अरविन्द शर्मा
बदले या नहीं बदले, दूसरों को बदलने की जिद हर किसी पर सवार है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ लोग मुझे बदलने के लिए हर संभव कोशिश....
अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जाएगा...
अरविन्द शर्मा
बदले या नहीं बदले, दूसरों को बदलने की जिद हर किसी पर सवार है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ लोग मुझे बदलने के लिए हर संभव कोशिश....
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अरविन्द शर्मा
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Labels: बदलाव
आप लोगो ने पिछली पोस्ट पढ़ी थी अब मैं आपको शिकायत न करने की कुछ और वजह बताता हूँ.....
रिश्वत देने मे और सिफारिश करने मे हम सबसे आगे होते हैं लेकिन जब अपना काम नही होता है तो कहते हैं की बहुत भर्ष्टाचार बढ़ गया है जिसको देखो रिश्वत मांग रहा है....बच्चे के पैदा होने से पहले उसका लिंग पता करने के लिए रिश्वत कुछ कहो तो कहते हैं की आगे तैयारी करने मे आसानी होती है, उसकी पैदा होने के बाद उसके जन्म प्रमाण - पत्र मे उसकी उम्र बदलवाने के लिए हम रिश्वत देते हैं, जब स्कूल में उसका दाखिला कराना होता है तो किसी अच्छे स्कूल में दाखिला कराने के लिए हम रिश्वत देते हैं चाहे हमारा बच्चा उस स्कूल की पढाई झेलने के लायक हो या नहीं हमें उससे कोई मतलब नहीं हैं, किसी खेल की टीम उसको खिलाने के लिए हम रिश्वत और सिफारिश सब कर लेते हैं, और हमारा बेटा खेल लेता हैं वो भी उस लड़के वो निकाल कर जो हमारे बच्चे से बहुत बेहतर खिलाडी है, चाहे जो करना पड़े खेलेगा हमारा बेटा,
बच्चे ने साल बार पढाई नहीं में अब इम्तिहान में कैसे पास होगा लेकिन कोई बात नहीं तेअचेर को रिश्वत देकर किसी और से पेपर दिलवा देंगे, अगर यह नहीं हुआ तो क्लास में चीटिंग का इन्तेजाम करा देंगे, अगर यह भी नहीं हुआ तो कॉपी में नंबर बडवा देंगे, वर्ना हम कॉपी ही बदलवा देंगे, सब कुछ कर्नेगे लेकिन अपने बच्चे को पास करवा कर छोडेंगे.
बेटा पास हो गया, अब वो बड़ा हो गया है उसको गाडी भी चाहिए लेकिन लाईसेन्स कैसे बनेगा उसकी तो अभी उम्र नहीं हुई है, कोई बात नहीं है हम दलाल से बनवा लेंगे थोड़े पैसे ही तो लगेंगे, गाडी से वो जम कर कानून तोडेगा दो चार लोगो को तोडेगा तो क्या हुआ गलती तो सबसे होती है, हम थानेदार को थोड़े पैसे देकर अपने बेटे को छुड़ा लेंगे क्या हुआ अभी छोटा ही तो है उसकी उम्र ही क्या हैं, नादान है,
अब उसकी नौकरी कैसे लगेगी, पढाई तो उसने की नहीं है लेकिन कोई बात नहीं है हमारे पास पैसा बहुत है, कुछ भी कर कर उसकी नौकरी हम लगवा देंगे, थोड़े पैसे क्लर्क को देंगे, थोडी मिठाई जूनियर मेनेजर को देंगे, थोडी मिठाई और एक नेता का सिफारिश लैटर मेनेजर आगे पढ़े...
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काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif
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सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।
जय भड़ास
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हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा
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Labels: कानून, गुरू, तथ्य, परंपरा, बदलाव, लैंगिक विकलांग, शिक्षा, शोषण
हिंदी मीडिया में बदलाव की बयार
जी नहीं, किसी अखबार में वैकेन्सी खाली है, इस तरह की बात नहीं करने जा रहा। दरअसल, इस एक वाक्य के पीछे छिपे हिंदी प्रिंट मीडिया के आंतरिक बदलाव की सुगबुगाहट को पकड़ने की कोशिश कर रहा। इन दिनों जब हिंदी भाषी उत्तरी भारत में मीडिया घरानों में बच्चा अखबारों के कई संस्करणों के धड़ाधड़ प्रकाशन, कई हिंदी बिजनेस डेली के पदार्पण, कई बड़े हिंदी अखबारों के विस्तार अभियान के तहत उनका नए शहरों से प्रकाशन का दौर चल रहा है तो हिंदी प्रिंट मीडिया के कुशल पत्रकारों का अकाल सा पड़ा हुआ दिख रहा है। यहां मैंने कुशल पत्रकारों के अकाल की बात कही है, उनकी नहीं जो शुद्ध हिंदी लिखने में कांखने लगते हैं और बढ़िया हेडिंव व रीडेबल कापी बनाने में पसीना पोछने लगते हैं। इन कुशल पत्रकारों की मांग हर कहीं है। इसके पीछे साफ साफ वजह मार्केट में बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। अच्छा लेआउट, बढ़िया प्रजेंटेशन, बेहतरीन कापी, कैची हेडिंग, नए तरह के स्टोरी एंगिल....ये सब चीजें देने वाला पत्रकार अगर मिल जाए तो समझो उसे लपकने के लिए हर मीडिया हाउस तैयार है। और ये सब चीजें पुराने जमाने के जड़ियल-सड़ियल पत्रकार देने से रहे।
पुरानों को बाय-बाय, नयों का वेलकम
पुराने जमाने के जड़ियल-सड़ियल पत्रकारों-संपादकों को नए जमाने के स्टोरी एंगिल, तकनीक, प्रजेंटेशन आदि को समझने-बूझने और इनके साथ चलने में ही पूरी ऊर्जा लगानी पड़ रही है। तो ऐसे में अब हर मीडिया हाउस की ख्वाहिश है कि उसकी संपादकीय और कंटेंट टीम को जो लीड करने वाला लीडर हो वो 35 पार का न हो। 35 पार का होने से एक खतरा आउटडेटेड होने व नई चीजों को न पकड़ पाने का है। मतलब, हिंदी मीडिया में 35 पार वालों की पारी अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। 35 से नीचे की नई जमाने की नई पत्रकारीय फौज मैदान में है, हालांकि इसमें भी हर फन में दक्ष लोग कम ही हैं, लेकिन जो भी हैं, उनको जल्द ही नेतृत्वकारी भूमिका में लाए जाने की तैयारी है।
एक मित्र ने बताया कि फलां मीडिया हाउस ने ऐलानिया इनहाउस कह रखा है कि उसे अब अपने एडीटोरियल इंचार्ज के रूप में 35 पार के न्यूज एडीटर नहीं चाहिए। उसे नए जमाने के पत्रकार लीडर के रूप में रखने हैं तभी वो अपने रीडर्स को यूथफुल व नए जमाने का अखबार दे पाएगा।
35 पार की पारी इतनी जल्द तो खत्म नहीं होने जा रही क्योंकि ये बदलाव अमल में लाते लाते कई वर्ष गुजर जायेंगे लेकिन इससे एक चीज स्पष्ट है कि वो जो लोग पत्रकारिता में चमचागिरी, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, चेलहाई, चाटुकारिता आदि को प्रश्रय देते थे, उनके दिन लदने के करीब है। इन चीजों से अखबार को पहले भी भला नहीं होता था लेकिन तब अखबारों में कंटेंट व क्वालिटी की लड़ाई नहीं हुआ करती थी। उस समय स्वामिभक्ति और लायल्टी सबसे पहली चीज होती थी जिसे ये बुजुर्ग पत्रकार बखूबी निभाया करते थे। बाकी उनके नीचे के स्तर पर क्या हो रहा है, संपादकीय टीम में क्या रोष या क्या राग चल रहा है, इससे मालिक का कोई खास लेना देना नहीं होता था। पर अब मालिक को लगने लगा है कि उसे मालिकाना ही करना चाहिए और बढ़िया अखबार निकालने के लिए बढ़िया लोगों को रखना चाहिए। इसी के तहत अब नई उम्र के प्रतिभाशालील नौजवानों को मौका दिया जा रहा है।
नए भी दूध के धुले नहीं
हालांकि कई नए लोगों में भी ये पुराने रोग ठीकठाक घुसा हुआ है और वे भी दूध के धुले नहीं हैं लेकिन जब उन्हें लीड करना होगा तब उन्हें अपनी टीम वाकई मेरिट के आधार पर बनानी पड़ेगी और काम न करने वाले व अन्य वजहों से अपनी नौकरी चलाने वाले कामचोर लोगों को हतोत्साहित करना होगा।
कुल मिलाकर हिंदी मीडिया में आ रहा बदलाव स्वागतयोग्य है। उम्मीद की जानी चाहिए की बाजार के दबाव के बावजूद नए लोग पत्रकारिता के आदर्शों व बाजार की जरूरतों के बीच सामंजस्य बनाकर रख सकेंगे।
विस्तार है अपार
प्रभात खबर बिहार में कई जगहों से लांच होने वाला है और उसे संपादकीय के हर तरह के जूनियर सीनियर लोग काफी संख्या में चाहिए, दिल्ली में चार चार हिंदी के बिजनेस अखबारों की भर्तियां चल रहीं हैं और वहां भी मेरिट को पैमाना रखा जा रहा है, आईनेक्स्ट व कांपैक्ट का धड़ाधड़ नए केंद्रों से प्रकाशन हो रहा है। कांपैक्ट ने तो हफ्ते भर में ही संभवतः चार पांच जगहों से प्रकाशन करके एक तरह से रिकार्ड बनाने का दावा किया है। आज खबर है कि इसका प्रकाशन मेरठ से हो गया और इससे ठीक कुछ दिन पहले गाजियाबाद और देहरादून से प्रकाशन शुरू हुआ। इसी तरह आईनेक्स्ट ने देहरादून के बाद अब पटना और रांची में प्रकाशन की तैयारी शुरू कर दी है। डीएलए नामक अखबार जो अभी तक सिर्फ आगरा से प्रकाशित होता था, अब नोएडा और गाजियाबाद से भी लांच कर दिया गया है और मेरठ से जल्द ही लांच होने वाला है। दैनिक भाष्कर ने लुधियाना से अपना संस्करण लांच किया है और कई नए संस्करण लांच करने की तैयारी में हैं। राजस्थान पत्रिका राजस्थान के बाहर हमला करने के लिए पूरे मूड में है।
इन सब जगहों पर जो टीम लीड कर रही है, वो नौजवानों की टीम है जिन्हें अपने काम और अपनी ऊर्जा पर भरोसा है। ये लोग खुद को साबित भी कर रहे हैं। अब सबसे बड़ी दिक्कत आगे होने वाली क्वालिटी की जंग में खुद को अव्वल रखना है और इसके लिए हर पत्रकार को खुद को टीच और प्रीच करते रहना होगा।
बनना होगा एक बेहतर टीम लीडर
हिंदी पत्रकारिता में नेतृत्वकारी भूमिका में जा रही नौजवानों की टीम को भड़ास की तरफ से ढेरों शुभकामनाएं, साथ में नसीहत भी कि, कभी भी अपने जूनियर का सार्वजनिक तौर पर अपामान न करें। वो जूनियर भी एक दिन आपकी तरह सीनियर बनेगा, इसलिए कोशिश करें कि हमेशा संतुलित व धैर्य के साथ स्थितियों से निपटें। अकारण रोब न गालिब करें, चापलूसों से सावधान रहें, मुखबिरों को बिलकुल प्रश्रय न दें, काम और सिर्फ काम की मेरिट पर अपने सहकर्मियों से नजदीकी या दूर के रिश्ते बनाएं। हमेशा टीम वर्क में विश्वास करें। कमियों को अपने उपर लें और अच्छाइयां की क्रेडिट पूरी टीम को दें। ऐसी ढेर सारी चीजें हैं, जिसे आत्मसात करके ही एक टीम का सर्वमान्य लीडर बना जा सकता है। अपन के तो गुरु वीरेन डंगवाल जी अपनी टेबल पर लिख के रखा करते थे....टीम बुरी नहीं होती, कप्तान बुरा होता है। और ये बात सोलह आने सच है। जैसा कप्तान होगा, वैसी टीम हो जाएगी। तो नौजवान कप्तानों, बुलंद इरादों के साथ चुनौतियों का सामना करो। किस्मत आपके साथ है, समय आपके हक में है, तकनीक व प्रतिभा आपके पास है......जाहिर सी बात है, भविष्य भी आपका और हमारा होगा। आप लोगों के क्या खयाल हैं?
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: चर्चा, बदलाव, बहस, भड़ास, हिंदी मीडिया