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23.2.11
पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!
पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।
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पिछले दिनों प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने एक खबर खूब बढाचढाकर प्रकाशित एवं प्रसारित किया गया कि सुकना भूमि घोटाले में सैन्य कोर्ट मार्शल ने थल सेना के पूर्व उप प्रमुख मनोनीत लेफ्टिनेंट जनरल पी. के. रथ को दोषी करार देकर कठोर दण्ड से दण्डित किया है। जबकि सच्चाई यह है कि पी. के. रथ के प्रति कोर्ट मार्शल की कार्यवाही में अत्यधिक नरम रुख अपनाया गया है। जब एक बार सेना का इतना बड़ा अधिकारी भ्रष्ट आचरण के लिये दोषी ठहराया जा चुका है, तो सर्व प्रथम तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों के अनुसार ऐसे भ्रष्ट अपराधी को कम से कम सेवा से बर्खास्त किये जाने का दण्ढ विभाग की ओर से दिया जाना चाहिये था और भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये जाने के कारण उसे जेल की हवा खिलाई जानी चाहिये थी। इसके उपरान्त भी मीडिया बार-बार लिख रहा है कि सेना के इतने बड़े अफसर को इतनी बड़ी सजा से दण्डित करके कोर्ट मार्शल के तहत ऐतिहासिक निर्णय सुनाया गया है। मीडिया का इस प्रकार का रुख भी भ्रष्टाचार को बढावा दे रहा है। जो सजा नहीं, बल्कि संरक्षण देने के समान है।
सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।
33 कोर के पूर्व कमांडर को पश्चिम बंगाल के सुकना सैन्य केंद्र से लगे भूखंड पर एक शिक्षण संस्थान बनाने के लिए निजी रियल इस्टेट व्यापारी को ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ जारी कर दिया और इसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों तक को नहीं दी। सीधी और साफ बात है कि कई करोड़ की कीमत की जमीन पर निजी शिक्षण संस्थान (जो इन दिनों शिक्षा के बजाया व्यापार के केन्द्र बन चुके हैं) के उपयोग हेतु जारी किया गया ‘‘अनापत्ति प्रमाण-पत्र’’ देश सेवा के उद्देश्य से तो जारी नहीं किया गया होगा। निश्चय ही इसके एवज में भारी भरकम राशी का रथ को गैर-कानूनी तरीके से भुगतान किया गया होगा।
ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।
अत: बहुत जरूरी है कि कानून के राज एवं इंसाफ में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देश के राष्ट्रपति, प्रधाममन्त्री, विधिमन्त्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करके अपराधी रथ को सेना से बर्खास्त किये जाने एवं कारावास की सजा दिये जाने की मांग करनी चाहिये।
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Labels: इंसाफ, कोर्ट मार्शल, बर्खास्त, भ्रष्टाचार, लेफ्टिनेंट जनरल
11.10.08
बर्खास्तगी पर प्रतिक्रया.
कल का दिन कुछ तकलीफदेह था, दो की भड़ास सदस्यता समाप्त कर दी गयी, पिछले कई दिनों से चल रहे बहस पर आखिरकार भड़ास संचालक मंडल को निर्णय लेना पड़ा। ये निर्णय अपनेआप में तकलीफदेह था क्यूँकी परिवार से किसी का जाना किसी को भी खुशी नही दे सकता।
भड़ास यानी की एक विचारधारा, एक आयाम जीवन के प्रति समर्पण और सामाजिक दायित्व के साथ बस भड़ास। शीर्षक के साथ संलग्न "अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जाएगा..." का मतलब अपने तरीके से निकालने वाले अपने विचार को भड़ास पर नही थोप सकते, ये सर्वविदित है की भडासी सिर्फ़ उल्टियां ही करते हैं मगर ये वो उलटी है जो जहर नही, किसी ने निगला तो विकृति नही अपितु औषधी और तभी तो महाभडासानन्द ने इस शीर्षक से इसे नवाजा।
भड़ास वो परिवार है जिसने हमेशा स्वधर्म से ऊपर राष्ट्रधर्म को जगह दी है, भड़ास परिवार इसका साक्षी है, विचारों की क्रांति ने ही भडास को वो मुकम्मल जगह दी है जहाँ हम भारतीय होने के साथ साथ भडासी होने पर गर्व करते हैं। ना जात ना पात, ना अमीरी ना गरीबी, धर्म और पाखंड से दूरी देश के लिए विचारों की उगली, लोगों के लिए आगे आने की चाह याह सम्मिलित सहयोग, समाज के उपेक्षितों की आवाज बनने से लेकर उनके हक की लड़ाई तक। ये भडास की आवाज है,
तकलीफ में इसलिए नही था की कौन बाहर गया या कौन शामिल हुआ क्योँकी कारवां कभी रुकता नही लोग आते हैं बिछड़ जाते हैं, कारवां अपने राह पर होता है। मगर लोगों की प्रतिक्रियाओं ने लिखने पर मजबूर कर दिया।
कुछ टिपण्णी पर एक नजर :
केवल हिन्दुओं को गाली देना ही सभ्याचार नहीं है......अगर ऐसे ही चलता रहा तो फ़िर भडास का मुख्य उद्देश्य ही ख़तम हो जाता है :- रजनीश परिहारऔर प्रवीण त्रिवेदी जी इन से सहमत हैं.
भाई, हमारे देश में धर्म के अलावे बहुत से मुद्दे हैं, भोजन, वस्त्र, आवास, बाढ़ तो कहीं सुखाड़ और इन सब जगह तंत्र की असफलता पर हमारी भडास भी है और मुहीम भी, जब पेट भरा हो तभी राम, अल्लाह,जीसस सूझते हैं, भडास का धर्म उद्देश्य ना कभी था और ना कभी होगा। हम सभी धर्मून का सम्मान करते हैं और सभी धर्म के लोग हमारे भडास परिवार में हैं, लोगों की माने तो अपने परिवार के सदस्यों को भी हम आतंकी मन लें ? संग ही आपसे दरख्वास्त की चुकी आप शिक्षक हैं नौनिहाल में ये बीज ना डालें।
नारदमुनि के अनुसार मैं कुछ भी लिखूं कोई बात नही लोग लिखे तो आपत्ति सो गोयल जी भडास का इतिहास की चर्चा को सार्थक मुद्दे तक पहुंचाती है और जरुरत पड़े तो विजय के लिए बिगुल भी बजाती , सभी को स्वतन्त्रता कभी किसी पर थोपना नही गया, और ना ही पाबंदी मगर जिस से भारतीय भावना आहत हूँ उससे भडास आहत हुए बिना नही रह सकता, हम देश में विश्वास रखते हैंऔर भारतीय संविधान और मर्यादा का पुरा ख्याल भी।
भाई जे पी की माने तो क्या भड़ास के लिए हिंदू अछूत हैं।
मित्र गले में अटके को उगलो जो लोगों के लिए विष नही दवा बन जाए इसका नाम भडास हैं, हिंदू हिंदू मुस्लिम मुस्लिम करने वाले जिसदिन मनीषा दीदी को बहन मान लेंगे तो और घर में जगह देंगे ये जज्बा हैं भडासी का । चौपाया लोकतंत्र और इस चारो खम्भे की मजबूती लक्ष्य हैं भडास का, समाज की कुरीतियों पर सिर्फ़ उगलना नही अपितु इसको लेकर समाज से लड़ना और सभी को अधिकार दिलाने का जज्बा हैं भडास का।
तमाम मित्रगण तात्पर्य सिर्फ़ इतना की भडास सभी धर्म में आस्था रखता हैं मगर देश को इन आस्थाओं से ऊपर जगह देता हैं। आप उगलिए जी भर के उगलिए क्योँकी आपके उगले हुए को समेटने के लिए आपकी सारी उलटीयों को समेटने को हम बैठे हैं मगर वो किसी के लिए दवा बन सके, न की जहर। कारवाँ को हमेशा योद्धाओं की जरुरत रहती हैं। भडास को भी हैं। सो योद्धा बनिए।
जय जय भड़ास
सादर, भवदीय
रजनीश के झा
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Labels: प्रतिक्रया, बर्खास्त, भारतीयता, रजनीश, राय और विचार, स्वतन्त्रता
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