Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label लोकतंत्र. Show all posts
Showing posts with label लोकतंत्र. Show all posts

24.10.11

लोकतंत्र,पूंजीवादी नैतिकता और हम-ब्रज की दुनिया

मित्रों,इन दिनों पूरी दुनिया में जनाक्रोश का तूफ़ान आया हुआ है.बारी-बारी से दुनिया के विभिन्न देशों में तानाशाही शासन का अंत हो रहा है.हर जगह जनता बेरोजगारी,महंगाई और सबसे बढ़कर आर्थिक गैरबराबरी से परेशान है.खैर तानाशाहों का अंत हमेशा से इसी तरह होता आया है.इतिहास बार-बार अपने को दोहराता रहता है परन्तु तानाशाह सबक नहीं लेते और फिर वही होता है जो इन परिस्थितियों में होना चाहिए.लेकिन इस बार जनाक्रोश के बबंडर की चपेट में सिर्फ तानाशाही शासन वाले देश ही नहीं हैं बल्कि वे देश भी इसकी जद में हैं जो दुनियाभर में मानवाधिकारों और लोकतंत्र के तथाकथित ठेकेदार बने फिरते हैं.दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े झंडाबरदार और दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका में भी इन दिनों बढ़ती बेरोजगारी,महंगाई और गैरबराबरी से क्षुब्ध जनता पूंजीवाद के सबसे बड़े प्रतीक वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा करने की मुहिम चला रही है.जनता नाराज है कि अमीरपरस्त सरकारी नीतियों के चलते वे गरीब होते जा रहे हैं और उनकी खून-पसीने की कमाई हड़प जानेवाले बैंक धनवान.दुनिया की मात्र ४% जनसंख्या की बदौलत दुनिया की २४% आय पर कब्ज़ा रखनेवाले अमेरिका की आतंरिक स्थिति भी पूंजीवाद की बिडंबनाओं के चलते कमोबेश ऐसी ही है.जहाँ वहां की करीब आधी राष्ट्रीय आय पर सबसे ऊपर के २०% लोगों का कब्ज़ा है वहीँ सबसे गरीब १५% जनसंख्या की राष्ट्रीय आय में सिर्फ ३.४% की हिस्सेदारी है.इतना ही नहीं सबसे ऊपर के १% लोगों का देश की आमदनी के १८% पर गरीबों के दिलों को खटकने वाला अधिकार है.परिणाम आम जनता मुफलिसी की जिंदगी जीने को बाध्य है वहीँ वहाँ के अमीर अपना पैसा कहाँ खर्च करें;की समस्या से जूझ रहे हैं.यूरोप में भी कमोबेश सारी सरकारें कॉरपोरेट जगत के ईशारों पर नृत्य करने में मग्न हैं.ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ?1860 के दशक तक जब अब्राहम लिंकन अमेरिका के राष्ट्रपति थे;तो प्रजातंत्र जनता का,जनता द्वारा और जनता के लिए शासन हुआ करता था.फिर यह विकृत्ति कैसे आ गयी कि कॉरपोरेट जगत परदे के पीछे से कथित लोकतान्त्रिक सरकारों का सूत्रधार बन बैठा.
                     मित्रों,समस्या लोकतंत्र में नहीं है;समस्या है लोकतंत्र के बदलते स्वरुप में.पूंजीवाद तो हमेशा से मुनाफा आधारित व्यवस्था रही है.इस व्यवस्था में धन का केन्द्रीकरण होने की प्रवृत्ति पहले भी थी.हाँ,इतना जरुर था कि पहले पूँजीपतियों के सीने में दिल भी होता था और यह बात भारत सहित पूरी दुनिया के लिए सत्य थी.तब के पूंजीपति दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम में यकीन करते थे.अपने देश में टाटा और बिरला ने अनगिनत मंदिरों,धर्मशालाओं और अस्पतालों का निर्माण कराया.इन्हें कभी इस बात की जरुरत महसूस नहीं हुई कि वे मुकेश अम्बानी की तरह हजारों करोड़ रूपये के माकन में रहें और वो भी उस देश में जहाँ की ८०% जनसँख्या दाने-दाने को मोहताज हो.आजाद भारत के प्रारंभिक दशकों में देश के तकनीकी विकास में टाटा परिवार के योगदान को हम कभी नहीं भूल सकते और अगर ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से कृतघ्न कहे जाएँगे.
           मित्रों,वक़्त बदला और साथ-साथ हमारे जीवन मूल्य भी बदलते गए.उपभोक्तावाद ने पूंजीपतियों को सामाजिक सरोकार से दूर कर दिया और तब कार्ल मार्क्स की प्रसिद्द उक्ति कि पूँजी हृदयहीन होती है सचमुच चरितार्थ होने लगी.पूंजीपति समाज से तो कट ही गए लालच में अंधे होकर धनबल के बल पर सरकारी नीतियों को भी प्रभावित करने लगे.अगर ऐसा नहीं होता तो आज २जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भारत की कई प्रमुख कंपनियों के उच्चाधिकारी तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहे नहीं होते.
         मित्रों,लोकतान्त्रिक देशों के राजनीतिक दलों का स्वाभाव और चरित्र भी पिछले दशकों में तेजी से बदला है.पार्टी फंड में पहले भी पैसों की जरुरत होती थी लेकिन तब जमीर बेचकर पैसा जमा करने का रिवाज नहीं था.आज करप्शन पार्टी के उपनाम से कुख्यात हो चुकी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कभी पार्टी फंड में चवन्निया कार्यकर्ताओं से २५-२५ पैसे करके जमा करवाया था.तब उसके नेता रेलवे के थर्ड क्लास में सफ़र किया करते थे.वायुयान के कैटल क्लास में सफ़र के बारे में भी कल्पना तक तब उनके लिए दूर की कौड़ी थी.हालांकि,तब भी जमनालाल बजाज और धनश्याम दास बिरला ने कई बार पार्टी फंड में अपना अहम् योगदान दिया था लेकिन उनकी मंशा इसके बदले आर्थिक लाभ प्राप्त करने की कतई नहीं थी.आज की स्थिति इसके बिलकुल उलट है.आज का कॉरपोरेट जगत अगर किसी पार्टी के कोष में १ रूपया देता है तो उसकी मंशा बदले में १०० रूपया पाने की होती है.आज देश की चिंता तो न तो जनप्रतिनिधि नेताओं को ही है और न ही पूँजी पर कब्ज़ा जमाए पूंजीपतियों को ही.
               मित्रों,हम देखते हैं कि चुनाव जो किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद होते हैं दिन-ब-दिन महंगे होते जा रहे हैं.कहीं-न-कहीं इसके पीछे पार्टी फंडिंग का बढ़ता जोर तो है ही जनता भी कम दोषी नहीं है.जनता हमेशा प्रत्येक चुनाव में तात्कालिक लाभ के चक्कर में रहती है.वह सोंचती है कि अभी जो मिलता है ले लो बाद का क्या ठिकाना कि क्या हो और क्या नहीं हो.परिणाम यह निकलता है कि चुनावों में धड़ल्ले से पैसे,सामान और शराब बांटे जाते हैं.लालच में अंधी होकर जनता मतदान करती है और भ्रष्ट तत्व चुनाव जीत जाते हैं.हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी भारत के इसी वैशाली से जहाँ मैं इन दिनों रहता हूँ;१९३७ में दीपनारायण सिंह जैसे फक्कड़ ने चुनाव जीता था और वो भी बिहार के धनाढ्यों में अग्रणी श्यामनंदन सहाय को हराकर.तब भी पैसे बांटे गए थे,शराब की बोतलें बाँटीं गयी थीं लेकिन धनबल हार गया था और जनबल की जीत हुई थी.आज ऐसा क्यों नहीं होता?कारण है अविश्वास और समाज में धनबल का बढ़ता महत्व.जनता को अब किसी के भी ऊपर विश्वास ही नहीं रह गया है.धूर्त लोग बगुला भगत बनकर,खुद को गरीब का बेटा कहकर चुनाव जीत जाते हैं और फिर भूल जाते हैं अपने गरीब मतदाताओं को.ऐसे में जनता यह देखती है कि उसे कौन कितना पैसा देता है.वह अपने वोटों की नीलामी करती है और जो सबसे ऊंची बोली लगाता है;जीत जाता है.बाद में लूटते तो सभी हैं-कोऊ नृप होए हमें का हानि.आज जो लोग भी चुनाव जीतते हैं;लगता है जैसे सत्य निष्ठा की नहीं बेईमानी की शपथ लेते हैं.परन्तु इनके राजनीतिक पूर्वज ऐसे नहीं थे.तब के सामाजिक मूल्य और थे और अब और हो गए हैं.तब जनसेवा और ईमानदारी का समाज में महत्त्व था;आज महत्त्व है सिर्फ पैसों का.पैसों के लिए आज का आदमी कुछ भी कर गुजरता है.अब कुछ भी पाप नहीं है,सब पुण्य है और उन पुण्यों में सबसे बड़ा पुण्य है येन केन प्रकारेण पैसा बनाना.
          मित्रों.हम भी वही कर रहे हैं यानि किसी-न-किसी तरह पैसा बना रहे हैं,राजनेता भी वही कर रहे हैं और कॉरपोरेट जगत भी वही कर रहा है.अंतर सिर्फ इतना है कि नेताओं और पूंजीपतियों के हाथों में ज्यादा शक्ति है,संसाधन है इसलिए वे ज्यादा पैसा बना रहे हैं और हमारे हाथों में कम शक्ति और संसाधन है इसलिए हम कम पैसा बना पा रहे हैं.सरकारी तंत्र में ऊपर से नीचे तक जो भ्रष्टाचार का व्यापार चल रहा है उसे कौन चला रहा है?हमहीं न!दिन-रात घूस लेनेवाले अधिकारी-कर्मचारी,नेता और पूंजीपति कोई आसमान से अवतरित नहीं हुए हैं बल्कि वे हमारे बीच से ही हैं.जिस तरह शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका होती है उसी तरह लोकतान्त्रिक शासन की सबसे छोटी इकाई हम हैं.जब कोशिका में विकृति आती है तो कैंसर हो जाता है और जब जनता में विकृत्ति आती है तब?तब लोकतंत्र जनता का,जनता द्वारा और जनता के लिए शासन नहीं रहकर पूंजीपतियों का,पूंजीपतियों द्वारा और पूंजीपतियों के लिए शासन बनकर रह जाता है.इसलिए अगर कहीं सुधार की आवश्यकता है तो हमारी सोंच,हमारे विचारों और हमारे मूल्यों में.यह काम दुनिया की कोई भी सरकार कोई भी सख्त-से-सख्त कानून बनाकर नहीं कर सकती.यह हमहीं कर सकते हैं केवल हम और हम शायद इसके लिए तैयार ही नहीं हैं.हमारी यह आदत बन गयी है कि हम दूसरों पर ऊंगली उठाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं,अपने अन्दर नहीं झांकते.बंधु;यह आत्मालोचना का समय है.अगर हम आत्मालोचन नहीं करेंगे,अपने-आप में सुधर नहीं करेंगे तो एक गद्दाफी के मारे जाने के बाद दूसरा गद्दाफी शासन में आ जाएगा;एक मनमोहन चुनाव हारेगा और उसकी जगह कोई और नहीं बल्कि दूसरा मनमोहन बदले हुए नाम और सूरत के साथ आ जाएगा.हम ठगे जाते रहेंगे और हमें कोई और ठग भी नहीं रहा होगा,हमारा अंतर्मन और हमारी अंतरात्मा खुद हमारे ही हाथों ठगे जाते रहेंगे;चाहे शासन साम्यवादी होगा या पूंजीवादी या फिर मिश्रित;वस्तुस्थिति में कोई अंतर नहीं होगा.

5.10.09

भारत का कारपोरेट लोकतंत्र में रूपान्‍तरण

हरि‍याणा वि‍धानसभा चुनावों में वि‍भि‍न्‍न दलों के द्वारा जि‍स तरह के प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए गए हैं उससे एक चीज साफ है कि‍ अब लोकतंत्र गरीबों का खेल नहीं है। लोकतंत्र में वही प्रत्‍याशी खड़ा हो सकता है जो धनी हो अथवा धनी दल का उम्‍मीदवार हो। यह लोकतंत्र के कारपोरेट लोकतंत्र में रूपान्‍तरि‍त होने की प्रक्रि‍या का संकेत है। जो लोग यह भ्रम पाले हैं कि‍ देश में 'आम आदमी' का लोकतंत्र है उन्‍हें अब कम से कम इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहि‍ए। लोकतंत्र में हि‍स्‍सेदारी के लि‍ए जि‍स तरह कोई शर्त नहीं है वैसे ही उम्‍मीदवार के बारे में भी कोई शर्त नहीं है। कोई भी नागरि‍क उम्‍मीदवार हो सकता है, वह अमीर हो या गरीब हो। अमीर जब लोकतंत्र को चलाएंगे तो शासन कैसा होगा ? प्रशासन का अनुभव कैसा होगा ? लोकतांत्रि‍क हि‍स्‍सेदारी की शक्‍ल क्‍या होगी ? लोकतांत्रि‍क संरचनाओं का भवि‍ष्‍य क्‍या होगा ? इत्‍यादि‍ सवालों पर भारतीय परि‍प्रेक्ष्‍य में गंभीरता से वि‍चार करने की जरूरत है।

हरि‍याणा वि‍धानसभा के लि‍ए वि‍भि‍न्‍न दलों के द्वारा जो प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए गए हैं उनमें सबसे ज्‍यादातर करोड़पति‍ कांग्रेस ने खड़े कि‍ए हैं। 'आम आदमी' का नारा लगाने वाली कांग्रेस ने 90 सदस्‍यीय वि‍धानसभा के लि‍ए 70 करोड़पति‍ खड़े कि‍ए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के वि‍रोध में खड़े दलों ने भी करोड़पति‍ प्रत्‍याशि‍यों को खड़ा कि‍या है। 'नेशनल इलेक्‍शन वाच' नामक संस्‍था ,इसके देश में तकरीबन 1200 स्‍वयंसेवी संगठन सदस्‍य हैं, के द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि‍ मुख्‍य राजनीति‍क दलों ने आधे से ज्‍यादा सीटों पर करोड़पति‍ प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए हैं। इनके पास एक करोड से ज्‍यादा की संपत्‍ति‍ है। चुनाव आयोग में उम्‍मीदवारी का पर्चा दाखि‍ल करने वाले उम्‍मीदवारों में से 489 उम्‍मीदवार करोडपति‍ हैं। जि‍न दलों ने करोडपति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं वे हैं कांग्रेस,भाजपा, बसपा, राष्‍ट्रीय लोकदल,समाजवादी पार्टी। कांग्रेस ने 90 में से 72 करोड़पति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं। आंकडे बताते हैं कि‍ कांग्रेस उम्‍मीदवारों की औसत संपत्‍ति‍ है 5.59 करोड रूपये, भारतीय राष्‍ट्रीय लोकदल के उम्‍मीदवारों की औसत संपत्‍ति‍ है 3.42 करोड,हरि‍याणा जनहि‍त पार्टी 3.03 करोड़, भाजपा 2.23 करोड़, बसपा 2.08 करोड रूपये। कांग्रेस ने 80 प्रति‍शत करोड़पति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं।

वि‍गत वि‍धानसभा के 42 सदस्‍य दोबारा चुनाव लड रहे हैं। इनकी संपत्‍ति‍ में वि‍गत पांच सालों में औसतन 388 फीसदी की बढोत्‍तरी हुई है। औसतन 4.8 करोड रूपये की संपत्‍ति‍ अर्जित की है। एक उम्‍मीदवार ने तो वि‍गत पांच सालों में 5,500 प्रति‍शत संपत्‍ति‍ पैदा की है। ‍

तकरीबन 50 करोडपति‍ उम्‍मीदवार ऐसे हैं जि‍नके पास करोडों की संपत्‍ति‍ है लेकि‍न इन्‍कम टैक्‍स का 'पेन' नम्‍बर तक नहीं है। जबकि‍ सभी बडे वि‍त्‍तीय लेन-देन के लि‍ए 'पेन' कार्ड नम्‍बर का होना कानूनन जरूरी है। कांग्रेस ने 72,राष्‍ट्रीय लोकदल 56,भाजपा 41,बसपा 29 और हरि‍याणा जनहि‍त पार्टी ने 44 करोडपति‍ उम्‍मीदवारों को खड़ा कि‍या है। उल्‍लेखनीय है वि‍गत वि‍धानसभा चुनाव में कुल उम्‍मीदवारों में मात्र 19 प्रति‍शत करोडपति‍ उम्‍मीदवार थे,जबकि‍ इसबार 50 फीसद करोडपति‍ उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। इस बार के चुनाव में फरीदाबाद जि‍ले में 45,गुडगांव 37 और हि‍सार जि‍ले में 37 उम्‍मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। हरि‍याणा में 28 उम्‍मीदवारों पर आपराधि‍क मुकदमे चल रहे हैं। जबकि‍ महाराष्‍ट्र में आपराधि‍क पृष्‍ठभूमि‍ के 132 उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍ महाराष्‍ट्र में आपराधि‍क पृष्‍ठभूमि‍ के ज्‍यादा उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं जबकि‍ हरि‍याणा में करोडपति‍ ज्‍यादा संख्‍या में चुनाव लड रहे हैं। हरि‍याणा में 52.22 प्रति‍शत करोडपति‍,महाराष्‍ट्र में 37.50 प्रति‍शत, अरूणाचल प्रदेश में 28.33 प्रति‍शत करोडपति‍ उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। दूसरी ओर अरूणाचल प्रदेश में एक भी महि‍ला उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में नहीं है,जबकि‍ महाराष्‍ट्र में 4 प्रति‍शत,हरि‍याणा में मात्र 12प्रति‍शत औरतें चुनाव मैदान में हैं। इससे यह भी पता चलता है कि‍ हमारे मीडि‍या प्रचार अभि‍यान का कम से कम राजनीति‍क दलों के ऊपर एकदम राजनीति‍क असर नहीं होता। मीडि‍या का जब राजनीति‍क दलों पर असर नहीं होता तो आम जनता पर कि‍तना असर होता होगा, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। समग्रता में देखें तो मीडि‍या के द्वारा अमीर व्‍यक्‍ति‍ को हमेशा आदर्श पुरूष के रूप में पेश कि‍या जातस है, अपराधी का महि‍मामंडन कि‍या जातस है और औरतों को दोयमदर्जे के नागरि‍क के रूप में रूपायि‍त कि‍या जाता है,ऐसी स्‍थि‍ति‍ में अमीर,अपराधी और पुरूष को चुनावी जंग के मैदान से बेदखल करना संभव ही नहीं है।

13.8.09

लोकतंत्र के हथियारों का गिरता स्टैंडर्ड

अरविन्द शर्मा
ब्लागिंग की दुनियां में एक नयाचेहरा कैलाश राव। लोकतंत्र के तीन हथियारों के गिरते स्टैंडर्ड को लेकर इनका दिल हो रहा है। आपके साथ बांटना चाहते हैं यह अपना दर्द। इनको पता है कि इनके लिखने और कहने से यह रुकने वाला नहीं है।इनकी पहली पोस्ट जरूर पढ़ें और अपनी राय प्रकट करें।
पोस्ट पढऩे के लिए क्लिक करें : आपकी खबर

10.4.09

निरक्षरों के अंगूठा निशान को अंगूठा दिखाते यूपी के अफसर

क्या आपको पता है कि यूपी के अफसर निरक्षर लोगों के अंगूठा निशान को प्रामाणिक नहीं मानते? जी, ऐसा हुआ है। इसी आधार पर एक प्रत्याशी का नामांकन अवैध करार दिया गया। भूमिहीनों और मजदूरों को गोलबंद कर उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाली पार्टी भाकपा (माले) के प्रत्याशी के साथ ऐसी ही हुआ है। अपने नेता का नामांकन खारिज किए जाने से नाराज गरीब और निरक्षर जनता ने चुनाव से पहले ही मतदान का अभियान शुरू कर दिया। इस बारे में डिटेल खबर पढ़ सकते हैं नीचे दी गई तस्वीर को क्लिक करके। सबसे नीचे की तस्वीर में समानांतर मतदान का दृश्य है। इस पूरे मामले के संबंध में जागरूक लोगों के बीच एक अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसे बिलकुल नीचे प्रकाशित किया जा रहा है-


Dear Friend,

Please see the following report in the form of an appeal and let me know if you would like to endorse an appeal to the Chief Election Commission Officer to look into the activities of the administration in Robertsganj and saying that it is unconstitutional to deny illiterate people the right to choose their representatives and propose candidates as well .

Also please find enclosed a report by a Jansatta correspondent on the matter describing the huge turnout in the parallel polls that are being held--it is on page 7 of 10 April, 2009 edition. Please do try to carry news-reports of this matter, in your newspapers/ blogs/ television also.

In solidarity,
Radhika Menon
radhikamenon1@gmail.com
------------------------

for Urgent attention
: Lok Sabha 2009:

Robertsganj: Denying illiterate people the right to choose their representatives, after having stolen their forest rights and public funds.

In a gross violation of the democratic rights of the large mass of people who are illiterate in India and showing utter contempt for their right to elect their own representatives, in Robertsganj, in Sonebhadra district of Uttar Pradesh the candidature of 6 SC-ST candidates have been cancelled only for having proposers who put thumb impressions.

It must be noted that if there is such a high illiteracy levels amongst the dalit adivasi population, the ruling class of this country is singularly responsible for it which has denied the people the right to equitable education. Now after having done that , it is usurping the democratic rights of illiterate people by not recognizing their electoral interventions. In Robertsganj, this is being done after failing to terrorise the people the usual police machinery, assaults, and intimidation. Worse, the administrative machinery in the area is infact trying to forcibly impose candidates on the people.

Amongst the candidates whose candidature has been cancelled, it is that of Jitu Kol, the CPIML candidate. This is an established area of CPIML’s struggle and has been exposing and resisting the scams related to NREGA and forest rights, theft of public funds, feudal and state atrocities(The administration has classified this region as being Naxal affected and has made it a practice to harass tribals going about their daily lives). All this has undoubtedly made it inconvenient and difficult for the ruling class to pursue its loot and terror in the area. And making the excuse of two women proposers who had put their thumb impressions, it has rejected Kol’s candidature.

The case

Take the procedure adopted for the violation in Kol’s case and what becomes evident is the routines of the violation of the democratic rights of the poor, dalits and adivasis:

· Kol submitted his nomination paper on the prescribed form with signatures of 8 proposers and thumb impressions of two other proposers. The women put their impressions in the presence of the Assistant Returning Officer (ARO) who was the authorized officer incharge. The ARO accepted it as per the technical standpoint (chapter V, paragraph No 15.1, p47 of pdf format of the handbook for returning officers available at ECI’s website)

· No communication was made on the day by ARO about any technical flaws after examining the papers.

· Subsequently the Returning officer, Pandhari Yadav, on the final day of scrutiny of the papers summarily rejected the papers arbitrarily, violating the code that there is a presumption of validity unless contrary and if there is doubt , the benefit of doubt should go to the candidate(Chapter VI, para7) saying the ARO had not signed alongside the thumb impression to identify them.

· Note that it was the ARO who accepted the papers, but the burden of the administration’s irresponsibility was passed on to the candidate and Jitu Kol’s nomination was cancelled.

· The same procedure was followed in others cases as well.

The people in the area have come up with their own modes of protest and a parallel election called ‘Put your thumb impression and Save democracy campaign',is being organised by CPIML, a photograph of which I am attaching.


Demand

However what is important is that this violation of the rights of the poor and the illiterate to choose their representatives be not allowed and the candidates whose nominations have been cancelled for the thumb impressions be allowed to contest and the administration take responsibility for its act instead of slapping it on the candidates.

The administration in the meantime has been threatening to invoke National Security Act(NSA), if protest programmes (which have all been peaceful ) continue. As you know disallowing peaceful protest programmes as well as invoking NSA on these grounds is violative of the rights of the people. The police since April 8 have also been raiding the homes of the protestors without arrest warrants at nights. After having denied illiterate people the right to choose their representatives, now will the 15th Lok Sabha elections be conducted in Robertsganj in this manner?

8.4.09

लोकसभा चुनाव-2009 और "कुछ ख्वाहिश"

भारतीय लोकतंत्र के महापर्व की तैयारियाँ चरमकाष्टा पर पहुँच चुकी हैं। साम, दाम, दंड, भेद………… हर हथकंडा अपनाया जा रहा हैं। सत्ता सुख से कोई महरुम नहीं होना चाहता हैं। वादे किये जा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति खुब परवान चढ रही हैं। कोई हाथ काटने पर तुला हैं तो कोई सीने पर रोलर चलवाने पर। लेकिन इन सब के बीच आम आदमी की अवाज कही सुनने को नहीं मिल रहा। एक आम आदमी को क्या चाहिये, इस बात पर कोई भी राजनीतिक पार्टी ध्यान नहीं दे रही।

भारतीय राजनीति में अब सिर्फ़ वहीं खिलाड़ी टिक सकता हैं, जिसके पास अकूत पैसा हो। जिसके पास किसी खास वर्ग का वोट बैंक हो। इस वैश्विक वित्तीय संकट में राजनीति अपना प्रभाव
बढाकर पैसे कमाने का साधन बन गया हैं। खैर यह तो थी कुछ सत्य, जिससे हर कोई वाकिफ़ हैं। अब बात करते हैं, राजनीति से मुझे क्या चाहिये ? और यह मांग लगभग हर युवा हिंदुस्तानी का हैं।

(1) एक सरकार जो देश की गरीब, पीड़ित, संघर्षरत जनता का प्रतिनिधित्व करे।
(2) नेताओं के उम्र सीमा तय करे।
(3) तुष्टीकरण की नीति बंद करे।
(4) युवा शक्ति को राजनीति में अहम किरदार प्रदान करे।
(5) सांप्रदायिकता और जातिवाद की राजनीति बंद करे।
(6) आपराधिक छवि के नेताओं के लिये लोकतंत्र के मंदिर के दरवाजे बंद करे।
(7) दलबदलू नेताओं को राजनीति से बाहर करे।
(8) आतंकवाद के खिलाफ़ सख्त कारवाई करे।
(9) विकलांगो के कल्याण के लिए योजना बनाये।
(10) हर बच्चा स्कूल जायें। शिक्षा की जिम्मेवारी सरकार की हों।
(11) क्षेत्रीय पार्टियों को केंद्र की राजनीति से दुर रखे।
(12) चुनावी काम में लगे सरकारी कर्मचारियों के लिये वोट डालने की समुचित इंतजामात किया जाये।
(13) वोट डालने को अधिकार नहीं, जिम्मेवारी घोषित किया जाये।
(14) आरक्षण की नीति को सिर्फ़ प्राइमरी लेवल तक रखा जाये। आरक्षण माली हलात पर हो, न की जात या धर्म के नाम पर्।
(15) काले धन पर सख्त कानून लाये।


ये "कुछ ख्वाहिश" हैं, जोकि भारतीय लोकतंत्र को एक गतिशील लोकतंत्र बना सकता हैं। अगर आप इनमे से किसी बात से सहमत ने हो, तो कमेंट के जरिये अपनी बात रखे।

Sumit K Jha
http://journalistsumit.blogspot.com

15.3.09

पाकिस्तान के हालत और एक किताब


आज पाकिस्तान के जो हालत हैं, उन्हें देख कर अंदेशा होता है किकहीं फ़िर से फौजी तख्ता पलट न हो जाए। जयपुर से प्रकाशित होने वाले डेली न्यूज़ के रविवारीय परिशिस्ट "हम लोग" में मैं एक स्तम्भ लिखता हूँ "पोथीखाना आज मैंने अपने स्तम्भ में आयशा सिद्दीका कि किताब "मिलिटरी .इंक"कि चर्चा की है। आप मेरी बात पढने के लिए इस पोस्ट के शीर्षक को क्लिक करें तो आप मेरे ब्लॉग पर जाकर इसे पढ़ सकते हैं। शुक्रिया, हम उम्मीद करते हैं कि हमारे पडौस में जल्द ही हालत सुधरेंगे और आम अवाम का मुस्तकबिल बदलेगा।

11.2.09

मुझे सपरिवार इच्छा मृत्यु की इजाजत दो!

कुलदीप द्वारा मौत मांगने के एक साल मार्च महीने में पूरे होंगे। उन्हें अब तक न तो 'मौत' मिली और न जीने लायक छोड़ा गया। भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों-खंभों ने उन्हें कोमा-सी स्थिति में रख छोड़ा है। कुलदीप मीडियाकर्मी हैं। इंदौर में हैं। 'नई दुनिया' से जुड़े रहे हैं। प्रबंधन ने कुलदीप से इस्तीफा देने को कहा था। उन्होंने नई नौकरी न ढूंढ पाने की मजबूरी बताई थी। प्रबंधन ने उनका तबादला कर दिया। बीमार पिता को छोड़ दूसरे शहर में नौकरी करने जाने में असमर्थ रहे कुलदीप। सो, कुलदीप ने रहम की गुहार लगाई।

प्रबंधन को किसी गुहार या बीमार से क्या मतलब! थक हार कर कुलदीप ने 30 मार्च 2008 को राष्ट्रपति को पत्र लिखा। सपरिवार इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी। जाहिर है, पत्र लिखने से पहले कुलदीप ने कई महीने ऐसे हालात झेले जिससे उन्हें मृत्यु वरण करने के लिए मंजूरी मांगने को मजबूर होना पड़ा। ये हालात पैदा किए 'नई दुनिया' प्रबंधन ने। राष्ट्रपति को चिट्ठी भेजने से बस इतना हुआ कि एक पुलिस वाला आया और 'क्यों मरना चाहते हो' सवाल का जवाब कुलदीप के मुंह से सुनकर बयान दर्ज कर ले गया। कुलदीप मामले को लेबर कोर्ट में ले गए तो वहां जाने किसके इशारे पर सिर्फ सुनवाई की तारीख दर तारीख तय हो रही है, हो कुछ नहीं रहा है।

कुलदीप ने जिन दिनों राष्ट्रपति को पत्र लिखा, उनके पिता गंभीर रूप से बीमार हुआ करते थे। आर्थिक तंगी से परेशान कुलदीप पिता के इलाज के लिए दर-दर भटके। एक-एक रुपये इकट्ठा किया। बेहतर इलाज कराने की कोशिश की। पर पिता को बचा न सके। पिता गुजर गए। पिता रेवेन्यू डिपार्टमेंट में पटवारी थे। उनकी पेंशन अब कुलदीप की मां को मिलने लगी है। कुलदीप का इकलौता बेटा 12वीं में है। मां को मिलने वाली पेंशन की रकम से कुलदीप समेत चार जनों का खाना-खर्चा चल रहा है। नून-तेल-साबुन खरीदा जा रहा है। बच्चे की फीस भरी जा रही है।

बरस बीत गए पर दुख-दर्द जस के तस हैं। सिस्टम न्याय करने का भरपूर 'प्रयास' करता दिख रहा है पर हो नहीं पा रहा है। न्याय होगा कब, यह नहीं पता। प्रबंधन से जुड़े लोग दिन दूना रात चौगुना तरीके से फल-फूल रहे हैं। भांति भांति के बहानों से जगह-जगह सम्मानित-सुशोभित हो रहे हैं। पर कुलदीप को कौन पूछे? कुलदीप को न तो लटके-झटके आते हैं और न दांव-पेंच। कुलदीप न तो दंदफंदी हैं और न धंधेबाज। कुलदीप न तो बेइमान बन पाए हैं और न रीढ़ निकाल पाए हैं। कुलदीप में वो सारी खामियां हैं जो इन दिनों के सिस्टम को स्वीकार्य नहीं है क्योंकि सिस्टम केवल एक सिद्धांत से चलता है, और वो है- तुम मुझे लाभ दो, मैं तुम्हें लाभान्वित करूंगा।

कुलदीप पहले दैनिक भास्कर, इंदौर में थे। नई दुनिया ने उनके आवेदन पर उन्हें अपने यहां प्रूफ रीडर के बतौर रखा और छह माह में संपादकीय विभाग का हिस्सा बना देने का वादा किया पर वो छह माह दस साल बाद भी नहीं आया। प्रूफ रीडर पद जब अखबारों में खत्म किए जाने लगे तो नई दुनिया प्रबंधन को कुलदीप भी अतिरिक्त खर्चे की तरह आंखों में खटकने लगे। लाभ कमाने में यकीन रखने वाला मीडिया हाउसों का प्रबंधन घाटे का सौदा भला कितनी देर तक बर्दाश्त करता। कुलदीप से पहले तो सीधे कहा गया कि इस्तीफा दो। कुलदीप ने मना किया तो तबादला कर दिया गया। फिर शुरू हुआ कुलदीप के मुश्किलों का दौर जिसे जीते-जीते लगभग दो वर्ष गुजार चुके हैं।

कुल मिलाकर कुलदीप अभी मरे नहीं हैं, यह एक भौतिक सच है लेकिन अंदर से कुलदीप ने खुद को मरते-जीत कितनी बार देख लिया है, ये उनका दिल जानता है। हर दो महीने बाद आने वाले तीज-त्योहार में खुद को गुम-सुम और बेबस पाने वाले कुलदीप को शिकायत किसी से नहीं है। शायद, गरीब के लिए दुखों-शिकायतों-पीड़ाओं की अति ही इनसे मुक्ति का माध्यम है। इसी मुक्ति के सुबकते अवसादी मनोभाव में कुलदीप ने राष्ट्रपति को जो कुछ लिखकर चिट्ठी के रूप में भेज दिया, उसे हम यहां हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि कृपया पढ़ने के बाद थोड़ी देर दुखी होकर फिर अपने-अपने काम में लग जाएं क्योंकि मंदी काल में ऐसे ढेरों कुलदीप-सुलदीप-प्रदीप मिलेंगे जिनके घर-परिवार का दीया बड़ी मुश्किल से जल रहा है। आखिर किस-किस को राहत देंगे आप। वैसे भी, राहत आजकल वो पाने को उत्सुक हैं जिनके पेट भरे-फूले हैं। गरीब को राहत देना लोक कल्याणकारी राज्य और इसकी लाडली कंपनियों का फर्ज नहीं रहा। लोक कल्याण का काम भी बाजार के हवाले है। बाजार तो बाजार है। इसे सिर्फ रोबोट चाहिए, नोट कमवाने वाले कुशल, पेशेवर और दक्ष रोबोट चाहिए। किसी संवेदनशील, ईमानदार और विचारवान मनुष्य की कतई जरूरत नहीं!

कुलदीप द्वारा राष्ट्रपति को भेज गए पत्र को पढ़ने के लिए क्लिक करें- मुझे मौत चाहिए

2.8.08

लोकतंत्र गया तेल लेने........

कल दोपहर को जब मुंबई के सबसे ज्यादा जगमगाते क्षेत्र जुनैद नगर, अंधेरी(पश्चिम) में अपने किसी काम से गया तो नजारा देखा कि युवकों की एक टोली दुकानो में जा-जाकर कुछ पर्चे दे रहे हैं और कुछ ऊंची से आवाज में दुकानदारों को हिदायत(धमकीनुमा) दे रहे हैं। इतना देख कर तो मेरे जैसे प्राणी को कौतूहल स्वाभाविक है कि जान तो लें कि भइए चल क्या रहा है......? दुकानदारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पर्चे हुक्म हैं इस बात का कि यदि मुंबई महानगरपालिका के आदेशानुसार दुकानों के नामों मे बोर्ड एक माह के अंदर मराठी में नहीं करे तो अवधि समाप्त होने के बाद दुकानो को तोड़ दिया जाएगा, आग लगा दी जाएगी; ये "राजा साहब" का आदेश है......। अरे स्स्साला... हमारे तो दिमाग में भोलेनाथ तांडव करने लगे कि जल्दी से पता करो कि देश आजाद हुए इतने साल बाद कहीं फिर से लोकतंत्र समाप्त तो नहींथो गया रातोंरात और राजा-महाराजा अस्तित्त्व में आ गए हों। जब मैंने लपक कर उन युवकों को जादू की झप्पी दी और पूछा कि भाई लोग आप क्या मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी हो या राजा साहब के सिपाही तो उन्होंने हिकारत भरी नजरों से मेरी तरफ़ देख कर बताया कि हम लोग राजा साहब के सैनिक हैं इसपर हमने जान की खैर मांगते अगला सवाल पूंछ लिया कि सेनापति जी ये तो बता दीजिये कि अब हम किस राजा साहब की प्रजा हैं। पता चला कि जब बाळ ठाकरे बालासाहब ठाकरे हो सकता है तो राज ठाकरे राजा साहब ठाकरे क्यों नहीं......? मुंबईवासियों को ये भी नहीं पता कि मुंबई में लोकतंत्र तेल लेने जा चुका है अब वहां राजा-महाराजा राज्य करते हैं। अगर आजादी के बाद हमारे वीरों ने शहादतें देकर कुछ सर्वाधिक मूल्यवान कुछ पाया था तो वह था इस देश में अपना कानून,एक लिखित संविधान जिसे बनाने वाले हर धर्म, जाति,रवायतों और भाषा के साथ-साथ क्षेत्र की भी विशेषताओं को समझते हुए उनका सम्मान करते थे लेकिन ऐसे राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिये उस संविधान को ऐसा बना दिया है जो कि सिर्फ़ इनके इशारों पर नाचने वाली रंडी है(विद्वानजन इन कठोर शब्दों के लिये क्षमा करें किन्तु मैं आहत हूं)।

26.2.08

धन्य हो लोकतंत्र, धन्य हो बाजार

दिल्ली-मथुरा रोड पर ठीक अगल बगल दो विज्ञापनों के मजमून..

...यहां शराब पीने के लिए हाल में बैठने की व्यवस्था है
(शराब की दुकान के ठीक सामने काफी मोटे मोटे अक्षरों में लिखा हुआ)

...पापा, शराब पीना छोड़े दो, बच्चों से नाता जोड़ लो
(मद्यनिषेध विभाग द्वारा जनहित में प्रसारित)

---अपन का तो यही कहना है कि भइया पहले बिठाकर पिलाते हो, फिर बच्चों की दुहाई देकर, इमोशनली ब्लैकमेल करके छुड़वाते हो...धन्य हो अपन देश का लोकतंत्र...
-----------

दिल्ली-मथुरा रोड पर ही दो और विज्ञापनों के मजमून

....खूब बातें करें, बातें खत्म कर देती है फासलों की दीवार, जीभर करें बातें

....अनचाही काल को रोक दें, बस कुछ रुपये महीने में यह सविधा उपलब्ध है


----अपन का तो कहना है भइया पहले तो खूब बातें करवाकर पैसे बटोरे, और जब इस दौरान फासलों की दीवार टूटने पर लड़ाई हो जाए तो पैसे लेकर उसकी काल रोक दो...धन्य हो इस लोकतंत्र का बाजार...
जय भड़ास
यशवंत