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30.12.11

लोकपाल-हमाम में सभी नंगे!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

लोकपाल विधेयक के बहाने कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों एवं ईमानदारी का ठेका लिये हुंकार भरने वाले स्वयं अन्ना और उनकी टीम के मुखौटे उतर गये! जनता के समक्ष कड़वा सत्य प्रकट हो गया!

जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये आँसू बहाते नजर आये! सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल पारित करवाने का दावा करने वाले यूपीए एवं एनडीए की ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा की पोले खुल गयी! सामाजिक न्याय को ध्वस्त करने वाली भाजपा की आन्तरिक रुग्ण मानसिकता को सारा संसार जान गया! भाजपा देश के अल्प संख्यकों के नाम पर वोट बैंक बढाने की घिनौनी राजनीति करने से यहॉं भी नहीं चूकी|

भाजपा और उसके सहयोगी संगठन एक ओर तो अन्ना को उकसाते और सहयोग देते नजर आये, वहीं दूसरी ओर मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा इस देश पर जबरन थोपे गये आरक्षण को येन-केन समाप्त करने के कुचक्र भी चलते नजर आये!

स्वयं अन्ना एवं उनके मुठ्ठीभर साथियों की पूँजीपतियों के साथ साठगॉंठ को देश ने देखा| भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके एनजीओज् के साथ अन्ना टीम की मिलीभगत को भी सारा देश समझ चुका है| सारा देश यह भी जान चुका है कि गॉंधीवादी होने का मुखौटा लगाकर और धोती-कुर्ता-टोपी में आधुनिक गॉंधी कहलवाने वाले अन्ना, मनुवादी नीतियों को नहीं मानने वाले अपने गॉंव वालों को खम्बों से बॉंधकर मारते और पीटते हैं!

भ्रष्टाचार मिटाने के लिये अन्ना भ्रष्टाचार फैलाने वाले कॉर्पोरेट घरानों और विदेशों से समाज सेवा के नाम पर अरबों रुपये लेकर डकार जाने वाले एनजीओज् को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहते, इस बात को देश को समझाने के बजाय बगलें झांकते नजर आये! जन्तर-मन्तर पर लोकपाल पर बहस करवाने वाली अन्ना टीम ने दिखावे को तो सभी को आमन्त्रित करने की बात कही, लेकिन दलित संगठनों को बुलाना तो दूर, उनसे मनुवादी सोच को जिन्दा रखते हुए लम्बी दूरी बनाये रखी है!

संसद में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, लेकिन किसी ने भी सच्चे मन से इस कानून को पारित कराने का प्रयास नहीं किया| विशेषकर यदि कॉंग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर यह तय कर लिया था कि लोकपाल को किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना है और देश के लोगों के समक्ष यह सिद्धि करना है कि दोनों ही दल एक सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल कानून बनाना चाहते हैं| वहीं दूसरी और सपा, बसपा एवं जडीयू जैसे दलों ने भी लोकपाल कानून को पारित नहीं होने देने के लिये संसद में बेतुकी और अव्यावहारिक बातों पर जमकर हंगामा किया| केवल वामपंथियों को छोड़कर कोई भी इस कानून को पारित करवाने के लिये गम्भीर नहीं दिखा| यद्यपि बंगाल को लूटने वाले वामपंथियों की अन्दरूनी सच्चाई भी जनता से छुपी नहीं है|

22.12.11

लोकपाल का डर



लोकपाल का डर


लोकपाल को लेकर हो हल्ला मचा है...सडक से लेकर संसद तक एक ही चर्चा है...अखबार से लेकर टीवी तक एक ही खबर छायी हुई है...लोकपाल...अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल आए...प्रधानमंत्री औऱ सीबीआई इसके दायरे में रहें...आम आदमी का सबसे ज्यादा पाला पडने वाले ग्रुप सी औऱ डी के कर्मचारी इसके दायरे में रहें...अन्ना का इसके पीछे तर्क है कि यह सब लोकपाल में होगा तो भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी...अब लोकपाल बिल पास होने के बाद इसका कितना असर होगा ये तो समय ही बताएगा...लेकिन लोकपाल के जिन्न ने देश की राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया है...एक अनजाना सा खौफ हमारे देश के राजनेताओँ पर छाया हुआ है...देश की राजनीति में खासा दखल रखने वाले दो बडे राज्य यूपी औऱ बिहार के कद्दावर नेता मुलायम सिंह औऱ लालू प्रसाद यादव ने तो इसके खिलाफ संसद में ही आवाज बुलंद कर दी है...मुलायम सिंह कहते हैं कि लोकपाल बिल पास हो गया तो एक मामूली सा दारोगा भी उन्हें जेल भेज देगा...कलेक्टर औऱ एसपी उनकी इज्जत नहीं करेंगे...यहां लालू भी मुलायम सिंह का समर्थन करते दिखे...हम कहते हैं...अरे साहब ऐसा काम ही क्यों करते हो कि कोई दारोगा आपको जेल भेजे...कलेक्टर और एसपी आपकी इज्जत न करें...कहीं न कहीं आपके मन में चोर है इसलिए शायद आप लोकपाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं...इतने ही ईमानदार आप होते तो एक सशक्त लोकपाल का समर्थन नहीं करते...।
ये तो रही बात यूपी औऱ बिहार के दो महानुभावों कि...बात अगर करें हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की...क्या वाकई में हमारे देश के प्रधानमंत्री ईमानदार हैं...किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं...अरे साहब हम तो कहते हैं कि अगर वाकई में ईमानदार हो...ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हो तो फिर डर काहे का...ले आओ न सशक्त लोकपाल...खैर कसूर आपका भी नहीं है...आपकी भी मजबूरी है...आपका तो खुद बुरा हाल है...कहते हैं ना...मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो...मैं पीता नहीं हूं पिलायी गयी है...आपको पिलाने वाला तो कोई औऱ ही है...।
केन्द्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में पेश करने जा रही है...इसके लिए संसद का सत्र भी 29 दिसंबर तक बढाया गया है...सरकार के लोकपाल को लेकर जहां टीम अन्ना ने आंखे तरेर रखी हैं...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने भी इसको लेकर कमर कस ली है...औऱ संसद में इस पर जमकर तकरार होने के आसार हैं...।
अब लोकपाल की इस लडाई में जीत किसकी होती है ये तो समय ही बताएगा...लेकिन निश्चित तौर पर लोकपाल का भय़ बिल के पास होने से पहले ही भ्रष्टाचारियों पर दिखाई देने लगा है...उम्मीद करते हैं कि एक सशक्त लोकपाल आए औऱ भ्रष्टाचार में नित नये रिकार्ड बनाते हिंदुस्तान की तस्वीर बदले।


दीपक तिवारी
08800994612
deepaktiwari555@gmail.com

14.12.11

कैसा हो लोकपाल कानून?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इस देश की रग-रग में भ्रष्टाचार समाया हुआ है और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये अन्य अनेक बातों के साथ-साथ सख्त कानून की दरकार है, जिसके लिये प्रस्तावित लोकपाल कानून को जरूरी बताया जा रहा है| अब तक की सभी केन्द्र सरकारों द्वारा किसी न किसी बहाने लोकपाल कानून को लटकाकर रखा है, जिसमें कॉंग्रेस भी शामिल है| चूँकि कॉंग्रेस ने सर्वाधिक समय तक देश पर शासन किया है, इस कारण कॉंग्रेस भ्रष्टाचार को पनपाने, रोकथाम नहीं कर पाने और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों का क्रियान्वयन नहीं करवा पाने और, या लोकपाल कानून को नहीं बनवा पाने के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार है| जिससे वह बच नहीं सकती है| यह अलग बात है कि केन्द्र की वर्तमान यूपीए सरकार लोकपाल कानून के बारे में बुरी तरह से फंस चुकी है| जानकारों का मानना है कि केन्द्र सरकार इस बारे में अन्ना हजारे और अन्ना हजारे के पीछे खड़े राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को इस बात का श्रेय नहीं लेने देना चाहती कि उनके दबाव में लोकपाल कानून बनाया गया है| क्योंकि राजनीति में इस प्रकार के निर्णयों का चुनावों में असर होता है| लेकिन आम जनता को इस बात से क्या लेना देना है? कॉंग्रेस या यूपीए ने ऐसी स्थिति क्यों निर्मित होने दी कि अन्ना, आरएसएस या भाजपा या एनडीए या अन्य विपक्षी दलों को लोकपाल कानून बनवाने का श्रेय मिलने की स्थिति बनी! निश्‍चय ही यह वर्तमान यूपीए और कॉंग्रेस नेतृत्व की राजनैतिक असफलता है| जिसका फायदा दूसरे राजनैतिक उठाना चाहते हैं, तो उनका राजनैतिक अधिकार है| इसमें गलत भी क्या है? अब भी यदि कॉंग्रेस दुविधा से बाहर नहीं निकल पायी तो फिर उसे और यूपीए को होने वाले नुकसान की लम्बे समय तक भरपाई कर पाना सम्भव नहीं होगा| अत: बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार न मात्र लोकपाल कानून को लाये ही, बल्कि सच्चे अर्थों में लोकपाल कानून बनाकर संसद में पेश करे| जिससे देश और देश की जनता को भ्रष्टाचार, अनाचार और गैर-कानूनी कुकृत्यों से मुक्ति मिल सके|


वर्तमान में इस बात की बहस भी चल रही है कि लोकपाल के दायरे में कौन हो और कौन नहीं हो| निश्‍चय ही यह महत्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दा है| जिस पर राष्ट्रीय सोच और राष्ट्रहित के साथ-साथ देश के सभी वर्गों का विशेषकर कमजोर वर्गों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है| अत: प्रस्तावित लोकपाल कानून बनाते समय ध्यान रखा जावे कि-


1. बिना किसी किन्तु-परन्तु के देश का प्रत्येक लोक सेवक लोकपाल के दायरे में आना चाहिये| लोक सेवक के दायरे में छोटे से छोटे जनप्रतिनिधि से लेकर प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति तक हर एक उस व्यक्ति को आना चाहिये जो जनता से संग्रहित धन से वेतन लेता हो या जनता से संग्रहित धन को खर्चे करने के बारे में निर्णय लेने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार रखता हो| जिसमें न्यायपालिका और सेना भी शामिल हों|


2. सभी औद्योगिक घराने, गैर-सरकारी संगठन (चाहे सरकारी अनुदान लेते हों या नहीं), सभी गैर-सरकारी शिक्षण या अन्य संस्थान, खेल संघ और ऐसा प्रत्येक सरकारी या गैर सरकारी या निजी निकाय या उपक्रम जिसके पास जनता से किसी भी कारण से किसी भी रूप में धन संग्रहित करने और उसे खर्च करने का हक हो उसे बिना किसी भी किन्तु-परन्तु के प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना ही चाहिये|


3. सभी प्रकार की ऐसी जॉंच ऐजेंसियॉं, जिन्हें किसी भी प्रकार के मामले की जॉंच करने का हक हो उन्हें भी प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना चाहिये| जिनमें नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों की नियुक्ति, पदोन्नति और बर्खास्तगी का अधिकार केवल लोकपाल के पास ही होना चाहिये|


4. प्रस्तावित लोकपाल कानून में भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तिृत और सुस्पष्ट करने की जरूरत है| जिसमें प्रत्येक ऐसे गैर-कानूनी कृत्य को जिसमें धन, बजट, अनुदान, शुल्क बजट,विज्ञापन, कर आदि को किसी भी प्रकार से धन समावेश हो वह मामला भ्रष्टाचार से सम्बन्धित होने के कारण प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में आना चाहिये| इसके अन्तर्गत समस्त प्रकार का मीडिया, बजट का मनमाना और गैर-कानूनी उपयोग करने वाले लोक सेवकों को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है| इससे मीडिया की मनमानी और ब्यूराक्रेसी की भेदभावपूर्ण कुनीतियों पर भी अंकुश लग सकेगा|


5. प्रस्तावित लोकपाल कानून में यह स्पष्ट रूप से व्यवस्था होनी चाहिये कि इसमें देश के सभी सम्प्रदायों और वर्गों को बारी-बारी से अवसर मिलेंगे| इसमें कम से कम 50 फीसदी स्त्रियों सहित, अल्पसंख्यकों, पिछड़ा वर्ग और दलित-आदिवासी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सशक्त हिस्सेदारी देने की सुनिश्‍चित व्यवस्था भी होनी चाहिये|


6. लोकपाल की औपचारिक नियुक्ति बेशक राष्ट्रपति द्वारा की जावे, लेकिन लोकपाल के चयन का अधिकार किसी भी राजनेता और पूर्व ब्यूरोक्रेट के पास नहीं होना चाहिये| बल्कि लोकपाल का चयन करने के लिये देश के निष्पक्ष कानूनविदों, न्यायविदों और सामाज के निष्पक्ष लोगों के संवैधानिक चयन मण्डल द्वारा होना चाहिये| बाद के चयनों में सेवा निवृत लोकपालों को भी शामिल किया जा सकता है|


7. लोकपाल को हटाने के लिये एक संवैधानिक निकाय होना चाहिये, जिसमें एक भी ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं हो, जो लोकपाल के चयन मण्डल में भागीदार रहा हो| लोकपाल के अधीन सभी लोक सेवकों के विरुद्ध देश के हर एक व्यक्ति को कानूनी कार्यवाही प्रारम्भ कराने के लिये न्यायपालिका के समक्ष अर्जी देने का पूर्ण हक दिया जावे|

11.7.11

SMS भाग भाग डी.के.बोस डी.के.बोस डी.के.बोस

नुक्कड़ से एक बच्चा उम्र  मुश्किल से दस साल होगी SMS बोस डी.के.  बोस डी.के. बोस डी.के. गाता हुआ चला जा रहा था ।  नुक्कड़ मे हंगामा मच गया लोग लोट पोट होने लगे भाई सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी  अचकचा गये बोले हंस क्यो रहे हो भाई और ये SMS कौन है । कही जवाब न मिला उल्टे लोग उनको देख और हंसते थे एक ने तो कमेंटिया भी दिया ये पीएसपीओ के जैसे  SMS भी नही जानता इतना सुनते ही हंगामा और बढ़ गया । दुखी हो शर्मा जी हमारे पास आये  बोले दवे जी आपको हमारी प्यारी मम्मी की कसम है SMS का मतलब बताओ । अब साहब  कसम थी हमने बता दिया बात ऐसी है भाई मन्नू को नौजवानो की मोबाईल भाषा मे SMS कहा जाता है । बात समझते ही शर्मा जी आपे के बाहर हो गये बोले हमारे मन्नू का ये अपमान नही सहेगा हिंदुस्तान अभी पीटता हूं उस बच्चे को सारी अकल ठिकाने आ जायेगी ।


 बड़ी मुश्किल से शर्मा जी को रोका गया  फ़िर समझाया भाई पीटना है तो खुद को पीटो आज देश के बच्चे बच्चे के मुंह मे यह गाना समा रहा है। जिम्मेदार तुम लोग खुद हो सेंसर बोर्ड मे भी भ्रष्टाचारियो को बैठाया है पैसे खाकर अश्लील गाने हो या द्रुश्य आराम से पास हो जाते है । आज जब बच्चो द्वारा माता पिता मित्रो पड़ोसियो और गुरुओं के नाम के साथ यह गाना जोड़ गुनगुनाया जा रहा है तो मीडियानुसार भ्रष्टाचारी मन्नू के साथ क्यों नही जोड़ा जा सकता

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अष्टावक्र

14.4.11

अन्ना जी मतदाता को गाली मत दो! आप एक निश्कलंक व्यक्ति तक नहीं ढूँढ सके!!

अन्ना जी मतदाता को गाली मत दो!
आप एक निश्कलंक व्यक्ति तक नहीं ढूँढ सके!!


यदि गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये| इतिहास के पन्ने पटलकर देखें तो पायेंगे कि जब संविधान बनाया गया था तो किसने सोचा होगा कि पण्डित सुखराम, ए. राजा, मस्जिद ध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संविधान निर्माता डॉ. अम्बेड़कर को गाली देने वाले अरुण शौरी जैसे लोग भी मन्त्री के रूप में संविधान की शपथ लेकर माननीय हो जायेंगे? जब सीवीसी अर्थात् मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया था तो किसी ने सोचा होगा कि इस पद पर एक दिन दागी थॉमस की भी नियुक्ति होगी? किसी ने सोचा होगा कि मुख्यमन्त्री के पद पर बैठकर नरेन्द्र मोदी गुजरात में कत्लेआम करायेंगे? जिससे पूरे संसार के समक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि तहस-नहस हो जायेगी? ऐसे हालातों में हमें हजारे जी कैसे विश्‍वास दिलायेंगे कि जितने भी व्यक्ति आगे चलकर प्रस्तावित जन लोकपाल के शक्ति-सम्पन्न पद पर बिराजमान होंगे, वे बिना पूर्वाग्रह के पूर्ण-सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ राष्ट्रहित में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करेंगे|




डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजनेताओं से निराश और अफसरशाही से त्रस्त भोले देशवासियों द्वारा बिना कुछ जाने समझे कथित गॉंधीवादी अन्ना हजारे के गीत गाये जा रहे हैं| गाये भी क्यों न जायें, जब मीडिया बार-बार कह रहा है कि एक अकेले अन्ना ने वह कर दिखाने का विश्‍वास दिलाया है, जिसे सभी दल मिलकर भी नहीं कर पाये| अर्थात् उन्होंने देश के लोगों में जन लोकपाल बिल पास करवाने की आशा जगाई है| मीडिया ने अन्ना हजारे का गीत इतना गया कि बाबा रामदेव की ही तरह हजारे के बारे में भी कुछ छुपी हुई बातें भी जनता के सामने आ गयी हैं| जिनके बारे में व्यावसायिक मीडिया से आम पाठक को जानकारी नहीं मिल पाती है| जबकि इन बातों को देश के लोगों को जानना जरूरी है| जिससे कि अन्ना के आन्दोलन में सहभागी बनने वालों को ज्ञात हो सके कि वे किसके साथ काम करने जा रहे हैं| कुछ बातें, जिन पर वैब-मीडिया ने काफी माथा-पच्ची की है :-

1. अन्ना हजारे असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस :मुम्बई में हिन्दीभाषी लोगों को जब बेरहमी से मार-मार कर महाराष्ट्र से बाहर खदेड़ा जा रहा था तो अन्ना हजारे ने इस असंवैधानिक और आपराधिक कुकृत्य का विरोध करने के बजाय राज ठाकरे को शाबासी दी और उसका समर्थन करके असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस होने का परिचय दिया| जानिये ऐसे हैं हमारे नये गॉंधीवादी अवतार!

2. अन्ना हजारे ने दो विवादस्पद पूर्व जजों के नाम सुझाये : जन्तर-मन्तर पर अनशन पर बैठते समय अन्ना हजारे ने कहा कि उनके प्रस्तावित जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति का अध्यक्ष किसी मन्त्री या किसी राजनैतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जज को बनाया जायेगा| इस काम के लिये अन्ना हजारे ने दो पूर्व जजों के नाम भी सुझाये|

3. एक हैं-पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा जो संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ के हितों के लिये काम करते हैं : दो पूर्व जजों में से एक हैं-पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा, जिनके बारे में देश को लोगों को जानने का हक है कि आज जे. एस. वर्मा क्या कर रहे हैं? संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ को भ्रष्ट अफसरशाही एवं राजनेताओं के गठजोड़ के कारण भारत की पवित्र नदियों को जहरीला बनाने और कृषि-भूमि में जहरीले कैमीकल छोड़कर उन्हें बंजर बनाने की पूरी छूट मिली हुई है| जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी सही ठहरा दिया है| ये कैसे सम्भव हुआ होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है| ऐसी खतरनाक कम्पनी को देश से बाहर निकालने हेतु देशभर में राष्ट्रभक्तों द्वारा वर्षों से जनान्दोलन चलाया जा रहा है| इस आन्दोलन को कुचलने और इसे तहस-नहस करने के लिये कम्पनी ने अपार धन-सम्पदा से सम्पन्न एक ‘‘कोका-कोला फाउण्डेशन’’ बनाया है, जिसके प्रमुख सदस्य हैं पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा| इसके अलावा सारे संसार को यह भी पता है कि कोका कोला कम्पनी साम्राज्यवादी देशों के हितों के लिये लगातार काम करती रही है| ऐसी कम्पनी के हितों की रक्षा के लिये काम करते हैं, इस देश के पूर्व चीफ जज-जे. एस वर्मा| जिन्हें अन्ना हजारे बिल ड्राफ्ट करने वाली समिति का अध्यक्ष बनाना चाहते थे| देश का सौभाग्य कि बना नहीं सके|

4. दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े जो संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर शोषित एवं दमित वर्ग अर्थात्-दलित, आदिवासी और पिछड़ों के विरुद्ध निर्णय देने से नहीं हिचकिचाये : अन्ना हजारे द्वारा सुझाये गये दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े| जो सुप्रीम कोर्ट के जज रहते संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर आरक्षण के विरोध में फैसला देने के लिये चर्चित रह चुके हैं| जो व्यक्ति देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सी पर बैठकर भी मूल निवासियों को इंसाफ नहीं दे सका हो, जो अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को नहीं त्याग सका हो और हजारों वर्षों से शोषित एवं दमित वर्ग अर्थात्-दलित, आदिवासी और पिछड़ों के विरुद्ध (जिनकी आबादी देश की कुल आबादी का 85 प्रतिशत है) निर्णय देने से नहीं हिचकिचाया हो, उसे अन्ना हजारे जी जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति का चैयरमैन बनाना चाहते थे| देश का सौभाग्य कि बना नहीं सके|

5. वकालती हुनर के जरिये बीस करोड़ सम्पत्ति एक लाख में ले लेने वाले शान्तिभूषण को बनाया सह अध्यक्ष : उक्त दोनों जजों की सारी असलियत अनशन के दौरान ही जनता के सामने आ गयी, तो अन्ना हजारे वित्तमन्त्री प्रणव मुखर्जी को अध्यक्ष एवं अपनी ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शान्तिभूषण को सह-अध्यक्ष बनाने पर सहमत हो गये, जो 1977 में बनी पहली गैर-कॉंग्रेसी सरकार में मन्त्री रह चुके है| हजारे की ओर से समिति के सह अध्यक्ष बने शान्तिभूषण एवं उनके पुत्र प्रशान्त भूषण (दोनों जन लोकपाल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति में हैं) ने 2010 में अपने वकालती हुनर के जरिये इलाहाबाद शहर में बीस करोड़ से अधिक बाजार मूल्य की अचल सम्पत्ति एवं मकान मात्र एक लाख में ले ली और स्टाम्प शुल्क भी नहीं चुकाया|

6. शान्तिभूषण एवं नियुक्त सदस्यों की सत्सनिष्ठा, देशभक्ति एवं देश के संविधान के प्रति निष्ठा के बारे में अन्ना हजारे को कैसे विश्‍वास हुआ : इससे अन्ना हजारे की राजनैतिक एवं भ्रष्ट व्यक्ति को समिति का अध्यक्ष नहीं बनाने वाली बात की असलियत जनता के सामने आ चुकी है| भूषण पिता-पुत्र सहित हजारे की ओर से नियुक्त अन्य सदस्यों की सत्सनिष्ठा, देशभक्ति एवं देश के संविधान के प्रति निष्ठा के बारे में अन्ना हजारे को कैसे विश्‍वास हुआ, यह आज तक देश को अन्ना हजारे ने नहीं बताया है| जबकि इस बारे में देश के लोगों को जानने का पूरा-पूरा हक है|

7. बाबा रामदेव और अन्ना हजारे कितने गॉंधीवादी और अहिंसा केकितने समर्थक हैं? हजारे ने अनशन शुरू करने से पूर्व गॉंधी की समाधि पर जाकर मथ्था टेका और स्वयं को गॉंधीवादी कहकर अनशन की शुरूआत की, लेकिन स्वयं अन्ना की उपस्थिति में अनशन मंच से अल्पसंख्यकों को विरुद्ध बाबा रामदेव के हरियाणा के कार्यकर्ता हिंसापूर्ण भाषणबाजी करते रहे| जिस पर स्वयं अन्ना हजारे को भी तालियॉं बजाते और खुश होते हुए देखा गया| यही नहीं अनशन समाप्त करने के बाद हजारे ने आजाद भारत के इतिहास के सबसे कुख्यात गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को देश का सर्वश्रेृष्ठ मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया| अब यह देशवासियों को समझना होगा कि बाबा रामदेव और आधुनिक गॉंधी अन्ना हजारे कितने गॉंधीवादी और अहिंसा समर्थक हैं?

8. एनजीओ और उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला : अन्ना हजारे ने सेवा के नाम पर विदेशों से अरबों का दान लेकर डकार जाने वाले और देश को बेचने वाले कथित समाजसेवी संगठनों (एनजीओज्) के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, सरकारी बैंकों का अस्सी प्रतिशत धन हजम कर जाने वाले भारत के उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला! आखिर क्यों? क्योंकि इन्हीं सबके मार्फत तो अन्ना के अनशन एवं सारे तामझाम का खर्च वहन किया जा रहा था|

9. अन्ना की मानसिक स्थिति-‘‘देश का आम मतदाता सौ रुपये में और दारू की एक बोतल में बिक जाता है|’’ स्वयं अन्ना हजारे अपनी अप्रत्याशित सफलता के कारण केवल दिल्ली से महाराष्ट्र रवाना होने से पूर्व आम मतदाता को गाली देने से भी नहीं चूके| संवाददाताओं को अन्ना ने साफ शब्दों में कहा कि ‘‘देश का आम मतदाता सौ रुपये में और दारू की एक बोतल में बिक जाता है|’’ अब अन्ना को ये कौन समझाये किमतदाता ऐसे बिकने को तैयार होता तो संसद में आम लोगों के बीच के नहीं, बल्कि अन्ना के करीब मुम्बई में रहने वाले उद्योगपति बैठे होते| अन्ना जी आम मतदाता को गाली मत दो, आम मतदाता ही भारत और स्वयं आपकी असली ताकत हैं| इस बात से अन्ना की मानसिक स्थिति समझी जा सकती है!

10. लोकपाल कौन होगा? ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि हजारे के प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को यदि संसद पास कर भी देती है, तो इस सबसे शक्ति सम्पन्न संवैधानिक संस्था का मुखिया अर्थात् लोकपाल कौन होगा? क्योंकि जिस प्रकार का जन-लोकपाल बिल ड्राफ्ट बनाये जाने का प्रस्ताव है, उसके अनुसार तो लोकपाल इस देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका से भी सर्वोच्च होगा| उसके नियन्त्रणाधीन केन्द्रीय एवं सभी राज्य सरकारें भी होगी और वह अन्तिम और बाध्यकारी निर्णय लेकर लागू करने में सक्षम होगा| बाबा राम देव तो लोकपाल को सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष दर्जा देने की मांग कर रहे हैं|

11. भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति के लोकपालबनने की सम्भावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता : ऐसे में देश के सवा सौ करोड़ लोगों की ओर से मेरा सीधा सवाल यह है कि यदि गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? आने की सम्भावना को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता है| इतिहास के पन्ने पटलकर देखें तो पायेंगे कि जब संविधान बनाया गया था तो किसने सोचा होगा कि पण्डित सुखराम, ए. राजा, मस्जिद ध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संविधान निर्माता डॉ. अम्बेड़कर को गाली देने वाले अरुण शौरी जैसे लोग भी मन्त्री के रूप में संविधान की शपथ लेकर माननीय हो जायेंगे? जब सीवीसी अर्थात् मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया था तो किसी ने सोचा होगा कि इस पथ पर एक दिन दागी थॉमस की भी नियुक्ति होगी? किसी ने सोचा होगा कि मुख्यमन्त्री के पद पर बैठकर नरेन्द्र मोदी गुजरात में कत्लेआम करायेंगे? जिससे पूरे संसार के समक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि तहस-नहस हो जायेगी? ऐसे हालातों में हमें हजारे जी कैसे विश्‍वास दिलायेंगे कि जितने भी व्यक्ति आगे चलकर प्रस्तावित जन लोकपाल के शक्ति-सम्पन्न पद पर बिराजमान होंगे, वे बिना पूर्वाग्रह के पूर्ण-सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ राष्ट्रहित में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करेंगे| विशेषकर तब जबकि जन लोकपाल का बिल ड्राफ्ट बनाने वाली समित के लिये हजारे जी को अपनी ओर से मनवांछित और पूर्व घोषित पैमाने पर खरा उतरने वाला एक अराजनैतिक एवं निश्कलंक छवि का यक्ति नहीं मिल सका!

इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये| अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि इस देश के सभी संवैधानिक निकायों पर नियन्त्रण करने वाला लोकपाल स्वयं अधिनायक बन जाये और भारत की लोकतान्त्रिक विरासत मिट्टी में मिल जाये और, या ऐसा शक्ति-सम्पन्न कोई भी व्यक्ति उन सभी से अधिक भ्रष्ट हो जाये, जिन भ्रष्टों के भ्रष्टाचार की रोकथाम के पवित्र उद्देश्य से हजारे और देशवासियों द्वारा उसे बनाया और रचा जा रहा है? विशेषकर तब जबकि थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भारत सरकार की ओर से यह कहा जा चुका है कि पूरी तरह से निर्विवाद और निश्कलंक छवि का व्यक्ति ढूँढना आसान नहीं है!