर उसे नकारता हुआ सोचा की चलो कोई नहीं जहा 2 दिन इन्तेजार किया वह 1 दिन और सही।

अगले दिन फिर मैं साहब के कक्ष की और बड़ा तस्सली हुई देखकर की साहब आज बैठे हुए हैं और वह आये कई लोगो के पत्रों पे पाने हस्ताक्षर करने में थोड़े व्यस्त हैं। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठ गया। करीबन डेढ़ घंटे बाद जब मेरी बारी आई तो वह गेट पर खड़े एक व्यक्ति ने जो की सादे लिबास में था, ने मुझे रोका और काम पूछा की क्यूँ मिलना चाहता हु मैं SHO  साहब से?

मैंने उसे बताया की मेरी बाईक बंद हैं और इसी सिलसिले में मैंने एक माफीनामा पत्र लिखा हैं और उसी पत्र पे साहब के हस्ताक्षर लेने हैं और इसे थाने में जमा करवा कर अपनी बाईक छुडानी हैं।

उस आदमी ने मेरी तरफ देखा और बोला की भाई मैं तुम्हारे इस पात्र पे साहब के हस्ताक्षर करवा सकता हु बशर्ते मैं उसे कुछ बक्शीश या ये कहूँ की वो अप्रत्यक्ष रूप से मुझसे रिश्वत की मांग कर रहा था। मन तो मेरा ऐसा किया की उसकी शिकायत साहब को जाकर अभी कर दू पर वो कम्बखत वही दरवाजे पे अड़ा खड़ा हुआ था और उन्ही को अन्दर जाने दे रहा था जो उसकी बात मानकर उसे बक्शीश/रिश्वत दे रहे थे।

मैंने सोचा क्यूँ न सीधे ही अन्दर घूस जाऊं और साहब को इसकी शिकायत लगा दू और अपने पत्र पे उनके हस्ताक्षर करवा लूँ।

मैंने उसे थोडा पीछे की और धकेलकर आगे बढकर सीधे ही साहब की मेज की और बड़ा और साहब को अपना पत्र देते हुए कहा सर इस माफीनामे पत्र पर आपके हस्ताक्षर की जरूरत हैं। कृपया करके आप इस पर हस्ताक्षर कर दे। वही पीछे से भागता हुआ उनका चमचा आया और साहब को बोला साहब ये छोरा जबरन अन्दर आया हैं। साहब मुझे घूर के थोड़े गुस्से वाले मुद्रा में निहारने लगे।

सर मैं पंक्ति में ही था और जब मेरा नंबर आया तो ये जनाब मुझे बक्शीश की मांग करने लगे और कहने लगे की बक्शीश दो और अपना काम आराम से करवा लो। सर मैं इस बक्शीश के बिलकुल खिलाप हूँ और इसका मैं पुरजोर विरोध करता हूँ। और तो और इसने ये मांग मुझसे ही नहीं अपितु सभी से की हैं और जो लोग इसकी मांग को पूरा कर रहे हैं वो ही आपके पास तक पहुच रहे हैं।

इतना ही बोला था की साहब ने पहले तो मुझे बड़े ही अजीब ढंग से देखा और दुसरे लोगो की तरफ भी और पूछा की क्या ये लड़का सच बोल रहा हैं?
सभी ने एक साथ ही बोला जी सर ये बिलकुल सही बोल रहा हैं और ये बंद हर किसी से बक्शीश ले कर ही आप तक पहुचने दे रहा हैं।

साहब ने उसे खूब डाटा  और कहा की आगे से उसने किसी से भी बक्शीश की मांग की तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।मैं मन ही मन खुश हो रहा था की चलो कुछ तो अच्छे लोग बचे हुए हैं जो आज भी जागरूक है अपने कर्तव्यो के प्रति। साहब ने मुझसे मेरा पत्र माँगा और थोडा उसमे कुछ पढने के बाद बोले की इस पर मैं अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकता क्योंकि इस पर टिकट नहीं लगी हैं पहले वो लगा के लाओ फिर मुझसे हस्ताक्षर करवाओ।

मैं ये सब सुनकर दंग रह गया और जल्द ही टिकट लगा कर दुबारा आया और साहब की डेस्क की और बड़ा और अपना पत्र साहब की और लपकाया। साहब ने सीधे ही बिना मेरी तरफ देखे ही कहा बेटा ऑफिस बंद होने का समय हो चला हैं, अब सोमवार को आना अपनी बाईक को छुडवाने। मैंने काफी विनम्रता से अपनी मजबूरी जाहिर की साहब के सामने की सर मैं एक स्टूडेंट हूँ और मुझे बहुत दूर-दूर अपनी पढाई के सिलसिले में जाना होता है। इसलिए कृपया करके आप इस माफ़ी पत्र पर अपने हस्तांतरण कर दे। पर साहब मेरी बाते अनसुनी करते हुए चलते बने। वो बंदा जिसकी शिकायत मैंने साहब से की थी वो बड़ी ही मंद मंद हसी लिए हुए मुझे घूर रहा था मानो कह रहा हो "और कर ले शिकायत अब तो तेरी बाईक कभी नहीं तुझे मिलने वाली"।

मेरे मन में काफी झल्लाहट हुई इतना सब कुछ करने के बाद भी काम नहीं हुआ क्या फायदा हुआ शायद मुझे उसे थोड़ी सी बक्शीश दे कर अपना काम करवा लेना चाहिए था। फिर निकल कर बाहर आने लगा तो वो बंदा  मुझे देख कर मुस्कुराया और बोला भाई मेरे साहब से माफ़ी मांग ले और मुझसे भी और फिर तेरा काम हो सकता है और फिर तेरी बाईक छूट जायेगी।

मैं मन ही मन मुझे आत्मग्लानी का अनुभव सा हुआ की क्यों मैंने बेकार में ही पंगे ले लिए। कहने के लिए ही भारत एक लोकतान्त्रिक देश रह गया हैं क्यूंकि यहाँ तो मैंने सिर्फ रिश्वतखोरी के विरोध में अपनी आवाज भर बुलंद की थी। यहाँ तो क़ानून के दो मामूली नुमाईन्दे ही उसे दबाने में एकजुट हो गए। अब मुझे समझ में आया की इतने दिनों से अरविन्द केजरीवाल साहब और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी द्वारा चलाये गए मुहीम को अभी तक मंजूरी क्यूँ नहीं मिली। इनकी लडाई तो पुरे भ्रष्ट सिस्टम से हैं। खैर मुझे एक आखरी फैसला लेना ही पड़ा की मुझे आगे क्या करना चाहिए अपनी बाईक छुड़ाने के लिए।


मैंने अपने अन्दर जागे हुए जिम्मेदार नागरिक को दबाते हुए उस बन्दे की बात मानी और उसे सॉरी बोला और बोला की भाई कृपया करके वो मेरा काम करवा दे और मैं साहब से माफ़ी भी मांग लूँगा। उसने मुझसे अपनी बक्शीश ली और कहा की कल सुबह सुबह वो साहब से मेरे बारे में जरूर बात करेगा और मेरा काम करवा देगा।

मैं घर पंहुचा और माँ को सब हाल सुनाया। माँ ने मेरी तरफ देखा और कहा बेटा मैंने तो तुझे पहले ही कहा था की इन समाज सेवा वाले चक्करों में न पड देखा आखिर में थक हार कर तुझे ही झुकना पड़ा। क्यूंकि तू एक आम आदमी है जिसे कोई भी औधे पर बैठे सरकारी अधिकारी के आगे झुकना ही पड़ता है। वरना अंत में परिणाम ऐसा ही निकलता हैं।

माँ आप शायद ठीक बोल रहे हो आगे से मैं भी इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनने में देरी नहीं करूँगा। कल ही जाकर अपनी बाईक छुडवाता  हूँ। बस इतना कहते ही अपने कमरे में जाते हुए मैं बस एक ही बात सोच रहा था की सभी लोग ऐसी परिस्थिति में आते होंगे और वो क्या करते होंगे? क्या वो भी झुकने को मजबूर हो जाते होंगे इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे।

खैर मैं अभी भी थोडा सा भ्रमित हूँ की "रिश्वतखोरी" एक गुनाह हैं या मजबूरी हैं? अब आप ही बताये? ये कहानी एक काल्पनिक कहानी है जिसकी प्रेणना मुझे एक मित्र के साथ हुई आप-बीती से मिली। अगर किसी व्यक्ति विशेष को मेरी किसी बात का बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी चाहूँगा।



via : Pawan Mall

11.8.12

‘रामदेव+विवाद’ बहुत गहरा याराना है


अति महत्वाकांक्षी और बड़बोलेपन का प्रमाण देने वाले योग गुरू रामदेव विवादित हो जाते हैं। उनको जन्म भी वह खुद ही देते हैं। रामलीला मैदान में चल रहे इस बार के आंदोलन में सरकार के प्रति उनका प्रेम भी दिख रहा है। यह वही बाबा हैं जो सरकार के विनाश का सपना देखते आये हैं और जी भरकर कोसते हैं। अब सोनिया गांधी को सोनिया माता कहकर कहते हैं कि बातचीत के लिये उनके दरवाजे खुले हैं। कोई इसे नमस्कार योग, तो कोई पलटयोग बता रहा है। मंच पर लगाये गए पोस्टर से भी वह विवादों में आ गए। मीडिया से तूल न देने का आग्रह किया। दरअसल पोस्टर में बालकृष्ण को महापुरूष बताते हुए पोस्टर के दोनों तरफ भगवान श्री कृष्ण के अलावा क्रमबद्व ढंग से राष्ट्रपिता, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, चंद्रशेखर आजाद के बाद बालकृष्ण व उनके बाद शहीद भगत सिंह व वीर शिवाजी आदि के फोटों हैं। पोस्टर पर लिखा गया कि ’जेल आंदोलनकारियों का तीर्थ है। आचार्यजी महान हैं, रोगियों के भगवान हैं, भगवान के वरदान हैं, भ्रष्टाचारी परेशान हैं।’ बाबा ने महापुरूषों का अपमान करते हुए पता नहीं बालकृष्ण की ऐसी तुलना शायद इसलिए कर डाली क्योंकि बालकृष्ण उनकी अरबों का कारोबार करने वाली 34 कंपनियों के डायरेक्टर हैं। फर्जी पासपोर्ट मामले में जेल में बंद बालकृष्ण को जबरन महापुरूष बनाने पर बाबा तुले हैं। अपने कृत्यों से व्यक्ति स्वतः ही महान हो जाता है, लोगों के दिलों में जगह बना लेता है उसके लिये कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है। 
पिछली बार अफसोसजनक बात यह रही कि लाखों दिलों में आदर के साथ बसने वाले स्वामी रामदेव ने अपने अनशन की बुनियाद झूठ के मंच पर रखी और नाम दे दिया ‘सत्याग्रह’। शीर्षासन पर बैठे लोगों से यूं तो ऐसी आशा नहीं की जाती। जब बाबा अनसन से पहले ही सरकार से लिखित समझौता कर चुके थे, तो उन्हें अनशन की क्या जरूरत थी। लोगों को गुमराह करने के बजाये उन्हें बता देना चाहिए था। बाबा के निर्णय पर कोई असहमति प्रकट भी नहीं करता। चूंकि सभी तैयारियां हो चुकी थीं। बाबा एक तीर से दो निशाना साधना चाहते थे। एक तो वह भक्तों की नजर में साफ रहना चाहते थे दूसरे सरकार को जनसमर्थन की ताकत दिखाना चाहते थे।
जनता की भावनाओं को छले जाने का सिलसिला पुराना है। नेता यह काम अर्से से करते आ रहे हैं। बाबा ने कुछ नया भी नहीं किया। बेचारी जनता की नियति यही है। संभवतः बाबा खुद को भविष्य में प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे थे। उन्होंने मांग शुरू कर दी कि जनता को प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। सवाल यह कि इससे लाभ किसको? जाहिर है बाबा के भक्त उन्हें ही कहते और बाबा कहते कि अब जनता कह रही है, तो मैं क्या करूं। बाबा की महत्वाकांक्षाओं से संत समाज भी उनसे नाराज रहा है। ऐसे संकेत बाबा फिर दे रहे हैं। भ्रष्टाचार मिटाने का सपना भला किसना नहीं होता, लेकिन बाबा की बातें डंके की चोट पर साफ नहीं होती। अह्म सवालों पर चतुराई से कन्नी काट जाते हैं। या वक्त आने पर बतायेंगे कहकर टाल जाते हैं। आरोप यह कि वह देखते हैं कि बात बन गई, तो ठीक वरना बाद में साफ कर देंगे। बाबा हों या नेता जनता बहुत कुछ जानकार व समझदार हो गई है। जय हो बाबा!

10.1.12

भ्रष्टाचार, स्त्री और असंवेदनशीलता

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

गत 23 दिसम्बर को एक समाचार पढने में आया कि जिला शिक्षा अधिकारी इन्दौर के कार्यालय में कार्यरत एक महिला लिपिक ने रिश्‍वत ली और वह रंगे हाथ रिश्‍वत लेते हुए पकड़ी भी गयी| इस प्रकार की खबरें आये दिन हर समाचार-पत्र में पढने को मिलती रहती हैं| इसलिये यह कोई नयी या बड़ी खबर भी नहीं है, लेकिन मेरा ध्यान इस खबर की ओर इस कारण से गया, क्योंकि इस खबर से कुछ ऐसे मुद्दे सामने आये जो हर एक संवेदनशील व्यक्ति को सोचने का विवश करते हैं| पहली बात तो यह कि एक महिला द्वारा एक दृष्टिबाधित शिक्षक से उसके भविष्य निधि खाते से राशि निकालने के एवज में रिश्‍वत की मांग की गयी| शिक्षक ने भविष्य निधि से निकासी का स्पष्ट कारण लिखा था कि वह उसके चार वर्षीय पुत्र का इलाज करवाना चाहता है, जो कि लम्बे समय से किडनी की तकलीफ झेल रहा है|
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

इतना सब पढने और जानने के बाद भी महिला लिपिक श्रीमती पुष्पा ठाकुर का हृदय नहीं पसीजा| श्रीमती ठाकुर ने भविष्य निधि में जमा राशि को निकालने के लिये प्रस्तुत आवेदन को आपनी टेबल पर दो माह तक लम्बित पटके रखा और आखिर में दो हजार रुपये रिश्‍वत की मांग कर डाली, जो एक बीमार पुत्र के पिता के लिये बहुत ही तकलीफदायक बात थी| जिससे आक्रोशित या व्यथित होकर दृष्टिबाधित पिता ने रिश्‍वत देने के बजाय सीधे लोकयुक्त पुलिस से सम्पर्क किया और श्रीमती पुष्पा ठाकुर को रंगे हाथ गिरफ्तार करवा दिया|

इस मामले में सबसे जरूरी सवाल तो यह है कि भविष्य निधि से निकासी के लिये पेश किये जाने वाले आवेदन दो माह तक लम्बित पटके रहने का अधिकार एक लिपिक को कैसे प्राप्त है? यदि आवेदन प्राप्ति के साथ ही आवेदन को जॉंच कर प्राप्त करने, पावती देने और हर हाल में एक सप्ताह में मंजूर करने की कानूनी व्यवस्था हो तो श्रीमती ठाकुर जैसी निष्ठुर महिलाओं को परेशान शिक्षकों या अन्य कर्मियों को तंग करने का कोई अवसर ही प्राप्त नहीं होगा| क्या मध्य प्रदेश की सरकार को इतनी सी बात समझ में नहीं आती है?

दूसरी बात ये भी विचारणीय है कि स्त्री को अधिक संवेदनशील और सुहृदयी मानने की भारत में जो महत्वूपर्ण विचारधारा रही है, उसको श्रीमती ठाकुर जैसी महिलाएँ केवल ध्वस्त ही नहीं कर रही हैं, बल्कि स्त्री की बदलती छवि को भी प्रमाणित कर रही हैं| इससे पूर्व विदेश विभाग की माधुरी गुप्ता जासूसी करके भी स्त्री की बदलती छवि को प्रमाणित कर चुकी है| यदि ऐसे ही हालात बनते गये तो स्त्री के प्रति पुरुष प्रधान समाज में जो सोफ्ट कॉर्नर है, वह अधिक समय तक टिक नहीं पायेगा|

इन हालातों में पुष्पा ठाकुर और माधुरी गुप्ता जैसी महिलाओं द्वारा स्त्री छवि को तहस-नहस किये जाने से सारी की सारी स्त्री जाति को ही आगे से पुरुष की भांति माने जाने का अन्देशा है| यदि ऐसा हुआ तो भारतीय कानूनों में स्त्री को जो संरक्षण मिला हुआ है, उसका क्या होगा?

30.12.11

लोकपाल-हमाम में सभी नंगे!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

लोकपाल विधेयक के बहाने कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों एवं ईमानदारी का ठेका लिये हुंकार भरने वाले स्वयं अन्ना और उनकी टीम के मुखौटे उतर गये! जनता के समक्ष कड़वा सत्य प्रकट हो गया!

जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये आँसू बहाते नजर आये! सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल पारित करवाने का दावा करने वाले यूपीए एवं एनडीए की ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा की पोले खुल गयी! सामाजिक न्याय को ध्वस्त करने वाली भाजपा की आन्तरिक रुग्ण मानसिकता को सारा संसार जान गया! भाजपा देश के अल्प संख्यकों के नाम पर वोट बैंक बढाने की घिनौनी राजनीति करने से यहॉं भी नहीं चूकी|

भाजपा और उसके सहयोगी संगठन एक ओर तो अन्ना को उकसाते और सहयोग देते नजर आये, वहीं दूसरी ओर मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा इस देश पर जबरन थोपे गये आरक्षण को येन-केन समाप्त करने के कुचक्र भी चलते नजर आये!

स्वयं अन्ना एवं उनके मुठ्ठीभर साथियों की पूँजीपतियों के साथ साठगॉंठ को देश ने देखा| भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके एनजीओज् के साथ अन्ना टीम की मिलीभगत को भी सारा देश समझ चुका है| सारा देश यह भी जान चुका है कि गॉंधीवादी होने का मुखौटा लगाकर और धोती-कुर्ता-टोपी में आधुनिक गॉंधी कहलवाने वाले अन्ना, मनुवादी नीतियों को नहीं मानने वाले अपने गॉंव वालों को खम्बों से बॉंधकर मारते और पीटते हैं!

भ्रष्टाचार मिटाने के लिये अन्ना भ्रष्टाचार फैलाने वाले कॉर्पोरेट घरानों और विदेशों से समाज सेवा के नाम पर अरबों रुपये लेकर डकार जाने वाले एनजीओज् को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहते, इस बात को देश को समझाने के बजाय बगलें झांकते नजर आये! जन्तर-मन्तर पर लोकपाल पर बहस करवाने वाली अन्ना टीम ने दिखावे को तो सभी को आमन्त्रित करने की बात कही, लेकिन दलित संगठनों को बुलाना तो दूर, उनसे मनुवादी सोच को जिन्दा रखते हुए लम्बी दूरी बनाये रखी है!

संसद में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, लेकिन किसी ने भी सच्चे मन से इस कानून को पारित कराने का प्रयास नहीं किया| विशेषकर यदि कॉंग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर यह तय कर लिया था कि लोकपाल को किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना है और देश के लोगों के समक्ष यह सिद्धि करना है कि दोनों ही दल एक सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल कानून बनाना चाहते हैं| वहीं दूसरी और सपा, बसपा एवं जडीयू जैसे दलों ने भी लोकपाल कानून को पारित नहीं होने देने के लिये संसद में बेतुकी और अव्यावहारिक बातों पर जमकर हंगामा किया| केवल वामपंथियों को छोड़कर कोई भी इस कानून को पारित करवाने के लिये गम्भीर नहीं दिखा| यद्यपि बंगाल को लूटने वाले वामपंथियों की अन्दरूनी सच्चाई भी जनता से छुपी नहीं है|

22.12.11

लोकपाल का डर



लोकपाल का डर


लोकपाल को लेकर हो हल्ला मचा है...सडक से लेकर संसद तक एक ही चर्चा है...अखबार से लेकर टीवी तक एक ही खबर छायी हुई है...लोकपाल...अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल आए...प्रधानमंत्री औऱ सीबीआई इसके दायरे में रहें...आम आदमी का सबसे ज्यादा पाला पडने वाले ग्रुप सी औऱ डी के कर्मचारी इसके दायरे में रहें...अन्ना का इसके पीछे तर्क है कि यह सब लोकपाल में होगा तो भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी...अब लोकपाल बिल पास होने के बाद इसका कितना असर होगा ये तो समय ही बताएगा...लेकिन लोकपाल के जिन्न ने देश की राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया है...एक अनजाना सा खौफ हमारे देश के राजनेताओँ पर छाया हुआ है...देश की राजनीति में खासा दखल रखने वाले दो बडे राज्य यूपी औऱ बिहार के कद्दावर नेता मुलायम सिंह औऱ लालू प्रसाद यादव ने तो इसके खिलाफ संसद में ही आवाज बुलंद कर दी है...मुलायम सिंह कहते हैं कि लोकपाल बिल पास हो गया तो एक मामूली सा दारोगा भी उन्हें जेल भेज देगा...कलेक्टर औऱ एसपी उनकी इज्जत नहीं करेंगे...यहां लालू भी मुलायम सिंह का समर्थन करते दिखे...हम कहते हैं...अरे साहब ऐसा काम ही क्यों करते हो कि कोई दारोगा आपको जेल भेजे...कलेक्टर और एसपी आपकी इज्जत न करें...कहीं न कहीं आपके मन में चोर है इसलिए शायद आप लोकपाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं...इतने ही ईमानदार आप होते तो एक सशक्त लोकपाल का समर्थन नहीं करते...।
ये तो रही बात यूपी औऱ बिहार के दो महानुभावों कि...बात अगर करें हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की...क्या वाकई में हमारे देश के प्रधानमंत्री ईमानदार हैं...किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं...अरे साहब हम तो कहते हैं कि अगर वाकई में ईमानदार हो...ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हो तो फिर डर काहे का...ले आओ न सशक्त लोकपाल...खैर कसूर आपका भी नहीं है...आपकी भी मजबूरी है...आपका तो खुद बुरा हाल है...कहते हैं ना...मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो...मैं पीता नहीं हूं पिलायी गयी है...आपको पिलाने वाला तो कोई औऱ ही है...।
केन्द्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में पेश करने जा रही है...इसके लिए संसद का सत्र भी 29 दिसंबर तक बढाया गया है...सरकार के लोकपाल को लेकर जहां टीम अन्ना ने आंखे तरेर रखी हैं...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने भी इसको लेकर कमर कस ली है...औऱ संसद में इस पर जमकर तकरार होने के आसार हैं...।
अब लोकपाल की इस लडाई में जीत किसकी होती है ये तो समय ही बताएगा...लेकिन निश्चित तौर पर लोकपाल का भय़ बिल के पास होने से पहले ही भ्रष्टाचारियों पर दिखाई देने लगा है...उम्मीद करते हैं कि एक सशक्त लोकपाल आए औऱ भ्रष्टाचार में नित नये रिकार्ड बनाते हिंदुस्तान की तस्वीर बदले।


दीपक तिवारी
08800994612
deepaktiwari555@gmail.com

14.12.11

कैसा हो लोकपाल कानून?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इस देश की रग-रग में भ्रष्टाचार समाया हुआ है और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये अन्य अनेक बातों के साथ-साथ सख्त कानून की दरकार है, जिसके लिये प्रस्तावित लोकपाल कानून को जरूरी बताया जा रहा है| अब तक की सभी केन्द्र सरकारों द्वारा किसी न किसी बहाने लोकपाल कानून को लटकाकर रखा है, जिसमें कॉंग्रेस भी शामिल है| चूँकि कॉंग्रेस ने सर्वाधिक समय तक देश पर शासन किया है, इस कारण कॉंग्रेस भ्रष्टाचार को पनपाने, रोकथाम नहीं कर पाने और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों का क्रियान्वयन नहीं करवा पाने और, या लोकपाल कानून को नहीं बनवा पाने के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार है| जिससे वह बच नहीं सकती है| यह अलग बात है कि केन्द्र की वर्तमान यूपीए सरकार लोकपाल कानून के बारे में बुरी तरह से फंस चुकी है| जानकारों का मानना है कि केन्द्र सरकार इस बारे में अन्ना हजारे और अन्ना हजारे के पीछे खड़े राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को इस बात का श्रेय नहीं लेने देना चाहती कि उनके दबाव में लोकपाल कानून बनाया गया है| क्योंकि राजनीति में इस प्रकार के निर्णयों का चुनावों में असर होता है| लेकिन आम जनता को इस बात से क्या लेना देना है? कॉंग्रेस या यूपीए ने ऐसी स्थिति क्यों निर्मित होने दी कि अन्ना, आरएसएस या भाजपा या एनडीए या अन्य विपक्षी दलों को लोकपाल कानून बनवाने का श्रेय मिलने की स्थिति बनी! निश्‍चय ही यह वर्तमान यूपीए और कॉंग्रेस नेतृत्व की राजनैतिक असफलता है| जिसका फायदा दूसरे राजनैतिक उठाना चाहते हैं, तो उनका राजनैतिक अधिकार है| इसमें गलत भी क्या है? अब भी यदि कॉंग्रेस दुविधा से बाहर नहीं निकल पायी तो फिर उसे और यूपीए को होने वाले नुकसान की लम्बे समय तक भरपाई कर पाना सम्भव नहीं होगा| अत: बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार न मात्र लोकपाल कानून को लाये ही, बल्कि सच्चे अर्थों में लोकपाल कानून बनाकर संसद में पेश करे| जिससे देश और देश की जनता को भ्रष्टाचार, अनाचार और गैर-कानूनी कुकृत्यों से मुक्ति मिल सके|


वर्तमान में इस बात की बहस भी चल रही है कि लोकपाल के दायरे में कौन हो और कौन नहीं हो| निश्‍चय ही यह महत्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दा है| जिस पर राष्ट्रीय सोच और राष्ट्रहित के साथ-साथ देश के सभी वर्गों का विशेषकर कमजोर वर्गों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है| अत: प्रस्तावित लोकपाल कानून बनाते समय ध्यान रखा जावे कि-


1. बिना किसी किन्तु-परन्तु के देश का प्रत्येक लोक सेवक लोकपाल के दायरे में आना चाहिये| लोक सेवक के दायरे में छोटे से छोटे जनप्रतिनिधि से लेकर प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति तक हर एक उस व्यक्ति को आना चाहिये जो जनता से संग्रहित धन से वेतन लेता हो या जनता से संग्रहित धन को खर्चे करने के बारे में निर्णय लेने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार रखता हो| जिसमें न्यायपालिका और सेना भी शामिल हों|


2. सभी औद्योगिक घराने, गैर-सरकारी संगठन (चाहे सरकारी अनुदान लेते हों या नहीं), सभी गैर-सरकारी शिक्षण या अन्य संस्थान, खेल संघ और ऐसा प्रत्येक सरकारी या गैर सरकारी या निजी निकाय या उपक्रम जिसके पास जनता से किसी भी कारण से किसी भी रूप में धन संग्रहित करने और उसे खर्च करने का हक हो उसे बिना किसी भी किन्तु-परन्तु के प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना ही चाहिये|


3. सभी प्रकार की ऐसी जॉंच ऐजेंसियॉं, जिन्हें किसी भी प्रकार के मामले की जॉंच करने का हक हो उन्हें भी प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना चाहिये| जिनमें नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों की नियुक्ति, पदोन्नति और बर्खास्तगी का अधिकार केवल लोकपाल के पास ही होना चाहिये|


4. प्रस्तावित लोकपाल कानून में भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तिृत और सुस्पष्ट करने की जरूरत है| जिसमें प्रत्येक ऐसे गैर-कानूनी कृत्य को जिसमें धन, बजट, अनुदान, शुल्क बजट,विज्ञापन, कर आदि को किसी भी प्रकार से धन समावेश हो वह मामला भ्रष्टाचार से सम्बन्धित होने के कारण प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में आना चाहिये| इसके अन्तर्गत समस्त प्रकार का मीडिया, बजट का मनमाना और गैर-कानूनी उपयोग करने वाले लोक सेवकों को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है| इससे मीडिया की मनमानी और ब्यूराक्रेसी की भेदभावपूर्ण कुनीतियों पर भी अंकुश लग सकेगा|


5. प्रस्तावित लोकपाल कानून में यह स्पष्ट रूप से व्यवस्था होनी चाहिये कि इसमें देश के सभी सम्प्रदायों और वर्गों को बारी-बारी से अवसर मिलेंगे| इसमें कम से कम 50 फीसदी स्त्रियों सहित, अल्पसंख्यकों, पिछड़ा वर्ग और दलित-आदिवासी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सशक्त हिस्सेदारी देने की सुनिश्‍चित व्यवस्था भी होनी चाहिये|


6. लोकपाल की औपचारिक नियुक्ति बेशक राष्ट्रपति द्वारा की जावे, लेकिन लोकपाल के चयन का अधिकार किसी भी राजनेता और पूर्व ब्यूरोक्रेट के पास नहीं होना चाहिये| बल्कि लोकपाल का चयन करने के लिये देश के निष्पक्ष कानूनविदों, न्यायविदों और सामाज के निष्पक्ष लोगों के संवैधानिक चयन मण्डल द्वारा होना चाहिये| बाद के चयनों में सेवा निवृत लोकपालों को भी शामिल किया जा सकता है|


7. लोकपाल को हटाने के लिये एक संवैधानिक निकाय होना चाहिये, जिसमें एक भी ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं हो, जो लोकपाल के चयन मण्डल में भागीदार रहा हो| लोकपाल के अधीन सभी लोक सेवकों के विरुद्ध देश के हर एक व्यक्ति को कानूनी कार्यवाही प्रारम्भ कराने के लिये न्यायपालिका के समक्ष अर्जी देने का पूर्ण हक दिया जावे|

5.8.11

भाड़ में जाये आम आदमी के सपने.............


आते जाते मैं अक्सर उस दुकान पर ठिठक जाता हूँ और उसमे सजाई चीजों को बड़ी हसरत से देखा करता हूँ. ये दुकान हैं सपनो की, काफी गहमा-गहमी का माहौल होता हैं पर मेरी निगाहें सीधे अपने सपनों पर ही जाकर टिक जाती हैं. हर बार मन करता हैं कि उनमें से कोई सपना साथ ले लू, लेकिन मजबूरी हैं की मैं चाह कर भी कुछ नहीं खरीद पता हूँ. मैं ही क्यों वहां आने वाला कोई भी व्यक्ति आसानी से कुछ भी नहीं खरीद पाता हैं क्योंकि अपना एक सपना खरीदने के लिए कम से कम दो सपने बेचने पड़ेंगे और मुझे तो बहुत सारे सपने खरीदने हैं, कुछ अपने लिए और कुछ अपनों के लिए. लेकिन इन सपनो की कीमत चुकाना मेरे बस में नहीं रहा. अब बस यही कशमकश में जी रहा हु आजकल की कैसे अपने और अपनों के सपनो को पूरा किया जाये और किन सपनो की क़ुरबानी दी जाये और किन्हें साकार करा जाए.....





आखिर इन सपनो पर भी महंगाई का असर हो ही गया, कई सपने अपने पापा के लिए देखे थे, कई सपने अपनी बेटी के लिए देखे थेकई सपने अपनी माँ के लिए देखे थे, और कई सपने अपने लिए भी सजाये थे पर लगता हैं इन सपनो को पूरा करने में कितने सपने ही टूटेंगे और फिर मैं भ्रम रूपी आयाम से बहार निकल वास्तविकता का सामना करूँगा और निराशा का एक डर जो अभी सता रहा हैं, का सामना जल्द ही करूँगा अगर जल्द ही हमारे हुक्मरानों ने कुछ नहीं किया तो, कितने ही आम लोगो को अपने सपनो से समझौता करना पड़ेगा !!!!!!!

जय हो भारत सरकार की जिन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने ही स्वार्थ रूपी सपनो की पड़ी है आम आदमी के सपनो की कोई कदर नहीं, भाड़ में जाये आम आदमी के सपने.............


via : My Thought & My Life

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2.8.11

सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी का स्लट वाक

भाई सोहन शर्मा नुक्कड़ पर ठहाके लगा रहे थे कारण पूछने पर बोले -  " देखो तो दीपक भाजपाई के संघेरे भाईयों को स्लट वाक याने बेशर्मी मोर्चा का विरोध कर रहे हैं । अरे भाई कोई कैसे भी कपड़े पहने इनको क्या आपत्ति है ।  कम कपड़े पहनने का यह मतलब थोड़े ही है कि लड़की आप को बुला रही है , कि आओ बलात्कार करो । हमने सर हिलाया - बड़े उच्च विचार हैं आपके , वैसे शर्मा जी सोना चांदी पैसा कहां रखते हो शर्मा जी बोले - लाकर मे या  अलमारी के सेफ़ में और आदमी कहां रखेगा ? । हमने कहा घर के बाहर शोकेस बनवा दो आते जाते लोग आपकी संपत्ती की गहनो की तारीफ़ करेंगे मुहल्ले मे आपकी इज्जत बढ़ेगी मान बढ़ेगा


शर्मा जी बोले - दिमाग खराब हो गया है क्या , जिस चोर की निगाह पड़ी वही लूट लेगा , कौन शोकेस की चौकीदारी करता फ़िरेगा दिन भर । हमने कहा यही बात महिलाओं पर लागू नही होती क्या ? जिन कपड़ो से बलात्कारियों की नजर मे चढ़ो , उसको पहने का फ़ायदा क्या , खास कर उन लड़कियों को जो परिवार से दूर रहती हों या असुरक्षित जगहो पर जाती हों । चोर और बलात्कारी तो आसान और बढ़िया शिकार खोजते हैं , क्या वे स्ल्ट वाक को देख अपनी हरकते बंद कर देंगे  । सुंदर लड़कियो को कम कपड़ो मे देख आप जैसा अच्छा इंसान तो मन मसोस कर रह जाता है कि लड़की के घर वाले पीटेंगे पुलिस वाले पीटेंगे और सबसी बड़ी बात बीबी पीटेगी ।

शर्मा जी ने सर हिलाया पीट तो बीबीयां वैसे भी लेती हैं भाई पर छोड़ के चले जायेगी उसका क्या । शर्माईन को भले मुझमें लाख बुराईयां और अपने मे लाख अच्छाईयां नजर आये , शादी के इतने सालों बाद मन भी नही लगता उनके बिना । हमने शर्मा जी को टोका - ओ भाई होश में आओ , कहां श्रीमती के प्यार में खो गये अभी घर पहुंचते ही भाभी चार काम बतायेंगी तो तुम्हारा प्यार का नशा हिरण हो जायेगा । अभी बात बेशर्मी मोर्चा की करना है , क्या विचार बनाया आपने । शर्मा जी ने स्टैंड बदला - मैं सहमत हूं कि बेशर्मी मोर्चा का विरोध होना चाहिये ।

अब शर्मा जी से हमने कहा तुरंत दिल्ली जाओ , अपनी सोणी मम्मी राउल बाबा और उनके चालीस चोरों का जो रोजाना स्लट वाक हो रहा है उसे बंद कराओ

पूरा पढ़ने के लिये अष्टावक्र

27.7.11

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए!!!


ये कहना गलत नही होगा की,
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए!!!

आप सभी सोच रहे होंगे ये क्या हो गया हैं मुझे और मैं ऐसा क्यों बोल रहा हु अरे मित्रो अभी कुछ दिनों से हो रहे बम धमाको से पूरा पडोसी मुल्क सकते में हैं अब जिसने उस तालिबान नाम के साप को पाला अब वो उसी को  ही डस रहा  हैं तो ये कहावत तो सही माईने में पडोसी मुल्क के ऊपर लागू होना जायज सी बात हैं. अगर वहां की हकुमत सही माईने में अपने लोगो की परवाह करती तो शायद पडोसी मुल्क भी अपने नाम की तरह पाक कहलाता और तरक्की की और बढता पर अब वहां की हकुमत ने भारत से हमेशा द्वेष की भावना ही रखी हैं और हमेशा ही मुह की ही खायी हैं.
अभी हाल ही में मैंने कहीं टेलीविजन में एक वृत्तचित्र देखा जिसमे ये बताया जा रहा था की पडोसी मुल्क किस तरह से अपने विद्यालयों में कैसे गुमराह की शिक्षा अपने आने वाले पीढियों को दे रहा हैं जहाँ भारत का चित्रण एक आतंकवादी देश के रूप में किया जाता हैं, अब वो तो बेचारे बच्चे हैं जो कोरे कागज की तरह होते हैं जिनपे द्वेष, आतंक की स्याही से कुछ भी लिख दो वो हमेशा के लिए ही छाप छोड़ जाता हैं उन मासूमो के दिमाक में.

खैर यही कारन हैं की वह की आम जनता भी अब अपनी सरकार का वो भयानक रूप देख चुकी हैं और अगर जल्द कुछ नही किया गया तो ये डर का साया यहाँ भी पहुँच जाएगा. और शायद पहुच भी सकता हैं क्योंकि यहाँ तो हमारे देश में ही पीठ पर छुरा घोपने वाले मौजूद हैं.
वो कहते हैं न की,
जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दुसरो से क्या उम्मीद रखी जा सकती हैं.

अब देखते हैं कब वो मदारी आते हैं और कब अपने इशारो पे इन्हें नाचना शुरू करते हैं. अगर हम अब नहीं जागेंगे तो फिर हमारी आवाम भी पडोसी मुल्क की तरह हो जाएगी असहाय और बेबस....


By : Pawan Mall
via : http://goo.gl/gIV4F

7.6.11

आधुनिक बोधकथाएँ -५. वीर विक्रम और बैताल ।

आधुनिक बोधकथाएँ -५. 
वीर विक्रम और बैताल ।
सौजन्य-गूगल
हमेशा  की तरह, परदुःखभंजन राजा वीर विक्रम ने, अड़ियल बैताल को, शव के साथ, पेड़ से नीचे उतारा और, अपने कंधे पर रखकर, राजा ने अपनी राह पकड़ ली ।

बैताल - " विक्रम, मेरी समझ में, ये बात नहीं आ रही  है  कि, तुम्हारी इस  व्यर्थ मेहनत पर, मैं  दया दिखाउँ या तेरी मूर्खता पर मैं  हँसूं..!! खैर, आसानी से रास्ता कट जाएं इसलिए, मैं तुम्हें एक आधुनिक बोधकथा सुनाता हूँ, अगर ये कथा सुनने के पश्चात मेरे द्वारा पूछे गये सवालों का सही  जवाब तुमने नहीं दिया, तो तुम पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे, ऐसा श्राप मैं तुम को दूँगा..!!

बैताल की यह बात सुनकर राजा विक्रम कुछ बोले बिना ही, मंद-मंद मुस्कुराता  हुआ, अपने मार्ग पर, आगे चलता  रहा ।

बैताल - " भारत वर्ष में, एक हठयोगी बाबा  रहता था ।  कोई उसे  बहुत बड़ा ठग कहता था, कोई उसे संत कहता था..!! पूरे भारत वर्ष में, उसके नाम का शोर्ट कट कर के,  लोग  उन्हें,`अनुलोम-विलोम बाबा` भी कहते थे ।

ये हठयोगी बाबा, कभी किसी के सामने भी, झुकने को तैयार न थे, इसीलिए  वहाँ के सत्ता अधिकारीओं के साथ अक्सर उनकी कहा सुनी हो जाती थी और  वहाँ  की समाचार पत्रिकाएँ और दूर दृश्य  डिब्बे को (TV) चौबीसों घंटे की ख़ुराक मिलती रहती थी, जिसके कारण उनके कर्मचारीओं को,  खाना-पीना नसीब होता था और प्रजा का भी हमेशा मनोरंजन होता था..!!

एक दिन की बात है, इस हठयोगी को न जाने कहाँ से पता चल गया कि, भारत वर्ष के सभी राज्यों में और केन्द्रीय राज्य में, भ्रष्टाचार ने, सभी सीमाओं को लाँघ कर, आम जनता का जीना हराम कर दिया है..!!

इतना ही नहीं, केन्द्रीय राजा और उनके कई मंत्री ने, भारत वर्ष की जनता के  ख़ून पसीने की कमाई से,  टैक्स के रूप में इकट्ठा किया हुआ ये सारा धन, जन हित में उपयोग कर ने के बजाय, उसे काला धन बना कर, भारत के बाहर दूसरे देशों में , बद-नियत से संग्रह किया  है?

बस फिर क्या था? ये सुनते ही बाबा ने, हठयोग आज़माते हुए, राजा के सामने  आमरण अनसन का एलान कर दिया और कई लाखों इन्सानों की भीड़ जमा करके, भ्रष्टाचार, काले धन और शीर्ष  राजा के खिलाफ़, जो दिल में आए  वो बोलना शुरु कर दिया..!!

केन्द्रीय शीर्ष राजा ने, समय की नज़ाकत को देखते हुए, बाबा का हठयोग भंग करने के लिए कई मंत्री को अपना दूत बनाकर, उनके पास वार्तालाप करने के लिए भेजा, पर बाबा ने अपना हठयोग-आमरण अनशन समाप्त करने से इनकार करते हुए, अनशन शिविर में पूरे राज्य से और कई लोग जमा करना शुरु करके, अपना भ्रष्टाचार और काला धन विरोधी अभियान और तेज़  कर दिया..!!

बाबा के आह्वान पर, अभियान के दूसरे ही दिन, शाम होते-होते, आंदोलन स्थल पर, लाखो लोग एकत्रित होने लगे..!!

राज्य शासन के प्रति प्रजा का  भारी आक्रोश  बढ़ता  देखकर ,अब राजा को  डर लगा कि, कहीं उसका सिंहासन  छिन न जाये..!!  अतः उसने मंत्रीओं  की आपात क़ालीन  बैठक बुलाई और सभी ने मिलकर कुछ ठोस निर्णय किए और उस पर अमल करने की ज़िम्मेदारी भी कुछ मंत्रीओं को सौंपी गई..!!

दूसरे दिन पूरे भारत वर्ष की प्रजा ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि, हठयोगीबाबा के आमरण अनशन अभियान स्थल पर, बाबा तो क्या, लाखों की भीड़ में से, सुबह होते-होते एक भी इन्सान, उस पंडाल में मौजूद नहीं है, वहाँ से सब लोग भाग गए हैं..!!

वीर विक्रम, मैं तुम्हें इतना अवश्य बता दूँ  कि, उस केन्द्रीय राजा ने, बाबा के आमरण-अनशन अभियान स्थल पर, भीड़ को भगा ने लिए, न तो सैनिक भेजे थे, ना आँसू गैस के गोले छोड़े थे, ना वहाँ पंडाल में आग लगाई थी, ना  तो  किसी मंत्री द्वारा, बाबा को कोई धमकी दी गई थी..!!

हे..वीर विक्रम, अब सवाल यह है कि,  राजा ने, उस भीड़ को भगाने के लिए, अगर कोई भी कदम नहीं उठाये थे तो फिर, अचानक आमरण-अनशन अभियान स्थल से,रात ही रात में,  सारी भीड़ अचानक  कहाँ भाग गई और क्यों भाग गई?

हे..वीर विक्रम, अगर तुमने  इन सवालों के सही-सही उत्तर न दिया तो, मैं तेरे द्वारा आजतक किए गये, सारे  भ्रष्टाचार के सबूत की फाइलें ,केन्द्रीय राजा के सुपर-डुपर कार्यक्षम महामंत्री श्री बकबक विज्य सिंह को पहुंचा दूँगा और साथ में श्राप भी दूँगा कि, तुम्हें  भी प्रजा भ्रष्टाचारी कह  कर जूतों से बूरी तरह पीटे..!!"

बैताल के मुख से, अत्यंत आधुनिक बोधकथा सुनकर, परदुःखभंजन राजा वीर विक्रमादित्य ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए, बैताल को उत्तर दिया,

" केन्द्रीय राजा के मंत्रीओ की आपात काल बैठक में जो निर्णय किए गये थे, उसी को कार्यान्वित करने के कारण, आमरण-अनशन अभियान स्थल से, बाबा समेत, सारी भीड़  रात ही रात में  भाग गई..!!

हे..बैताल, मेरे पास खुफ़िया जानकारी है कि, हठयोगी बाबा के आमरण-अनशन अभियान स्थल पर, उन शातिर और चालाक मंत्रीओं के, भाड़े के कई  आदमीओं ने, बाबा और वहाँ जमा आंदोलनकारीओं की भीड़ को गहरी नींद में, सोते हुए देखकर, मौका पाते ही वहाँ `इतालियन लाल चींटीओं के  सेकडों बॉक्स उँड़ेल दिये थे, जिस  इतालियन लाल चींटी का काटा, पानी तो क्या ठीक से सांस भी नहीं ले पाता..!!

अतः बाबा समेत सारी भीड़ वहाँ से सैन्य कार्यवाही किए बिना ही इतालियन चींटीयों के कहर से, पंडाल से उठ कर भाग गई..!!"

वीर विक्रम का बिलकुल सही उत्तर सुनते ही, बैताल उस शव के साथ फिर से वही पेड़ पर जा कर लटक गया ।

आधुनिक बोध- सारे भारत वर्ष में, बड़े-बड़े सुरमाओं से भयभीत न होनेवाले हठयोगी और अन्य जवाँमर्द भी, इतालियन लाल चींटी के काटने के डर से, अत्यंत भयभीत होकर, उसे देखते ही भाग जाते हैं..!!

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कैरेक्टर ढीला है? (कहानी)

" अचानक, मृगया को अपनी नाज़ुक कमर पर, देव के मज़बूत हाथों की पकड़ महसूस हुई । मृगया भय के कारण कांप उठी और वह कुछ ज्यादा सोचे-समझे उसके पहले ही, रूम का दरवाज़ा बंद हो चुका था । किसी मुलायम पुष्प जैसी कोमल-हल्की मृगया को, देव ने अपने मज़बूत कंधे पर उठाया और वासना पूर्ति के बद-इरादे के साथ, मृगया को बेड पर पटक दिया..!!"

इस कहानी का सटीक और सशक्त अंत दर्शाने के लिए अपने अमूल्य प्रतिभाव देकर मेरा मार्गदर्शन  करनेवाले, सभी विद्वान पाठक मित्रों का तहे दिल से धन्यवाद करते हुए प्रस्तुत है ये कहानी । 

आप पूरी कहानी इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/06/blog-post_06.html

मार्कण्ड दवे । दिनांक-०६-०६-२०११.

30.4.11

भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों?


भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि इन दिनों भारत में हर क्षेत्र में, भ्रष्टाचार चरम पर है| भ्रष्टाचार के ये हालात एक दिन या कुछ वर्षों में पैदा नहीं हुए हैं| इन विकट हालातों के लिये हजारों वर्षों की कुसंस्कृति और सत्ताधारियों को गुरुमन्त्र देने के नाम पर सिखायी जाने वाली भेदभावमूलक धर्मनीति तथा राजनीति ही असल कारण है| जिसके कारण कालान्तर में गलत एवं पथभ्रष्ट लोगों को सम्मान देने नीति का पनपना और ऐसे लोगों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाने की हमारी वैचारिकता भी जिम्मेदार है|

आजादी के बाद पहली बार हमें अपना संविधान तो मिला, लेकिन संविधान का संचालन उसी पुरानी और सड़ीगली व्यवस्था के पोषक लोगों के ही हाथ में रहा| हमने अच्छे-अच्छे नियम-कानून और व्यवस्थाएँ बनाने पर तो जोर दिया, लेकिन इनको लागू करने वाले सच्चे, समर्पित और निष्ठावान लोगों के निर्माण को बिलकुल भुला दिया|

दुष्परिणाम यह हुआ कि सरकार, प्रशासन और व्यवस्था का संचालन करने वाले लोगों के दिलोदिमांग में वे सब बातें यथावत स्थापित रही, जो समाज को जाति, वर्ण, धर्म और अन्य अनेक हिस्सों में हजारों सालों से बांटती रही| इन्हीं कटुताओं को लेकर रुग्ण मानसिकता के पूर्वाग्रही लोगों द्वारा अपने चहेतों को शासक और प्रशासक बनाया जाने लगा| जो स्वनिर्मित नीति अपने मातहतों तथा देश के लोगों पर थोपते रहे|

एक ओर तो प्रशासन पर इस प्रकार के लोगों का कब्जा होता चला गया और दूसरी ओर राजनीतिक लोगों में आजादी के आन्दोलन के समय के समय के जज्बात् और भावनाएँ समाप्त होती गयी| जिन लोगों ने अंग्रेजों की मुखबिरी की वे, उनके साथी और उनके अनुयाई संसद और सत्ता तक पहुँच स्थापित करने में सक्षम हो गये| जिनका भारत, भारतीयता और मूल भारतीय लोगों के उत्थान से कोई वास्ता नहीं रहा, ऐसे लोगों ने प्रशासन में सुधार लाने के बजाय खुद को ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे अफसरों के साथ मिला लिया और विनिवेश के नाम पर देश को बेचना शुरू कर दिया|

सत्ताधारी पार्टी के मुखिया को कैमरे में कैद करके रिश्‍वत लेते टीवी स्क्रीन पर पूरे देश ने देखा, लेकिन सत्ताधारी लोगों ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय, उसका बचाव किया| राष्ट्रवाद, संस्कृति और धर्म की बात करने वालों ने तो अपना राजधर्म नहीं निभाया, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यूपीए प्रथम और द्वितीय सरकार ने भी उस मामले को नये सिरे से देखना तक जरूरी नहीं समझा|

ऐसे सत्ताधारी लोगों के कुकर्मों के कारण भारत में भ्रष्टाचार रूपी नाग लगातार फन फैलाता जा रहा है और कोई कुछ भी करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है| सत्ताधारी राजनैतिक गठबन्धन से लेकर, सत्ता से बाहर बैठे, हर छोटे-बड़े राजनैतिक दल में भ्रष्टाचारियों, अत्याचारियों और राष्ट्रद्रोहियों का बोलबाला लगातार बढता ही जा रहा है| ऐसे में नौकरशाही का ताकतवर होना स्वभाविक है| भ्रष्ट नौकरशाही लगातार मनमानी करने लगी है और वह अपने कुकर्मों में सत्ताधारियों को इस प्रकार से शामिल करने में माहिर हो गयी है कि जनप्रतिनिधि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकें|

ऐसे समय में देश में अन्ना हजारे जी ने गॉंधीवाद के नाम पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके सत्ता को झुकाने का साहस किया, लेकिन स्वयं हजारे जी की मण्डली में शामिल लोगों के दामन पर इतने दाग नजर आ रहे हैं कि अन्ना हजारे को अपने जीवनभर के प्रयासों को बचाना मुश्किल होता दिख रहा है|

ऐसे हालात में भी देश में सूचना का अधिकार कानून लागू किया जाना और सत्ताधारी गठबन्धन द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी पाये जाने पर अपनी ही सरकार के मन्त्रियों तथा बड़े-बड़े नेताओं तथा नौकरशाहों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाना आम लोगों को राहत प्रदान करता है|

अन्यथा प्रपिपक्ष तो भ्रष्टाचार और धर्म-विशेष के लोगों का कत्लेआम करवाने के आरोपी अपने मुख्यमन्त्रियों को उनके पदों से त्यागपत्र तक नहीं दिला सका और फिर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने का नाटक करता रहता है!

29.4.11

ये देश हैं वीर जवानों का.... या ये देश हैं भ्रष्ट नेताओ का....


ये देश हैं भ्रष्ट नेताओ का,
रिश्वतखोरो का, नमकहरामो का !!
इस देश का यारो होए!!
इस देश का यारो क्या कहना
ये देश था कभी दुनिया का गहना.......
ओ ओ ओ ओ ...

यहाँ मरते हैं गरीब अमीरों की बस्ती में
उडती हैं धज्जिया कानूनों की बस्ती.....
यहाँ चलती हैं सिर्फ भ्रष्टाचारियो की
यहाँ भोली हैं शक्ले आम लोगो की
यहाँ लुटती हैं जनता भोली-भाली, नित नए-नए घोटालो में.
ओ ओ ओ ओ ओ........

यहाँ रोता हैं आम आदमी अपनी किस्मत पे
कोसता हैं अपनी किस्मत को.
पैरो में बेडिया रिश्वत की..
राहों में रूकावटे भ्रष्टो की
यहाँ रोता हैं आदमी अपनी किस्मत पे
कोसता हैं अपनी किस्मत को.
ओ ओ ओ ओ ...

कभी होते थे दंगल सोख जवानो के
कभी होते थे करतब तीर कमानों की
कभी नित नित मेले होते थे
कभी नित नित मेले सजते थे
नित नित ढोल ताशे बजते थे
ओ ओ ओ ओ ओ.....................

अब देखो सूरत इस देश की
जहाँ रोती हैं जनता अपनी किस्मत पे
ओ ओ ओ ओ ओ.......
लूटते हैं भ्रष्टाचारी देश को मिलकर
रोकते हैं उन्नति को मिलकर
ओ ओ ओ ओ ओ.........

अब और न सहेंगे कहते हैं हम सब मिलकर,
करेंगे सामना भ्रष्टाचार से हम मिलकर..
क्योंकि.....
दिलबर के लिए दिलदार हैं हम
दुश्मन के लिए तलवार हैं हम
मैदान में अगर हम आ जाएँ!!
दुश्मन के छक्के छोट जाये....
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ............

क्यों न आवाज को बुलंद कर दे हम
अपने बच्चो को सुनहरा भविष्य दे दे हम
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ .........

गर मिल के सामना करे हम सब मिल कर
फिर से हो गुनगुनायेंगे सब मिलकर......

ये देश हैं वीर जवानों का
अलबेलो का, मस्तानो का
इस देश का यारो होए!!!!!
इस देश का यारो क्या कहना
ये देश हैं वीरो का गहना.
ओ ओ ओ ओ ओऊ ओ ओ ओ ओ ......................

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Re - Written by : Pawan Mall

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17.3.11


तुम आग हो

तुम आग हो ,
तुम्हे सुलगना नहीं
जलना हैं
ताप देना हैं
सारे जहाँ को
घुट घुट कर सांस लेना
तुम्हारी प्रकृति नहीं
ऊर्जा हो तुम
युवा
तुम्हारे रक्त की उष्णता
सिर्फ प्रेयसी को उन्मादित करने के लिए नहीं
इसके बहुत से प्रयोजन हैं
राष्ट्र, समाज,
ताक रहे हैं तुम्हारी ओर
कब जलाओगे
भ्रष्टाचार और आतंकवाद की लाश ?

5.3.11

राज करें बेईमान

अन्दर से डर जाता हूँ
देख भला इन्सान ,
अपना सा लगने लगा
जो बैरी था शैतान।
----
यही सोच कर सबके सब
होते हैं परेशान,
भ्रष्टाचार का कोई किस्सा
अब करता नहीं हैरान।
----
गली गली में बिक रहा
राजा का ईमान ,
सारी उम्मीदें टूट गईं
राज करें बेईमान।


23.2.11

पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!

पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।
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पिछले दिनों प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने एक खबर खूब बढाचढाकर प्रकाशित एवं प्रसारित किया गया कि सुकना भूमि घोटाले में सैन्य कोर्ट मार्शल ने थल सेना के पूर्व उप प्रमुख मनोनीत लेफ्टिनेंट जनरल पी. के. रथ को दोषी करार देकर कठोर दण्ड से दण्डित किया है। जबकि सच्चाई यह है कि पी. के. रथ के प्रति कोर्ट मार्शल की कार्यवाही में अत्यधिक नरम रुख अपनाया गया है। जब एक बार सेना का इतना बड़ा अधिकारी भ्रष्ट आचरण के लिये दोषी ठहराया जा चुका है, तो सर्व प्रथम तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों के अनुसार ऐसे भ्रष्ट अपराधी को कम से कम सेवा से बर्खास्त किये जाने का दण्ढ विभाग की ओर से दिया जाना चाहिये था और भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये जाने के कारण उसे जेल की हवा खिलाई जानी चाहिये थी। इसके उपरान्त भी मीडिया बार-बार लिख रहा है कि सेना के इतने बड़े अफसर को इतनी बड़ी सजा से दण्डित करके कोर्ट मार्शल के तहत ऐतिहासिक निर्णय सुनाया गया है। मीडिया का इस प्रकार का रुख भी भ्रष्टाचार को बढावा दे रहा है। जो सजा नहीं, बल्कि संरक्षण देने के समान है।

सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।

33 कोर के पूर्व कमांडर को पश्चिम बंगाल के सुकना सैन्य केंद्र से लगे भूखंड पर एक शिक्षण संस्थान बनाने के लिए निजी रियल इस्टेट व्यापारी को ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ जारी कर दिया और इसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों तक को नहीं दी। सीधी और साफ बात है कि कई करोड़ की कीमत की जमीन पर निजी शिक्षण संस्थान (जो इन दिनों शिक्षा के बजाया व्यापार के केन्द्र बन चुके हैं) के उपयोग हेतु जारी किया गया ‘‘अनापत्ति प्रमाण-पत्र’’ देश सेवा के उद्देश्य से तो जारी नहीं किया गया होगा। निश्चय ही इसके एवज में भारी भरकम राशी का रथ को गैर-कानूनी तरीके से भुगतान किया गया होगा।

ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।

अत: बहुत जरूरी है कि कानून के राज एवं इंसाफ में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देश के राष्ट्रपति, प्रधाममन्त्री, विधिमन्त्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करके अपराधी रथ को सेना से बर्खास्त किये जाने एवं कारावास की सजा दिये जाने की मांग करनी चाहिये।

17.11.10

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
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इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!" शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।

मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!" सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।

स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।

ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौ‹ड रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौ‹ड में शामिल होने को बेताब हैं।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाया जावे।

अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून" बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।

यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-

1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?

2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?

3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?

4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?

ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।

यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।

क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून"

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.1.ग में प्रदत्त मूल अधिकार के तहत 1993 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयन्ती के दिन (26 एवं २7 सितम्बर की रात्री को) स्थापित एवं भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से 6 अप्रेल, 1994 से पंजीबद्ध एवं अनुमोदित ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक राज्यों के अनेक क्षेत्रों व व्यवसायों से जुडे लोगों के साथ कार्य करते हुए और 20 वर्ष 9 माह 5 दिन तक भारत सरकार की सेवा करते हुए मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-

1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो :सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार" या "भ्रष्ट आचरण" घोषित किया जावे।

इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।

..............‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून के शेष सुधार अगली किश्त में शीघ्र पढने को मिलेंगे....

पाठकों से निवेदन है कि खुलकर प्रतिक्रिया दें और बहस को आगे बढाने में सहयोग करें!

1.8.08

बारिश में पतंग मत उड़ाओ सोमकुंवर (संदर्भ: पत्रकार जुबैर कुरैशी पर बेबुनियाद आरोप)

अवधेश बजाज
त्वरित टिप्पणी

सच कहते हैं तो बुरा मानते हैं लोग
और रो-रो कहने की आदत नहीं हमारी
इस अशआर से प्रेरित होकर राज एक्सप्रेस के अपराध संवाददाता ने राज एक्सप्रेस में गुरुवार को एक खबर लिखी। खबर का शीर्षक था ‘अधीक्षक के सामने आईएसओ जेल में कैदियों से क्रूरता’। इस खबर से भोपाल के जेल अधीक्षक पीडी सोमकुंवर इतने बौखलाए कि उन्होंने जुबैर कुरैशी पर प्रतिबंधित संगठन सिमी से ताल्लुकात का आरोप मढ़ दिया। इस तारतम्य में सोमकुंवर ने राज एक्सप्रेस के मैनेजमेंट को एक पत्र भी लिखा है।

दरअसल इसमें सोमकुंवर की गलती नहीं है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था के अर्थतंत्र की गलती है। सत्ता के साकेत में बैठे दल्ले ऐसे सोमकुंवर पैदा करते हैं, जिनकी प्रेस वालों पर उंगली उठाने की हिम्मत होती है। सत्ताई अर्थतंत्र के आंगन की सदा सुहागन सोमकुंवर क्या है, उनका चरित्र और उनकी आर्थिक सेहत किसी से छुपी नहीं है। उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके स्थानांतरण को रूकवाने के लिए दो सांसद, पांच मंत्री और भाजपा के दो राष्ट्रीय महामंत्रियों ने लाबिंग की थी। इसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूं। सोमकुंवर सत्ताई दल्लों के संरक्षण में गदरा रहे हैं। वे राजनीतिज्ञों को खरीद सकते हैं, लेकिन मीडियाकर्मियों को नहीं।

जुबेर कुरैशी मुस्लिम है। लिहाजा उस पर सिमी से संबंध का आरोप लगाने का उपक्रम सोमकुंवर जैसे मानसहीन लोग ही कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि हमारी तंत्र व्यवस्था में सोमकुंवरों का जन्म कैसे होता है, एक ही पद पर ये नौ-नौ साल कैसे जमे रहते हैं? दरअसल ये हमारी अफसरशाही के नव सामंत हैं, जो राजनीतिज्ञों के संरक्षण में बेलगाम हो रहे हैं। मीडियाकर्मियों को एकजुटता के साथ ऐसे बेलगाम मानसहीन सोमकुंवर को करारा जवाब देना चाहिए। आज एक जुबैर कुरैशी के खिलाफ एक अफसर बेबुनियाद, मिथ्या आरोप लगा रहा है। कल आपकी बारी आ सकती है।
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(लेखक अवधेश बजाज मध्य प्रदेश केंद्रित लोकप्रिय मीडिया पोर्टल बिच्छू डाट काम के प्रधान संपादक होने के साथ-साथ प्रदेश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार हैं)

23.2.08

कानून के पिछवाड़े उंगली नही डालनी चाहिए वहां दांत होते हैं

मुझे बताया गया कि जी न्यूज के जिस जांबाज और दिलेर संवाददाता विजयशेखर ने कानून के पुरोधाओं की एक स्टिंग आपरेशन चला कर यह सिद्ध करा था कि जुडीशियरी में कितना कुत्तापन व्याप्त है ,उसे ही सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस दिया है कि छह सप्ताह के भीतर माफ़ीनामा प्रस्तुत करो वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहो । सारे भड़ासी भाई बहन जान लीजिए कि इस बहादुर ने क्या किया था ,इस पट्ठे ने अपनी खून पसीने की कमाई के मात्र चलीस हजार रुपए खर्च करे और एक थाने में झूठी रपट लिखवा कर वहां के जज महोदय से चार लोगों के खिलाफ़ वारंट निकलवा दिये ;जानते हैं उनमें से दो कौन थे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भारत के चीफ़ जस्टिस वी.एन.खरे । चार्ज लगाया था कि इन लोगों ने एक सोने के व्यापारी को ठगा है .....भौं भौं भौं ....भूं भूं भूं ... कांय कांय कांय...... अभी फटी होगी ।
अबे कितनी बार बोला कि कानून के पिछवाड़े में उंगली नहीं करने का ,अबी भुगत साला ; जैसे एक शाणा वो है जस्टिस आनंद सिंह जिसने जुडीशियरी में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ उंगली उठाई तो आज तक भोग रहा है पूरे परिवार समेत .....
लेकिन भड़ासी लोग अपना एक सल्ला है कि तुम लोग बस होली-बीली का पोस्ट लिखने का ,रंग गुलाल वगैरे का ;जास्ती शाणा बन कर पत्रकारिता करके ऐसा प्रोबलेम में उंगली डाला तो मालुम क्या तेरे कूं ,उंगली इच गायब हो जाएंगी बाप । ये कानून वाला लोग के पिच्छू बी दांत होता है साला उंगली करने वाले की उंगली चबा लेते हैं । अबी सीरियसली होली मनाने का कांयकूं फुकट का टेन्चन लेने का जब अपनी फटेगी तबी चिल्लाने का नईं तो गपचिप बैठ कर औरत लोग का मुक्ति-बिक्ति पर बात करने का ऐसा भंकस में क्या रखेला है भिड़ू, अपन को तो अक्खा लाइफ़ उदर मूं इच नईं करने का । ठी है ना भाई लोग ? चल अबी होली मनाने का........
जय जय भड़ास