30.12.12
माफ करना दामिनी! हम भी गुनाहगार हैं!
19.12.12
कानून के खौफ की सख्त जरूरत
दिल्ली की बस में एक युवती के साथ हुई शर्मनाक घटना जैसी घटनाओं पर अरब का कानून याद आता है। समाज से लेकर सरकार तक कहीं भी इस बाबत शाब्दिक सहानुभूति से आगे कोई अर्थपूर्ण चिंता दूर-दूर तक नजर नहीं आती। लड़कियां कहीं भी खुद को सुरक्षित नहीं पातीं। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर वाले भारत में हालात शायद सबसे शर्मनाक हैं। छेड़छाड़ के मामलों में तो देश के अधिकांश हिस्सों में हालात एक जैसे हैं। इस पीड़ा को नजदीक से महसूस करना है, तो उन कामकाजी महिलाओं व लड़कियों से बात करिये जो प्रतिदिन सफर से लेकर कार्यालय तक में मानसिक यंत्रणा सहती हैं। कोई एक कारण नहीं है बल्कि बड़े सामाजिक मंथन की जरूरत है। जरूरत कानून के खौफ की? क्योंकि कानून लचीला है। मामलों की जल्द सुनवाई के साथ ही सख्त सजाएं ही डर पैदा करती हैं। स्वार्थपूर्ण मुद्दों पर चीखने-चिल्लाने वाले संगठनों को भी इसके लिये आगे आना चाहिए। जो हालात हैं उसमें ज्यादा प्रतिशत लोग बेटियां पैदा करने से डरेंगे ही। इस हकीकत का स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों को कानून का खौफ नहीं है?
29.12.10
"बाल मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?
वहीँ अगर कोई बच्चा अपने और अपने परिवार वालों का पेट पालने के लिए प्लेट धो लेता है तो यह "बाल-मजदूरी" हो जाती है और वहीँ यह दोगली मीडिया उस बात को उछाल-उछाल कर कान पका देती है।
अगर कोई होटल-ढाबे वाला किसी को जीविका देने के लिए "बाल-मजदूरी" करवाने का दोषी हो सकता है तो आज हम सारे लोग जो बड़े मजे से टी.वी. के सामने ठहाके मारते हैं, वाह-वाह करते है, मेरी नज़र में वो सब दोषी हैं "बाल-मजदूरी" करवाने के।
... और मुझे यह भी मालूम है कि अकेले सिर्फ मेरे मानने से भी कुछ नहीं होने को है।
चलता हूँ और आपके लिए कुछ लिंक छोड़ जाता हूँ। धन्यवाद!
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प्रकाश पंकज | Prakash Pankaj
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8.8.08
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते
दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते। यह जान कर मुझ जैसे संविधान पर आस्था रखने वाले लोगों को धक्का लगा होगा क्योंकि लाखों वीरों की शहादतों के बाद अगर हमें आजाद देश में कुछ हासिल हुआ है तो वह है हमारा अपना निजी संविधान जिसको आधार बना कर देश को लोकतांत्रिक तरीके से चला कर सभी के अधिकारों की रक्षा करी जा सकती है। जो लोग कहते हैं कि कानून में खामियां है सत्यतः वे कानून को समझते ही नहीं और बस बकवास कर देते हैं ऐसे लोगों ने कभी संविधान को समझने की चेष्टा ही नहीं करी होती क्योंकि संविधान बनाने वाले लोग मूर्ख नहीं बल्कि देश की आत्मा और उसके घटकों जैसे सभ्यता,धर्म,नैतिकता,भाषा व क्षेत्र की विविधताएं आदि के गहरे जानकार थे लेकिन आज जो स्वरूप अमें दिखाई दे रहा है वह संविधान का सही चेहरा नहीं बल्कि उस पर कब्जा जमा चुके जुडीशियल माफ़िया का है जिसके कारण हमें और हमारे जैसे लोगों को कानून की बात से ही खीझ होने लगती है। अबकी बार यह बयान सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया है नेताओं द्वारा सरकारी आवासों पर किये गए गैरकानूनी कब्जे को लेकर करी जाने वाली कार्यवाही मे सुधार लाकर कठोरता लाने के विषय में है। कार्यपालिका और विधायिका ने मिल कर एक बार फिर माफ़िया का रूप धर लिया है और न्यायपालिका ऐसे लाचार और पंगु सा होकर यह बयानबाजी कर रही है। कुल मिला कर बात यह है कि कानून की बंदिशें सिर्फ़ कमजोर और गरीब लोगों के लिये हैं जो ताकतवर हैं उन्हें कुछ भी अपराध करने पर दोष नहीं लगता। जिन्हें रामचरितमानस की जानकारी है तो वे जानते हैं कि ये सत्य तो गोस्वामी तुलसीदास जी तभी कह गये थे .. समरथ को नहिं दोस गोसाईं....। अब राज ठाकरे हो या सिमी जैसे संगठन ये सब रामचरितमानस के इस सत्य को समझ गये हैं तभी तो पेले पड़े हैं।
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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2.8.08
लोकतंत्र गया तेल लेने........
कल दोपहर को जब मुंबई के सबसे ज्यादा जगमगाते क्षेत्र जुनैद नगर, अंधेरी(पश्चिम) में अपने किसी काम से गया तो नजारा देखा कि युवकों की एक टोली दुकानो में जा-जाकर कुछ पर्चे दे रहे हैं और कुछ ऊंची से आवाज में दुकानदारों को हिदायत(धमकीनुमा) दे रहे हैं। इतना देख कर तो मेरे जैसे प्राणी को कौतूहल स्वाभाविक है कि जान तो लें कि भइए चल क्या रहा है......? दुकानदारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पर्चे हुक्म हैं इस बात का कि यदि मुंबई महानगरपालिका के आदेशानुसार दुकानों के नामों मे बोर्ड एक माह के अंदर मराठी में नहीं करे तो अवधि समाप्त होने के बाद दुकानो को तोड़ दिया जाएगा, आग लगा दी जाएगी; ये "राजा साहब" का आदेश है......। अरे स्स्साला... हमारे तो दिमाग में भोलेनाथ तांडव करने लगे कि जल्दी से पता करो कि देश आजाद हुए इतने साल बाद कहीं फिर से लोकतंत्र समाप्त तो नहींथो गया रातोंरात और राजा-महाराजा अस्तित्त्व में आ गए हों। जब मैंने लपक कर उन युवकों को जादू की झप्पी दी और पूछा कि भाई लोग आप क्या मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी हो या राजा साहब के सिपाही तो उन्होंने हिकारत भरी नजरों से मेरी तरफ़ देख कर बताया कि हम लोग राजा साहब के सैनिक हैं इसपर हमने जान की खैर मांगते अगला सवाल पूंछ लिया कि सेनापति जी ये तो बता दीजिये कि अब हम किस राजा साहब की प्रजा हैं। पता चला कि जब बाळ ठाकरे बालासाहब ठाकरे हो सकता है तो राज ठाकरे राजा साहब ठाकरे क्यों नहीं......? मुंबईवासियों को ये भी नहीं पता कि मुंबई में लोकतंत्र तेल लेने जा चुका है अब वहां राजा-महाराजा राज्य करते हैं। अगर आजादी के बाद हमारे वीरों ने शहादतें देकर कुछ सर्वाधिक मूल्यवान कुछ पाया था तो वह था इस देश में अपना कानून,एक लिखित संविधान जिसे बनाने वाले हर धर्म, जाति,रवायतों और भाषा के साथ-साथ क्षेत्र की भी विशेषताओं को समझते हुए उनका सम्मान करते थे लेकिन ऐसे राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिये उस संविधान को ऐसा बना दिया है जो कि सिर्फ़ इनके इशारों पर नाचने वाली रंडी है(विद्वानजन इन कठोर शब्दों के लिये क्षमा करें किन्तु मैं आहत हूं)।
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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21.6.08
शोषण का पोषण करते ये गुरूघंटाल
सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।
जय भड़ास
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हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा
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2.6.08
वकीलों को विज्ञापन की अनुमति मिली
अब आपको कानूनी पचड़ों से निपटने के लिए निपुण वकीलों की तलाश में भटकना नहीं पडेग़ा। कुछ बंदिशों के साथ वकीलों को अब वेबसाइट पर विज्ञापन का अधिकार मिल गया है। अधिवक्ताओं के लिए नीति निर्धारित करने वाली बार काउंसिल ऑफ इण्डिया (Bar Council of India) ने बार काउंसिल ऑफ इण्डिया के नियमों में संशोधन के बाद विज्ञापन के लिए एक सारणी निर्धारित की है। अधिवक्ता इसके अनुसार ही बिन्दुवार जानकारी वेबसाइट पर जारी कर सकेंगे। इससे अलावा किसी भी तरह का विज्ञापन या विवरण जारी करना एडवोकेट्स एक्ट-1961 के अन्तर्गत व्यावसायिक दुराचरण माना जाएगा। नियमों में संशोधन को मुख्य न्यायाधीश ने मंजूरी दे दी है।
बार काउंसिल ऑफ इण्डिया नियमावली में संशोधन के बाद जारी सारणी के मुताबिक अधिवक्ता अपना नाम, पता, टेलीफोन नम्बर, ई-मेल, नामांकन संख्या, नामांकन की तिथि, स्टेट बार काउंसिल का नाम एवं अधिवक्ता की सदस्यता वाली बार एसोसिएशन का नाम वेबसाइट पर जारी करेंगे। इसके अलावा व्यावसायिक व अकादमिक योग्यता तथा प्रेक्टिस के क्षेत्र मसलन सिविल, फौजदारी, टैक्सेशन, लेबर आदि के बारे में भी जानकारी दे सकेंगे। इसमें उल्लेखित जानकारी के सही होने की घोषणा भी करनी होगी।निर्धारित बिन्दुओं के अलावा किसी तरह के विज्ञापन पर एडवोकेट्स एक्ट-1961 के सेक्शन 35 व 36 के अन्तर्गत अधिवक्ता के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वेबसाइट के अलावा किसी अन्य माध्यम से विज्ञापन पर भी अधिनियम में सख्त पाबंदी है।
साभारः लोकेश के ब्लाग अदालत http://adaalat.blogspot.com से
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हरे प्रकाश उपाध्याय
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12.4.08
नमाज के पाश्चर्स अच्छे फिजिकल एक्सर्साइजेस हैं ,क्या बस यही साइंस मान्य है????
मैं जो भी लिख रही हूं उसके लिये बस मैं ही जिम्मेदार हूं क्योंकि ये मेरी निहायत ही निजी सोच है जिसे आप सब के संग बांट रही हूं, बात ईसा मसीह की ही नहीं हज़रत मुहम्मद साहब की भी है कि अगर उन्होंने उस समय की आस्था पर चोट न करी होती तो आज इस पोस्ट का वजूद न होता इस लिहाज से अगर उस समय रक्षंदा आपा होती तो क्या मौजूदा आस्था के खिलाफ़ उठ कर खड़े हुए नबी की मुखालफ़त करतीं या कुछ और सोच रखतीं। मेरा मानना है कि जैसे आज के हिंदू परिवेश में लोग उनके पूर्वज महाराज मनु(शायद इस्लाम के अनुसार हज़रत नूह अल्ले स्सलाम)के द्वारा बनाई वर्ण व्यवस्था को आज अनुकूल नहीं मानते और न ही भारत का कानून मानता है महाराज मनु की व्यवस्था को लेकिन यहां के नेता मुस्लिम वोट बैंक को नाराज कर पाने की स्थिति न होने के कारण हिंदुओं के लिये अलग कानून और मुस्लिमों के लिये अलग कानून बनाए बैठे हैं। मेरे दिल से पूछो तो मैं क्या और रक्षंदा आपा क्या कोई भी आज के भारत में किसी भी परिस्थिति में चार(नहीं दस)शादियों का पक्षधर होगा(निजी तौर पर खुद रक्षंदा आपा भी शायद ये नहीं चाहेंगी कि उनकी तीन और सौतने हों )। अगर शरीयत(जो कि भारतीय संविधान से पूर्णतया इत्तेफ़ाक नहीं रखने वाली विचारधारा है)इन बातों को जायज मानती है तो कम से कम मैं तो सहमत नहीं हूं और खुलेआम इस वैश्विक मंच पर कहती हूं कि जिस मुल्ला-काज़ी को मेरे खिलाफ़ जैसा फ़तवा देना है दे दे,ये लोग एक आम इंसान को इंसानी जड़ों से काट कर एक अलग किस्म का मखलूक बना चुके हैं इस्लाम के नाम पर,फ़तवे और तकवे के उलझाव ही इनके आनंद के मार्ग हैं। मजह्ब को इन लोगों ने मजाक बना दिया है। कोई भी ये न समझ ले कि मैं ये कमेंट किसी आवेश या भावुकता में आकर दे रहीं हूं बल्कि अपने भीतर झांक कर देख ले कि क्या जो सोच इतनी सख्त हो कि आपको सवाल उठाने तक से रोक दे क्या सही होगी लेकिन आपकी आस्था और श्रद्धा है तो दूसरी तरफ साइंस है,फलसफ़ा है,मेरी निजी सोच है कि अगर अल्लाह तआला भी ऐसा निजाम बनाए है जो कि अक्ल(भले ही कोई उसे दुर्बुद्धि कहे)का इस्तेमाल न करने दे तो फिर आज मैं इबलीस के संग होने का एलान कर रही हूं,फैसले के रोज़ चंद सवाल करने हैं मुझे अल्लाहतआला से,मुझे एक बात ये भी पता है कि सारे दार्शनिक और साइंसदान मुझे दोजख में ही मिलने वाले हैं और मुझे नहीं बख्शवाना है खुद को। अब कोई डर नहीं रहा दिल में कि कुछ बुरा न हो जाए इस लिये जो मन में है बिंदास लिख देती हूं और स्वस्थ हूं आप सब भी स्वस्थ और प्रसन्न रहिये अपनी-अपनी बात कह कर। एक बार फिर से उदारता और कठमुल्लेपन के बीच वैचारिक विवाद है तो जरा मैं अपनी कमरानुमा कमर कस कर तैयार तो हो जाऊं। एक तरफ तो लोग इस तरह की जड़बुद्धि जैसी बाते करते हैं और फिर तमाम बातों को ऐसे भी सिद्ध करते हैं कि वो डेढ़ हजार साल पहले कही गयी बातें बहुत साइंटिफ़िक हैं ,क्यों हमें साइंस की कसौटियों की जरूरत पड़ती है अपनी बात सिद्ध करने के लिये या बस हम साइंस की बस वही बातें मानते हैं जो हमारे पक्ष में प्रतीत होती हैं जैसे कि नमाज के पाश्चर्स अच्छे फिजिकल एक्सर्साइजेस हैं लेकिन अगर धरती पर मानव की उत्पत्ति की या आसमान, ग्रहों, नक्षत्रों की बात चलती है तो हम फिर पोंगापंथी होकर अपना ढपोरशंख की तरह बजने लगते हैं। एक बात और रह गयी है तो लगे हाथ उसे भी उगले दे रही हूं मैंने अपने घर आने वाले अब्बा के कुछ दोस्त मौलानाओं से सुना कि ईसाअल्लेस्सलाम एक बार फिर धरती पर आएंगे और नबी की उम्मत में आयेंगे और अखिरी धर्मयुद्ध क्रिस्तानों और मोमिनों के बीच होगा फिर कयामत आयेगी वगैरह-वगैरह......। क्या ये बातें अगर हैं तो कब लिखी गयी होंगी? क्यों इन बातों में भगवान राम या मुरलीवाले कन्हैया का जिक्र नहीं है? कारण मैं बताती हूं अगर मानना है तो मानो वरना किसे परवाह है मैं तो सच समझ गयी हूं कि अगर आखरात खराब होने का यही सबब है तो ये ही सही...। दरअसल जब इस्लाम पनपा और उससे पहले जितने भी नबी आये चाहे वो हज़रत मूसा हों या ईसा मसीह उनका ही जिक्र उन किताबों में मिलेगा और आखिरी जंग क्रिस्तानों से ही लड़ेंगे क्योंकि उन्हें सबसे नजदीकी प्रबलतम प्रतिद्वंदी वे ही नजर आये.....। जबकि धरती के इस तरफ एक और विकसित सभ्यता पहले से ही मौजूद थी जिस जमीन को लोगों ने आर्यावर्त्त कहा है। इस सभ्यता के लोग बहुत पहले ही विकसित हो चुके थे लेकिन अरब की सभ्यता इधर की सभ्यता के बारे में जानती ही नहीं थी इसलिये वहीं लिखा-पढ़ा जो भी समझा गया विकास क्रम में। हिन्दुओं की एक मान्यता है अवतारवाद जो कि मानती है कि हर युग में विष्णु का अवतार होता है और अभी कलियुग में यह अवतार होना बाकी है जिसका नाम "कल्कि" बताया गया है तो जरा सोचो कि क्या मोमिन उससे जंग नहीं करेंगे या वो बिना किसी संघर्ष के मुसलमान बन जाएगा........???? क्यों नहीं लिखा है ये सब??? इसलिये कि वे लोग इस विकसित सभ्यता से अपरिचित थे। सबको हक है कि वो अपनी सोच और बात रखे आप सहमत नहीं हैं तो जैसे उसने लिखा आप भी शब्दों में ही स्याही से विरोध करें न कि लिखने या बोलने वाले को पत्थर मारें या सूली पर चढ़ा दें अगर आप ऐसे हैं तो ये सोच आदिम है कि आप सभ्यता की राह पर अभी इतने विकसित नहीं हो पाए हैं कि उसका सभ्य तरीके से विरोध करें,अभी भी आपके हाथ में शब्द के विरोध में पत्थर आ जाते हैं। अगर आपको लगता है कि मेरी सोच मैं आप पर थोप रही हूं तो आप स्वतंत्र हैं उसे न मानने के लिये कोई आपकी गरदन पर तलवार नहीं रखेगा, न ही कोई जज़िया लगाएगा। अरे मैंने तो हरे भाई की कविता से भी ज्यादा लिख दिया लेकिन अब तक भड़ास शेष है इस विषय पर जो अगर फिर ऐसा माहौल बना तो निकल पड़ेगी।
भड़ास ज़िन्दाबाद
23.2.08
कानून के पिछवाड़े उंगली नही डालनी चाहिए वहां दांत होते हैं
मुझे बताया गया कि जी न्यूज के जिस जांबाज और दिलेर संवाददाता विजयशेखर ने कानून के पुरोधाओं की एक स्टिंग आपरेशन चला कर यह सिद्ध करा था कि जुडीशियरी में कितना कुत्तापन व्याप्त है ,उसे ही सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस दिया है कि छह सप्ताह के भीतर माफ़ीनामा प्रस्तुत करो वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहो । सारे भड़ासी भाई बहन जान लीजिए कि इस बहादुर ने क्या किया था ,इस पट्ठे ने अपनी खून पसीने की कमाई के मात्र चलीस हजार रुपए खर्च करे और एक थाने में झूठी रपट लिखवा कर वहां के जज महोदय से चार लोगों के खिलाफ़ वारंट निकलवा दिये ;जानते हैं उनमें से दो कौन थे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भारत के चीफ़ जस्टिस वी.एन.खरे । चार्ज लगाया था कि इन लोगों ने एक सोने के व्यापारी को ठगा है .....भौं भौं भौं ....भूं भूं भूं ... कांय कांय कांय...... अभी फटी होगी ।
अबे कितनी बार बोला कि कानून के पिछवाड़े में उंगली नहीं करने का ,अबी भुगत साला ; जैसे एक शाणा वो है जस्टिस आनंद सिंह जिसने जुडीशियरी में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ उंगली उठाई तो आज तक भोग रहा है पूरे परिवार समेत .....
लेकिन भड़ासी लोग अपना एक सल्ला है कि तुम लोग बस होली-बीली का पोस्ट लिखने का ,रंग गुलाल वगैरे का ;जास्ती शाणा बन कर पत्रकारिता करके ऐसा प्रोबलेम में उंगली डाला तो मालुम क्या तेरे कूं ,उंगली इच गायब हो जाएंगी बाप । ये कानून वाला लोग के पिच्छू बी दांत होता है साला उंगली करने वाले की उंगली चबा लेते हैं । अबी सीरियसली होली मनाने का कांयकूं फुकट का टेन्चन लेने का जब अपनी फटेगी तबी चिल्लाने का नईं तो गपचिप बैठ कर औरत लोग का मुक्ति-बिक्ति पर बात करने का ऐसा भंकस में क्या रखेला है भिड़ू, अपन को तो अक्खा लाइफ़ उदर मूं इच नईं करने का । ठी है ना भाई लोग ? चल अबी होली मनाने का........
जय जय भड़ास
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: कानून, जुडीशियरी, झूठी रपट, भ्रष्टाचार




